‘पहला विश्व युद्ध क्यों शुरू हुआ था?’इतिहास के विद्यार्थी इस सवाल की अहमियत जानते हैं. इस सवाल पर अब तक न जाने कितनीकॉन्फ्रेंस, न जाने कितनी डिबेट आयोजित हुईं और न जाने कितने रिसर्च पेपर लिखे गए.पर इस सवाल की प्रासंगिकता अभी तक खत्म नहीं हुई है. इस सवाल का जवाब भी आसान नहींहै. लगभग 5 करोड़ लोगों की जान लेने वाली इस जंग के कई कारण बताए जाते हैं. कुछ कहतेहैं, इसकी वजह ऑस्ट्रिया के प्रिंस की हत्या थी. कुछ कहते हैं कि इसका कारण जर्मनीकी विस्तारवादी रणनीति थी.इसकी असल वजह क्या है? ये एकेडमिक्स की एक बड़ी डिबेट है. इसकी बात कभी और. आज हमआपको ऐसे देश की कहानी बताएंगे, जहां नए साल की तारीख पर विवाद छिड़ गया है. येकहानी श्रीलंका की है. कुछ ज्योतिषियों ने 13 अप्रैल 2024 को शुभ घोषित किया. दूसरागुट इससे नाराज़ हो गया. उसने कहा कि 13 अप्रैल शुभ नहीं है. अगर उस रोज़ नया सालमनाया तो क़यामत आएगी. श्रीलंका आग की लपटों में जल जाएगा. ज्योतिषी तारों कीस्थिति देखकर मुहूर्त बताते हैं. इसलिए, इसको श्रीलंका का स्टारवॉर कहा जा रहा है.तो, आइए जानते हैं,- श्रीलंका में ज्योतिषियों का इतना दबदबा क्यों है?- नए साल की तारीख़ तय करने पर कैसा विवाद पनपा?- और साथ जानेंगे, दुनियाभर के कुछ दिलचस्प विवादों की कहानियां.पहले बेसिक क्लीयर कर लेते हैं.श्रीलंका हिंद महासागर में बसा एक द्वीपीय देश है. चारों तरफ़ से समंदर से घिराहुआ. किसी भी देश से उसकी ज़मीनी सीमा नहीं लगती. सबसे क़रीब में भारत है. भारत सेश्रीलंका की न्यूनतम दूरी लगभग 55 किलोमीटर है. दोनों देशों को पाल्क स्ट्रेटएक-दूसरे से अलग करती है. श्रीलंका 1948 में ब्रिटिश शासन से आज़ाद हुआ. तब इसकोसीलोन के नाम से जाना जाता था. 1972 में नाम बदलकर श्रीलंका कर दिया गया.मुल्क की आबादी 02 करोड़ 25 लाख है.70 फीसदी लोग बौद्ध हैं. तकरीबन 13 फीसदी हिंदू हैं, 10 फीसदी मुस्लिम और 07 फीसदीईसाई हैं.श्रीलंका की दो राजधानियां हैं - कोलम्बो और श्रीजयवर्धनपुरा. दूसरे बड़े शहर हैं -गाले, हम्बनटोटा, केंडी, जाफ़ना, दाम्बुला आदि.अब श्रीलंका का पॉलिटिकल सिस्टम समझ लेते हैं. श्रीलंका एक लोकतांत्रिक गणराज्य है.शक्तियों का विभाजन सरकार के तीन अंगों के बीच हुआ है - कार्यपालिका, विधायिक औरन्यायपालिका.> कार्यपालिका की कमान राष्ट्रपति के पास है.- वो राष्ट्र और सरकार के मुखिया होते हैं.- सशस्त्र सेनाओं के सुप्रीम कमांडर हैं.- मंत्रिमंडल की चाबी भी उन्हीं के पास होती है.- प्रधानमंत्री की नियुक्ति भी राष्ट्रपति ही करते हैं.- राष्ट्रपति के पास संसद आहूत करने और भंग करने का अधिकार भी होता है. हालांकि,उनके फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है.