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22,500 करोड़ रुपए गंवाने वाले मलविंदर-शिविंदर, जिन्होंने एक-दूसरे पर मारपीट के आरोप लगाए हैं

एक वक्त भारत के सबसे बड़े रईसों में शामिल थे सिंह भाई.

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7 दिसंबर 2018 (अपडेटेड: 7 दिसंबर 2018, 10:24 AM IST)
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मलविंदर सिंह और शिविंदर सिंह कभी 22,500 करोड़ रुपये के कारोबार के मालिक थे. अब उनके पास कुछ नहीं बचा. बैंक के खाते तक फ्रीज कर दिए गए हैं. वित्तीय अनियमितता के आरोपों की जांच हो रही है. इसके पीछे सबसे बड़ी वजह भी ये दोनों खुद ही हैं. बिना सोचे-समझे कारोबार बढ़ाना, कर्जे पर कर्जा लेते जाना, आंख मूंदकर भरोसा करना, प्लानिंग की कमी, ये सारी गलतियां इनकी बर्बादी की जिम्मेदार हैं.
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21 सितंबर, 2016. फोर्ब्स के मुताबिक, मलविंदर और शिविंदर मोहन सिंह भारत के रईसों में 92वें नंबर पर थे. 24 सितंबर, 2018. दोनों भाइयों ने 22,500 करोड़ रुपये और अपना पूरा कारोबार गंवा दिया है. 7 दिसंबर, 2018. मलविंदर सिंह ने अपने छोटे भाई शिविंदर सिंह पर आरोप लगाया है कि उन्होंने 5 दिसंबर को उनपर हमला बोल दिया. वहीं शिविंदर ने मालविंदर पर मारपीट का आरोप लगाया है. मालविंदर ने एक तस्वीर शेयर की है, जिसमें वह घायल नज़र आ रहे हैं. हालांकि दोनों में से किसी ने भी एक दूसरे के खिलाफ मुकदमा नहीं दर्ज कराया है.
शिविंदर ने एक वीडियो पोस्ट करते हुए कहा है कि 5 दिसंबर, 2018 को शाम छह बजे के बाद उनके छोटे भाई शिविंदर मोहन सिंह ने 55 हनुमान रोड पर मेरे साथ मारपीट की, शर्ट के बटन तोड़ दिए और मुझे घायल कर दिया. लेकिन इस झगड़े से पहले की कहानी कुछ और है. मलविंदर मोहन सिंह. शिविंदर मोहन सिंह. दो कारोबारी भाई. बर्बादी तक आने से पहले दोनों ने साथ काम किया और खूब कामयाबी देखी. लोगों ने कभी दोनों भाइयों को झगड़ते हुए नहीं देखा. लेकिन फिर 4 सितंबर,2018 को शिविंदर ने बड़े भाई पर मुकदमा चलाने की अर्जी लगाई. नैशनल कंपनी लॉ ट्राइब्यूनल में उन्होंने मलविंदर पर जालसाजी, कुप्रबंधन और उत्पीड़न का इल्जाम लगाया. कहा, भैया ने मेरी बीवी अदिति के जाली दस्तखत कराए. मलविंदर और रेलिगेयर के पूर्व चेयरमैन सुनिल गोधनानी पर कंपनी को कर्जे में डालने का इल्जाम लगाया. ये पहली बार था जब लोगों ने दोनों भाइयों के बीच कड़वाहट देखी. इससे पहले लोग उनकी आर्थिक बर्बादी देख चुके थे. अपनी ही कंपनी फोर्टिस और रेलिगेयर में अपना मालिकाना हक खो दिया उन्होंने. कर्जा चुकाने के लिए उन्होंने अपने शेयर्स बैंकों में गिरवी रखे थे. कर्ज नहीं चुका पाए, तो कंपनी ने गिरवी शेयरों को जब्त कर लिया. कुल मिलाकर उन्होंने सब गंवा दिया. उनकी ये बर्बादी की कहानी बड़ी अजीबोगरीब है. इतना अनुभव और इतना पैसा होने के बाद आगे बढ़ने की जगह सब गंवा देना, ये अजीब ही तो है. वो इस मुकाम तक कैसे पहुंचे, इसकी पूरी कहानी सुनाते हैं आपको. किस्सा रेनबेक्सी का इसकी शुरुआत हुई बंटवारे से पहले के अमृतसर में. दो चचेरे भाई थे- रणजीत और गुरबक्स. दोनों ने मिलकर दवाओं के डिस्ट्रिब्यूशन की एक फर्म शुरू की. रणजीत के नाम का शुरुआती अक्षर और गुरबक्स के नाम के आखिरी अक्षरों (Ran+Bax) को मिलाकर इसका नाम पड़ा रेनबेक्सी. मगर 1947 में उन्हें ये कंपनी बेचनी पड़ी. बंटवारे के वक्त रावलपिंडी से दिल्ली आए भाई मोहन सिंह ने उनकी फर्म खरीद ली. वहां से इस कंपनी ने खूब तरक्की की. खूब सारी सुपरहिट दवाएं बनाईं. भाई मोहन सिंह के बाद कंपनी संभाली उनके बेटे परविंदर सिंह ने. उन्होंने कंपनी को विदेशों तक पहुंचा दिया. परविंदर के दो बेटे हुए- मलविंदर और शिविंदर. साल 2000 में परविंदर की मौत के बाद पूरी जिम्मेदारी दोनों भाइयों पर आ गई. परविंदर के भाई अनलजीत भी करोड़पति हैं. मैक्स ग्रुप उन्हीं का है.
जेनरिक दवाओं के बाजार में रेनबेक्सी बड़ा खिलाड़ी था. जेनरिक दवाएं ऐसी दवाएं होती हैं, जिनका पेटेंट एक्सपायर हो चुका है. इसलिए कई सारी कंपनियां उन्हें कम कीमत पर बना लेती हैं. फार्मा कंपनियों में दवाओं के पेटेंट की अवधि काफी छोटी होती हैं. लाइसेंस फी नहीं देने की वजह से जेनरिक दवाओं की कीमत कम होती है, लेकिन इसका असर ऑरिजनल दवा जैसा ही होता है.
जेनरिक दवाओं के बाजार में रेनबेक्सी बड़ा खिलाड़ी था. जेनरिक दवाएं ऐसी दवाएं होती हैं, जिनका पेटेंट एक्सपायर हो चुका है. इसलिए कई सारी कंपनियां उन्हें कम कीमत पर बना लेती हैं. फार्मा कंपनियों में दवाओं के पेटेंट की अवधि काफी छोटी होती हैं. लाइसेंस फी नहीं देने की वजह से जेनरिक दवाओं की कीमत कम होती है, लेकिन इसका असर ऑरिजनल दवा जैसा ही होता है.

