टाइगर ज़िंदा था, टाइगर ज़िंदा है, टाइगर ज़िंदा रहेगा
क्योंकि हमारे मुल्क में भारी मात्रा में 'अंधभक्त' रहते हैं.
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फोटो - thelallantop
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'टाइगर ज़िंदा है'. सलमान की नई फिल्म. उनकी पिछली फिल्मों से कुछ करोड़ और ज़्यादा कमाने वाली फिल्म. फिल्म देखकर आया तो दुखी था. फिल्म बुरी तो है ही लेकिन दुःख की वजह थोड़ी ज़्यादा बड़ी थी. मुझे ऐसा लगा. ये फिल्म भारत के सिनेमाप्रेमियों का भयानक अपमान करती है. उन्हें मूर्खों का एक ऐसा समूह मानती है जिनके सामने जो परोसा जाए, भकोस लेंगे. स्टार के नाम पर सिनेमाघर तक बुलाओ, फिर चाहे कूड़ा पल्ले बांध दो, कोई कुछ नहीं बोलेगा.
मेरे शब्द बहुत तीखे लग रहे होंगे नहीं?
आइए बात करते हैं.

पूरी आर्मी से अकेले भिड़ता टाइगर.
भारत में दो तरह के सिनेमा का हमेशा से चलन रहा है. एक वो, जिसमें कुछ नामचीन कलाकार लिए जाए और तमाम मसालों का छौंक मारते हुए फुल फैन-फेयर के साथ फिल्म रिलीज़ की जाए. दूसरी वो, जहां स्टार की जगह एक्टर्स हो और सीमित संसाधनों में कोई कहानी कहने का प्रयास हो. किसी ज़माने में इन दो तरह की फिल्मों में स्पष्ट विभाजन था. एक कमर्शियल सिनेमा कहलाता था, दूसरा आर्ट सिनेमा.
मल्टीप्लेक्स के ज़माने ने इनके बीच की रेखा को थोड़ा कमज़ोर कर दिया. नए-नए लोग स्थापित कलाकारों के साथ आर्टनुमा फ़िल्में बनाने लगे और उन्हें पसंद करने वालों की भी अच्छी-खासी संख्या पाई जाने लगी. इस हौसलाअफज़ाह सूरतेहाल में भी जब सलमान ख़ान के कद का एक्टर लगातार कचरा डिलीवर करता है, तो बहुत दुःख होता है.

भाई कुछ भी कर सकते हैं.
'टाइगर ज़िंदा है' फिल्म से एक दर्शक को कुछ हासिल नहीं होता. अपने साथ वो घर कुछ नहीं ले जा सकता. हां, मुझे पता है ये दलील आएगी कि सिनेमा अमूमन मनोरंजन के लिए होता है. पर यकीन जानिए बुरी तरह बनाई गई इस फिल्म से वो भी पल्ले नहीं पड़ता. लॉजिक ढूंढना तो पाप है. कुछेक लूपहोल तो मैं बिना याददाश्त पर ज़ोर दिए बता सकता हूं. गिनिए.

मजदूर बना टाइगर.
'टाइगर ज़िंदा है' पर पैसों की बंपर बारिश हो रही है. ये बरसात इस बात को मोहरबंद करती नज़र आती है कि आगे भी फिल्म के नाम पर हमें यही ढर्रा कबूलना पड़ेगा. एक तरफ रीजनल सिनेमा बेशुमार मेहनत करके अच्छी कहानियां, अभिनव प्रयोग हम तक पहुंचा रहा है. दूसरी तरफ बॉलीवुड के बड़े बरगद हमें लगातार एक ही झूला झुलाए दे रहे हैं.
यहां मैं ये नहीं कह रहा कि सलमान ख़ान को आर्ट फ़िल्में करनी चाहिए. बस इतनी सी उम्मीद है कि वो कम से कम तर्क की हत्या तो न होने दे. आमिर की 'दंगल' भी कमर्शियल फिल्म थी और शाहरुख़ की 'चक दे इंडिया' भी. ये फ़िल्में क्लासेस और मासेस दोनों द्वारा बहुत पसंद की गई. सलमान भी चाहे तो ऐसा बीच का रास्ता निकाल सकते हैं. आज सूरज चढ़ा हुआ है लेकिन जब करियर का प्राइम ख़त्म होगा तब? आमिर तो 'दंगल', 'रंग दे बसंती', 'तारे ज़मीन पर' गिनवा देंगे. शाहरुख़ के पास भी 'स्वदेस', 'पहेली', 'चक दे इंडिया' है. सलमान के पास क्या है?

