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भारत में केंद्र और राज्यों के चुनाव एक साथ करवाने से क्या लोकतंत्र सलामत रहेगा?

बहुत दिनों से इस मसले पर बात चल रही है.

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लोकसभा में पास हुआ लेकिन राज्यसभा में अटका है ट्रिपल तलाक बिल.
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5 नवंबर 2016 (Updated: 5 नवंबर 2016, 06:21 PM IST)
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आजकल एक बहस जोरों पर है कि लोक सभा और विधानसभा चुनाव साथ में होने चाहिए या नहीं? नई दिल्ली में एक दिवाली मिलन समारोह में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा इस पर नए सिरे से बात होनी चाहिए. मीडिया को इसमें अपना रोल अदा करना चाहिए. हो सकता है राजनीतिक लोग इस पर चर्चा न करें लेकिन अगर ये सही चीज है तो इस पर बहस होनी चाहिए और अगर नहीं तो ये भी सामने आना चाहिए. लेकिन कम से कम इस पर बात होनी चाहिए. ऐसा पहली बार नहीं है जब मोदी ने इस बात का समर्थन किया है. मार्च में मोदी ने इस मुद्दे पर एक बैठक भी की थी. इस बहस में कई दांव-पेच हैं. इसमें कहा गया है कि लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय स्तर पर एक साथ चुनाव करवाये जायें. मोदी ने कहा कि इससे चुनाव और विकास कार्य अलग-अलग किया जा सकता है. इससे पहले लाल कृष्ण आडवाणी ने भी इस व्यवस्था की वकालत की थी, जब 1999 में वाजपेयी सरकार एक वोट से गिर गई थी. तो ये पूरी बहस क्या है? पिछले महीने सरकार ने अपने वेबपोर्टल 'My Gov' पर इस मुद्दे पर ओपन डिबेट करने के लिए लोगों को कहा था. इस पर 15 अक्टूबर तक अपने-अपने विचार भेजना था. इसमें पांच सवाल थे-
1. क्या लोक सभा, विधानसभा चुनाव एक साथ करवा सकते हैं? इसके फायदे-नुकसान क्या हैं? 2. अगर एक साथ चुनाव होते हैं, तो उन विधानसभाओं का क्या होगा जहां चुनाव होने हैं? 3. क्या लोक सभा और विधानसभा चुनावों का कार्यकाल फिक्स होना चाहिए?4. अगर कार्यकाल के बीच में चुनाव करवाना ज़रूरी हो जाए तो क्या होगा?5. क्या होगा अगर रूलिंग पार्टी या गठबंधन कार्यकाल के बीच में अपना बहुमत खो दे?
लॉ कमीशन ने 1999 में अपनी 107वीं रिपोर्ट (इलेक्टोरल लॉ,1999) में कहा था कि लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ होने का नियम होना चाहिए. पर 17 दिसंबर,2015 को पार्लियामेंट की स्टैंडिंग कमेटी की 79वीं रिपोर्ट में कहा कि अगर ये नियम लागू हुआ तो बहुत से सांगठनिक बदलाव करने होंगे. इसके लिए आर्टिकल 83, 172, 85, 174 में संशोधन करना होगा. चुनाव आयोग भी एक साथ चुनाव करवाने का समर्थक है. लॉ मिनिस्ट्री ने इलेक्शन कमीशन से पार्लियामेंट्री कमेटी की 79वीं रिपोर्ट के बारे में सलाह मांगी थी. जून 2016 में चुनाव आयोग ने लॉ मिनिस्ट्री को एक चिट्ठी लिखी. इसमें उसने एक साथ चुनाव करवाने का समर्थन किया था.ऐसा पहली बार हुआ कि चुनाव आयोग ने आधिकारिक रुप से अपनी इच्छा जाहिर की. चुनाव आयोग ने कहा- 'जहां तक इलेक्शन कमीशन का सवाल है, कमीशन के लिए ये कोई बड़ी बात नहीं है. अगर राजनीतिक सहमति बनती है तो ये कहने की कोई जरुरत नहीं, चुनाव आयोग सहमत है या नहीं.' आखिर क्या है ये सिस्टम? ये चुनावी सिस्टम जर्मन सिस्टम पर आधारित है. संविधान लागू होने के बाद चार बार 1951, 1957, 1962, 1967 में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ हुए थे. तब कांग्रेस की तूती बोलती थी. ज्यादातर जगहों पर कांग्रेस की सरकारें थीं. इससे तंग आकर राममनोहर लोहिया ने 'गैर-कांग्रेसवाद' का नारा दिया था. इसके बाद आठ राज्यों में कई पार्टियों ने मिलकर गठबंधन से संयुक्त विधायक दल की सरकारें बना ली थीं. ये राज्य थे- बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, मद्रास और केरल. कम्युनिस्ट पार्टियां और जनसंघ भी इसमें शामिल थे. इससे कांग्रेस राज को चुनौती तो मिली लेकिन ये गठबंधन सरकारें ज्यादा दिनों तक नहीं टिकीं. आपस में ख़ट-पट थी. कांग्रेस की केंद्र सरकार इससे नाराज़ हो गई थी. कई सरकारों को संविधान के आर्टिकल 356 के तहत बर्खास्त कर दिया गया था. हालांकि इमरजेंसी के बाद आई मोरार जी देसाई की जनता पार्टी ने भी यही किया था. उसने नौ सरकारों को बर्खास्त किया. इंदिरा गांधी ने भी 1980 में दोबारा सत्ता में आने पर ऐसा ही किया. एक साथ चुनाव वाली इस व्यवस्था के कई अच्छे और बुरे पहलू बताए जा रहे हैं: इसमें क्या ठीक है- 1. इससे इलेक्शन कमीशन का काम घट जायेगा. बार बार चुनावों की तैयारी करने से छुटकारा मिलेगा. पैसे भी कम लगेंगे. 