40 साल पहले हुए इस कांड के चलते पाकिस्तान की हालत इतनी बुरी है
जो पाकिस्तान जम्हूरियत में सोया था, वो सुबह फौजी बूटों के साए में उठा.

कभी ऐसा भी हो कि तारीख को तारीख के हवाले से ही बताया जाए. साल था 1977. दो पड़ोसी देश थे और दोनों में 7 साल बाद चुनाव होने जा रहे थे. नाम था भारत और पाकिस्तान. 7 मार्च 1977 को पाकिस्तान में आम चुनाव और इसके ठीक 9 दिन बाद 16 मार्च को भारत में आम चुनाव शुरू हुए. ये कितना अजीब संयोग था कि भारत इस चुनाव के जरिए नागरिक सरकार की तानाशाही का अंत कर रहा था, वहीं पाकिस्तान इस चुनाव के जरिए सैनिक तख्तापलट की तरफ बढ़ रहा था. 10 साल 11 महीने लंबी सैनिक तानाशाही, जिसने पाकिस्तान की तासीर को बदल दिया.
मार्च की पहली तारीख, साल था 1976. प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो एक दस्तावेज पर दस्तखत कर रहे थे. ये दस्तावेज था लेफ्टिनेंट जनरल ज़िया उल हक़ की नियुक्ति का. सात सीनियर अफसरों को इस्तीफा दिलवाकर जिया को आर्मी चीफ बनाया गया था. मशहूर पाकिस्तानी पत्रकार हसन निसार के शब्दों में कहा जाए तो भुट्टो ने एक तरह से अपने डेथ वारंट पर दस्तखत कर दिए थे.

भुट्टो
1977 का वो चुनाव
पाकिस्तान में 1970 के बाद 7 साल बाद चुनाव हो रहे थे. जुल्फिकार भुट्टो के नेतृत्व में पकिस्तान पीपल्स पार्टी (पीपीपी) के खिलाफ खड़ा था एक संयुक्त मोर्चा. नाम था पाकिस्तान नेशनल अलाइंस. ये एक उलटबासी सा गठबंधन था. इसमें जमात-ए-इस्लामी था और पाकिस्तान के कम्युनिस्ट भी. चुनाव का नतीजा आया और पीपीपी ने बड़े अंतराल से ये चुनाव जीत लिया. उसे 60% वोट के साथ 200 में से 155 सीटें जीत ली. पीएनए के खाते में आईं महज 36 सीटें.
ये नतीजे पाकिस्तान में दंगे लेकर आए. पूरा विपक्ष चुनाव में धांधली का आरोप लगाकर सड़कों पर उतर आया. धीरे-धीरे ये आंदोलन तेजी पकड़ने लगा. इसे दबाने के लिए भुट्टो ने फ़ौज की मदद ली. कई जगह फ़ौज ने प्रदर्शन कर रहे नागरिकों पर गोलियां चलाईं. कराची सहित कई शहरों में मार्शल लॉ लगा दिया गया. इस पूरे बलवे में 200 से ज्यादा लोग मारे गए.

खान वली खान (दाएं), जिनके नेतृत्व में गठबंधन किया गया
ऑपरेशन फेयर प्ले
जरनल जिया भुट्टो के सबसे वफादार सिपहसालारों में से एक हुआ करते थे. 1975 में जिया सेकेंड कॉर्प्स के कमांडर हुआ करते थे. उन्होंने भुट्टो को मुल्तान में कर्नल-इन-चीफ की हैसियत से आर्मड कॉर्प्स आने का न्यौता दिया. इस दौरान भुट्टो ने उनके सामने अपनी एक मुराद रखी कि उन्हें टैंक पर चढ़कर गोला दागना है. जिया ने उनकी ये मुराद पूरी की. भुट्टो टैंक पर चढ़े, उन्होंने टारगेट पर निशाना लगाया और जिया उल हक़ का निशाना एकदम ठीक लगा. इस मुलाकात के दौरान जिया ने जुल्फिकार अली भुट्टो के सामने वफ़ादारी की कसमें खाई. इसका नतीजा ये था कि दो साल बाद जिया आर्मी चीफ की कुर्सी पर बैठे थे.
अप्रैल 1977 में मिलिट्री इंटेलिजेंस का एक अफसर प्रधानमंत्री भुट्टो से मिला. उसने चेताया कि अगर जल्द ही वो विपक्ष के साथ किसी समझौते पर नहीं पहुंचे, तो आर्मी तख्तापलट कर सकती है. जून 1977 में समझौते के लिए बातचीत शुरू हुई. पीपीपी ने पीएनए की लगभग सभी मांगे मान ली थीं. इस बीच भुट्टो मध्यपूर्व के लंबे दौरे पर निकल गए. इधर पीएनए ने प्रधानमंत्री को भगोड़ा घोषित कर दिया. मीडिया में भी ये संकेत दिए गए कि ये बातचीत अंतहीन सड़क पर खड़ी है.

