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सुप्रीम कोर्ट ने आखिरकार मुझे मेरे पैरों पर खड़ा कर दिया

जन गण पे न खड़ा हुआ तो ढिशूम!

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केतन बुकरैत
30 नवंबर 2016 (Updated: 14 फ़रवरी 2017, 07:27 AM IST)
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इंजीनियरिंग की थी. की क्या, हो गयी थी. न जाने कैसे. एक दिन रिज़ल्ट आया तो देखा हम ग्रेजुएट थे. घरवालों ने सुबह आंखें खोलीं तो झपकाई ही नहीं. एकटक देख रहे थे. वो मन ही मन मुझसे कुछ कह रहे थे और मैं था कि टेलीपैथी के हर कनेक्शन को रिजेक्ट कर रहा था. ध्यान हटा तो कनेक्शन जुड़ गया. वो मन ही मन मुझसे कह रहे थे, "बेटा, अपने पैरों पर खड़े हो जाओ. चार साल खर्चा किया है, कुछ रिटर्न भी मिले तो बेहतर." सुनते ही मैंने सेकंड इयर में खरीदा लोअर पहना, और जाकर अंदर वाले कमरे में जाकर सो गया.
आज सुप्रीम कोर्ट हम जैसे सिरफिरों के लिए एक वरदान बन चुका है. कुछ देर पहले ही खबर मिली कि थियेटर में हर फ़िल्म के पहले राष्ट्रगान बजेगा. और हर किसी को खड़ा होना पड़ेगा. मेरे घरवाले आज भी मुझसे अपने पैरों पर खड़ा होने की अपेक्षा करते हैं. मैंने उन्हें फ़ोन कर दिया है. मैं अपने पैरों पर खड़ा हो गया हूं. सुप्रीम कोर्ट ने मेरी मदद की है. मैं अबसे थियेटर में फ़िल्म देखूंगा. पूरा दिन. कई बार ऐसा करूंगा कि एक फिल्म का राष्ट्रगान खतम होते ही दूसरे ऑडी में घुस जाऊंगा. वहां के राष्ट्रगान के लिए. क्या है कि मुझे अपने पैरों पर खड़ा होना है.
कहते हैं कि एक कवि न बहुत पहले ही लेफ़्ट के भारत बंद के बारे में लिख दिया था. उसे भविष्य दिखता था. उसने कहा 'तोड़ दे कतार!' ऐसा कवि यूं तो बिरला ही मिलता है मगर हुआ ये है कि एक ही काल में दो-दो कवि हैं जिन्हें भविष्य ज्ञात है. उन्हें शायद ये भी मालूम हो कि विश्व शांति कब मिल सकेगी. उन्हें ये भी मालूम हो कि आडवाणी जी प्रधान मंत्री कब बनेंगे. उन्हें शायद ये भी मालूम था कि ट्रंप अमरीका के राष्ट्रपति बनने वाले हैं. मगर उन्होंने सिर्फ ज़रूरी बात ही बतानी चाही. अच्छा किया. फालतू की बातों पर तो अपन वैसे भी ध्यान नहीं देते. कवि मयूर पुरी ने कहा कि,

"किसी लड़की को छेड़े कोई तो ढिशुमकरे चीटिंग और खेले कोई तो ढिशुममेरे इंडिया को बुरा कहा तो ढिशुमजन गण पे न खड़ा हुआ तो ढिशुम"

कवि ने पहले ही चेता दिया था. आप न माने. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने गुपच लिया. उसने कह दिया कि जन गण मन होना है और जब हो तो खड़ा होना है. अपने पैरों पर. देश के लिए. देश सर्वोच्च है. सर्वोपरि है. सर्वश्रेष्ठ है. सर्वज्ञ है. सर्वे-सर्वा है. देश के लिए आपको खड़े होना पड़ेगा. इसपर कोई अपील भी नहीं हो सकती. कोई रिफरल नहीं. ये देश है. क्रिकेट मैच नहीं. यहां बॉल ट्रैकिंग नहीं होती. यहां देशभक्ति ट्रैकिंग होती है. मगर इन सभी के बीच लोग एक बात भूल गए. सीमा पर जवान खड़ा है. पूरा दिन. साहब, बर्फ़ में घुटने डुबोये खड़ा रहता है. एक नहीं, सैकड़ों. रायफल पकड़े. मोटे-मोटे कपड़ों का बोझ लादे. अंगुलियों में दस्ताने पहने. सीमा पार से आने वाली गोली खाने का खतरा लेकर. और आप? आपका तो बैग भी सिनेमा हॉल के बाहर जमा हो जाता है. आप तो बस आप ही आते हैं. अन्दर टेम्परेचर भी मेन्टेन रहता है. गरमी में एसी चलता है. जाड़े में बगल में गर्लफ्रेंड रहती है. आप 52 सेकंड के लिए खड़े नहीं हो सकते? ये सभी बातें दिल से आती हैं. आप हमारे कहने से खड़े हुए तो क्या खड़े हुए? इतने बड़े हो गए,आपको समझाना पड़ रहा है? जेएनयू से तो नहीं पढ़े न आप?

देखिये साहब, आप ये दलील मत दीजिये कि आपको फ़ोर्स किया जा रहा है. आपको फ़ोर्स से इतनी दिक्कत क्यूं है? आप कश्मीरी हैं क्या? या नॉर्थ ईस्ट से आते हैं? नहीं न? फिर? जन गण मन सुनते ही एक-एक मानुस को इरेक्ट पोज़ीशन में होना चाहिए. यही जीवन है. इस जीवन का यही है, यही है रंगरूप.


अंत में इतना ही कहना है कि तेरी अदाओं पे मरता हूं, लव तुझे लव मैं करता हूं. और ये गाते वक़्त मेरे स्मृतिपटल पर राष्ट्र का ध्वज लहरा रहा है. तीन रंग. क्रमशः भगवा, सुफैद और हरा. हवा में लहर रहा है. मानो दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे में लहलहाते सरसों के फूलों से कहना चाहता हो, "योर मूव, बिच!" ये गाना फ़िल्मी भले हो, मैं देश को समर्पित करता हूं. मैं अपने पैरों पर खड़े होने पास के सिनेमा हॉल में जा रहा हूं. क्यूंकि मैं पोएटिक जस्टिस से डरता हूं. मुझे मालूम है दुनिया का सबसे क्रूर कॉन्सेप्ट है पोएटिक जस्टिस. मुझे पोएट्री भी भायावह लगती है. बुखार देती है. मुझे अगर जाना है तो बस उस पोएट की शरण में जो कहता है "स्विट्टी स्विट्टी स्विट्टी तेरा प्यार चाइदा! स्विट्टी स्विट्टी स्विट्टी त्वाड्डा प्यार चाइदा!"

उस स्विट्टी, स्विट्टी के देश और उसी स्विट्टी के देश की मिट्टी को सलाम. झंडे को सलाम. जय हिन्द!

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