कभी-कभी चिट्ठी नहीं आती. डाकिया आ जाता है. कल शाम ऐसा ही हुआ. दिव्य प्रकाश दुबेआया. हमारे घर. पंचायत जमी. सुबह 4 बजे बर्खास्त हुई. 4 घंटे बाद फिर सदन आहूत होगया. उसी से कुछ छुट्टी लेकर ये लिख रहे हैं. हमारा इतवार धनिया, रायता और परांठोंकी तैयारी से गमक रहा है. आपका भी कुछ ऐसा ही होगा. आदिम खुशबुएं अपनी टीआरपी कभीनहीं खोएंगी. और अब बात इस चिट्ठी की. जो डीपीडी ने जब लिखी, तब लौटी, मगर अब इसेभी एक नया डाकिया मिल गया है. बिजॉय नांबियर. डायरेक्टर. शैतान और वजीर वाला. यानीबच्चन के साथ काम कर चुका आदमी. वो मिला. डाकिये को. आईआईएम उदयपुर में. दोनोंज्ञान देने गए थे. दुबे ने बताया किस्सा खत का. बिजॉय बोला. हम पहुंचा देंगे. तब तकये आप तक भी पहुंचे. - सौरभ द्विवेदी--------------------------------------------------------------------------------तुम्हारे पापा ने मुझे हिम्मत दी अमिताभतीन साल पहले ये चिट्ठी सही में लिख कर अमिताभ बच्च्न को पोस्ट की थी। हाँ कभी जवाबनहीं आया बल्कि कूरियर वापिस आ गया था। कूरियर अभी भी पड़ा हुआ है। कभी अमिताभ बच्चनसे फुरसत में मुलाक़ात होगी तो वही बिन खुला कूरियर उनको दे दूँगा, उनके पास मेरे100 रुपये उधार हैं। डीयर अमिताभ जी , मुझे नहीं मालूम आप ये कभी पढ़ेंगे या नहीं ।इंजीन्यरिंग करके निकले हुए ठीक एक साल होने जा रहा था, नौकरी लगी नहीं थी औरइंजीन्यरिंग वाली नौकरी करने का मन भी नहीं था। 8-June-2006 सुबह तीन बजकर चालीसमिनट,स्थान– पुणे मैंने ‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’ पढ़कर खतम की और किताब में लालऔर नीले रंग की कलम से सैकड़ों लाइंस को underline किया। उनमे से दो हिस्से यहाँ परलिख रहा रहा हूँ । पेज़ नंबर-234 ‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’ मैंने डॉक्टरबी.के.मुखर्जी के पास जाकर कहा ,”डॉक्टर साहब ,आपका इलाज बहुत महंगा है, मेरे पासआपके इलाज के लिए पैसे नहीं...” इसके पूर्व कि मैं कुछ और कहूँ या पूछूँ उन्होनेअपने बदनाम मुँहफट स्वभाव से कहा, “पैसे नहीं हैं तो जाओ मरो!” मुझे जीवन मेंचुनौती से ही बल मिलता है । यदि वे मुझे सौ बरस भी जीने का आशीर्वाद देते तो शायदजीने के लिए संघर्ष करने का मुझमें इतना बल न आता जितना मैंने उनके ‘जाओ मरो’शब्दों से संचय किया । पता नहीं क्यूँ लेकिन लेकिन जब जब भी मैं कहीं से भी rejectहुआ तो ये पंक्तियाँ मुझे याद आती रहीं। हिन्दी लिखने का थोड़ा और पढ़ने का बहुत शौकशुरू से ही था। “क्या भूलूँ क्या याद करूँ” एक मित्र को पढ़ने के लिए दी और जैसा किकिताबों के साथ अक्सर होता है लोग लौटना भूल जाते हैं। दोस्त ने बोला भी कि नयीकिताब ले लो यार 225 रूपय की ही तो है । बात पैसे की नहीं थी। मैं पुणे के बाद लखनऊआया और इसी किताब को वापस लेने कानपुर गया, दोस्त का पूरा घर ऊपर से नीचे करा दियाकेवल इसलिए क्यूंकी इस किताब में मैंने कई जगह लाल, नीले पेन से निशान बना रखे थेवो निशान मेरे