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क्या टीपू सुल्तान ने कृष्णासागर बांध की नींव रखी थी? पूरी कहानी में मिलेगा सच

कर्नाटक के समाज कल्याण मंत्री एच.सी. महादेवप्पा ने हाल में कहा कि टीपू सुल्तान ने सबसे पहले कृष्णराज सागर (केआरएस) डैम यानी कन्नंबाड़ी बांध की नींव रखी थी. यह बात उन्होंने मैसूर के राजा नलवाड़ी कृष्णराज वोडियार को याद करते हुए कही.

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KRS Dam
केआरएस बांध की कहानी (India Today)
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राघवेंद्र शुक्ला
7 अगस्त 2025 (पब्लिश्ड: 04:36 PM IST)
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भारत की राजनीति में टीपू सुल्तान को लेकर विवाद नई बात नहीं है. मैसूर की रियासत पर 21 साल तक शासन करने वाले टीपू को लेकर भारत में राजनीतिक दलों की अपनी विचारधारा के हिसाब से धारणाएं हैं. एक खेमा है जो टीपू सुल्तान को बहादुर और पंथ निरपेक्ष राजा के तौर पर देखता है. वहीं, एक पक्ष ऐसा भी है, जिसकी नजर में वह एक सांप्रदायिक राजा था, जिसने अपने शासनकाल में अल्पसंख्यकों पर जुल्म किए. कर्नाटक की राजनीति में जब-तब उसके इन दोनों ‘रूपों’ के आधार पर सियासत बिजली की तरह चमकती है और फिर बुझ जाती है. 

ताजा चर्चा केआरएस डैम यानी कृष्णराज सागर बांध को लेकर है. कर्नाटक के मंत्री हैं एचसी महादेवप्पा. कांग्रेस के नेता हैं. एक कार्यक्रम में उन्होंने जोश-जोश में कह दिया कि केआरएस डैम, जिसे 20वीं सदी के दूसरे-तीसरे दशक में बनवाया गया था, उसकी नींव टीपू सुल्तान ने रखी थी. फिर क्या था? भाजपा ने बयान लपक लिया. कांग्रेस पर हमले तेज हो गए हैं. बीजेपी नेता और MLC सीटी रवि ने कहा कि लगता है कांग्रेस नेताओं को ‘पागल कुत्ते ने काट लिया’ है. अभी कह रहे हैं बांध टीपू सुल्तान ने बनाया था. बाद में कहेंगे कि राज्यगान उसके पिता हैदर अली ने लिखा है.

खैर, महादेवप्पा के दावे और बांध के ‘सच’ के बीच टीपू सुल्तान के नाम के तीन शिलालेख इन सवालों की तीव्रता बढ़ा रहे हैं कि आखिर कावेरी नदी की गोद में बसी आबादी को सरस जीवन देने वाले बांध की पहली कल्पना किसने की थी? ये तीन शिलालेख फारसी, अंग्रेजी और कन्नड़ में लिखे हैं और केआरएस डैम के रिजरवायर के पास मौजूद हैं. इन शिलालेखों के अनुसार, टीपू सुल्तान ने 1794 में 'मोही बांध' नाम के बांध का सपना देखा था. हालांकि, इससे बांध बनाए जाने की या फिर केआरएस बांध से संबंध की कोई पुष्टि नहीं होती.

फिर केआरएस बांध की पूरी कहानी क्या है? 

इसका जवाब जानने के लिए हमने इतिहासकार और मैसूर विश्वविद्यालय में प्राचीन इतिहास विभाग के प्रोफेसर एनएस रंगराजू से बात की. 

प्रोफेसर रंगराजू ने बताया, “खेती के लिए, पीने के लिए और अपनी रियासत के लोगों के प्रयोग के लिए पानी के प्रबंध की चिंता टीपू सुल्तान को थी, इससे इनकार नहीं किया जा सकता. कावेरी नदी के पानी को बांध बनाकर संग्रहीत करने के लिए सुल्तान ने कोशिश भी की थी. लेकिन जो केआरएस डैम आज मौजूद है, उसमें उसका किसी भी तरह का हाथ था, इस बारे में साफतौर पर कुछ नहीं कह सकते.”

रंगराजू कहते हैं कि इसमें कोई शक नहीं है कि टीपू सुल्तान भारत के इसी हिस्से से शासन कर रहे थे. खासतौर पर मैसूर और श्रीरंगपट्टनम से. उन्होंने बहुत लंबे समय तक, बहुत सी लड़ाइयां लड़ीं. रंगराजू ने कहा, “टीपू ने चार एंग्लो-इंडियन युद्ध भी लड़े और चौथी जंग में मारे गए. इसमें कोई शक नहीं है, लेकिन जहां तक कावेरी नदी के पानी के उपयोग की बात है, इस दिशा में उनकी कोशिश को नकारा नहीं जा सकता. टीपू सुल्तान पानी संग्रह करने के उद्देश्य से एक छोटा-सा प्रयास करना चाहते थे, जिसकी जानकारी शिलालेखों में भी है. लेकिन इसे आज के केआरएस डैम जैसा पूरा बांध कह देना सही नहीं है.” 