- पद पर रहते हुए उनके ऊपर मुकदमा नहीं चल सकता.- राष्ट्रपति का कार्यकाल पांच बरस का होता है.> विधायिका की कमान संसद के पास होती है.श्रीलंका की संसद में सिर्फ़ एक सदन है. कुल सदस्यों की संख्या 225 है.संसद के पास विधान बनाने की शक्ति है.संसद में प्रधानमंत्री सत्ताधारी पार्टी को लीड करते हैं.> न्यायपालिका की कमान सुप्रीम कोर्ट के पास है. ये श्रीलंका की सर्वोच्च न्यायिकसंस्था है.श्रीलंका का इतिहास क्या कहता है?श्रीलंका का यूरोप से कनेक्शन 16वीं सदी की शुरुआत में हुआ. उससे पहले वहां भारत,चीन और मिडिल-ईस्ट के देश कदम रख चुके थे. श्रीलंका की भाषा और रहन-सहन पर सबसेबड़ा प्रभाव भारत का पड़ा. 1498 ईसवी में पुर्तगाली नाविक वास्कोडिगामा भारत के तटपर उतरा. वो भारत पहुंचने वाला पहला यूरोपियन था. पुर्तगाल ने भारत में अपनी कॉलोनीबसाई. 1505 में पहला गवर्नर नियुक्त किया. उसका नाम था, फ़्रैंसिस्को डि अल्मीडा.अल्मीडा ने अपने बेटे लॉरेंसो को मालदीव भेजा. इसी यात्रा के दौरान वो श्रीलंका केतट पर उतरा. उस समय श्रीलंका अलग-अलग साम्राज्यों में बंटा हुआ था. हर कोई एक-दूसरेके ख़िलाफ़ था. पुर्तगाल को अवसर दिखाई दिया. उसने कोलम्बो में अपने उपनिवेश कीबुनियाद रख दी. ये श्रीलंका में औपनिवेशिक शासन की शुरुआत थी. पुर्तगालियों के बादडच आए. 1658 में उनका शासन शुरू हुआ. हालांकि, केंडी उनकी पहुंच से दूर रहा. 1796में ब्रिटेन ने क़ब्ज़ा करना शुरू किया. 1815 आते-आते केंडी पर भी उनका नियंत्रण होचुका था. उन्होंने सीलोन में चाय, कॉफ़ी और नारियल की खेती शुरू करवाई. फिर साउथइंडिया से तमिल कामगारों को लेकर आए. 1833 में पूरा श्रीलंका ब्रिटेन के नियंत्रणमें आ चुका था.1931 में ब्रिटिशर्स बहुसंख्यक सिंहलियों के साथ पॉवर शेयर करने के लिए राज़ी होगए. उन्होंने स्थानीय लोगों को वोटिंग का अधिकार भी दिया. ब्रिटेन का शासन 1948 तकचला. 04 फ़रवरी 1948 को श्रीलंका आज़ाद हो गया. हालांकि, वो तब भी ब्रिटेन काडोमिनियन बना रहा. यानी, आज़ादी के बाद भी हेड ऑफ़ द स्टेट की कुर्सी पर ब्रिटिशक्राउन ही बैठता रहा. मई 1972 में सीलोन ने डोमिनियन स्टेटस ख़त्म करने का फ़ैसलाकिया.आज़ादी के बाद सत्ता बहुसंख्यक सिंहली लोगों के पास आई. इस बीच तमिल कामगारों कीज़िंदगी मुश्किल होने लगी. उनको नागरिकता और दूसरे बुनियादी अधिकारों से वंचित कियाजाने लगा. इसके चलते दंगे भड़के. 1976 में लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम (LTTE यालिट्टे) की स्थापना हुई. वे अलग तमिल देश की मांग कर रहे थे. लिट्टे ने श्रीलंकासरकार के ख़िलाफ़ जंग छेड़ी. आगे चलकर ये सिविल वॉर में बदल गया. सिविल वॉर 2009 तकचला. तब श्रीलंकाई सेना ने लिट्टे को हरा दिया. फिलहाल, श्रीलंका सिविल वॉर में हुएनुकसान और आर्थिक और राजनैतिक संकट से उबरने की कोशिश कर रहा है.