10 सालों में क्या-क्या हो सकता है? 2008 में वन-डे क्रिकेट के अंदर ऑस्ट्रेलिया पहले नंबर था. 2018 में अभी वो छठे रैंक पर है. 10 साल में क्या से क्या हो सकता है. ऐसी ही कहानी मलविंदर और शिविंदर की है. 2008 से ही शुरू करते हैं. क्योंकि ये उनका चरम था. इसी साल मलविंदर और शिविंदर ने रेनबेक्सी कंपनी का अपना स्टेक बेचा. खरीदने वाली कंपनी थी जापान की दाइची सांक्यो. ये 2.4 बिलियन डॉलर की डील थी. रेनबेक्सी भारत के जेनरिक दवाओं की इंडस्ट्री का सितारा थी. जब वो बिकी, उस समय वो भारत की सबसे बड़ी दवा कंपनी थी. किस्मत अगर कोई चीज होती है, तो वो भी बड़ी मेहरबान थी इन दोनों भाइयों पर. इसी से सोचिए कि इन्होंने जब दाइची के हाथों रेनबेक्सी का अपना हिस्सा बेचा, उसके कुछ ही दिन बाद अमेरिका में ड्रग रेग्युलेटर ने रेनबेक्सी के आयात पर बैन लगा दिया. कहा, दवाई की क्वॉलिटी खराब है. दाइची की तो वॉट लग गई. आगे चलकर 2013 में दाइची ने दोनों भाइयों पर मुकदमा ठोक दिया. 2014 में उसने सन फार्मा के हाथों रेनबेक्सी बेच दी. तब तक दाइची को हजारों करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका था.
बाईं तरफ हैं मलविंदर सिंह. दाहिनी तरफ दाइची सांक्यो के प्रेजिडेंट और सीईओ तकाशी शोदा बैठे हैं. ये 2008 के समय की तस्वीर है, जब दोनों के बीच रेनबेक्सी की डील हुई. उस समय मलविंदर रेनबेक्सी के चीफ ऐक्जिक्यूटिव थे (फोटो: रॉयटर्स)
बाईं तरफ हैं मलविंदर सिंह. दाहिनी तरफ दाइची सांक्यो के प्रेजिडेंट और सीईओ तकाशी शोदा बैठे हैं. ये जून 2008 की तस्वीर है, जब दोनों के बीच रेनबेक्सी की डील हुई. उस समय मलविंदर रेनबेक्सी के चीफ ऐक्जिक्यूटिव थे (फोटो: रॉयटर्स)

