सोमप्रभ कभी कविता लिखते थे. इन दिनों भारत के सीमावर्ती जिले में कस्बाई जीवन जीरहे हैं. मन करने पर साइकिल से मीलों नापते हैं और जो दृश्य देखते-दिखाते हैंउन्हें स्मृतियों में संजो लेते हैं. उनके मुताबिक़ दृश्य इतने हैं कि वह कहानी,उपन्यास, कविताओं में अट नहीं सकते. लेकिन जब सबको अच्छा लगता है, तब बार-बार ऐसेदृश्यों को दर्ज करने का अपना उत्साह और बढ़ा पाते हैं. उन्हें लगता है कि इससेसुंदर दृश्यों के न खत्म होने का भ्रम बचा रहता है. या क्या पता कि वह बच भी जाताहो! इस बार की घुमक्कड़ी में दो बहनों से मुठभेड़ हो गई उनकी. जो उन्होंने महसूसा, हमआपके लिए लाए हैं.--------------------------------------------------------------------------------दो बहनेंदो बहनें दीवाली पर नैहर लौटीं हैं. नैहर में उनके कोई न बचा है अब. आंगन में भांगउग आई थी. वेदी उखड़ गई थी. जिस पर उनका ब्याह हुआ. जिस पर मचिया रख सर्दियों कीधूप वे खाती थीं और मां उसी पर बैठ चावल फटकती थीं. पिता भी नहीं रह गया गए. शरीफेअब भी फल रहे हैं. वे लौटीं कि इस साल आंगन बुहारेंगी. पानी की छींट मारेंगी.घास-पात साफ करेंगी. कीट, पतंगों और सांप का वास हो गया है घर.सुबेराती ने चूना भिगाते हुए कहा, बहिनी अब के लगवावत है गेरू. लेकिन उन्होंने पिताकी तरह चूने और गेरू से ही पुतवाया है घर. डिस्टेंपर से न जाने क्यों चिढ़ थी पिताको. और दीवार के भीतर बनी एक गहरी जगह में शरीफे पकने के लिए रख दिए हैं. जैसे बचपनमें रखतीं थी, ढ़ेंपी में चूने लगाकर.वे शाम बाजार गयीं और लौटीं. बड़ी बहन आगे-आगे और छोटी पीछे. ‘जिज्जी धीम चलव.’धीमे से कहती हैं छोटी. ‘संझा होत है. दिया-बाती कय समय होयगा.’ बड़ी चिंता से कहतीहैं. छोटी बहन को जिज्जी में अम्मा दिखती हैं. वह बड़ी के कंधे पर हाथ रख कर कहतीहै, जिज्जी तुम अब बिलकुल अम्मा की तरह बोलती हो. जिज्जी तुम्हारे हाथों में मोरपंख, अम्मा के हाथों का मोर पंख है. तेज-तेज चलते हुए वे चिंता में दुहरातीं हैं.‘जल्दी जल्दी चलव बहिनी. संझा होत है.’ छोटी बहिन देखती है कि जिज्जी की चिंता कारंग शाम का नहीं है, बिलकुल अम्मा के रंग का है. और शाम उनसे दूर नहीं है, आस-पासहै.तस्वीर सोमप्रभ ने खुद खींची है.(इसमें कस्बे के ऐसे ही परिवारों का समय में बिला जाने का प्रसंग भी अनायास शामिलहो गया है. उनके उजड़ने-बसने की कहानी भी. दीवाली के बाजार में दो ऐसी बहनों कोदेखा. उम्र तकरीबन पचास और चालीस या पैंतीस. बहुत भला सा दृश्य था. बड़ी सच केदृश्य में भी मोरपंख लिए जा रही थीं. और छोटी पीछे- पीछे. दृश्य का रंग इतना गाढ़ाथा कि बहुत ही सजा हुआ बाजार भी फीका लग रहा था. बाहर के दृश्य पर दूसरे रंग केदृश्य आते और गायब होते रहे. भीतर के रास्ते पर दो बहने हाथों में धीमे-धीमे हिलताहुआ मोरपंख लिए चली जा रही थीं.दीवाली का बाजार घूमते हुए उस शाम कपड़ों की बनीं ये दिखीं. वे मुझे दो बहनों कीतरह दिखीं. जब मैं पहुंचा तो तीन बचीं थीं. मैंने इन दो को लिया. तीसरी थोड़ीतुनकमिजाज लग रही थी. अधेड़ आदमी ने बताया कि दर्जी हूं. और उनके घर में एक बुजुर्गमहिला इसे बस दीवाली-दीवाली बना देती हैं. उन्हें बनाना अच्छा लगता है, तो वे बनादेती हैं और मैं बाज़ार में इसे लेकर कुछ देर खड़ा हो जाता हूं. कपड़ों के खिलौनेकम लोग लेते हैं. किसी किसी को अच्छा लगता है, तो ले जाता है. ज्यादातर नहींखरीदते. लेकिन मैं इसकी परवाह नहीं करता. यह कथा या कथा नहीं, इस दृश्य में खो जानेऔर दृश्य कहीं खो न जाए के मोह में लिखी गई हैं. जीवन सरल रेखा पर नहीं बसा है.वक्र पर घटित होते जीवन में यह सोचना कितना सुख पाना है कि यह दृश्य बीत ही नहींरहा है. दो उम्रदराज बहनें हाथों में मोरपंख लिए एक शाम चली जा रही हैं. बड़ीतेज-तेज और छोटी पीछे-पीछे. अब भीतर देखिए तो सही.)--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ें:उसने ग़ज़ल लिखी तो ग़ालिब को, नज़्म लिखी तो फैज़ को और दोहा लिखा तो कबीर को भुलवा दियाहिंदू धर्म की अस्मिता क्या पटाखों से जुड़ी है?विविध भारती के बारे में सोचना भर पूरे वजूद को सनसनाहट से भर देता हैवीडियो: प्रोफेसर यशपालः जो कहते थे कि आईआईटी कोचिंग से बुरा कुछ नहीं हो सकता