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कोई जाकर ये कहानी नरेंद्र मोदी को सुना दो!

एक राज्य के खजाने में सीलन आ गई, और राजा ने सियारों को कंबल बंटवा दिए.

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आशीष मिश्रा
24 नवंबर 2016 (Updated: 24 नवंबर 2016, 06:38 PM IST)
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मुझे रोना बुरा लगता है, सर्दी की रातों में रोने वाले सियारों का भी. मैं हर उस आंसू की कद्र करता हूं, चाहे वो किसी की आंख से गिरे हों. वो चाहे लाइन में लगने वाला हो या लाइन में लगाने वाला. जादू देखिए, लाइन में लगने वाला भी रोता है और लगाने वाला भी. सबके अपने हिस्से के दुःख हैं. लाइन में लगने वाला सोचता है, अचानक ये क्या हो गया, लाइन में लगाने वाला सोचता है अचानक ये क्या कर डाला. कोई पार्टी राम के नाम पर सत्ता में आती है तो उसे आने देना चाहिए, क्योंकि इस वक़्त देश भी रामभरोसे ही चल रहा है. ये कैसे संभव होता है कि एक रोज़ किसी ने सोचा और आपकी ज़िंदगी बदल जाती है. यही होता है, जब राजा सबकुछ अपनी सुभीता से तय करने लगे. बिना आगा-पीछा सोचे तय करने लग जाए. मुझे बचपन का एक किस्सा याद आता है जो मेरी मां सुनाया करती थी. एक राज्य में एक नया राजा आया था. उसके पहले के राजा का इतिहास कुछ अच्छा नहीं था, प्रजा उससे खुश न रहती तो उसने पुराने राजा को हटा दिया. पुराने राजा ने राज्य की दुर्गति कर रखी थी. नए राजा से लोगों को उम्मीद थी. पुराने राजा ने खजाने का भी हाल-बेहाल कर रखा था.
नए राजा ने पाया कि खजाने में नमी है. दरवाजों में घुन लगे हैं, दीवारों में दीमक लगे हैं. मंत्रियों से पूछा, धन को कैसे बचाया जाए. जवाब मिला, सारे धन को धूप दिखा दीजिए, नमी चली जाएगी, जो कीड़े हैं सो निकल जाएंगे. राजा ने ऐसा ही किया, सारा धन महल की छतों पर फैला दिया गया. कहते हैं, इतनी बड़ी छत थी जो कश्मीर से कन्याकुमारी तक फ़ैली थी. कहते हैं इतना धन था इतना धन था कि आसमान भी दिन के वक़्त सोने की चमक से नीले से सुनहरा हो गया था. उसकी चौकीदारी को पहरेदार लगे थे.
शाम को जब धन वापिस लाया गया तो वो आधा हो चुका था, पहरेदारों में खोट था. राजा हैरान था. उसने मंत्रियों से वजह पूछी तो जवाब मिला. धन सूख गया है, इसलिए कम हो गया है. जैसे गीला कपड़ा भारी होता है, और सूखने पर वजन कम हो जाता है. वही हुआ है. राजा मान गया. इस कहानी से क्या सीख मिलती है? सीख-वीख कुछ नहीं मिलती. क्योंकि किसी को कुछ नहीं मिल रहा.
मैंने सियार के रोने का जिक्र किया था. उसका किस्सा मेरे पिता सुनाते थे. वही राजा था. मंत्री भी वही थे. न भी रहें हों तो क्या एक वक़्त के बाद सारे राजा, सारे मंत्री और सारे निर्णय एक से ही लगने हैं. सर्दियों की रातों में सियार हुआ-हुआ करते थे. राजा ने कहा कि ये सियार ऐसा क्यों करते हैं. मंत्रियों ने इस बार सीधा जवाब नहीं दिया. ऐप तैयार हुआ. जवाब आए. राजा उम्मीद करता है कि जंगल के सियार भी डिजिटल हो गए होंगे, जो जवाब आए उससे पता लगा कि सियार ठंड के कारण रोते थे.
राजा ने मंत्रियों से समाधान पूछा मंत्रियों ने कहा सारे सियारों को कंबल बांट देने चाहिए. कंबल, सिम्बल है. राहत का प्रतीक है. राजा ने सारे सियारों के नाम कंबल भिजवाए. सियारों की मौज होनी चाहिए, नहीं होगी तो रंगे सियारों की तो है ही. अगले दिन सियार फिर हुआ-हुआ कर रहे थे. राजा ने कहा अब ये क्यों रोते हैं? मंत्रिओं ने जवाब दिया. कंबल पाकर खुश हैं. आपकी जय-जयकार करते हैं. अब जंगल से जब-जब रोने की आवाज जाती है तो राजा को लगता है, जय-जयकार हो रही है. सियार कौन है और राजा क्यों रोता है? इस पर विद्वानों में मतभेद है. इसका जवाब किसी ऐप पर नहीं आता. लेकिन जानने वाले बताते हैं, अब राजा को भी ठंड लगने लगी है.

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