रेनबेक्सी डील से चौपट होने का किस्सा शुरू हुआ जून 2008 में डील के बाद इन दोनों भाइयों के पास साढ़े नौ हजार करोड़ की नकदी थी. बाकी का साम्राज्य अलग. लेकिन इन दोनों ने चीजें ठीक से प्लान नहीं की. पैसे की बेकद्री की. बेवकूफी दिखाई. आंख मूंदकर भरोसा किया. दाइची से मिले नकद पैसों में से 2,000 करोड़ रुपये से दोनों भाइयों ने टैक्स और बाकी का कर्जा चुकाया. बाकी बचे 7,500 करोड़ रुपये. दोनों भाइयों के पास दो और बड़े कारोबार थे. एक- भारत के सबसे बड़े अस्पतालों की चेन फोर्टिस हेल्थकेयर. दूसरा- सबसे बड़े नॉन बैंक फाइनैंशनल इंस्टिट्यूशन्स में से एक रेलिगेयर ऐंटरप्राइजेज. बचे हुए पैसों में से 1,750 करोड़ रुपये इन्होंने रेलिगेयर में निवेश किए. 2,230 करोड़ फोर्टिस में लगाए.
मलविंदर और शिवेंदर सिंह की मां निम्मी राधा स्वामी सत्संग ब्यास के प्रमुख गुरिंदर सिंह ढिल्लों की ममेरी बहन हैं. ढिल्लों से पहले निम्मी के पिता चरण सिंह इसके प्रमुख थे.
मलविंदर और शिवेंदर सिंह की मां निम्मी राधा स्वामी सत्संग ब्यास के प्रमुख गुरिंदर सिंह ढिल्लों की ममेरी बहन हैं. ढिल्लों से पहले निम्मी के पिता चरण सिंह इस सेक्ट के प्रमुख थे.

