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राहुल गांधी, थाने में बैठे-बैठे अपने पापा-दादी का किया-धरा भी पढ़ लो

वन रैंक वन पेंशन की पूरी बात.

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ऋषभ
2 नवंबर 2016 (अपडेटेड: 3 नवंबर 2016, 02:52 PM IST)
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वन रैंक, वन पेंशन. एक रिटायर्ड सैनिक ने आत्महत्या कर ली. लोग जंतर-मंतर पर खोज रहे हैं उसके घरवालों को. राहुल गांधी और मनीष सिसोदिया उनके घर जा रहे हैं. पुलिस पकड़ रही है दोनों को. राहुल चीख रहे हैं कि मोदी सरकार जवानों के साथ अच्छा नहीं कर रही है. पुलिस छोड़ देती है. राहुल लपक के फिर पहुंचते हैं. पुलिस फिर धर लेती है. राहुल ये नाटक क्यों कर रहे हैं? क्या राहुल ये जानते हैं कि जवानों की दुर्दशा किसने की? 1973 तक तो वन रैंक वन पेंशन मिलता ही था. फिर ये स्थिति कैसे आ गई?
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वन रैंक, वन पेंशन. मतलब एक रैंक से रिटायर हुए लोगों को एक ही पेंशन मिलेगी. चाहे जब रिटायर हुए हों. ऐसा हुआ नहीं है. 1970 में रिटायर होने वाला जवान 2010 में रिटायर हुए जवान से कम पैसे पाता है. जबकि दोनों का खर्चा बराबर है. इसके अलावा उस वक्त पैसे इतने कम मिलते थे कि सेविंग्स भी ज्यादा नहीं थीं. उस वक्त मार्केट में कुछ था भी नहीं इन्वेस्ट करने के लिए. आर्मी के लोगों की ये बहुत पुरानी डिमांड है. देश की सेवा करते हैं. ज्यादा तनख्वाह नहीं है. तो बुढ़ापे में सुरक्षा चाहिए. साथ ही इज्जत. जहां वो अपने लोगों के साथ बैठ के अपने किस्से सुना सकें. पर अपने जूनियरों से भी कम पेंशन पाते हैं जवान. ये कैसा लगेगा किसी को.
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मोदी सरकार ने आश्वासन तो बहुत दिया. फिर एक प्रस्ताव भी लाए. पर वो सैनिकों को जंचा नहीं है. मोदी सरकार तो अपने वादे पर खरी नहीं ही उतरी है. पर राहुल गांधी ने क्या किया था? दस साल तो उनकी ही पार्टी की सरकार बनी रही. क्या वो ये बात नहीं जानते कि ये समस्या इंदिरा गांधी ने ही खड़ी की थी?
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इस मुद्दे की शुरूआत हुई थी बांग्लादेश की लड़ाई के दो साल बाद. 1973 में. इंदिरा सरकार थी. पैसे की बात हुई. गरीबी हटाओ का नारा था. तो आसान रास्ता निकाला गया. पेंशन को सरकारें बिना वजह का खर्च मानती हैं. पेंशन आखिरी तन्खवाह के आधार पर होती है. बिना सेना से पूछे सेना की पेंशन 20 प्रतिशत कम कर दी गई और सिविल की पेंशन 20 प्रतिशत बढ़ा दी गई. कहा गय़ा कि फुल पेंशन के लिए मिनिमम 33 साल की सर्विस करनी पड़ेगी. इसके पहले देश में वन रैंक वन पेंशन था. इसे खत्म कर दिया गया. साथ ही सैनिकों का स्टेटस भी कम कर दिया गया. तीन साल से कम सर्विस के सैनिकों को अनस्किल्ड मजदूर माना गया. ये सब हुआ जब 71 की लड़ाई के फील्ड मार्शल मानेकशॉ रिटायर हो गए. कहा गया कि अब सिविल और आर्मी के पे में बराबरी रहेगी. 