बेंगलुरु मास मोलेस्टेशन भयानक था. लेकिन हमारे बीच कोई भी घटना ज्यादा दिनों तकभयानक रहती नहीं है. वजह, उसे मीडिया में इतनी बार दिखाते हैं, उसे इतना घिस देतेहैं कि उस चीज को लेकर टीवी देखने वाले संवेदनाशून्य हो जाते हैं. और हर बार की तरहइस बार भी लड़कियां महज आंकड़े बनकर रह गईं. जब अखबारों ने छापा कि 200 लड़कियों काशोषण हुआ, ये बात गौण हो गई कि वो 200 इंसान थीं. 200 जोड़े हाथ-पांव, 200 दिल, 200आत्माएं. 200 जोड़ी आंखें जो रोई होंगी.जब लोगों ने कहा, औरतें छोटे कपड़े न पहनतीं तो अच्छा होता, देर रात घर से बाहर नरहतीं, तो अच्छा होता, लड़कियों ने जवाब में कहा, 'हमें नहीं, अपने बेटों कोसमझाइए.' लेकिन क्या एक समाज और मां-बाप के तौर पर हम अपने बेटों को समझाने के लायकहैं?शाहरुख़ खान ने कहा, 'अगर मेरे बेटे आर्यन या छोटा सा अब्राम भी कभी किसी लड़की कोनुकसान पहुंचाएं, तो मैं उनके सर काट दूंगा. मैंने उनसे कहा है कि वो औरतें हैं,तुम्हारी चड्डी-बडी नहीं कि तुम उनके साथ किसी भी तरह पेश आओ. उनकी इज्जत करो.'अक्सर हमें लगता है कि अगर हम बेटों को डांट-डपट कर रखेंगे, तो वो आगे चलकर एकअच्छे नागरिक बनेंगे, अच्छे लड़के बनेंगे. क्योंकि हमें लगता है कि लड़कियों के साथशारीरिक या मौखिक हिंसा होना ही औरतों का अपमान है. बिल्कुल है, मगर औरतों का अपमानही वो पैमाना नहीं होता, जो औरत और पुरुष के बीच की दूरी को इतना बढ़ा दे कि वो समाजमें एक-दूसरे के विपरीत खड़े हो जाएं. ऐसी कई चीजें बचपन से ही हमारे दिमाग में फिटकर दी जाती हैं, जो हमें सिखाती हैं कि लड़के और लड़कियां एक दूसरे से अलग-अलग हैं.इतने कि औरतें वीनस ग्रह से आई हैं और पुरुष मार्स ग्रह से.लेकिन औरतों और पुरुषों के बीच की दूरी, उनके एक दूसरे से अलग होने की भावना हीहोती है जो औरत को कमज़ोर और पुरुष को ताकतवर बताती है. और ये कोई उम्र के साथ सीखीहुई या परिस्थितियों से उपजी हुई चीज नहीं है. ये हमारे पैदा होते ही शुरू हो जातीहै.एक दोस्त को बेबी हुआ. एक बड़े अस्पताल में. जाहिर सी बात है कि मां की सेहत अच्छीरहे, इसलिए मायके वाले हों या ससुराल वाले, उसे अच्छे, बड़े, महंगे अस्पताल मेंभर्ती करवाते हैं. खैर, उस बड़े अस्पताल में दोस्त ने बेटी डिलीवर की. और बच्ची कोसेक्स असाइन होते ही मां के कमरे के बाहर गुलाबी गुब्बारों से सजावट कर दी गई.क्योंकि उसे बेटी हुई थी. अस्पताल के नियम के मुताबिक अगर बेटा होता तो नीलेगुब्बारे लगाए जाते.किसी मॉल में शॉपिंग करने जाएं तो पाएंगे कि बच्चे 3 महीने के हुए नहीं कि उनकेकपड़े लड़की और लड़कों के सेक्शन में बंटने लगते हैं. मुझे नहीं मालूम कि आज भी बच्चोंके 'किचन सेट' आते हैं या नहीं, मगर जब मेरे बचपन में आते थे, तो उन्हें लड़कियों केलिए खरीदा जाता था. लड़कों के लिए बैट-बॉल लिया जाता था. बिजनेस या बिल्डिंग ब्लॉक्सलड़कों के लिए, लड़कियों के लिए गुड़िया. टीनेज में आते-आते लड़कियों का बाहर खेलना बंदहो जाता है. लड़के खिलौने वाली बंदूक खरीद रहे होते हैं और लड़कियां चूड़ियां. लड़केबिना कहे ही सीख जाते हैं कि हिंसा उनका काम है.