दिवाली के पहले से ही दिल्ली में पॉल्यूशन लेवल बहुत ऊपर था. फिर ऑड-इवन के चक्करमें थोड़ा कम हो गया था. अपन लोगों को लेवल बहुत ऊपर चाहिए. सो, दिवाली के दिनलोगों ने दबा के पटाखे फोड़े. लेवल जरा भी डिप ना हो, इसके लिए दिवाली के दो दिनबाद भी पटाखे फोड़े जा रहे हैं. मेहनत रंग लाई. सुबह उठे तो आसमान का रंग धूसर होगया था. ऐसा लगा जाड़े का मौसम आ गया है. पर ठंड नहीं लग रही थी. सिर्फ दिखाई नहींदे रहा था साफ-साफ. फिर महसूस हुआ कि सांस लेने में भी दिक्कत आ रही है. जाड़ा नहींआया है. ये स्मॉग है, जो कुहरे की फील दे रहा है. [facebook_embedded_posthref="https://www.facebook.com/ajplusenglish/videos/827363734071802/"]पर स्मॉग क्या है?इस शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले लंदन में किया गया था. 1900 के आस-पास. ये शब्द बनाहै स्मोक और फॉग से. लोगों को लगता था कि फॉग पर धुआं जम गया है. क्योंकि उस वक्ततक ये नहीं पता था कि जो कुहरे जैसा दिखता है वो असल में पॉल्यूटेंट्स का मिक्स्चरहै. पहले ये नहीं लगता था कि स्मॉग खतरनाक भी हो सकता है. बारिश या धूप की तरह लगताथा. कि अभी है, फिर खत्म हो जाएगा. फिर पता चला कि ये जानलेवा भी है. धीरे-धीरे येपता चला कि इंसान के चलते ही स्मॉग होता है वायुमंडल में. जब भी कोई चीज जलाई जातीहै, उसमें से धुआं निकलता है. ये धुआं कुछ देर में विलीन हो जाता है. आंखों के आगे.पर असल में इसमें बहुत कुछ होता है. इतने छोटे कण होते हैं कि आंखों से दिखाई नहींदेते. ईंधन या पटाखों में ऐसे कण ज्यादा होते हैं जो जलने के बाद वायुमंडल मेंज्यादा देर तक रहते हैं. इसीलिए तो ये ईंधन हैं. जल्दी जलते हैं और देर तक रहतेहैं. जब सूरज की रोशनी और गरमी वायुमंडल की गैसों से रिएक्ट करते हैं तो स्मॉग बनजाता है. ये सारे कण आपस में गुत्थमगुत्था होते हुए घूमते रहते हैं. हमारी हर सांसके साथ हमारे फेफड़ों में घुसते रहते हैं. इनमें बहुत सारे ऑर्गेनिक कंपाउंड होतेहैं. माने इनमें कार्बन और हाइड्रोजन होता है. इसीलिए जलते हैं मस्त होकर. सल्फरडाई ऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड भी इसमें होते हैं. ये सारी गैसें ईंधन,इंडस्ट्री से आती हैं. पटाखे रोज तो फूटते नहीं. पर जिस दिन फूटते हैं, काम ये भीकर जाते हैं. जाड़े के महीनों में हवा की स्पीड धीमी हो जाती है. तो धुआं छंट नहींपाता. एक ही जगह रहता है. इससे देखने में भी परेशानी होती है और सांस लेने में भी.गरमी के दिनों में जब हवा तेज होती है तो ये दिक्कत नहीं आती.क्या-क्या खतरे हैं इसके?ये एक साथ इंसान, जानवर और पेड़-पौधों सब को प्रभावित करता है: 1. इसमें ज्यादा देरतक सांस लेने से फेफड़े फूल जाते हैं. सीने में दर्द की शिकायत बनी रहती है. जुकामऔर न्यूमोनिया तो होता ही है. सांस की बीमारियों के चलते लोग मर भी जाते हैं. 2.सूरज की रोशनी साफ नहीं पहुंचती. जिससे विटामिन डी की कमी हो जाती है. इसके चलतेलोगों को रिकेट्स की बीमारी हो जाती है. 3. आंखों में भी जलन होती है. 4. अस्थमा केमरीजों को तो इससे बच के ही रहना चाहिए. उनके लिए ये मौत का पैगाम ले के आता है.बूढ़े और बच्चे स्मॉग से सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं. 5. आसमान के भी ऊपर जोओजोन की लेयर है, वो तो सूरज की खतरनाक अल्ट्रॉ-वायलेट किरणों से हमको बचाती है. परजो जमीन पर ओजोन पैदा होती है वो स्मॉग के साथ मिल जाती है. और ये बेहद खतरनाक होतीहै. इंसान को तो प्रभावित करती ही है, फल और सब्जियों को भी ध्वस्त कर देती है.गेहूं, टमाटर, सोयाबीन और कॉटन इसके निशाने पर सबसे पहले आते हैं. बहुत सारे ऐसेजीव-जंतु होते हैं, जो ओजोन को झेल नहीं पाते. सूक्ष्म कीड़े-मकोड़े तो खत्म ही होजाते हैं. मच्छर नहीं. इनको तो वरदान प्राप्त है. जैसे-जैसे सामान्य मानवी का विकासहो रहा है, नये-नये उद्योग लग रहे हैं, स्मॉग की समस्या बढ़ती जा रही है. शहरीइलाकों में ये समस्या ज्यादा हो जाती है. अगर इसको रोका नहीं गया तो एक दिन ऐसाआएगा कि लोग सांस ले तो लेंगे, छोड़ नहीं पाएंगे. बीच में ही देहांत हो जाएगा. औरदिल्ली में ऑड-इवन से मामला सुलझने वाला नहीं. बहुत क्रांतिकारी कदम उठाने पड़ेंगे.कड़े कदम. जिसमें नेता को जनता की गाली खानी पड़ेगी. आमूल-चूल परिवर्तन चाहिए.