इंटरनैशनल क्रिमिनल पुलिस ऑर्गेनाइज़ेशन. शॉर्ट में बोलें तो इंटरपोल. आपने ये नामख़ूब सुना होगा. फ़िल्मों में, वेब सीरीज़ में, कभी-कभार न्यूज़ चैनलों पर भी.फिलहाल, इसी इंटरपोल की बैठकी चल रही है. तुर्की के इस्तांबुल में. बैठकी में नएअध्यक्ष का चुनाव होना है. दो कैंडिडेट हैं. जिस कैंडिडेट का जीतना तय माना जा रहाहै, उस पर टॉर्चर और अत्याचार के आरोप लग रहे हैं. कहा जा रहा है कि अगर ये आदमीइंटरपोल का प्रेसिडेंट बना तो अनर्थ हो जाएगा. बताएंगे, वो आदमी कौन है? उसके ऊपरक्या आरोप हैं? और, साथ में जानेंगे, इंटरपोल की पूरी कहानी क्या है? और, ये कामकैसे करता है? पहले इतिहास का ज़िक्र. मोनाको का मोन्टे कार्लो शहर. साल 1914.‘प्रिंस ऑफ़ मोनाको’ अल्बर्ट प्रथम परेशान चल रहे थे. उनके कैसिनोज़ में फ़्रॉड होरहा था. यूरोप के शातिर घपलेबाज कैसिनो में आते और चूना लगाकर निकल जाते थे. लोकलपुलिस उन्हें पकड़ पाने में नाकाम साबित हो रही थी. प्रिंस को लगा कि अगर ऐसा हीचलता रहा तो उनका बिजनेस ठप पड़ जाएगा. उन्हें इससे निपटने का रास्ता तलाशना था.इसलिए, उन्होंने अलग-अलग देशों से पुलिस अधिकारियों और लीगल एक्सपर्ट्स को मोन्टेकार्लो बुलाया. अप्रैल 1914 में 24 देशों के विशेषज्ञ जमा हुए. उन्होंने अपराध कीगुत्थी सुलझाने, अपराधियों की पहचान और उन्हें प्रत्यर्पित करने के रास्ते तलाशे.बात ये भी चली कि आपस में सहयोग कैसे बढ़ाया जाए. कहा गया कि फिर मिलते हैं. इस परचर्चा आगे बढ़ाई जाएगी. लेकिन बात आगे जाती, इससे पहले ही पहला विश्व युद्ध शुरू होगया. पहले ‘इंटरनैशनल पुलिस कांग्रेस’ की फ़ाइल दबी रह गई. ये फ़ाइल निकली नौ बरसबाद. साल 1923 में. मोनाको से लगभग 11 सौ किलोमीटर दूर. ऑस्ट्रिया की राजधानी वियनामें. उस समय वियना पुलिस के प्रेसिडेंट थे, जोहान सोबर. एक साल पहले तक वोऑस्ट्रिया के प्रधानमंत्री भी रह चुके थे. सोबर ने मोन्टे कार्लो वाले सम्मेलन केआयोजन में अहम भूमिका निभाई थी. पहले विश्व युद्ध के बाद अपराधी कार और टेलीफ़ोन काइस्तेमाल करने लगे थे. ये उस दौर की सबसे बड़ी तकनीक थी. अपराधी एक देश में क्राइमकरते और फिर बॉर्डर पार कर दूसरे देश में चले जाते. इन लोगों को ट्रैक एंड ट्रेसकरने के लिए कोई मैकेनिज़म नहीं था. इन अपराधियों से ऑस्ट्रिया भी परेशान था. पुलिसप्रेसिडेंट होने के नाते ज़िम्मेदारी सोबर की थी. फिर उनका ध्यान नौ साल पहले कीफ़ाइल पर गया. देखा तो आइडियाज़ के पन्ने भरे हुए थे. अब उन पर अमल करने की बारीथी. इसके लिए फिर से मिलना ज़रूरी था. सोबर ने दुनियाभर के लगभग तीन सौ पुलिसअधिकारियों को बुलावा भेजा. इनमें से सिर्फ़ 30 लोग नेशनल पुलिस के मुखिया थे. मतलबये कि जिन अधिकारियों को बुलावा भेजा गया था, उनमें से अधिकतर सीधे तौर परसत्ता-प्रतिष्ठान से नहीं जुड़े हुए थे. इसलिए, ये सम्मेलन पुलिस अधिकारियों परकेंद्रित था, ना कि सरकारों पर. सितंबर 1923 में वियना में बैठक का आयोजन हुआ.