भेड़िये की टाइगर के सामने क्या औकात!
शाहरुख़ की 'जब हैरी मेट सेजल' जब नापसंद की जा रही थी तो बावजूद शाहरुख़ का फैन होने के मैं खुश हुआ था. वो इसलिए क्योंकि ये एक सबक होता उनके लिए. दर्शकों को, फैन्स को मिट्टी का माधो समझ लेना उन्हें बंद करना होगा. सलमान के केस में ये दिख नहीं रहा. तभी 'टाइगर ज़िंदा है' जैसी औसत से कई पायदान नीचे की फिल्म कमाई के रिकॉर्ड पर रिकॉर्ड बना रही है.
पता नहीं इसके लिए किसे ज़िम्मेदार माना जाए. सलमान जैसे एक्टर को जो अपने विशाल फैन बेस का नाजायज़ फायदा उठाता है, या उन दर्शकों को जो अंधभक्त की कैटेगरी में खुद को रजिस्टर करवा चुके हैं? जो अपने फेवरेट एक्टर के नाम पर सिनेमा का मर्डर भी नज़रअंदाज़ करने को तैयार बैठे हैं. जो नहीं समझते कि उनकी ये अंधभक्ति भारतीय सिनेमा का कितना बड़ा नुकसान करती है. 'टाइगर ज़िंदा है' जैसी फिल्मों की सफलता ही राहुल ढोलकिया जैसे डायरेक्टर से 'परजानिया' जैसी कलाकृति के बाद 'रईस' बनवाती है.
जब तक बॉक्स ऑफिस की खिड़की पर स्टार के क़दमों में लोटने को तैयार अंधभक्त उमड़ते रहेंगे, टाइगर का वजूद बना रहेगा. टाइगर ज़िंदा था, टाइगर ज़िंदा है, टाइगर ज़िंदा रहेगा.
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मेरे शब्द बहुत तीखे लग रहे होंगे नहीं?
आइए बात करते हैं.

पूरी आर्मी से अकेले भिड़ता टाइगर.
भारत में दो तरह के सिनेमा का हमेशा से चलन रहा है. एक वो, जिसमें कुछ नामचीन कलाकार लिए जाए और तमाम मसालों का छौंक मारते हुए फुल फैन-फेयर के साथ फिल्म रिलीज़ की जाए. दूसरी वो, जहां स्टार की जगह एक्टर्स हो और सीमित संसाधनों में कोई कहानी कहने का प्रयास हो. किसी ज़माने में इन दो तरह की फिल्मों में स्पष्ट विभाजन था. एक कमर्शियल सिनेमा कहलाता था, दूसरा आर्ट सिनेमा.
मल्टीप्लेक्स के ज़माने ने इनके बीच की रेखा को थोड़ा कमज़ोर कर दिया. नए-नए लोग स्थापित कलाकारों के साथ आर्टनुमा फ़िल्में बनाने लगे और उन्हें पसंद करने वालों की भी अच्छी-खासी संख्या पाई जाने लगी. इस हौसलाअफज़ाह सूरतेहाल में भी जब सलमान ख़ान के कद का एक्टर लगातार कचरा डिलीवर करता है, तो बहुत दुःख होता है.