आज श्रीलंका की चर्चा क्यों?जैसा कि हमने शुरुआत में बताया, वहां ज्योतिषों के बीच लड़ाई छिड़ गई है. श्रीलंकामें किसी भी शुभ काम के लिए ज्योतिष की सलाह लेना ज़रूरी माना जाता है. आम लोगों सेलेकर ताक़तवर नेताओं तक पर इसका प्रभाव देखा गया है. ज्योतिष की सलाह पर चुनाव तककराए गए हैं.श्रीलंका में बौद्ध आबादी लगभग 70 फीसदी है, दूसरे नंबर पर हिंदू हैं, जिनकी आबादीलगभग 13 फीसदी है. दोनों धर्मों के अधिकतर लोग एस्ट्रोलॉजी माने ज्योतिष शास्त्र परयकीन करते हैं. ज्योतिष शास्त्र में ग्रहों और सितारों की स्थिति देखकर भविष्य काआकलन लगाया जाता है. ज्योतिषी दावा करते हैं कि हमारे बताए मुताबिक़ चले तो आपकोफ़ायदा होगा.श्रीलंका में इस दावे पर भरोसा करने वालों की संख्या काफ़ी ज़्यादा है. तीनउदाहरणों से समझिए,- नंबर एक, श्रीलंका सरकार ने 42 ज्योतिषियों की एक टीम सरकारी फैसलों पर राय लेनेके लिए रखी है. ये ज्योतिषी सांस्कृतिक मामलों के मंत्रालय द्वारा नियुक्त किए जातेहैं. इनको सरकार सैलरी देती है.- नंबर 2, वहां के बड़े मंत्री, व्यापारी अपना निजी ज्योतिषी रखते हैं. श्रीलंका केपूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षा का इससे जुड़ा एक मज़ेदार क़िस्सा भी है. साल 2014की बात है. श्रीलंका में महिंदा राजपक्षा की पॉपुलैरिटी कम हो रही थी. वो 2005 सेश्रीलंका के राष्ट्रपति बने हुए थे. लोग उनकी नीतियों से खुश नहीं थे. उन्हें डर थाकि अगला चुनाव वो नहीं जीत पाएंगे. इसी डर के चलते उन्होंने अपने निजी ज्योतिषीसुमनदास एबेगुणवर्धने से सलाह ली. पूछा कि क्या किया जाए कि मैं चुनाव जीत जाऊं.सुमनदास ने राष्ट्रपति चुनाव की तारीख़ बदलने की सलाह दी. कहा चुनाव समय से पहलेहों तो आपके सितारे चमक उठेंगे. सुमनदास की सलाह मानकर महिंदा ने तय समय से दो बरसपहले यानी जनवरी 2015 में चुनाव कराने का ऐलान कर दिया.सुमनदास ने राजपक्षा को चुनाव के लिए पर्चा भरने की मुहूर्त भी बताई. उन्होंनेमुहूर्त के मुताबिक 20 नंबवर 2014 को दिन के 1 बजकर 04 मिनट पर पर्चा भर दिया.08 जनवरी 2015 को वोटिंग हुई. राजपक्षा अपनी जीत को लेकर निश्चिंत थे. लेकिन नतीजेआए तो उनको झटका लगा. इसमें राजपक्षा की हार हुई थी. मैत्रीपाल सिरिसेना चुनाव जीतगए थे.