कोई भी अपने बेटों को नहीं सिखाता 'बेटा, बड़े होकर रेप करना'लेकिन जब हमारे बेटे इस तरह के खिलौनों, इस तरह के विचार के साथ बड़े होते हैं, उनकाखुद-ब-खुद इस बात पर यकीन बन जाता है कि वो औरतों से ज्यादा शक्तिशाली और व्यवहारमें उनसे ज्यादा हिंसक हैं. अगर बेटे ऐसे घर में बड़े हुए हैं, जहां पिता मां को पीटरहा है और मां इसे अपना धर्म समझकर बिना किसी प्रतिरोध के निभा रही है, हमारे बेटोंको ये संदेश जाता है कि औरतों का फ़र्ज़ यही है कि वो पति की बात मानें. घर पर लगातारबनाए गए नैतिक दबाव की वजह से लड़के कभी किसी लड़की के साथ एक स्वस्थ दोस्ती केरिश्ते में नहीं ढल पाते. और होने वाली पत्नियों में अपनी मां को खोजते हैं. जबउनकी पत्नियां उनकी मांओं की तरह पति के सामने सरेंडर नहीं करतीं, वो बुरी बन जातीहैं.लेकिन हर घर पितृसत्ता की इतनी बदसूरत जकड़ में नहीं होता. हम अपने बेटों को अच्छीशिक्षा के साथ सभ्य इंसान बनाना चाहते हैं. इसलिए उन्हें सिखाते हैं कि लड़कियों कीइज्जत करें. साथ ही उन्हें ये भी सिखाते हैं कि किस तरह की औरत की इज्जत करें. अगरवो शॉर्ट स्कर्ट पहनने वाली, शराब पीने वाली लड़की है तो उससे दूर रहें. अगर वो ऊंचीआवाज में बोलने वाली या गाली देने वाली लड़की है तो उसकी इज्जत न करें. हमारे बेटेये सीखते हैं कि जो लड़कियां 'खराब' हैं, उनके साथ हिंसा या ख़राब व्यवहार बुरा नहींहै.इज्जत नहीं, बराबरी चाहिएजब तक हम अपने बेटों को सिखाते रहेंगे कि औरतों की इज्जत करो, उन्हें ये भी सिखातेरहेंगे कि किन औरतों की इज्जत करो. ये नहीं बताएंगे कि वो तुम्हारी अतिरिक्त इज्जतया दया का पात्र नहीं. तुम्हारे बराबर हैं. ठीक वैसे ही, जैसे तुम्हारे पुरुष दोस्तहैं. उनकी चाल-ढाल, आदतों या बर्ताव से उन्हें अलग-अलग कैटेगरी में मत डालो. औरत बसऔरत है, देवी या रंडी नहीं.शाहरुख़ औरतों की इज्जत करते हैं, करते ही होंगे. लेकिन अपने बच्चों को धमकी देकर हमउन्हें इज्जत करना नहीं सिखा सकते. हम जो दुनिया अपनी औरतों के लिए रचना चाहते हैं,उसके लिए हमें अपनी मानसिकता बदलनी होगी. हमारे बेटे जैसा भोगेंगे, वैसे होंगे. अगरआप आज अपनी पत्नी से घर का सारा काम करने की उम्मीद करते हैं और उसे नौकरी नहींकरने देना चाहते, ये बात मुझे आश्चर्यचकित नहीं करेगी कि कल आपका बेटा शराब पीनेवाली लड़की को वेश्या कहे. क्योंकि उसने जिस औरत को आदर्श माना है, वो तो उसके हीपिता की गुलाम थी.--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ें:'साथ काम करने वाली लड़की' ने किया शाहरुख की प्राइवेट लाइफ का खुलासा!