भाई कुछ भी कर सकते हैं.
'टाइगर ज़िंदा है' फिल्म से एक दर्शक को कुछ हासिल नहीं होता. अपने साथ वो घर कुछ नहीं ले जा सकता. हां, मुझे पता है ये दलील आएगी कि सिनेमा अमूमन मनोरंजन के लिए होता है. पर यकीन जानिए बुरी तरह बनाई गई इस फिल्म से वो भी पल्ले नहीं पड़ता. लॉजिक ढूंढना तो पाप है. कुछेक लूपहोल तो मैं बिना याददाश्त पर ज़ोर दिए बता सकता हूं. गिनिए.
1. भेड़ियों से घिरा हुआ छोटा बच्चा इतना सामान्य है जैसे पालतू बिल्ली से खेल रहा हो. (मुमकिन है?)इतने तो एक सांस में याद आ गए. दिमाग पर ज़ोर दूं तो और निकल आएंगे. कहने का मतलब ये कि इतने बड़े प्रोजेक्ट में जब इतनी वाहियात चीज़ें मिलती हैं तो मन वितृष्णा से भर जाता है. सलमान इस मामले में बेशर्मी की हद तक ढीठ हो गए हैं. उनके नाम पर फ़िल्में चलती हैं. इसे वो ज़िम्मेदारी की तरह नहीं लेते नज़र आते. दर्शकों को फॉर ग्रांटेड लेते रहना उन्हें बिज़नेस तो शायद भरपूर दे लेकिन सिनेमा का इतिहास उन्हें माफ़ नहीं करेगा.
2. 40 नर्सें बंधक हैं. रॉ के अधिकारी मिनिस्ट्री में सिर्फ 25 बताते हैं क्योंकि 15 तो पाकिस्तानी थीं. (जैसे नर्सों के बंधक बना लिए जाने की ख़बर किसी और को होगी ही नहीं! भई बड़ी वारदात है, न्यूज़ वाले दिखाएंगे, पाकिस्तान भी तो अपने लोगों की सुध लेगा कि नहीं? ये बात कोई छुपने वाली है?)
3. सीआईए का कोई अधिकारी रॉ के शिनॉय साहब को नर्सों को बचाने के लिए 7 दिन की मोहलत देता है. बिना किसी से मशवरा किए. (सीआईए न हुई मोहल्ला सुधार कमिटी हुई, जहां अध्यक्ष का वचन ही शासन है.)
4. टाइगर और उसकी टीम इराक की रिफाइनरी में बिना किसी वेरिफिकेशन के आसानी से नौकरी पा जाती है. (जैसे सद्दाम से सिफारिशी लैटर लिखवा के लाए हो. वाह भाईजान वाह.)
5. आल्प्स की पहाड़ियों में ज़ोया को पीछे छोड़ आए टाइगर की मदद को ज़ोया ऐन उस वक़्त इराक में टपक पड़ती है जब वो जान से जाने वाला होता है. (क्यों, कैसे, हाउ पूछना मना है.)
6. टाइगर को मारने के लिए कमरे में ज़हरीली गैस छोड़ी गई है. भाई की जान नाक पर मफलर बांधने भर से बच जाती है. (गैस में ज़हरीला क्या हुआ फिर! या फॉग का डियो छिड़का था?)
7. नर्स के शरीर से बंधे बम को डिफ्यूज करने के लिए कौन सी वायर काटनी है, ये हमारे 'एक्सपर्ट' साहब नर्स से ही पूछते हैं. जो वो कहती है उसे काट भी देते हैं. (जीज़स! ये न भूला जाए कि इन साहब को टाइगर ने ख़ास चुना था और उनकी कार्यकुशलता के गीत गाए थे.)
8. बम डिफ्यूज फिर भी नहीं होता. तो क्या उपाय है फिर? सिंपल. जैकेट ही निकाल दो. दो जगह से काटा और जैकेट अलग. (अजीब घामड़ आदमी था जिसने इस तरह का बम नर्स पे चिपकाया था. जब इतनी आसानी से ही बम शरीर से अलग होना था, तो इतनी कंपकंपी काहे छूट रही थी?)
9. भारत का एक अंडरकवर एजेंट अमेरिकी सेना के पास जाता है और उनसे कहता है भाई इत्ते बजे, इस जगह पर हमला बोल दियो. हमें ध्यान भटकाना है. वो भी ऐसे आज्ञाकारी कि 'जी भाईजान' कहके मान लेते हैं. (बाप का राज है क्या?)
10. पाकिस्तान की एक जासूस अमेरिकी सेना की टीम को ऑर्डर देती रहती है कि ये करो, ये न करो वगैरह. (जहां तक मुझे याद है पाकिस्तान-अमेरिका वाले इक्वेशन में हुक्म देने वाले एंड पर हमेशा अंकल सैम के मुल्क वाले ही रहते आए हैं. तीन दिन की छुट्टी में वर्ल्ड पॉलिटिक्स बदल तो नहीं न गई है? मैं न्यूज़ देख नहीं पाया तीन दिन से.)
11. 300 के करीब गार्ड्स को एक्शन से बाहर करने का क्या तरीका है? सिंपल. पहले कुछ दवाई बनाओ. फिर उसे उनके खाने में मिलाओ. फिर सबके एक साथ खाने का इंतज़ार करो. उधर फ़ूड पॉइजनिंग की दवा की 150 शीशियों में सिडेटिव भर दो. साले जब खाना खा के, बीमार हो के इंजेक्शन लगवाएंगे तो बेहोश हो जाएंगे. (यूनेस्को ने इस प्लान को बेस्ट प्लान घोषित कर दिया है.)
12. क्लाइमैक्स तो कहर है. खूंखार आतंकी संगठन का दुर्दांत आतंकवादी मुखिया टाइगर के सामने अकेले पेश हो जाता है. बिना किसी अमले के. (ताकि उस मरघिल्ले को हट्टा-कट्टा भाई पटक के मार सके. जाओ यार, इतने बड़े आतंकी संगठन की नाक काट दी. उस पर कहर ये कि ये आतंक वाले भैया भाई को मारने तीन इंच का चाकू ले के आए हैं. बताओ!)