राजपक्षा की हार के बाद सुमनदास से उसका आलिशान बंगला छीन लिया गया. वो एक सरकारीबैंक का बोर्ड मेंबर भी था. उसे वहां से भी निकाल दिया गया. ये सब राजपक्षा की हारकी वजह से हो रहा था. सुमनदास कुछ दिनों तक मीडिया से बचता भी रहा. उसका बतौरज्योतिषी श्रीलंका में खूब नाम था. उसको अपने ग्राहक खोने का डर था. बाद में AFP कोदिए गए इंटरव्यू में वो ये बात कबूलता भी है. सुमनदास ने राजपक्षा की हार पर कहा था,‘मैं उनकी जीत के लिए जो कर सकता था, किया. पर राष्ट्रपति बनने के लिए आपके पासभाग्य भी होना चाहिए’- अब तीसरे उदाहरण की तरफ़ चलते हैं. श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति गोटबायाराजपक्षा ने साल 2022 में इस्तीफ़ा दे दिया था. उस समय श्रीलंका आर्थिक संकट से जूझरहा था.खैर, गोटबाया इस्तीफ़ा देकर मालदीव भागने को तैयार थे. इसके पहले उनके घर पर हमलाहुआ. गोटबाया की एक पर्सनल ज्योतिषी ज्ञानवती जयसूर्या थी. लोगों को पता था किगोटबाया हर फै़सले से पहले उससे राय लेते हैं. इसलिए गुस्साई भीड़ ने 9 मई 2022 कोज्ञानवती के होटल पर हमला कर दिया. लोग देश के हालत की ज़िम्मेदार उन्हें भी मान रहेथे. इसलिए कहा जाता है, श्रीलंका में नेताओं से ज़्यादा ताकतवर ज्योतिषी होते हैं.- श्रीलंकाई फ़ौज के कई जनरलों ने माना है कि सिविल वॉर के दौरान ऑपरेशन की टाइमिंगज्योतिषियों की सलाह पर तय होती थी.इन उदाहरणों से आप श्रीलंका में ज्योतिषियों की अहमियत समझ चुके होंगे.श्रीलंका में नए साल की तारीख तय करने का ज़िम्मा ज्योतिषियों का होता है. इसके लिएसरकार ने एक कमिटी बनाई हुई है. इसमें कुल 42 ज्योतिषी हैं. ये हर साल तमिल औरसिंहली नववर्ष की तारीख़ तय करते हैं. ये नववर्ष अप्रैल के महीने में पड़ता है.आमतौर पर कमिटी आपसी सहमति से एक दिन चुनती है. लेकिन इस बार ऐसा हुआ कि अंतिम समयतक सहमति नहीं बन पाई. फिर बहुमत का फ़ैसला माना गया. बहुमत ने 13 अप्रैल का दिननिर्धारित किया. घोषणा तो हो गई, मगर विरोध बरकरार रहा. कमिटी के कुछ सदस्यों नेफ़ैसला मानने से मना कर दिया. उनमें से एक रोशन चनाका ने पब्लिक में आकर अपना विरोधदर्ज कराया. रोशन ने चेतावनी दी कि 13 अप्रैल का दिन निर्धारित करने वालों की गणनाग़लत है. अगर ग़लत मुहूर्त में नववर्ष से जुड़े अनुष्ठान हुए तो श्रीलंका में आपदा आसकती है. श्रीलंका आग की लपटों में जल सकता है.इस वक़्त श्रीलंका आर्थिक संकट से उबरने की कोशिश कर रहा है.दूसरी चीज़, इसी बरसश्रीलंका में राष्ट्रपति चुनाव भी होने वाला है. सरकार किसी भी तरह का जोखिम नहींलेना चाहती है. इसलिए, ज्योतिषियों का मतभेद बड़े विवाद में बदल सकता है. अब, कुछ ऐसी घटनाओं के बारे में जान लेते हैं, जब तिल का ताड़ बनते देर नहीं लगी.और, छोटी सी बात पर विवाद इतना बढ़ा कि जंग शुरू हो गई.