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पहले मुकदमों में फंसाया, अब दौड़ाकर पीट जाते हैं दलित किसान को

बभनी गांव के श्रीनिवास की कहानी आपको पढ़नी चाहिए, 2016 में इस मुल्क के किसान का ये हाल है.

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इस तस्वीर में जिस चेहरे पर मुस्कुराहट नहीं आ पाई है वो श्रीनिवास हैं. काली टी-शर्ट में कमलेश जी नजर आ रहे हैं, वो हमारे ऑफिस में ही हैं, उन्हीं के जरिये हम श्रीनिवास से बात कर पाए.
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आशीष मिश्रा
22 नवंबर 2016 (अपडेटेड: 22 नवंबर 2016, 03:47 PM IST)
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उस आदमी का नाम श्रीनिवास पासवान है. श्रीनिवास उत्तरप्रदेश के देवरिया जिले में रहते हैं, गांव का नाम बभनी है. 36 साल की उम्र है. जाति से दलित हैं. तीन बेटियां हैं, सबसे बड़ी बेटी जो पांच साल की है उसने अभी स्कूल जाना शुरू किया है, उससे छोटी 3 साल की है और सबसे छोटी एक साल. अगर आपको लगता है कि श्रीनिवास की बेटियां बहुत हैं तो आपको ये भी जानना चाहिए उससे ज्यादा उनके पास मुकदमे हैं.
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श्रीनिवास ने बताया वो गांव के बड़े लोग हैं, जेपी जायसवाल और उनके भतीजे, और एक नाम बताया गांव के केमला सिंह का बेटा जितेंद्र बहादुर सिंह उर्फ मिट्ठू. वही लोग उन्हें मारते और परेशान करते हैं. 10 साल से ज्यादा हुए, श्रीनिवास और उनके पिता राधेश्याम पासवान, कुछ डिसमिल जमीन के लिए कोर्ट-कचहरी के चक्कर काट रहे हैं, जो उन्हें 'आबादी' में मिली थी. ये खाली जमीन थी, जहां सरकार ने उनके बाबा और पिता को घर बनाने का पट्टा दिया था. लेकिन उस जमीन पर वो कभी रहने नहीं पाए. क्योंकि गांव के इन्हीं दबंगों ने वहां कब्जा कर रखा है. मामला सालों से कोर्ट में है. श्रीनिवास बताते हैं कि कोर्ट में अटकने की वजह भी है. दूसरी तरफ से पैसे का जोर जो ज्यादा है.
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रेलवे का तार कटकर गिरा था, चोरी हो गया. श्रीनिवास बताते हैं, मिट्ठू बाबू की कृपा से उसमें आरोपी वो बने. दो-दो धाराएं लगीं. वो उस रोज़ कहीं न्यौते में गए थे. पुलिस ने बुलाया तो वो साथ चले गए. श्रीनिवास कहते हैं कि चोर होता तो डर लगता मैंने कुछ किया नहीं था. साथ चला गया. पुलिस से कैसा डर. लेकिन उन्हीं पुलिस वालों ने ले-जाकर गिराकर उन्हें पीटा. बंद कर दिया. दसियों दिन श्रीनिवास अंदर ही रहे. पिताने जिस वकील की मदद ली वो भी फर्जी निकला. जहां छह हजार लगने थे, 24 हजार में उन्हें छुड़वाया. बाकी के 24 हजार पुलिस की मार के निशान, दर्द और चोटों के इलाज में फुंक गए. अभी हाल ये है कि एक मुकदमा वो खुद का लड़ रहे हैं, दो उनके पिताजी की तरफ से लड़ रहे हैं, एक और मुकदमा था, जिससे हार कर हाथ ही खींच लिए. घर पर एक भैंस है, सुबह चार लीटर और शाम चार लीटर दूध देती है. हाथ में पैसे नहीं हैं, बिलकुल नहीं हैं. मूली बेचकर गुजारा कर रहे हैं. उसी से नमक-रोटी चल रही है. भैंस बेचना चाहते हैं, लेकिन बिक नहीं रही है. मोदी जी की दया से बदले में लोग पुराने नोट देना चाहते हैं जो कि चलते नहीं हैं. श्रीनिवास की कहानी इतनी ही है. इससे वो बाहर कैसे आएंगे ये उन्हें खुद समझ नहीं आता. लोग उनसे खार खाए हैं, उन्हें मारते हैं, उन्हें बेटियां पालनी हैं, पढ़ानी हैं,
श्रीनिवास का पिटना आम हो गया है. उनको अपनी मुसीबतों का कोई हल नहीं दिखता हेडलाइन में दलित देखकर भले लोग खिसिया जाते हैं. तर्क देते हैं हर चीज को क्यों दलित से जोड़ा जाता है. दलित के नाम पर चलाया जाता है. वो लोग तब कहीं नहीं दिखते जब श्रीनिवास जैसे लोग दौड़ाकर पीटे जाते हैं. उनसे बेगारी कराने का दुस्साहस किया जाता है. दुःख ये भी कि दलितों के अगुआ भी तब कहीं नज़र आते. या श्रीनिवास जैसे लोग उनकी नज़र में नहीं आते. दरअसल ये हमारे अंदर बस गया है. हम इसके आदी हो गए हैं. इसमें नया क्या है, ये तो होता रहता है कहना हमने अपना स्वभाव बना लिया है. संवेदनाएं चुकी हुई हैं हीं, ये तब और मर रहती हैं जब ऐसा कुछ दलित के साथ होता है. हमने इसे उनकी नियति मान लिया है.किसी मिठ्ठू सिंह की हिम्मत है क्या कि वो किसी ऊंची जाति वाले को यूं ही दौड़ाकर पीट जाए. गांवों में ये और होता है, शहरों में हम इस मुगालते में हैं कि पुलिस और क़ानून का कुछ भय है, गांवों तक जाते-जाते ये चुक ही जाता है. वहां जाति कि जड़ें बहुत गहरी हैं, वैसा ही वर्गभेद भी है. ये सब मिलकर किसी कमजोर की ज़िंदगी पर भारी पड़ जाते हैं. ये भी कम लगे तो जाते-जाते ये वीडियो देखते जाइएगा.  https://www.youtube.com/watch?v=VYEk-36zzAI

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