प्रोफेसर ने आगे बताया,

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उन्होंने कहा कि वास्तव में हमारे पास ये बताने के लिए कोई सबूत नहीं है कि उन्होंने ये काम कहां शुरू किया था. हालांकि, इसकी जानकारी इकट्ठा की गई है और कई पुस्तकों में प्रकाशित भी हुई है. हमारे पास एपिग्राफिया कार्नाटिका (epigraphia Carnatica) नामक ग्रंथ है, जिसे बेंजामिन लुईस राइस ने संकलित किया था. इसमें एक फारसी शिलालेख का जिक्र है, जिससे यह प्रमाणित होता है कि उन्होंने पानी संग्रह करने के लिए प्रयास किया था, लेकिन इसके लिए फंड रिलीज करने या फिर योजना को अमल में लाने की बात कहीं साफतौर पर नहीं मिलती. 

प्रोफेसर ने बताया,

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कहानी केआरएस बांध की

बीसवीं सदी की शुरुआत की बात है. पानी से भरी कावेरी नदी के आसपास के इलाके सूखे की मार झेल रहे थे. लेकिन किसी को समझ नहीं आ रहा था कि कावेरी नदी के पानी का इस्तेमाल कैसे किया जाए. बांध बनाया जा सकता था, लेकिन तब न तो तकनीकी आज जैसी उन्नत थी और न ही उतना पैसा था. 

प्रोफेसर रंगराजू के मुताबिक, साल 1908 में राजा कृष्णराज वाडियार ने हिम्मत दिखाई और खेती-सिंचाई के लिए कावेरी नदी पर बांध बनाने की योजना बनाई. उन्होंने अपने दीवान को प्लान बनाने का निर्देश दिया. दीवान ने इसके लिए एक ब्रिटिश इंजीनियर और एक भूवैज्ञानिक को हायर किया. दोनों ने सर्वे किया और बांध के लिए जगह चुनी- कन्नामबाड़ी गांव. 

मुश्किल ये थी कि बांध की वजह से पूरा गांव डूब सकता था. इसका कोई विकल्प भी नहीं था. तय किया गया कि गांव के लोगों को नई जगह पर बसाया जाएगा. जिस नई जगह पर गांव बसाया जाना था उसे नाम दिया गया- नया कन्नामबाड़ी. गांव के एक-एक शख्स को नई जगह पर शिफ्ट किया गया.

नलवडी कृष्णराज वाडियार जब तक आश्वस्त नहीं हो गए कि गांव के सब लोगों का पुनर्वास हो गया है, तब तक बांध के निर्माण का काम नहीं शुरू हुआ.

अंग्रेजों की शर्त

बांध के निर्माण के लिए मद्रास रेजिडेंसी से अनुमति लेना जरूरी था, क्योंकि मैसूर में अंग्रेजों का कोई मुख्यालय नहीं था. दोनों ब्रिटिश भूवैज्ञानिक और इंजीनियर इसके लिए अंग्रेज अधिकारियों से मिले. अंग्रेज अधिकारियों ने कुछ शर्तों के साथ बांध के पहले चरण की इजाजत दे दी. शर्त थी कि पानी सिमसा नदी की ओर लगातार बहता रहना चाहिए, जहां बिजली पैदा की जा रही थी. अगर किसी भी तरह से यह प्रवाह बाधित हुआ, तो अनुबंध रद्द कर दिया जाएगा. 

ऐसा इसलिए था कि अगर सिमसा नदी में पानी कम जाता तो कोलार से सोने के खनन पर असर पड़ता और अंग्रेज ये बिल्कुल नहीं चाहते थे.

बांध बनना शुरू

इसके बाद 1908 में बांध का काम शुरू हुआ. डीपीआर (डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट) और वित्तीय खर्च की जानकारी इंजीनियरों ने दी और महाराजा ने उसे स्वीकार कर लिया.

फिर एक हादसा हुआ

1909 में सिमसा नदी में बने बिजलीघर की ओर जाने वाली पाइप में कचरा फंस गया और पानी रुक गया. ब्रिटिश इंजीनियरों को पता चला तो वे एक छोटी सी नाव और उस पर 7 लोगों को लेकर वहां पहुंचे. कचरा हटा दिया और पानी ठीक से बहने भी लगा. लेकिन इन सब में नाव पलट गई और सब पानी में गिर गए. कुछ लोग जैसे-तैसे बचकर बाहर आ गए, लेकिन एक मजदूर रह गया. 31 साल के ब्रिटिश इंजिनियर कैप्टन डाइस (Captain Dias) को पता लगा तो वह पानी में कूद गए और उस मजदूर को बचाकर बाहर निकाला. लेकिन वह खुद पानी में फंस गए. तीन दिन बाद उनका शव मिला. यह एक इंजीनियर का बलिदान था, एक मजदूर की जान बचाने के लिए.