- नंबर एक, जब पेस्ट्री की वजह से दो मुल्कों में जंग हुई,साल 1821 में मेक्सिको को स्पेन से आज़ादी मिली. आज़ादी के बाद देश की अर्थव्यवस्थाचरमराई हुई थी. मेक्सिको पर फ्रांस समेत दूसरे देशों का कर्ज़ा बकाया था. मेक्सिकोमें एक इलाका ऐसा था जहां बड़ी संख्या में फ़्रेंच लोग रहते थे. इसी इलाके में एकफ्रांसीसी नागरिक बेकरी चलाता था. 1832 में बेकरी के मालिक ने दावा किया कि एकमेक्सिकन सैनिक ने उसकी दुकान पर हमला किया, तोड़-फोड़ की. इससे उसका बड़ा नुकसान हुआहै. उसे इसका मुआवजा चाहिए. मेक्सिको सरकार की तरफ से उसको कोई मुआवज़ा नहीं मिला.तब उसने सीधे इसकी शिकायत फ्रांस के राजा से कर दी. मेक्सिको में इस तरह के और भीवाकये हुए, जहां फ्रांसीसियों को निशाना बनाया गया.फ्रांस ने इसकी शिकायत मेक्सिको की सरकार से की. और, मुआवज़ा देने के लिए कहा. लेकिनमेक्सिको की माली हालत सही नहीं थी. वो ये पैसे कैसे चुकाता. उसके ऊपर पहले से हीबहुत कर्ज़े थे. इसलिए उसने मुआवज़ा देने से इनकार कर दिया. फ्रांस की सरकार मेक्सिकोको धमकाती रही. मुआवज़ा देने की मांग करती रही. ये सिलसिला चलता रहा. ऐसा होते होते6 साल बीत गए.फिर 1838 में फ्रांस ने अपना एक जहाज़ मेक्सिको के बंदरगाह पर लाकर खड़ा कर दिया.उसने मेक्सिको के जहाज़ों का रास्ता ब्लॉक कर दिया. इसके चलते मेक्सिको को समंदर केरास्ते व्यापार में दिक्कत आई. कुछ दिनों बाद फ्रांस ने मेक्सिको के बंदरगाह परबमबारी भी की. मेक्सिको ने भी युद्ध का ऐलान किया. मेक्सिको के पास हथियार और सैनिककम थे, लेकिन फिर भी वो बहादुरी से लड़े. लेकिन युद्ध ज़्यादा चला नहीं. 1839 मेंदोनों देशों के बीच समझौता हो गया. मेक्सिको में जितने भी फ्रांस नागरिकों कानुकसान हुआ था, उनको मुआवज़ा देना पड़ा.नंबर 2. जब एक आवारा कुत्ते की वजह से दो देश भिड़े.20वीं सदी के शुरुआती दौर की बात है. यूरोप के दो देश ग्रीस और बुल्गारिया के बीचज़मीन के कुछ हिस्सों को लेकर विवाद चल रहा था. इनमें से एक मेसीडोनिया था. दोनोंदेश इसे अपना-अपना हिस्सा बता रहे थे. नॉर्थ मेसीडोनिया आज एक आज़ाद देश है. 1991में इसको यूगोस्लाविया से आज़ादी मिली थी. खैर मेसीडोनिया की ज़मीन को लेकर 1904 मेंग्रीस और बुल्गारिया के बीच खूब लड़ाई हुई. 4 साल के बाद लड़ाई रुकी. लेकिन रंजिशेंअभी भी बाकी थीं. दोनों बस किसी मौके के इंतज़ार में थे कि वापस लड़ाई शुरू हो जाए.लेकिन पहले विश्व युद्ध तक तो सब शांत रहा. फिर आया साल 1925. अक्टूबर महीने की बातहै. ग्रीस और बुल्गारिया के सिपाही बॉर्डर पर पहरा दे रहे थे. एक रोज़ सुबह के समय ग्रीस के एक सैनिक ने अपने इलाके से एक कुत्ते को बॉर्डर पारकरते देखा. वो सैनिक कुत्ते के पीछे-पीछे चला गया, ताकि उसे सीमा पार ना जाने दे.