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58 दिन के अनशन के बाद जान गंवाकर आंध्र प्रदेश बनवाने वाले श्रीरामुलु की कहानी

जिन्हें नेहरू नज़रअंदाज करते रहे, मरने के बाद उन्हीं श्रीरामुलु की मांग मानी.

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19 दिसंबर 2018 (अपडेटेड: 19 दिसंबर 2018, 12:10 PM IST)
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1917 में कांग्रेस ने एक स्टैंड लिया. स्टैंड ये था कि राज्यों का गठन भाषा के आधार पर होना चाहिए. भाषा की विविधता को खूब बढ़ावा दिया गया. भाषा के आधार पर प्रोविंशियल कांग्रेस कमिटियां (जो बाद में प्रदेश कांग्रेस कमिटियां बनीं) भी बनने लगीं. ये सब था तो बहुत सही, लेकिन कांग्रेस को ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि 30 साल बाद परिस्थितियां उलट होंगी और ये स्टैंड बैकफायर कर जाएगा.
1947 में देश आज़ाद हुआ. सत्ता कांग्रेस के हाथ में आई. अब भाषा के आधार पर राज्यों के गठन की बात नए सिरे से शुरू हुई. भारत के धर्म के अधार पर दो टुकड़े हो चुके थे. पार्टीशन के ज़ख्म अभी ताजे थे. डर था कि भाषा ने भी संप्रदाय वाला तूल पकड़ लिया तो बचा हुआ भारत भी कई टुकड़ों में बंट जाएगा. उस समय कांग्रेस में हर बात के कई मत थे लेकिन इस बात को लेकर नेहरू, पटेल और गांधी तीनों एक-मत थे.
भाषा के आधार पर अलग राज्य मांग रहे गुटों में सबसे उग्र आवाज़ तेलुगू समुदाय की थी. 1950 में बना मद्रास राज्य तमिल, मलयाली, कन्नड़ और तेलुगू इलाकों का मिक्सचर था. उस समय हिंदी के बाद सबसे ज्यादा संख्या तेलुगू बोलने वालों की थी. तब की मद्रास सिटी यानी आज के चेन्नई में भी तेलुगू-भाषी मेजोरिटी में थे. उनकी मांग थी कि मद्रास राज्य से अलग एक तेलुगू भाषी प्रदेश यानी कि आंध्र प्रदेश का गठन किया जाए.
1950 में मांग तेज़ हो गई. मद्रास राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री ने विरोध में कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया. 1951 के मानसून में राजनीति छोड़ संत बने स्वामी सीताराम आंध्र की मांग के लिए अनशन पर बैठ गए. करीब पांच हफ्ते बाद विनोबा भावे कहने पर इन्होंने अनशन ख़त्म किया. अनशन तो ख़त्म कर दिया, लेकिन शांत नहीं बैठे. सीताराम ने तेलुगू-भाषी इलाकों का दौरा कर आंध्र की मांग को जनमानस के बीच उतार दिया.
1952 में भारत के पहले आम चुनाव होने थे. साथ ही राज्यों के चुनाव भी हुए. कांग्रेस ने देश भर में पताका लहरा दी. लेकिन मद्रास में पार्टी को मुंह की खानी पड़ी. मद्रास विधानसभा की 145 तेलुगू सीटों में से सिर्फ 43 पर कांग्रेस जीती. मेसेज साफ़ था - आंध्र नहीं तो वोट नहीं.
सी राजगोपालाचारी और जवाहरलाल नेहरू.
सी राजगोपालाचारी और जवाहरलाल नेहरू आंध्र समस्या को लेकर गंभीर थे.

तेलुगू समुदाय का गुस्सा ज्यादातर दो लोगों को कोसकर निकलता था - नेहरू और सी. राजगोपालाचारी उर्फ़ 'राजाजी'. दोनों ने साफ़ ज़ाहिर कर दिया था कि आंध्र को लेकर उनका मत दूसरी तरफ है. चुनाव के नतीजों ने आंध्र के आन्दोलन में नई ऊर्जा डाल दी. 19 अक्टूबर, 1952 को पोट्टि श्रीरामुलु आमरण अनशन पर बैठ गए. श्रीरामुलु पहली बार अनशन पर नहीं बैठे थे. इससे पहले 1946 में अछूत माने जाने वाले लोगों के लिए मद्रास के सभी मंदिरों को खोलने की मांग को लेकर भी श्रीरामुलु अनशन पर बैठे थे. कांग्रेस का ध्यान उस समय केवल स्वतंत्रता की ओर टिका हुआ था. लेकिन गांधी जी का ध्यान श्रीरामुलु पर था. श्रीरामुलु गांधी जी के शिष्य थे और गांधी जी ने श्रीरामुलु को 1946 वाला अनशन तोड़ने के लिए मना लिया. लेकिन 1952 से पहले ही गांधी जा चुके थे. और उनके साथ जा चुकी थी श्रीरामुलु को अनशन से उठाने वाली ताकत. 3 दिसंबर तक श्रीरामुलु के अनशन को करीब छह हफ्ते हो चुके थे. इसी दिन नेहरू ने राजाजी को एक खत में लिखा,
'मैं अपनी राय पर अब भी कायम हूं, मैं इस अनशन को पूरी तरह नज़रंदाज़ करने का प्रस्ताव रखता हूं'.
लेकिन आंदोलनकारी उग्र होने लगे. ट्रेनें रोकी जाने लगीं. नेहरू को ध्यान देना पड़ा. 12 दिसंबर को नेहरू ने राजाजी को एक दूसरी चिट्ठी में लिखा कि आंध्र की मांग मानने का समय आ गया है. दो दिन बाद राजाजी ने जवाब में नेहरू को लिखा कि श्रीरामुलु को दिल्ली बुला लें.
लेकिन सुझाव पर अमल करने में अब देर हो चुकी थी. 15 दिसंबर को श्रीरामुलु ने अनशन के 58वें दिन अपने प्राण त्याग दिए. पूरे आंध्र में हाहाकार मच गया. जनता ने सरकारी दफ्तरों पर हमला बोल दिया. ट्रेनें रोकीं और तोड़फोड़ मचा दीं. इस विरोध में सरकारी संपत्ति को दसियों लाख का नुकसान झेलना पड़ा. जवाब में पुलिस फायरिंग ने भी कई लोगों की जान ले ली. हालात हाथ से निकलते देख प्रधानमंत्री नेहरू ने श्रीरामुलु की मौत के चार दिन बाद 19 दिसंबर को बयान जारी कर आंध्र की मांग को मंज़ूरी दे दी.
1 अक्टूबर, 1953 को नए राज्य आंध्र प्रदेश का उसकी नई राजधानी कुरनूल में उद्घाटन समारोह हुआ. राजाजी ने इस समारोह में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई. और नेहरू इस कार्यक्रम में उपस्थित होने के साथ-साथ इस कार्यक्रम के चीफ गेस्ट भी थे.

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ये स्टोरी आयुष ने लिखी है. आयुष IIT गुआहाटी से हमारे यहां इंटर्नशिप करने आए थे. आयुष इंटर्नशिप पूरी कर वापस जा चुके हैं. चूंकि उन्हें किस्से लिखना अच्छा लगता है. और वो कायदे के किस्से सुनाते हैं. ये किस्सा उनकी इसी खूबी का नमूना है.

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