इसमें इंटरनैशनल क्रिमिनल पुलिस कमीशन (ICPC) की नींव रखी गई. वियना इसका मुख्यालयबना. फ़ंडिंग ऑस्ट्रिया सरकार से आती थी. जोहान सोबर को ICPC का पहला अध्यक्ष चुनागया. वो 1932 में मृत्यु तक इस पद पर बने रहे. ICPC का मकसद क्राइम्स से जुड़ीसूचनाओं का डेटाबेस बनाना और उसे सदस्य देशों के साथ साझा करना. इसका दायरा पूरीदुनिया तक फैला हुआ था. हालांकि, लंबे समय तक ICPC का कार्यक्षेत्र सेंट्रल यूरोपतक ही महदूद रहा. 1927 में एम्सटर्डम में सदस्य देशों की सालाना बैठक हुई. इसमें तयहुआ कि सभी देश पुलिस फ़ोर्स के भीतर एक संस्था की स्थापना करेंगे. ये संस्था पॉइंटऑफ़ कॉन्टैक्ट का काम करेगी. जो ICPC और उसके सदस्य देशों के साथ सूचनाओं काआदान-प्रदान करेगी. कालांतर में इस संस्था को नेशनल सेंट्रल ब्यूरो (NCB) के नाम सेजाना गया. भारत में CBI को ही NCB का दर्ज़ा मिला हुआ है. 1930 के दशक में जर्मनीमें नाज़ी पार्टी सत्ता में आ चुकी थी. एडोल्फ़ हिटलर जर्मनी का चांसलर बना. उसकाजन्म ऑस्ट्रिया में हुआ था. उसने अपनी आत्मकथा ‘मीन काम्फ़’ में ऑस्ट्रिया कोजर्मनी में मिलाने की बात लिखी थी. हिटलर ने सत्ता में आते ही पहली साज़िश रची.जुलाई 1934 में एक नियो-नाज़ी गुट ने ऑस्ट्रिया के चांसलर की हत्या कर दी. ये हत्याहिटलर के इशारे पर की गई थी. उसे भरोसा था कि अब उसके समर्थक आसानी से कुर्सी परक़ब्ज़ा कर लेेंगे. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. ऑस्ट्रिया के मिलिटरी लीडर्स ने इसतख़्तापलट का समर्थन नहीं किया. नतीजतन, हिटलर की पहली साज़िश फ़ेल हो गई. मई 1935में हिटलर ने एक भाषण दिया. इसमें उसने कहा कि ऑस्ट्रिया पर हमला करने या उसेजर्मनी में मिलाने का कोई प्लान नहीं है. लेकिन तीन बरस बाद ही उसका मन बदल गया.मार्च 1938 में हिटलर ने ऑस्ट्रिया के राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखी. उसने कहा कि मेरीपसंद का चांसलर नियुक्त करो, वर्ना हमले के लिए तैयार हो जाओ. जैसे ही राष्ट्रपतिने मना किया, हिटलर ने आक्रमण का आदेश दे दिया. हमला सुबह में शुरू होने वाला था.लेकिन उससे पहले ही राष्ट्रपति ने घुटने टेक दिए. उन्होंने हिटलर की पसंद का चांसलरनियुक्त कर दिया. अगली सुबह जर्मन सेना ऑस्ट्रिया में घुस गई. उन्हें किसी तरह कीचुनौती नहीं मिली. हिटलर ने ये अफ़वाह उड़ा दी थी कि ऑस्ट्रिया में अराजकता फैल गईहै. राजधानी में कम्युनिस्ट दंगा कर रहे हैं. हालात को काबू में करने के लिए जर्मनीका आना ज़रूरी है. हमले के एक दिन बाद ही ऑस्ट्रिया की संसद ने जर्मनी के क़ब्ज़ेको मान्यता दे दी. ऑस्ट्रिया अब जर्मनी का प्रांत बन चुका था. ऑस्ट्रिया को मिलानेके बाद वहां की संस्थाएं भी जर्मनी के नियंत्रण में आ चुकीं थी. ICPC भी इससे नहींबच पाया. ये देखकर बाकी देशों ने सहयोग करना बंद कर दिया. 