1973 के बाद बहुत दिन तक तो सेना ने आवाज नहीं उठाई थी. सेना के लिए सरकार के खिलाफ आवाज उठाना बड़ा मुश्किल था. म्यूटिनी वाली फीलिंग आ रही थी. पर जैसे-जैसे वक्त गुजरा, कम पैसे का अंतर समझ आने लगा. फिर जब आवाज उठी तो कमिटी बना दी गई. जसवंत सिंह, संगमा, विलासराव देशमुख और व्यालार रवि को लेकर. पर इनकी कोई मांग नहीं मानी गई. फिर से नई कमिटी का ऐलान कर दिया गया. 1986 में राजीव गांधी ने एक और काम कर दिया. सेना की बेसिक पे भी घटा दी. रैंक पे का कॉन्सेप्ट ले के आए. बेसिक में से ही काट के रैंक पे बना दिया गया. सारी पोस्ट को रैंक के आधार पर बांट दिया गया. पर सिविल की तुलना में सेना के पोस्ट की रैंक मैच ही नहीं करती थी. पेंशन फिर कम हो गई. सेना के बहुत लोगों को ये समझ ही नहीं आ रहा था. एकदम फ्रस्ट्रेशन हो गई. अब सिविल और सेना के पे में बहुत अंतर आ गया. फिर सेना की तनख्वाह सिविल की तरह बढ़ती भी नहीं. सेना में एक जवान और सिविल में एक चपरासी एक साथ भर्ती हों तो कुछ साल के बाद सेना का जवान बहुत पीछे हो जाता है तनख्वाह के मामले में.
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1987 में कर्नल इंदरजीत सिंह के साथ 14 लोगों ने आमरण अनशन शुरू कर दिया. उनकी दो मांगें मानी गईं. 1964 के पहले की सैनिकों की विधवाओं को पेंशन और रोकी हुई पेंशन का देना. पर बाकी मांगें नहीं मानी गईं. उसके बाद सैनिकों ने मेडल लौटाने शुरू किए. धरने दिए. पर कोई फर्क नहीं पड़ा. 1998 में सेना के एक रिटायर्ड मेजर ने कोर्ट में मामला डाला. सुप्रीम कोर्ट ने इसी केस में फैसला दिया था.
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2008 में मनमोहन सरकार छठा पे कमीशन ले के आई. इसमें रैंक पे खत्म कर दिया गया. इसकी जगह पर ग्रेड पे और पे बैंड लाया गया. इससे कंफ्यूजन और बढ़ गया. पर समस्याएं जस की तस बनी रहीं. उधर सिविल में सरकार ने नए पोस्ट बना दिये जिससे उन पर कोई फर्क ही नहीं पड़ा. इसके बाद सेना की पेंशन और कम हो गई. अब जवानों को लगने लगा कि सेना के लिए सारे इमोशन बातों से हैं. पैसे देने के लिए कोई तैयार नहीं. 2008 में ही सेना के रिटायर्ड जवानों ने जंतर-मंतर पर फास्ट करना शुरू किया. पर सरकार अपनी धुन में थी.
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2011 में भाजपा सांसद भगत सिंह कोश्यारी के नेतृत्व में कमिटी बनी जिसने साफ-साफ कहा कि सेना की मांग जायज है. 2014 में चुनाव के ठीक पहले राहुल गांधी नींद से जागे. अचानक कहना शुरू किया कि सेना की मांग पर विचार किया जाएगा. भाजपा ने तो इसको मुद्दा ही बना लिया. रेवाड़ी में सेना के जवानों की मीटिंग की. बड़े-बड़े वादे किये. जीतने के बाद सुधार करने की कोशिश की पर ये पूरा नहीं था. मर्ज बढ़ता गय़ा.
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अब मौजूदा सरकार ने कुछ तो किया ही है. पर ये पूरा नहीं है. वादे से मुकरना है ये. जो सियाचीन में जाकर मोदी ने जवानों से किया था. टसल तो होगा. देखना ये है कि सरकार कैसे समझती है, कैसे समझाती है.

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