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कहानी एक्टिविस्ट जसवंत सिंह खालड़ा की, जिन्हें पुलिसवाले घर से बुलाकर ले गए और मार डाला

अब उन पर फिल्म बन रही है. उनका रोल दिलजीत दोसांझ करने वाले हैं.

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23 मार्च 2022 (अपडेटेड: 23 मार्च 2022, 05:22 PM IST)
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जानिए जसवंत सिंह खालड़ा की पूरी कहानी. फोटो - इंस्टाग्राम/ Pippal.org
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साल 1995. कैनडा. अप्रैल का महीना. ऑडिटोरियम में जमा लोगों को एक शख्स एड्रेस करने जा रहा था. उसने अपनी स्पीच की शुरुआत एक लघुकथा से की. कहा,
सूरज पहली बार अस्त हो रहा था. जैसे-जैसे वो अपना सफर तय करता जा रहा था, उजाला घटता चला रहा था. उजाला घट रहा था और अंधेरे के निशान प्रकट होने लगे थे. कहते हैं कि उस वक्त लोगों में हाहाकार मच गया, कि सूरज छिप जाएगा, अंधेरा पसर जाएगा, किसी को कुछ नज़र नहीं आएगा. ऐसे में हमारा क्या होगा. दुनिया चिंता में डूबी थी, लेकिन फिर भी सूरज अस्त हुआ.
अंधेरे ने अपना जौहर दिखाने के लिए धरती पर कदम रखा. पर कहते हैं कि दूर किसी झोपड़ी में एक दीपक ने अपना सिर उठाया. उसने कहा कि मैं अंधेरे को चैलेंज करता हूं. और कुछ नहीं तो मैं अपने आसपास इसे फैलने नहीं दूंगा. अपने आसपास रोशनी कायम करूंगा. कहते हैं कि उस दीपक को देखकर, हर झुग्गी-झोपड़ी से एक दीपक उठा. दुनिया हैरान रह गई कि इन दीपकों ने अंधेरे को पसरने से रोक लिया, ताकि लोग देख सकें.
मैं समझता हूं कि आज जब एक अंधेरा पूरी ताकत के साथ सच पर फतेह पाने के लिए ललकार रहा है, तब पंजाब एक दीपक की तरह इस अंधेरे को चैलेंज कर रहा है.
ये शब्द थे ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट जसवंत सिंह खालड़ा के. इस स्पीच के कुछ महीनों बाद उनके घर कुछ अजनबी शख्स आए. उन्हें अपने साथ लेकर चले गए. उस दिन के बाद जसवंत सिंह खालड़ा कभी अपने घर नहीं लौटे. आज अचानक से हम जसवंत सिंह खालड़ा की बात क्यों कर रहे हैं. वजह ये है कि उनकी लाइफ और उनके काम पर आधारित एक हिंदी फिल्म बन रही है. जहां उनका रोल दिलजीत दोसांझ निभाएंगे. खालड़ा की पत्नी परमजीत कौर ने सोशल मीडिया पर स्टेटमेंट रिलीज़ करते हुए इस फिल्म की जानकारी दी. साथ ही कहा कि ये फिल्म उनको और उनके परिवार को दिखाने के बाद ही अप्रूव की जाएगी. इस फिल्म को ‘रात अकेली है’ के डायरेक्टर हनी त्रेहन बना रहे हैं. दिलजीत और हनी त्रेहन खालड़ा की कहानी परदे पर कैसे उतारेंगे, ये समय आने पर ही पता चलेगा. आज आपको बताएंगे जसवंत सिंह खालड़ा की रियल लाइफ स्टोरी.
# “यहां हर दिन आठ से दस लाशें आती हैं”
खालिस्तानी मूवमेंट की शुरुआत 1973 में हुई. लेकिन 1984 के इंदिरा गांधी हत्याकांड के बाद पंजाब में खालिस्तान मूवमेंट को लोगों का सपोर्ट मिल रहा था. पंजाब पुलिस इसे कुचलने के लिए गिरफ्तारियां करने लगीं. जिसपर भी शक होता, उसे अरेस्ट कर लिया जाता. बताया जाता है कि सिर्फ शक के आधार पर ही पुलिस ने कई एनकाउंटर भी किए. 1984 में शुरू हुआ ये दौर 1995 तक चला. इस दौरान असंख्य गिरफ्तारियां हुईं. गिरफ्तार हुए शख्स की जानकारी से परिवार और करीबियों को दूर रखा जाता. दिवंगत पॉलिटिकल एक्टिविस्ट राम कुमार नारायण ने ऑस्ट्रेलियन डाक्यूमेंट्री ‘India Who Killed The Sikhs’ में बताया कि कई केसेज़ में पुलिस लड़कों को उठाकर ले जाती, झूठा केस बनाती और उनकी रिहाई के बदले लाखों रुपये मांगती. साल 1992 में पियारा सिंह नाम के आदमी को पुलिस ने अरेस्ट किया. पियारा अमृतसर के सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक में बतौर डायरेक्टर काम करते थे.
वो अपने किसी रिश्तेदार के पास उत्तरप्रदेश गए हुए थे. पुलिस ने यूपी जाकर उन्हें अरेस्ट किया था. परिवार वाले और उन्हें जानने वाले लोग उनकी तलाश करने लगे. पुलिस के पास कोई जवाब नहीं था. फिर बैंक में उनके कलीग और डायरेक्टर रहे जसवंत सिंह खालड़ा को पता चलता है कि पियारा को पुलिस एनकाउंटर में मार दिया गया है. सिर्फ इतना ही नहीं, अमृतसर के दुर्गीयाना मंदिर शमशान घाट में बिना किसी को बताए उनका अंतिम संस्कार भी हो चुका है.
Jaswant Singh Khalra
जसवंत सिंह खालड़ा के बैंक कलीग के गायब होने के बाद उन्होंने जांच शुरू की. फोटो - स्क्रॉल