1942 में ICPC कामुख्यालय वियना से बर्लिन शिफ़्ट कर दिया गया. कहा जाने लगा कि ये ICPC का अंत है.अब ये कभी अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो पाएगी. लेकिन पिक्चर अभी बाकी थी. दूसरेविश्व युद्ध में जर्मनी की हार हुई. फिर 1946 में ब्रुसेल्स में इसको फिर से खड़ाकिया गया. तय हुआ कि नई ICPC अब फ़्रांस में बेस्ड होगी. 1956 में संस्था ने अपनानाम बदलकर इंटरनैशनल क्रिमिनल पुलिस ऑर्गेनाइज़ेशन (इंटरपोल) रख लिया. ‘इंटरपोल’असल में टेलीग्राफ़िक पता था. बाद में पत्रकारों और टीवी सीरीज़ ने इस नाम को इतनापॉपुलर बना दिया कि ये चलन में आ गया. और, अंतत: ये नाम आधिकारिक बन गया. 1950 और60 के दशक में दुनिया की जियो-पॉलिटिक्स तेज़ी से बदल रही थी. विदेशी नियंत्रण मेंरह रहे देश एक-एक कर आज़ाद हो रहे थे. इस वजह से इंटरपोल की सदस्यता भी बढ़ने लगी.जल्दी ही यूरोपीय देश अल्पसंख्यक हो चुके थे. इंटरपोल अब असल मायनों मेंअंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार हुआ था. 1972 में फ़्रांसने इंटरपोल को अंतरराष्ट्रीय संस्था के तौर पर मान्यता दे दी. हालांकि, उसकाप्रभुत्व 1985 तक बना रहा. उस साल 1946 के बाद पहली बार कोई गैर-फ़्रांसीसी व्यक्तिइंटरपोल का सेक्रेटरी-जनरल बना. रेमंड केंडल स्कॉटलैंड यार्ड के वेटरन पुलिसअधिकारी थे. उनके कार्यकाल में इंटरपोल को आधुनिक बनाया गया. तब तक सारा रेकॉर्डकाग़ज़ों पर दर्ज़ होता था. उसे कम्प्युटराइज़्ड किया गया. साल 2000 में रॉन नोबलइंटरपोल के सेक्रेटरी-जनरल बने. वो इस कुर्सी पर बैठने वाले पहले अमेरिकी व्यक्तिथे. नोबल चाहते थे कि इंटरपोल 24 घंटे काम करे. 9/11 के हमले के बाद इसकी ज़रूरतबढ़ चुकी थी. नोबल ने ऐलान किया, ‘अब इंटरपोल के मुख्यालय की बत्तियां कभी बंद नहींहोंगी’. वही हुआ भी. तब से इंटरपोल हमेशा ऐक्टिव रहता है. चौबीसों घंटे. साल के 365दिन. इस समय 195 देश इंटरपोल का हिस्सा हैं. ये देश एक सिक्योर नेटवर्क के ज़रिएइंटरपोल के डेटाबेस का इस्तेमाल करते हैं. सदस्य देश संदिग्ध अपराधियों और फ़र्ज़ीदस्तावेज़ों से जुड़ी जानकारियां अपलोड करते हैं. इंटरपोल के डेटाबेस मेंफ़िंगरप्रिंट, पासपोर्ट, वीजा, डीएनए आदि दर्ज़ हैं. इंटरपोल के दो मुख्य काम हैं.