लेकिन सैनिक और वो कुत्ता ग़लती से सीमा पार पहुंच गए. बुल्गारिया के एक सैनिक नेइसको घुसपैठ मान लिया और गोली चला दी. इससे ग्रीस गुस्सा गया. बुल्गारिया का कहनाहमने जानबूझकर गोली नहीं चलाई. वहीं ग्रीस ने 3 मांगें रख दीं. नंबर 1, बुल्गारियाउस सैनिक के परिवार को मुआवज़ा दे, नंबर 2, बुल्गारिया गोली चलाने वाले सैनिक कोजल्द सज़ा दे., नंम्बर 3. बुल्गारिया आधिकारिक रूप से हमसे माफ़ी मांगे.बुल्गारिया ने तीनों मांगें नहीं मानी. फिर दोनों के बीच लड़ाई हुई. दोनों तरफ से कईसैनिक मारे गए. इसे इतिहास में 'वॉर ऑफ द स्ट्रे डॉग' के नाम से जाना गया.नंबर तीन. जब सुअर की वजह से भिड़े दो देश.ये कहानी 1859 की है. अमेरिका और वैंकुवर आईलैंड (वर्तमान में कनाडा) के बीच सैनहुआन आईलैंड पड़ता है. तब यहां पर अमेरिका के मूल निवासी और ब्रिटेन की एक कंपनी‘हडसन बे’ के कर्मचारी रहते थे. दोनों ही पक्ष सैन हुआन आईलैंड को अपना बताते थे.वहां पर ब्रिटिश कर्मचारियों ने सुअर पाला हुआ था. ये सुअर अमेरिकियों की फसल ख़राबकर दिया करते थे. इससे परेशान होकर एक अमेरिकी किसान ने एक सुअर को गोली मार दी.किसान का नाम लीमैन कटलर था. इससे ब्रिटिश और अमेरिकियों के बीच तनाव पैदा हो गया.ये विवाद सैन हुआन आईलैंड पर असल अधिकार की लड़ाई में बदल गया. फिर अमेरिका ने फ़ौजकी एक टुकड़ी रवाना की. उन्होंने वहां पहुंच कर ब्रिटिश लोगों से कहा कि ये पूरीप्रॉपर्टी अमेरिका की है. ब्रिटिश लोगों ने भी अपने देश में इस घटना की जानकारीदी. ब्रिटेन ने सैन जुआन की तरफ एक जंगी बेड़ा भेज दिया. दोनों के बीच जंग के हालातबन गए थे.बाद में ब्रिटेन की पहल पर अमेरिका ने बातचीत शुरू की. फिर फैसला हुआ कि सैन हुआनआईलैंड पर दोनों ही देशों का मिलिट्री ऑक्यूपेशन रहेगा. इस तरह से एक सुअर की वजहसे अमेरिका और ब्रिटेन में जंग होते-होते रह गई.अब दुनिया की कुछ बड़ी अपडेट जान लेते हैं. पहली सुर्खी अमेरिका से है.नवंबर 2024 में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव की तस्वीर साफ़ हो चुकी है. डेमोक्रेटिकपार्टी से मौजूदा राष्ट्रपति जो बाइडन और रिपब्लिकन पार्टी से पूर्व राष्ट्रपतिडोनाल्ड ट्रंप का नाम लगभग तय है. दोनों ने प्राइमरी इलेक्शन जीतने के लिए ज़रूरीडेलीगेट्स हासिल कर लिए हैं.अभी क्या स्थिति है?रिपब्लिकन पार्टी का नॉमिनेशन हासिल करने के लिए 1,215 डेलीगेट्स की ज़रूरत थी.ट्रंप के खाते में 1,623 वोट हैं.डेमोक्रेटिक पार्टी से नॉमिनेशन पाने के लिए 1,968 डेलीगेट्स की दरकार थी. बाइडन2,488 वोट हासिल कर चुके हैं.अभी कई राज्यों में प्राइमरी इलेक्शन बाकी है. यानी, दोनों कैंडिडेट्स का बेस औरबढ़ेगा.आगे क्या होगा?