मजदूर बना टाइगर.
'टाइगर ज़िंदा है' पर पैसों की बंपर बारिश हो रही है. ये बरसात इस बात को मोहरबंद करती नज़र आती है कि आगे भी फिल्म के नाम पर हमें यही ढर्रा कबूलना पड़ेगा. एक तरफ रीजनल सिनेमा बेशुमार मेहनत करके अच्छी कहानियां, अभिनव प्रयोग हम तक पहुंचा रहा है. दूसरी तरफ बॉलीवुड के बड़े बरगद हमें लगातार एक ही झूला झुलाए दे रहे हैं.
यहां मैं ये नहीं कह रहा कि सलमान ख़ान को आर्ट फ़िल्में करनी चाहिए. बस इतनी सी उम्मीद है कि वो कम से कम तर्क की हत्या तो न होने दे. आमिर की 'दंगल' भी कमर्शियल फिल्म थी और शाहरुख़ की 'चक दे इंडिया' भी. ये फ़िल्में क्लासेस और मासेस दोनों द्वारा बहुत पसंद की गई. सलमान भी चाहे तो ऐसा बीच का रास्ता निकाल सकते हैं. आज सूरज चढ़ा हुआ है लेकिन जब करियर का प्राइम ख़त्म होगा तब? आमिर तो 'दंगल', 'रंग दे बसंती', 'तारे ज़मीन पर' गिनवा देंगे. शाहरुख़ के पास भी 'स्वदेस', 'पहेली', 'चक दे इंडिया' है. सलमान के पास क्या है?

भेड़िये की टाइगर के सामने क्या औकात!
शाहरुख़ की 'जब हैरी मेट सेजल' जब नापसंद की जा रही थी तो बावजूद शाहरुख़ का फैन होने के मैं खुश हुआ था. वो इसलिए क्योंकि ये एक सबक होता उनके लिए. दर्शकों को, फैन्स को मिट्टी का माधो समझ लेना उन्हें बंद करना होगा. सलमान के केस में ये दिख नहीं रहा. तभी 'टाइगर ज़िंदा है' जैसी औसत से कई पायदान नीचे की फिल्म कमाई के रिकॉर्ड पर रिकॉर्ड बना रही है.
पता नहीं इसके लिए किसे ज़िम्मेदार माना जाए. सलमान जैसे एक्टर को जो अपने विशाल फैन बेस का नाजायज़ फायदा उठाता है, या उन दर्शकों को जो अंधभक्त की कैटेगरी में खुद को रजिस्टर करवा चुके हैं? जो अपने फेवरेट एक्टर के नाम पर सिनेमा का मर्डर भी नज़रअंदाज़ करने को तैयार बैठे हैं. जो नहीं समझते कि उनकी ये अंधभक्ति भारतीय सिनेमा का कितना बड़ा नुकसान करती है. 'टाइगर ज़िंदा है' जैसी फिल्मों की सफलता ही राहुल ढोलकिया जैसे डायरेक्टर से 'परजानिया' जैसी कलाकृति के बाद 'रईस' बनवाती है.
जब तक बॉक्स ऑफिस की खिड़की पर स्टार के क़दमों में लोटने को तैयार अंधभक्त उमड़ते रहेंगे, टाइगर का वजूद बना रहेगा. टाइगर ज़िंदा था, टाइगर ज़िंदा है, टाइगर ज़िंदा रहेगा.
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