पहला, सेंट्रलाइज़्ड क्रिमिनल डेटाबेस को मेंटेन करना. हर देश का अपना नेशनलसेंट्रल ब्यूरो है. ये ब्यूरो इंटरपोल के डेटाबेस से जुड़े होते हैं. उन्हें अपराधया अपराधियों की पहचान के लिए डेटाबेस की इजाज़त होती है. इंटरपोल का दूसरा कामनोटिस जारी करने से जुड़ा है. इंटरपोल अलग-अलग कलर के नोटिस जारी करता है. जैसे,मिसिंग पर्सन के केस में येलो नोटिस. लावारिस लाश मिलने की स्थिति में ब्लैक नोटिस.ख़तरे की चेतावनी देने के लिए ऑरेंज नोटिस. और, वॉन्टेड लोगों की तलाश यागिरफ़्तारी के लिए रेड नोटिस जारी किया जाता है. इनमें सबसे खास है, रेड नोटिस. मानलीजिए, किसी ने भारत में कोई क्राइम किया. जब तक पुलिस उसे पकड़ पाती, वो देशछोड़कर अमेरिका भाग गया. अब भारत की पुलिस सीधे तौर पर अमेरिका में घुसकर संदिग्धको अरेस्ट नहीं कर सकती. ऐसे मौके पर इंटरपोल काम में आता है. उसे संबंधित व्यक्तिके बारे में जानकारी दी जाती है. इंटरपोल को बताया जाता है कि फलाना व्यक्ति इसमामले में वांछित है. उस पर अदालती कार्रवाई होनी है या उसे जेल भेजा जाना है.इंटरपोल आवेदन को रिव्यू करती है. अगर मामला जमा तो वो रेड नोटिस जारी कर देती है.अगर मामला राजनीति, मिलिटरी, धार्मिक या नस्लभेदी नेचर का हुआ तो एप्लीकेशन कोरिजेक्ट कर दिया जाता है. इंटरपोल के रेड नोटिस जारी करने से क्या होगा? यहां पर एकबात समझने की ज़रूरत है. इंटरपोल अपने आप में लॉ एनफ़ॉर्समेंट एजेंसी नहीं है. उसकेएजेंट किसी को गिरफ़्तार नहीं कर सकते. इंटरपोल बस एक पुल का काम करता है. सूचनाओंको एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने में. उदाहरण के लिए, अगर भारत का भगोड़ा किसीदूसरे देश में छिपा है. और, उस पर इंटरपोल ने रेड नोटिस जारी किया हुआ है. ऐसीस्थिति में उसे गिरफ़्तार करने या ना करने का पूरा अधिकार संबंधित देश के पास है.इंटरपोल किसी देश को ऐसा करने के लिए बाध्य नहीं कर सकती. फिलहाल, इंटरपोल ने लगभग66 हज़ार रेड नोटिस जारी किए हुए हैं. इनमें से लगभग आठ हज़ार पब्लिक डोमेन मेंहैं. बाकी नोटिसेज़ की जानकारी सिर्फ़ सरकारी एजेंसियों के पास है. आज हम इंटरपोलकी चर्चा क्यों कर रहे हैं? दरअसल, तुर्की के इस्तांबुल में इंटरपोल की जनरलअसेंबली की बैठक चल रही है. जनरल असेंबली इंटरपोल की सुप्रीम गवर्निंग बॉडी है.इसमें सभी सदस्य देशों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं. पिछले साल की बैठक यूएई मेंहोनी थी. लेकिन कोरोना की वजह से इसे टालना पड़ा था. ये बैठक इसलिए भी खास है,क्योंकि इस साल इंटरपोल को अपना नया अध्यक्ष चुनना है. इस चुनाव में दो कैंडिडेटहैं. पहला नाम संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के इंस्पेक्टर जनरल अहमद नासिर अल-रईसी काहै. दूसरे हैं, चेक गणराज्य के साका हवांकोवा. चुनाव के लिए 25 नवंबर को वोटिंगहोगी. हर सदस्य देश के पास एक वोट होता है. जानकारों का दावा है कि इस चुनाव मेंअल-रईसी की जीत तय है. वजह क्या