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बढ़ती जा रही है सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच उठा-पटक

जानिए क्या है कॉलेजियम सिस्टम और क्यों है इस पर हायतौबा.

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CJI टीएस ठाकुर और पीएम नरेंद्र मोदी
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19 नवंबर 2016 (अपडेटेड: 19 नवंबर 2016, 12:04 PM IST)
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सरकार और न्यायपालिका के बीच तकरार कोई नई बात नहीं है. दोनों के बीच खिटपिट बनी ही रहती है. नोटबंदी पर मोदी सरकार को फटकार लगाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अब सरकार को एक और झटका दिया है. जिस बात को लेकर दोनों में हमेशा ठनी रहती है, वो है कॉलेजियम सिस्टम. कॉलेजियम सिस्टम जजों के अपॉइंटमेंट की व्यवस्था है. अब उसी कॉलेजियम ने सरकार के एक फैसले को मानने से इनकार कर दिया है. ये फैसला हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति को लेकर था. सरकार ने हाई कोर्ट में नियुक्ति के लिए 43 जजों के नाम रद्द कर दिए थे. अब सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने सरकार के इस फैसले को स्वीकार करने से मना कर दिया है. कोर्ट ने इन नामों को फिर से सरकार को भेजा है. चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर ने अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी को बताया कि कॉलेजियम ने इस पर बात की है. हम इन 43 लोगों की नियुक्ति रद्द नहीं करेंगे. 11 नवम्बर को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि इन 43 नामों पर फिर से विचार किया जाना चाहिए.
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सुप्रीम कोर्ट की बेंच जजों की नियुक्ति में हो रही देरी पर सुनवाई कर रही थी. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा था कि क्या वो पूरी व्यवस्था पर ताला लगाना चाहती है. जजों की नियुक्ति के बारे में इस तरह के लॉगजाम बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. जजों की नियुक्ति में तेजी लानी होगी.

अब केंद्र सरकार को हाई-कोर्ट में इन 43 जजों की नियुक्ति करनी होगी. उसके पास और कोई चारा नहीं है.

हाई कोर्ट में नियुक्त होने वाले जजों के नाम हाई कोर्ट के कॉलेजियम और चीफ जस्टिस के सामने से गुजरने के बाद सरकार तक पहुंचते हैं. सरकार इन नामों पर पुनर्विचार करने को कह सकती है, लेकिन अगर कॉलेजियम इन्हें फिर से सरकार को भेज दे, तो उसे नियुक्ति करनी ही होगी. क्या है कॉलेजियम सिस्टम?
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न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर काफी चर्चा होती है. माना जाता है कि इसमें सरकार का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए. इसीलिए कोर्ट में जजों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम सिस्टम बनाया गया. सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जज, चीफ जस्टिस ऑफ़ इंडिया की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किए जाते हैं. इस बारे में संविधान में आर्टिकल 124(2) और 217 में लिखा गया है. कॉलेजियम कोर्ट की अंदरूनी व्यवस्था है. इसमें सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में जजों की एक पीठ कोर्ट में जजों को नियुक्त करती है. सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम में चीफ जस्टिस के अलावा चार सीनियर जज होते हैं. ये लोग सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति और ट्रांसफ़र की सिफारिशें करते हैं. इस सिस्टम के बारे में संविधान में कहीं कोई जिक्र नहीं है. ये सिस्टम सुप्रीम कोर्ट के तीन केसों के फैसले से आया है. इन केसों को जज केस कहते हैं.
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पहला जज केस, 1981.

'SP Gupta vs. Union of India' केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चीफ जस्टिस ऑफ़ इंडिया अगर जजों की नियुक्ति के बारे में राष्टपति से सिफारिश करता है, तो कुछ ख़ास मामलों में इस सिफारिश को निरस्त किया जा सकता है. इससे जजों की नियुक्ति के मामले में काफी ताकत सरकार के पास चली गई.

दूसरा जज केस, 1993.

'Advocates on record association vs. Union of India' केस में कहा गया की जजों की नियुक्ति में चीफ जस्टिस को पहला अधिकार देना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 'जुडिशियल फैमिली' में चीफ जस्टिस प्रथम है. इसमें कार्यपालिका हस्तक्षेप नहीं कर सकती. यहीं से कॉलेजियम की शुरुआत हुई.

तीसरा जज केस, 1998.

राष्ट्रपति के.आर. नारायणन ने 'चीफ जस्टिस से सलाह' को और ज्यादा विस्तार से बताने का आदेश दिया. ये सलाह वाली बात आर्टिकल 143 में कही गई है. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने 9 गाइडलाइन जारी कीं. इसमें जजों की नियुक्ति और उनके ट्रांसफ़र की बातें थीं. यही व्यवस्था कॉलेजियम कहलाती है.
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  कॉलेजियम से सरकार को क्या दिक्कत है? इस व्यवस्था की आलोचना में कहा जाता है कि इसमें जज ही जजों को चुन लेते हैं. किसी को कुछ पता नहीं चलता. ट्रांसपेरेंसी की कमी है. नियुक्ति किन आधारों और नियम पर होती है, साफ़ नहीं है. किसी को नहीं मालूम कि ये कॉलेजियम कब मिलता है और कब फैसले ले लेता है. सीनियर जजों की इसमें चलती है. गुटबाजी है. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर कॉलेजियम को लेकर कुछ शिकायतें हैं, तो न्यायपालिका उसे दुरुस्त करेगी. सरकार ने इसके खिलाफ क्या किया है? 1998 की एनडीए सरकार ने इसे बदलने के लिए जस्टिस एमएन वेंकटचेलैया कमीशन बनाया था. कमीशन ने इसमें बदलाव का समर्थन किया . उसने नेशनल जुडिशियल अपॉइंटमेंट कमीशन (NJAC) बनाने की वकालत की. NJAC क्या है?
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सरकार ने जजों की नियुक्ति के लिए 2014 में एक बिल पास किया. ये दो दशक पुराने कॉलेजियम सिस्टम को बदलने की कोशिश थी. इस बिल में कॉलेजियम की जगह जजों की नियुक्ति के लिए नेशनल जुडिशल अपॉइंटमेंट कमीशन (NJAC) बनाने की बात की गई. इस कमीशन में छह लोग होंगे. इसमें चीफ जस्टिस ऑफ़ इंडिया, सुप्रीम कोर्ट के दो सीनियर जज, लॉ मिनिस्टर और दो फेमस लोग होंगे. इन दो लोगों को चीफ जस्टिस, प्राइम मिनिस्टर और अपोजिशन लीडर की एक कमेटी नामित करेगी. इसके लिए संविधान में 99वां संशोधन किया गया, लेकिन इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी गई. सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल इसे असंवैधानिक कहकर खारिज कर दिया. पांच जजों की एक बेंच ने ये फैसला सुनाया था. हालांकि, पांच में से एक जज जस्टिस चेलमेश्वर इस बिल के पक्ष में थे. NJAC से क्या दिक्कत है कोर्ट को? इस कमीशन के विरोध में कोर्ट का कहना  है कि इससे न्यायपालिका में सरकार का दखल बढ़ जाएगा. वो खुलकर फैसले नहीं ले पाएगी. सरकार अपने लोगों को कोर्ट में बैठा सकती है. सरकार जजों को रिटायरमेंट के बाद पद देने का वादा करके भी अपनी तरफ कर सकती है. 1973 के केशवानंद भारती केस के हिसाब से सरकार संविधान के मूल ढांचे में कोई बदलाव नहीं कर सकती.

ये स्टोरी निशान्त ने की है.

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