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वो गैंगस्टर, जो कांग्रेस से जीता और सड़क पर दौड़ाकर मार डाला गया

राम गोपाल वर्मा वंगावीटी मोहन रंगा पर फिल्म रिलीज करने जा रहे हैं.

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5 दिसंबर 2016 (अपडेटेड: 5 दिसंबर 2016, 07:11 PM IST)
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रामगोपाल वर्मा अपनी फिल्म 'वंगावीटी' रिलीज करने जा रहे हैं. ये फिल्म आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा के इतिहास के सबसे बड़े खूनी खेल पर बनी है. लेकिन विवादों से रामू की पुरानी दोस्ती रही है इसलिए ये फिल्म भी विवादों में आ गई है. इस फिल्म को रामू ने फरवरी में अनाउंस किया था. इस कहानी से जुड़े परिवार कह रहे हैं कि ये केस अभी कोर्ट में है. इस पर फिल्म बनाना ठीक नहीं है.
ये कांग्रेस के नेता और गैंगस्टर वंगावीटी मोहन रंगा की कहानी है जिसने अस्सी के दशक में विजयवाड़ा पर राज किया था. दो गुटों के बीच के गैंगवार की कहानी. दो जातियों के संघर्ष की कहानी. जैसा अनुराग कश्यप की 'गैंग्स ऑफ़ वासेपुर' में दिखाई दिया था. राम गोपाल वर्मा इससे पहले भी आंध्र प्रदेश के एक गैंगवार पर 'रक्तचरित्र' बना चुके हैं.
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फिल्म का पोस्टर
तो कौन है ये वंगावीटी मोहन रंगा वंगावीटी रंगा की लाइफ वाकई में किसी थ्रिलर से कम नहीं है. उसकी लाइफ और उसकी मौत की कहानियां आज भी साउथ में समुन्दर किनारे टहलती रहती हैं
रंगा का इतिहास शुरू होता है 70 के दशक में. तब विजयवाड़ा में गैंगवार चलते थे. इसकी स्टूडेंट पॉलिटिक्स, जातीय तनाव, क्रिमिनल पॉलिटिक्स की वजह से.
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वंगावीटी मोहन रंगा

रंगा का दौर ऐसा था कि विजयवाड़ा की क्रिमिनल हिस्ट्री को दो भागों में देख सकते हैं. रंगा के पहले और रंगा के बाद. रंगा से पहले का विजयवाड़ा तब विजयवाड़ा पर कम्युनिस्टों का दबदबा हुआ करता था. वहां कांग्रेस ही दूसरी बड़ी पार्टी थी. कम्युनिस्ट पार्टी का अगुआ वेंकट रत्नम था. स्टूडेंट और मजदूर संगठनों का लीडर. वेंकट रत्नम रंगा के परिवार का सपोर्टर था इसलिए रंगा का बड़ा भाई वंगावीटी राधा कृष्णा, वेंकट का चेला बन गया.
विजयवाड़ा तब तेजी से डेवलप कर रहा. ऐसे मौकों में अपराध भी जमकर फलते-फूलते हैं. विजयवाड़ा समुद्र के किनारे था. तब यहां का सबसे बड़ा बिजनेस ट्रांसपोर्ट का था.
अपना पैर जमाने के लिए राधा कृष्णा ने विजयवाड़ा के लेनिन सेंटर में एक ऑटो स्टैंड शुरू किया. वेंकट को ये बात पसंद नहीं आई. ट्रांसपोर्ट के बिजनेस में वेंकट का दबदबा था. दोनों के बीच टकराव शुरू हो गए. वेंकट रमन के समर्थकों ने इसके जवाब में एक और ऑटो स्टैंड ऑटो नगर में खोल दिया.
ये लपट तब और बढ़ गई जब राधा कृष्णा ने United Independent Organisation (UIO) नाम से एक स्टूडेंट यूनियन बना लिया. तब तक यहां कम्युनिस्ट समर्थन वाला All India Student Federation (AISF) ही सक्रिय था. इससे स्टूडेंट पॉलिटिक्स में दो फाड़ हो गए. तनाव बढ़ने लगा. और लगभग रोज झड़पें होने लगीं. वेंकट रमन का ट्रांसपोर्ट का काम दत्ती कनका राव देखता था. उसकी ह्त्या कर दी गई. यहां से खून-खराबा शुरू हो गया.
राधा कृष्णा के आदमी दुर्गा का दूसरे गुट ने मर्डर कर दिया. कुछ महीनों में कृष्णा के एक और आदमी हनुमता को भी मार डाला गया. इससे राधा कृष्णा उबल पड़ा. उसके आदमियों ने कम्युनिस्ट नेता वेंकट रमन को मार डाला. उसका मर्डर इतने भयानक तरीके से किया गया कि बाद में उसके शरीर पर चाक़ू के 72 गहरे घाव मिले. इस मर्डर से विजयवाड़ा में सनसनी फ़ैल गई. बाद में इस मर्डर की वजह से राधा कृष्णा और उसके दस आदमियों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई.
इससे राधा कृष्णा का दबदबा कायम हो गया था. जेल में रहकर भी विजयवाड़ा में उसकी ही चलती थी. उसकी बात कोई काट नहीं सकता था. दो साल तक उसने विजयवाड़ा पर राज किया. लेकिन दो साल बाद वेंकट रत्नम गुट ने उसकी हत्या कर दी. वंगावीटी मोहन रंगा की एंट्री यहां से मोहन रंगा का उभार शुरू हुआ. विजयवाड़ा की पूरी राजनीति बदल गई. राधा कृष्णा के ग्रुप में देविनेनी राजशेखर (नेहरु) और देविनेनी गांधी थे. राधा कृष्णा की मौत के बाद इस गुट में सत्ता संघर्ष शुरू हो गया. वैसे देविनेनी और वंगावीटी परिवार एक दूसरे के काफी नजदीक थे लेकिन देविनेनी परिवार राधा कृष्णा की जगह लेना चाहता था.
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