मल्लिका कौर की किताब Faith, Gender, and Activism in The Punjab Conflict: The Wheat Fields Still Whisper में इस घटना का अकाउंट मिलता है. जसवंत की पत्नी परमजीत कौर ने किताब में बताया उनके पति शमशान घाट पहुंचे, और पता किया कि क्या किसी पियारा सिंह नाम के शख्स को यहां लाया गया है. सामने से जवाब आया कि वहां रोज़ आठ से दस लाशों को लाया जाता है. जसवंत के साथ अकाली दल की ह्यूमन राइट्स विंग के चेयरमैन जसपाल सिंह ढिल्लों भी थे.
शमशान घाट में लाई हर एक लाश के नाम आदि ज़रूरी डीटेल मिलना मुश्किल था. ऐसे में उन्हें एक रजिस्टर मिला. जहां शमशान घाट के वर्कर रिकॉर्ड मेंटेन कर के रखते, कि कितनी लकड़ी आदि सामग्री की खपत हुई. उसमें कुछ लाशों के नाम, उनके जन्मस्थान नोट किए हुए थे. परमजीत बताती हैं कि तमाम जानकारी के बावजूद उन लाशों को लावारिस के कॉलम में रखा हुआ था. जसवंत ने शुरुआती रजिस्टरों की जांच में पाया कि साल 1992 में दुर्गीयाना मंदिर शमशान घाट में 300 से ज्यादा बेनाम लाशों का अंतिम संस्कार किया गया. ये डाटा बाहर आना ज़रूरी था.
इसलिए किसी तरह शमशान घाट के कर्मचारी को बातों में लगाया और दूसरी तरफ उनके साथी ने इन रिकॉर्ड्स की फोटो कॉपी करवा ली. उन्हें पता चला कि ये सिर्फ इस शमशान घाट का हाल नहीं. बाकी जगह भी पुलिस लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार कर रही है, बिना किसी को खबर लगे. कुछ और शमशान घाट पहुंचे, वहां से डाटा इकट्ठा किया. जनवरी का महीना खत्म होने तक उनके पास तीन शमशान घाट के रिकॉर्ड आ चुके थे. अब उन्हें पब्लिक करने का वक्त था.

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