राधास्वामी सत्संग ब्यास के 'बाबा जी' से क्या रिश्ता है? गुरिंदर सिंह ढिल्लों उर्फ बाबा जी. जिनका ब्यास सत्संग चलता है. देशभर में इनके बीस लाख से ज्यादा भक्त हैं. करीब 5,000 केंद्र हैं इनके. अथाह जमीन है इनके पास. ये संप्रदाय 1861 में बने राधा स्वामी सेक्ट से टूटकर बना है. ढिल्लों से पहले उनके मामा चरण सिंह इसके प्रमुख थे. चरण सिंह की बेटी निम्मी सिंह मलविंदर और शिवेंदर की मां हैं. यानी, निम्मी सिंह ढिल्लों की ममेरी बहन हैं. मलविंदर और शिवेंदर कहते थे कि ढिल्लों उनके लिए पिता जैसे हैं.
दाइची वाली डील से जो पैसे आए थे, उनमें से 2,700 करोड़ रुपये इन दोनों भाइयों ने ढिल्लों परिवार को ट्रांसफर कर दिए. ये शायद साथ मिलकर कारोबार करने की मंशा से दिया गया होगा. दोनों भाइयों का कहना है कि ढिल्लों उनके गुरु हैं. कि उनके बीच गुरु-शिष्य का संबंध है. मगर अच्छे दिनों में दिए गए ये पैसे बुरे दिनों में भी वापस नहीं मिले. ब्याज जोड़ दें, तो अब वो रकम 4,000 से 5,000 करोड़ रुपये तक हो गई है. ये पैसा क्यों नहीं लौटाया गया, इस बारे में दोनों भाई कुछ नहीं कहते.
फिर मंदी आ गई, उसने डुबा दिया जेब में ढेर सारा कैश था. सो रेलिगेयर और फोर्टिस ने खूब इन्वेस्टमेंट शुरू कर दिया. कारोबार बढ़ाने के लिए इन्होंने खूब धुआंधार कर्जा लेना शुरू कर दिया. उसी रफ्तार से खर्च भी करते गए. ये बेतहाशा खर्च बिना प्रॉपर प्लानिंग के हो रहा था. दूसरी तरफ ढिल्लों और राधा स्वामी सत्संग ब्यास (RSSB) के सहयोगियों ने उन्हीं दिनों रियल एस्टेट में शुरुआत की. तब ये खूब मुनाफे का सौदा था. इन लोगों ने ज्यादा से ज्यादा खरीदारी करने के लिए ऊंची ब्याज दरों पर खूब पैसा लिया. सोचा, जितना लगाएंगे उतना कमाएंगे. मगर फिर क्या हुआ कि मंदी आ गई. जमीन और घरों के दाम गिर गए.
दोनों भाइयों के ऊपर वित्तीय अनियमितता का भी इल्जाम है. सेबी इन आरोपों की जांच कर रहा है. इल्जाम है कि इन्होंने अपनी निजी कंपनियों का कर्ज चुकाने के लिए ग्रुप के पैसों का इस्तेमाल किया. फंड इधर से उधर किए. वित्तीय लेनदेन में गड़बड़ियां की.
दोनों भाइयों के ऊपर वित्तीय अनियमितता का भी इल्जाम है. इल्जाम है कि इन्होंने अपनी निजी कंपनियों का कर्ज चुकाने के लिए ग्रुप के पैसों का इस्तेमाल किया. फंड इधर से उधर किए. वित्तीय लेनदेन में गड़बड़ियां की. वैसे फोर्टिस अब मलयेशिया की IHH हेल्थकेयर के पास है. रेलिगेयर का कंट्रोल बे कैपिटल के पास है.

कर्ज चुकाने के चक्कर में कई गड़बड़ियां हुईं एक तो बिक्री घट गई, ऊपर से कीमतें भी गिर गईं. लेकिन जो कर्ज लिया था, उसका ब्याज तो ज्यों का त्यों था. ये पैसा चुकाने के लिए रेलिगेयर और फोर्टिस को अपने पास रिजर्व पड़े रुपये भी निकालने पड़े. ये दोतरफा मार थी. झटका मलविंदर और शिविंदर को तो लगा ही लगा, ढिल्लों भी चपेटे में आए. ऐसी नौबत आ गई कि देनदारियों को निपटाने के लिए इन्हें अपनी कंपनियों की संपत्ति को गिरवी रखना पड़ रहा था. इस चक्कर में काफी गड़बड़ियां भी हुईं. जैसे कई बार ग्रुप की कंपनियों के पैसे से निजी होल्डिंग कंपनियों का पैसा भरा गया. इन आरोपों की जांच हो रही है. इनके कई सारे लेन-देन जांच के घेरे में हैं. सेबी भी उनके खिलाफ जांच कर रहा है.
सुनील गोधवानी की ढिल्लों से इतनी करीबी थी
सुनील गोधवानी की ढिल्लों से इतनी करीबी थी कि उनकी बेटी सिमरन की सगाई ढिल्लों के छोटे बेटे गुरकीरत से हुई. आगे जब उनका रिश्ता बिगड़ा, तो इस सिमरन-गुरकीरत के रिश्ते पर भी असर पड़ा. शादी हुई नहीं दोनों की. 