इसके बाद महाराजा ने बांध का निर्माण कार्य रोक दिया.

इस बीच कन्नामबाड़ी गांव के लोगों ने चंदा इकट्ठा करना शुरू किया. उस समय पैसा नहीं चलता था. ‘आना’ चलता था. लोगों ने एक-आना, दो-आना, चार-आना करके इकट्ठा किया और मैसूर विश्वविद्यालय में उस इंजीनियर की स्मृति में एक गोल्ड मेडल देना शुरू किया. हर साल किसी अच्छे तैराक को वह पदक दिया जाता है.

इस घटना की जानकारी लंदन पहुंची तो रानी ने उस इंजीनियर की पत्नी को बुलाया और उन्हें सम्मानित किया.

एम विश्वेश्वरैया को न्योता

इंजीनियर के न रहने पर बांध का काम रुक गया तो 1910-11 में नलवडी कृष्णराज वाडियार ने एम. विश्वेश्वरैया को बुलाया, जो महाराष्ट्र में चीफ इंजीनियर थे. उनकी पढ़ाई-लिखाई में वाडियार परिवार ने काफी मदद की थी. कृष्णराज वाडियार के पिता चामराज वाडियार-दशम ने उन्हें स्कॉलरशिप दी थी, जिसके बाद वह उच्च शिक्षा हासिल करने बाहर जा सके थे. 

इस कारण विश्वेश्वरैया के मन में राजा के प्रति बहुत सम्मान था. वह मैसूर लौटे और उन्हें राज्य का चीफ इंजीनियर बनाया गया. उन्होंने उसी जगह पर एक नई योजना बनाई. डीपीआर में कुछ बदलाव किए गए. पहले चरण के लिए ऊंचाई 80 फीट और दूसरे चरण के लिए 124 फीट रखी गई. लेकिन ब्रिटिश इस पर सहमत नहीं हुए. 

विश्वेश्वरैया ने बार-बार मद्रास रेजिडेंसी से अपील की और उनकी सारी शर्तें मानीं. तब जाकर उन्हें बांध बनाने की इजाजत मिली.

हालांकि, एक पेच अभी और फंसना था. जब उन्होंने डीपीआर और खर्च की पूरी रिपोर्ट तैयार की और महाराजा को सौंपी तो खर्च रियासत के तीन साल के बजट से भी ज्यादा था.

महाराजा ने साफ कह दिया कि मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं. अब इस परियोजना को छोड़ दो. फिर विश्वेश्वरैया और महाराजा के बीच कई दौर की बैठक हुई. एक दिन विश्वेश्वरैया ने कहा कि अगर आप इजाजत नहीं देंगे तो मैं इस्तीफा देकर महाराष्ट्र लौट जाऊंगा. महाराजा परेशान हो गए. उन्होंने अपने घर के लोगों को बुलाया और परेशानी बताई. उनकी मां महारानी केम्पा नेनजामानी वाणी विलास सन्निधना अपने पति की मृत्यु के बाद से 8-9 सालों तक रीजेंट थीं. उन्होंने अपने सारे गहने महाराजा को दान दे दिए. फिर पत्नी और राजा की तीनों बहनों ने भी अपने सारे गहने दे दिए. 

बोरियों में सोना लेकर बेचने गए राजा

कुल 6 बड़ी बोरियों में सोना भरा गया. उसे लेकर महाराजा बॉम्बे की गलियों में गए और बेचकर डैम निर्माण के लिए पैसा जुटाया.

1911 में बांध का काम फिर शुरू हुआ और 1931 तक चला. विश्वेश्वरैया केवल दो सालों तक चीफ इंजीनियर के पद पर रहे. फिर वह मैसूर राज्य के दीवान बन गए और 4 साल तक इसी पद पर अपनी सेवा दी. बाद में किसी कारण से उन्होंने इस्तीफा दे दिया. कुल 6 साल मैसूर में उनकी सेवा रही, जिसे हमेशा याद किया जाएगा.

हजारों मजदूरों और तकनीशियनों ने मिलकर 1931 में बांध बना डाला. इसमें 24 लोहे के ऑटोमैटिक गेट लगाए गए, जिसे भद्रावती आयरन एंड स्टील फैक्ट्री में बनाया गया, जो महाराजा की ही फैक्ट्री था.

यही है KRS डैम निर्माण की पूरी कहानी.

टीपू सुल्तान ने भी किसानों को खेती के लिए पानी देने के मकसद से इस विचार को जन्म दिया था. शिलालेख में लिखा भी गया है कि उन्होंने इस परियोजना के बारे में सोचा था, लेकिन इसके लिए आर्थिक मदद नहीं थी, क्योंकि तकनीक नहीं थी. सहयोगी हाथ नहीं थे. अगर कुछ था तो बस युद्ध, युद्ध और युद्ध.

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