है? अल-रईसी ने पिछले कुछ महीनों में कई देशों कादौरा किया है. उसने अपने पक्ष में इन देशों का समर्थन भी जुटा लिया है. इसके अलावा,यूएई ने इंटरपोल को लगभग 38 करोड़ रुपये के डोनेशन का वादा किया हुआ है. इंटरपोल कासालाना बजट 110 करोड़ के आस-पास है. उसे ऑपरेट करने के लिए सदस्य देशों से मिले दानकी ज़रूरत होती है. अगर यूएई एक-तिहाई खर्च उठाने के लिए तैयार है, तो कोई देश शायदही उस पर आपत्ति जताए. अल-रईसी की जीत के अनुमान के साथ ही आरोप-प्रत्यारोप का दौरभी शुरू हो गया है. दो ब्रिटिश नागरिकों ने रईसी पर हिरासत में टॉर्चर के आरोप लगाएहैं. मैथ्यू हेज़ेस को सात महीने जेल में रखा गया था. अली ईसा अहमद दुबई में छुट्टीमनाने गए हुए थे. वहां उन्हें क़तर की फ़ुटबॉल टीम का टी-शर्ट पहनने के लिएगिरफ़्तार किया गया था. दोनों ने आरोप लगाया है कि अल-रईसी की निगरानी में उन्हेंजेल में टॉर्चर किया गया था. दोनों लोगों ने तुर्की में अल-रईसी के ख़िलाफ़ याचिकादायर करने का फ़ैसला भी किया है. अल-रईसी पर स्वीडन, नॉर्वे, ब्रिटेन और फ़्रांसमें मानवाधिकार उल्लंघन के केस दर्ज़ हैं. इंटरपोल का हेडक़्वार्टर फ़्रांस केलियोन में है. अगर अल-रईसी चुनाव जीत जाता है तो उसे फ़्रांस की ज़मीन पर आना होगा.ऐसे में अगर कोर्ट का आदेश आया तो फ़्रेंच पुलिस उसे गिरफ़्तार भी कर सकती है.इंटरपोल प्रेसिडेंट के पद को लेकर विवाद कोई नई बात नहीं है. 2016 में चीन के मेंगहोंगवेई को इंटरपोल का प्रेसिडेंट चुना गया था. चार सालों के लिए. 2018 की बात है.मेंग छुट्टी मनाने चीन गए और अचानक गायब हो गए. कुछ समय बाद उनके नाम की चिट्ठी आई.इसमें उन्होंने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था. उनके बारे में पब्लिक को जनवरी2020 में पता चला. जब चीन की एक अदालत ने उन्हें घूस लेने के आरोप में साढ़े तेरहबरस के लिए जेल भेज दिया. खैर, मेंग के इस्तीफ़े के बाद नया प्रेसिडेंट चुनने कीप्रक्रिया शुरू हुई. तब दो कैंडिडेट्स का नाम सामने आया. पहले थे, इंटरपोल केतत्कालीन सीनियर वाइस-प्रेसिडेंट किम जोंग येंग. और दूसरे थे, वाइस-प्रेसिडेंटअलेक्जेंडर प्रोकपचक. अलेक्ज़ेंडर रूस के गृह मंत्रालय में काम कर चुके थे. उन्हेंपुतिन का करीबी माना जाता था. इसको लेकर आलोचना शुरू हुई. कहा गया कि रूसअंतरराष्ट्रीय कानूनों का मज़ाक बनाने के लिए कुख्यात है. अगर उसी तंत्र से आयाव्यक्ति मुखिया बना तो इंटरपोल का दुरुपयोग बढ़ जाएगा. आखिरकार, साउथ कोरिया के किमको प्रेसिडेंट चुना गया. यूएई पर लगातार मानवाधिकार उल्लंघन और आलोचकों को दबाने केआरोप लगते रहे हैं. अल-रईसी का नाम ज़िम्मेदार लोगों की लिस्ट में है. इंटरपोल अपनीछवि को बचाने में सफ़ल हो पाता है या नहीं, ये देखने वाली बात होगी.