प्राइमरी इलेक्शन खत्म होने के बाद नेशनल कन्वेंशन होगा. उसमें चुने हुए डेलीगेट्सअपनी-अपनी पार्टी का प्रेसिडेंशियल कैंडिडेट चुनेंगे.कब है नेशनल कन्वेंशन?रिपब्लिकन पार्टी - 15 जुलाई.डेमोक्रेटिक पार्टी - 19 अगस्त.जैसे ही कैंडिडेट्स के नाम पर मुहर लगेगी, प्रेसिडेंशियल डिबेट का प्रोसेस शुरूहोगा. दोनों उम्मीदवारों के बीच तीन डिबेट्स होंगी. इनका प्रसारण लाइव टीवी पर होताहै. पहली डिबेट 16 सितंबर को हो सकती है.राष्ट्रपति चुनाव कब होगा?05 नवंबर 2024 को लोग वोट डालेंगे. उससे पहले लाखों लोग पोस्ट और अर्ली वोटिंग मेंअपना मत दर्ज करा चुके होंगे. नतीजा आने में एक से चार हफ़्ते तक का वक़्त लग सकताहै.06 जनवरी 2025 को अमेरिका की संसद रिजल्ट सर्टिफ़ाई करेगी.20 जनवरी 2025 को अमेरिका के 47वें राष्ट्रपति पद और गोपनीयता की शपथ लेंगे.आज के समय में कौनसा कैंडिडेट आगे चल रहा है?- डोनाल्ड ट्रंप पर चार आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं. एक मामला जनवरी 2021 मेंतख़्तापलट की साज़िश रचने से जुड़ा है. जब ट्रंप के समर्थकों ने संसद में घुसकरदंगा किया था.- जो बाइडन महंगाई को काबू करने में फ़ेल रहे हैं. मेक्सिको बॉर्डर से आने वालेआप्रवासियों को रोकने में भी उनकी सरकार सफल नहीं हो पाई है. इसके अलावा,इज़रायल-हमास जंग, यूक्रेन और अफ़ग़ानिस्तान में बाइडन की विदेश-नीति कमज़ोर साबितहुई है.जानकार कहते हैं, दोनों ही खासे अलोकप्रिय हैं. वोटर्स की चुनौती कम ख़राब कैंडिडेटचुनने की है.आज की दूसरी और आख़िरी सुर्खी ब्राज़ील से है. यहां पुलिस ने पूर्व राष्ट्रपति जाएरबोल्सोनारो के ख़िलाफ़ आपराधिक मुकदमा चलाने की सलाह दी है. उनके ऊपर कोविड वैक्सीनसर्टिफ़िकेट में फ़र्ज़ीवाड़े का आरोप है. पुलिस ने साल भर की जांच के बाद अपनीरिपोर्ट सौंप दी है. अब मुकदमा चलाने की ज़िम्मेदारी अटॉर्नी जनरल के पास है.हालांकि, ये बोल्सोनारो पर लगने वाला इकलौता आरोप नहीं है. उनपर दो और संगीन मामलोंमें जांच चल रही है. पहला मामला हीरे की ज्वैलरी छिपाकर ब्राज़ील लाने से जुड़ा है.दूसरा मामला तख़्तापलट की साज़िश रचने से जुड़ा है. बोल्सोनारो का कार्यकाल 01जनवरी 2019 से 31 दिसंबर 2022 तक था. उससे पहले अक्टूबर 2022 में राष्ट्रपति चुनावहुए. इसमें लूला डि सिल्वा ने बोल्सोनारो को हरा दिया. 01 जनवरी 2023 को लूलाराष्ट्रपति बन गए. 08 जनवरी को बोल्सोनारो के समर्थकों ने राजधानी ब्राजीलिया मेंसंसद और सुप्रीम कोर्ट की इमारतों पर हमला कर दिया. उनका मकसद था कि फ़ौज दखल दे औरलूला की सरकार को हटा दे. हालांकि, वे सफल नहीं हो पाए. बोल्सोनारो पर इल्ज़ाम हैकि इस हमले की साज़िश उन्होंने रची थी.