भाई पर इल्जाम लगाने से पहले किस पर ठीकरा फोड़ा? सुनील गोधवानी खुद भी कारोबारी परिवार के थे. चमड़े का बिजनस था उनका. इनका परिवार ढिल्लों का भक्त था. पिछली दो पीढ़ियों से ये राधा स्वामी सत्संग के साथ थे. उधर मलविंदर और शिवेंदर, दोनों भाइयों को ढिल्लों पर बहुत भरोसा था. कहते हैं कि ढिल्लों ने ही उन्हें सुनील गोधवानी का नाम सुझाया था. उनके कहने की वजह से ही दोनों भाइयों ने गोधवानी पर भरोसा किया और उन्हें रेलिगेयर एंटरप्राइजेज संभालने को दिया. कंपनी का सीईओ और एमडी बना दिया. गोधवानी के पास फ्री हैंड था. दोनों भाई आंख मूंदकर भरोसा करते थे उनके ऊपर. एक जमाने में इन तीनों के बीच बहुत पटती थी. मलविंदर और शिवेंदर कहते थे कि गोधवानी उनके सगे भाई जैसे हैं. आगे चलकर ये भाईचारा रिश्तेदारी में बदलने का फैसला हुआ. गोधवानी की बेटी सिमरन की सगाई हुई ढिल्लों के छोटे बेटे गुरकीरत से. हालांकि बाद में जब चीजें बिगड़ गईं, तो रिश्ता भी सगाई तक ही रहा. शादी तक नहीं पहुंचा. 2016 में चीजें खराब होती दिखीं. इसी साल गोधवानी ने रेलिगेयर में अपना पद छोड़ा. फिर कंपनी से भी बाहर हो गए. अगस्त 2018 में मलविंदर और शिविंदर ने साझा बयान जारी कर अपनी बर्बादी का ठीकरा गोधवानी के सिर फोड़ा.
दोनों भाइयों ने इल्जाम लगाया कि कंपनी के ऊपर कर्जा लादने में उनका बहुत बड़ा हाथ है. उनका कहना है कि गोधनानी ने अपने पद का बेजा फायदा उठाया. उन्हें बिना बताए पैसों का लेनदेन किया और इसी वजह से 2016 आते-आते पूरा ग्रुप कर्ज तले दब गया. गोधनानी के लोग इन आरोपों से इनकार करते हैं. उनका कहना है कि हर डीलिंग के बारे में दोनों भाइयों को पता था. सब कुछ उनकी सहमति, जानकारी और दस्तखत के साथ हुआ.
दाइची ने भी रेनबेक्सी को बेच दिया. इसे खरीदा सन फार्मा ने.
दाइची ने भी रेनबेक्सी को बेच दिया. इसे खरीदा सन फार्मा ने.

बर्बाद हो गए हैं, मुसीबतें खत्म नहीं हुई हैं वित्तीय अनियमितताओं की जांच तो चल ही रही है. इसके अलावा दाइची के साथ कोर्ट केस भी चल रहा है. कोर्ट का फैसला आया था कि दोनों भाई 50 करोड़ डॉलर का मुआवजा दें दाइची को. उन्होंने इस फैसले के खिलाफ अपील की हुई है. अगर आगे भी कोर्ट का यही फैसला रहता है, तो उन्हें ये पैसा चुकाना होगा. पैसा चुकाने को पैसा होना भी चाहिए. इन दोनों के पास न पैसा बचा है, न कंपनी पर मालिकाना हक ही बचा है. दोनों भाई ग्रुप की कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी बेचकर कर्जा चुकाने की कोशिश कर रहे थे. लेकिन दाइची सांक्यो ने इसके खिलाफ अपील कर दी. दिल्ली हाई कोर्ट ने इस केस में दोनों भाइयों को फटकार लगाई. कहा कि उन्होंने अदालत को गुमराह किया है. दोनों के सारे बैंक खाते भी सील कर दिए. दोनों भाई साथ थे, तो बर्बाद हुए. 'बाबा जी' का साथ भी उनको बचा नहीं पाया. बल्कि ये उनकी बर्बादी की कई सारी वजहों में से एक बड़ी वजह बना. दोनों भाई अब अलग होकर कर्जे से कैसे उबरेंगे और आगे कैसे बढ़ेंगे, ये फिलहाल तो समझ के बाहर है.