भुट्टो
भुट्टो अपने विदेश दौरे से लौटे. 4 जुलाई, 1977 को कैबिनेट की एक बैठक बुलाई गई. जरनल जिया उल हक़ भी इस मीटिंग में मौजूद थे. वो चाहते थे कि प्रधानमंत्री को जल्द से जल्द विपक्ष के साथ किसी समझौते पर पहुंच जाना चाहिए. इसी चार और पांच की दरम्यानी रात क्या हुआ, ये बताने से पहले हम आपको पाकिस्तान की संसद ले जाते हैं.
साल था 1973. प्रधानमंत्री संविधान के अनुच्छेद 6 में जरूरी बदलाव करने जा रहे थे. इस बदलाव के मुताबिक संविधान की अवहेलना करने वाला हर नागरिक 'गद्दार' कहलाएगा. इसके लिए मौत की सजा तय की गई. उस दिन सदन में भाषण देते हुए जुल्फिकार अली भुट्टो ने कहा कि ये संविधान संशोधन भविष्य में किसी भी सैनिक तख्तापलट के लिए सभी दरवाजे बंद कर देगा.
5 जुलाई की आधी रात को सेना ने सभी बड़े सरकारी दफ्तरों पर कब्ज़ा जमा लिया. सरकार और विपक्ष के बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया. जो पाकिस्तान जम्हूरियत में सोया था, वो सुबह फौजी बूटों के साए में उठा. सेना ने इसे 'ऑपरेशन फेयरप्ले' का नाम दिया था. टीवी की स्क्रीन पर जनरल जिया नामूदार हुए और उन्होंने अपने सख्त फौजी लहजे में कहना शुरू किया, मानो वो किसी सैनिक टुकड़ी को आदेश दे रहे हों-
"मिस्टर भुट्टो की हुकूमत खत्म हो चुकी है. सारे मुल्क में मार्शल लॉ नाफ़िज़ कर दिया गया है. कौमी और सूबाई असेम्बलियां तोड़ दी गई हैं. सूबाई गवर्नर और वजीर हटा लिए गए हैं. अलबत्ता आइन को मंसूख नहीं किया गया है. इसके बाज हिस्सों पर अमलदरामत रोक ली गई है."

जिया उल हक
तख्तापलट के वक़्त जिया ने वायदा किया कि 90 दिनों के भीतर देश में नए और पारदर्शी चुनाव करवाए जाएंगे. इस बात को यहां लिखने के बजाए चुटकुले की किसी किताब में दर्ज किया जा सकता है. 11 साल लंबी तानाशाही उनकी मौत के साथ ही खत्म हुई. अपनी तमाम बुराइयों के बावजूद जुल्फिकार अली भुट्टो एक सेक्युलकर देश गढ़ना चाहते थे. उनका रुझान समाजवाद की तरफ था. उधर अफगानिस्तान में कम्युनिस्टों की धमक साफ़ सुनाई दे रही थी. ये अमेरिका के लिए असहज करने वाली स्थिति थी. बाद के अध्ययन बताते हैं कि इस सैनिक तख्तापलट में अमेरिकी दूतावास की सहमति थी.
3 सितंबर 1977 को भुट्टो को फिर से गिरफ्तार कर लिया गया. उन पर तीन साल पुराने एक कत्ल के मामले में मुकदमा चलाया गया. नवम्बर 1974 में नवाब मोहम्मद अहमद खान को लाहौर में मार डाला गया था. इस खून के छींटे जुल्फिकार भुट्टो के ऊपर भी लगे थे. पांच महीने लंबे ट्रायल का नतीजा जुल्फिकार अली भुट्टो के लिए मौत लेकर आया. उन्हें 4 अप्रैल 1979 के सैनिक तख्तापलट के ठीक दो साल के बाद रावलपिंडी के सेंट्रल जेल में फांसी पर लटका दिया गया. जिया एक नए इस्लामी देश की नींव डाल रहे थे. भुट्टो उसमें गारे के काम आ गए.

भुट्टो को फांसी दिए जाने की खबर मिलने के बाैद उनकी पत्नी नुसरत
आपको पता है दुनिया जिन तानाशाहों से खौफ खाती है, वो खुद कितने डरे हुए होते हैं? चलिए आपको जिया उल हक़ का एक किस्सा सुनाते हैं. 13 अगस्त 1988 की बात है. जिया उल हक़ को ये अंदेशा हो गया था कि उनकी जान को खतरा है. खतरे को देखते हुए उन्होंने स्वतंत्रता दिवस के समरोह की जगह बदल कर आर्मी हाउस कर ली. उन्होंने आर्मी हाउस के हर एक कोने को जांचा. अंत में उन्होंने 35 पेड़ों को काटने के आदेश दिया, जो उनके हिसाब से हत्यारे के लिए ओट का काम कर सकते थे. 35 पेड़ों की बलि भी उनकी मौत को टाल नहीं पाई.
17 अगस्त 1988, बहावलपुर में नए खरीदे गए अब्राहम टैंक के प्रदर्शन को देखने के बाद वो हरकुलिस एयरक्राफ्ट में इस्लामाबाद के लिए रवाना हुए. टेकऑफ के कुछ मिनट के बाद इस विमान का संपर्क टूट गया. इसके बाद विमान एक जोरदार विस्फोट का शिकार हो गया. जिया और उनके साथ यात्रा कर रहे 30 लोगों में से कोई भी जिंदा नहीं बचा.
चलते-चलते आप हबीब जलीब की यह कविता सुनिए-
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