2. केंद्र और राज्य सरकारें एक साथ पॉलिसी बना सकते हैं. 3. केंद्र और राज्य सरकारें एक साथ जवाबदेह हैं. 4. पूरे देश में एक मतदाता सूची होगी. अभी लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकायों की अलग-अलग मतदाता सूचियां हैं. अक्सर ऐसा होता है कि मतदाता का नाम एक सूची में होता है, लेकिन दूसरी सूची में नहीं होता. जिससे वो वोट नहीं कर पाता. 5. देश को बार-बार लगभग हर साल चुनावों से राहत मिलेगी. सरकारों और जनता को पांच साल तक अपने अपने काम पर ध्यान देने का मौका मिलेगा. 6. रोज-रोज के चुनाव से विकास के काम प्रभावित हो जाते हैं. मॉडल कोड ऑफ़ कंडक्ट की वजह से नई स्कीम लागू नहीं कर सकते. 7. देशं में लगभग हर साल बड़े पैमाने में चुनावों को ठीक से निपटाने के लिए बार-बार फ़ोर्स बुलानी पड़ती है. पांच सालों में एक बार चुनाव होने से उन्हें एक साथ मैनेज किया जा सकता है. 8. इस देश में बड़ी विविधता है. अलग अलग जगह के हिसाब से नेता लोग गणित भिड़ाते हैं. लोगों को साम्प्रदायिक माहौल बनाने का मौका मिल जाता है. एक साथ पूरे देश में ऐसे तत्त्वों पर नज़र रखना थोड़ा कठिन तो होगा पर नामुमकिन नहीं होगा. 9. चुनावी भ्रष्टाचार में लगाम लगाई जा सकती है. 10. बार-बार होने वाले चुनावों को रोकने के लिए ये जरूरी है कि चुनी हुई सरकारें स्थायी हों. इसमें गड़बड़ क्या है- 1. ज्यादातर लोग वोट देते समय एक ही पार्टी को वोट कर सकते हैं. इससे अलग अलग राज्यों के हित प्रभावित हो सकते हैं. देश में एक ही पार्टी का शासन हो सकता है. 2. इस समय जो व्यवस्था चल रही है उसकी लोगों को आदत पड़ गई है. हमारे देश में ज्यादातर लोग पढ़े-लिखे नहीं हैं. उन्हें नई व्यवस्था समझाना कठिन हो सकता है. 3. इससे राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों के बीच मतभेद बढ़ सकते हैं. 4. आर्टिकल 356 का गलत इस्तेमाल हो सकता है. 5. नए सिरे से चुनाव करवाने के लिए पुरानी विधान सभाओं को भंग करना होगा. इसके लिए शायद ही राज्य सरकारें तैयार हों. संविधान के आर्टिकल 85 (2)B के अनुसार राष्ट्रपति लोकसभा को और आर्टिकल 174 (2) B के तहत राज्यों में राज्यपाल विधानसभा को पांच साल के पहले भी भंग कर सकते हैं. 6. इससे राष्ट्रीय दलों को फायदा हो सकता है. छोटी पार्टियां पीछे रह जायेंगी. पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी ने कहा- चाहे इसे कोई माने या न माने, बड़े राजनीतिक नेताओं और पार्टियों से जुड़ी लहर का कारक राज्य चुनावों के परिणाम को प्रभावित करता है और इसलिए एक साथ चुनाव कराए जाने से राष्ट्रीय पार्टियों को फायदा होगा और छोटे क्षेत्रीय दलों के लिए मुश्किल होगी. उन्होंने कहा  'एक संघीय ढ़ांचे वाले विविधतापूर्ण देश में एक साथ चुनाव कराने का विचार बहुत अच्छा नहीं है. जिस तरह के लोकतंत्र में हम लोग रह रहे हैं, उसमें छोटे दलों के उभरने से मतदाताओं को चुनाव का एक विकल्प मिलता है.' स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटी (सीएसडीएस) के निदेशक संजय कुमार ने कहा, 'एक साथ चुनाव कराए जाने से बड़े राजनीतिक दलों को ज्यादा फायदा होने की उम्मीद है और छोटे क्षेत्रीय दलों की भूमिका नामालूम हो जाएगी'. अभी तो फिलहाल पांच राज्यों में 2017 में चुनाव होने हैं. 13 राज्यों में 2018 में, 9 राज्यों में 2019 में और 1 राज्य में 2020 में चुनाव होने हैं. एक साथ लोकसभा और विधानसभा चुनाव करवाने की बहस बहुत लंबी है. लेकिन बहस होनी चाहिए. लोकतंत्र के लिए अच्छा है. अगर एक साथ चुनाव न भी हो सकें तो भी ये लगभग हर साल अलग-अलग जगहों पर चुनाव करवाने से इलेक्शन कमीशन को राहत देनी चाहिए उसे और मजबूत किया जाना चाहिए ताकि चुनावों के करप्शन पर लगाम लग सके. 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ये स्टोरी निशान्त ने की है.


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