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मीर जाफर, वो गद्दार जिसकी वजह से अंग्रेज़ भारत में कदम जमा सके

जिसका किया विश्वासघात इतना मशहूर हुआ कि कहावतों में उसका नाम आने लगा.

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मुबारक
2 जुलाई 2021 (अपडेटेड: 2 जुलाई 2021, 09:37 AM IST)
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अंग्रेज़ भारत में करीब 200 साल रहें. लेकिन क्या आप जानते हैं वो कौन सी घटना थी, जिसने अंग्रेज़ों को भारत में पैर जमाने का मौका दिया? ये मुमकिन हो सका, एक शख्स के धोखे की वजह से. उसका नाम था मीर जाफर. उस धोखे की बलि चढ़े थे बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला. फिरंगी भारतभूमि पर कदम रखने को मचल रहे थे. नवाब के सत्ता और जान से हाथ धोने की देर थी बस.
मीर जाफर का ये वही जगतप्रसिद्ध धोखा है जिसकी वजह से पीढ़ियों तक लोग अपने बच्चों का नाम मीर जाफर रखने में कतराते थे. गद्दारी और नमकहरामी का प्रतीक बन गया था ये नाम.
2 जुलाई 1757 का वो दिन था, जब नवाब सिराजुदौला को एक गद्दार सेनापति की धोखाधड़ी की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी थी.
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नवाब सिराजुद्दौला.

नवाब सिराजुद्दौला, उनकी नवाबियत और अपनों का असंतोष

नवाब सिराजुद्दौला को आख़िरी आज़ाद नवाब कहा जाता है. और ठीक ही कहा जाता है. नवाब की जान जाते ही भारतीय उपमहाद्वीप में अंग्रेज़ी शासन की नींव रखी गई. नवाब का पूरा नाम मिर्ज़ा मुहम्मद सिराजुद्दौला था. 1733 में पैदा हुए नवाब की अपनी मौत के वक़्त महज़ 24 साल की उम्र थी. अपनी मौत से साल भर पहले ही अपने नाना की मौत के बाद, उन्होंने बंगाल की गद्दी संभाली थी. ये वही वक्त था, जब ईस्ट इंडिया कंपनी उपमहाद्वीप में अपने कदम जमाने की कोशिश कर रही थी.
सिराजुद्दौला को कम उम्र में नवाब बनाए जाने से उनके कई रिश्तेदार खफा थे. ख़ास तौर से उनकी खाला घसीटी बेग़म. सिराजुद्दौला ने नवाब बनने के थोड़े ही समय बाद उन्हें क़ैद करवा दिया था. नवाब ने बरसों से बंगाल के सेनापति रहे मीर जाफर की जगह मीर मदान को तरजीह दी. इससे मीर जाफर नवाब से बुरी तरह खफ़ा हो गया.

हर लंका में एक विभीषण होता है

अपनी ज़मीन पक्की करने के फ़िराक में लगे अंग्रेज़ों की राह में, नवाब सिराजुद्दौला बहुत बड़ा रोड़ा थे. उन्होंने इस बात की संभावना तलाशनी शुरू की, कि क्या किसी विभीषण का वजूद है? अंग्रेज़ी सेना के सेनापति थे रॉबर्ट क्लाइव. उन्होंने कुछ जासूस बंगाल भेजें. जासूसों ने क्लाइव को बताया कि मीर जाफर में काफी संभावनाएं हैं. मीर जाफर बंगाल का नवाब बनने का सपना संजोए बैठा था. क्लाइव ने उससे संपर्क साधा. खतोकिताबत शुरू हुई. साजिश परवान चढ़ने लगी.
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मीर जाफर.

प्लासी की वो लड़ाई, जिसने हिंदुस्तान का भविष्य बदल कर रख दिया

अंग्रेज़ों ने बंगाल पर धावा बोल दिया. नवाब सिराजुद्दौला अपनी पूरी फ़ौज को अंग्रेज़ों के खिलाफ़ नहीं झोंक सकते थे. उन्हें उत्तर से अफगानी शासक अहमद शाह दुर्रानी और पश्चिम से मराठों का ख़तरा हमेशा बना रहता था. फ़ौज के एक हिस्से के साथ वो प्लासी पहुंचे. मुर्शिदाबाद से कोई 27 मील दूर डेरा डाला. 23 जून को एक मुठभेड़ में सिराजुद्दौला के विश्वासपात्र मीर मदान की मौत हो गई. नवाब ने सलाह के लिए मीर जाफर को पैगाम भेजा. मीर जाफर ने सलाह दी कि युद्ध रोक दिया जाए. नवाब ने मीर जाफर की सलाह मानने का ब्लंडर कर दिया.
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लड़ाई रोकी गई. नवाब की फ़ौज वापस कैंप लौटने लगी. मीर जाफर ने रॉबर्ट क्लाइव को स्थिति समझा दी. क्लाइव ने पूरी ताकत से हमला बोल दिया. अचानक हुए हमले से सिराज की सेना बौखला गई. तितर-बितर होकर बिखर गई. क्लाइव ने लड़ाई जीत ली. नवाब सिराजुद्दौला को भाग जाना पड़ा. मीर जाफर फ़ौरन अंग्रेज़ कमांडर से जाकर मिला. एग्रीमेंट के मुताबिक़ उसे बंगाल का नवाब बना दिया गया. नाम का नवाब. सत्ता अंग्रेज़ों के हाथ लग चुकी थी.

क्या है नमक हराम ड्योढ़ी!

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद के लागबाग एरिया में एक हवेली है. ये कभी धोखेबाज़ों के सरताज रहे मीर जाफर की हवेली है. इसी हवेली को कहा जाता है नमक हराम ड्योढ़ी. इतिहास इसी तरह बदला लेता है.
प्लासी की लड़ाई से भागकर नवाब सिराजुद्दौला ज़्यादा दिन आज़ाद नहीं रह सके. उन्हें पटना में मीर जाफर के सिपाहियों ने पकड़ लिया. उन्हें मुर्शिदाबाद लाया गया. मीर जाफर के बेटे मीर मीरन ने उन्हें जान से मारने का हुक्म दिया. 2 जुलाई 1757 को उन्हें इसी नमक हराम ड्योढ़ी में फांसी पर लटकाया गया. अगली सुबह, उनकी लाश को हाथी पर चढ़ाकर पूरे मुर्शिदाबाद शहर में परेड कराई गई.
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नमक हराम ड्योढ़ी.

सत्ता की वो बाज़ी तो मीर जाफर जीत गया था. लेकिन तारीख ने उसे बुरी तरह हरा दिया. आज भी मीर जाफर का नाम कहावतों में पिरोया हुआ, विश्वासघात की दास्तान बना फिरता है. वक़्त सब हिसाब बराबर कर देता है.


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