थे, उन underlines की कोई कीमत नहीं लग सकती थी। किताब वापिस मिल गयीऔर सबसे पहले मैंने किताब खोल कर यही पंक्तियाँ फिर से चार पाँच बार पढ़ीं । PN.198“क्या भूलूँ क्या याद करूँ” शायद सन’32 की जनवरी का पहला सप्ताह था, मैं प्रकाशक केयहाँ अपनी प्रतियाँ लेने गया। मुझे ढाई सौ प्रतियों का बण्डल दे दिया गया और उसेअपने कंधे पर रखकर मैं ऐसे ही गर्व से चला जैसे पक्षीराज गरुड़ ,भगवान विष्णु कोअपनी पीठ पर बैठकर उड़े जा रहे हों –हाँ मैं उड़ा ही जा रहा था, मेरे पैर जैसे धरतीपर नहीं पड़ रहे थे । मेरी सर्वप्रथम कृति प्रकाशित हो गयी थी ! पहली बार अनुभूतिहुई कि कवि के पहली रचना प्रकाशन उसके लिए उतना ही रोमप्रहर्षक होता है जितनाप्रेयसी का प्रथमालिंगन । रास्ते की एक घटना अविस्मरणीय है । कटरे में एक मेरे एकमित्र रहते थे श्याम गोपाल शिवली । उनके चाचा राम गोपाल शिवली सरकारी शिक्षा-सेवामें किसी पद पर थे। सामने से आते दिखे । पूछा , क्या लिए जा रहे हो बण्डल में ?इससे अधिक सुखद प्रश्न शायद ही जीवन में मुझसे किसी ने पूछा हो । मैंने विभोर होकरकहा “मेरी पहली पुस्तक प्रकाशित हो गयी है !” छायावादी ‘नीरव स्वर’ की कोई सत्ता होतो उसमें यह वाक्य उद्घोषित करता चल ही था था । मैंने बण्डल खोल उनको एक प्रति भेंटकरनी चाही। उन्होने अपनी जेब से एक रुपया निकाला ,कहा “मैं तुम्हारी पहली किताब कीपहली प्रति मुफ़्त नहीं लूँगा, ख़रीदूँगा। पहली ‘बोहनी’ दिन भर की बिक्री का भाग्यनिर्णय करती है, तुम्हारी पुस्तकें लाखों में बिकें !” मेरी माँ कहती थी दिन भर मेंएक बार सरस्वती स्वयं मनुष्य की जिव्हा पर बैठकर बोलती हैं । उस समय राम गोपालशिवली की जिव्हा पर सचमुच सरस्वती बोलीं थीं। इस घटना के ठीक 81 साल बाद जनवरी 2013में मेरी पहली किताब आने वाली है । किताब कहानियों की है । सारी कहानियाँ आज कल हीबोलचाल वाली हिन्दी में लिखी गईं हैं । मेरे बहुत से जानने वालों ने कहा यार हिन्दीकौन पढ़ता है । हिन्दी में क्यूँ लिखते हो लिखना है तो अँग्रेजी में लिखो । हिन्दीमें लिखना ‘Cool’ भी नहीं हैं । मुझे नहीं मालूम मैं हिन्दी में ही क्यूँ लिखता हूँ। आये दिन पढ़ने को भी मिलता है कि आज कल की generation हिन्दी किताबें नहीं पढ़ती ।बावजूद इसके मैंने एक हिन्दी की किताब लिख ली है । किताब का नाम है टर्म्स एंडकंडिशन्स अप्लाई (Terms and Conditions apply). मैं भी आपको एक प्रति भेंट देनाचाहता हूँ लेकिन मुझे बहुत अच्छा लगेगा अगर आप एक प्रति खरीद कर ‘बोहनी’ कर दें ।मुझे नहीं मालूम आप ये कभी पढ़ेंगे या नहीं । लेकिन अगर यहाँ तक पढ़िएगा तो बताइएगाजरूर। सादर , दिव्य प्रकाश दुबे, लखनऊ #sundaywalichithi#storybaazi#संडेवालीचिट्ठी PS:चिट्ठी में कुछ गलतियाँ हैं। उनको जान- बूझ के सहीनहीं किया है। चिट्ठी जैसी गयी थी वैसी ही डाल दी। गलतियाँ सुधारनी जरूर चाहिएलेकिन मिटानी नहीं चाहिये। गलतियाँ वो पगडंडियाँ होती है जो बताती रहती हैं कि हमनेशुरू कहाँ से किया था।