इस पूरी बर्बादी की मोटा-मोटी टाइमलाइन 
जून 2008 - 9,576 करोड़ रुपये में जापान की दाइची सांक्यो को रेनबेक्सी बेची. 2009-10 - उन पैसों में से 2,000 करोड़ रुपये कर्ज चुकाने और टैक्स देने में खर्च हुए. 1,750 करोड़ रुपये रेलिगेयर में निवेश हुए. 2,230 करोड़ रुपये फोर्टिस हेल्थकेयर में लगाए. 2009-11 - 2,700 करोड़ रुपये दिए बाबा जी गुरिंदर सिंह ढिल्लों के परिवार और उनके राधास्वामी सत्संग ब्यास ट्रस्ट (RSSB) के लोगों को. 2009-14 - RSSB और ढिल्लों परिवार ने रियल एस्टेट में जमकर पैसे लगाए. मंदी आई और कीमतें गिर गईं. खूब घाटा हुआ. 2010-14 - रेलिगेयर और फोर्टिस ने भी अपने पांव फैलाए. न केवल भारत के अंदर, बल्कि विदेशों में भी. मगर मंदी का असर यहां भी हुआ. कर्जा चुकाना भारी पड़ने लगा. अप्रैल, 2010 - अप्रैल 2010 में दोनों भाइयों को रेलिगेयर के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ग्रुप से निकाल दिया गया. 2012 - दाइची ने सिंगापुर के इंटरनैशनल कोर्ट ऑफ अरबिट्रेशन में अपील किया. कहा कि दोनों भाइयों ने रेनबेक्सी डील में उन्हें धोखा दिया. कहा कि रेनबेक्सी ने अमेरिकी जांच से जुड़े तथ्यों पर उन्हें गुमराह किया. डील के कुछ दिनों बाद ही अमेरिका ने खराब क्वॉलिटी बताकर रेनबेक्सी दवाओं के इम्पोर्ट पर बैन लगा दिया था. 2016 - रिजर्व बैंक ने रेलिगेयर की लेंडिंग फर्म फिनवेस्ट को झिड़का. इस फर्म ने जांच और जरूरी प्रक्रिया पर अमल किए बिना कंपनी को 1,200 करोड़ रुपये का कर्ज दिया था. 2016 - इंटरनैशनल कोर्ट ऑफ अरबिट्रेशन ने दाइची के हक में फैसला सुनाया. कहा कि मलविंदर और शिविंदर दाइची को बतौर हर्जाना 50 करोड़ डॉलर दें. जुलाई 2016 -  सुनील गोधवानी ने रेलिगेयर ऐंटरप्राइजेज के सीएमडी की पोस्ट छोड़ दी. 2017 में वो कंपनी से ही बाहर हो गए. 2016 - मलविंदर और शिविंदर के सिर पर कुल 13,000 करोड़ रुपये का कर्ज हो गया. नवंबर 2016 - नवंबर 2016 में RHC के कर्जदारों का बकाया चुकाने के लिए मलविंदर ने कथित तौर पर फोर्टिस से 473 करोड़ रुपया ट्रांसफर कर लिया. इसकी जांच शुरू हुई. फरवरी 2018 - बकाया न चुका पाने पर लेनदारों ने इक्विटी मांगी. फोर्टिस और रेलिगेयर से दोनों भाइयों का कंट्रोल खत्म हो गया. अगस्त 2018 - दोनों भाइयों ने रेलिगेयर के पूर्व सीईओ गोधनानी पर इल्जाम लगाया. कहा, उन्होंने बिना बताए कई लेनदेन किए और उन्हें कर्जे में फंसाकर चले गए. सितंबर 2018 - शिविंदर ने बड़े भाई मलविंदर और गोधनानी पर उत्पीड़न, जालसाजी और कुप्रबंधन का इल्जाम लगाया. कहा, भाई से अलग हो रहे हैं. सितंबर 2018 - मां निम्मी सिंह ने दोनों भाइयों में बीच-बचाव किया. शिविंदर ने भाई के खिलाफ केस वापस ले लिया. लेकिन फिर ये भी कहा कि बाकी चाहे जो हो जाए, बंटवारा तो होगा ही. और वो अपना अलग कारोबार शुरू करेंगे.


 

इस स्टोरी में कई इनपुट इंडिया टुडे में छपी राजीव दुबे की रिपोर्ट से लिए गए हैं.




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