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घूंघट वाली उन औरतों से मिलिए जिन्होंने एक राज्य की सरकार को झुका दिया

राजस्थान में हाल ही में इन महिलाओं की वजह से कैसे किसान अपना आंदोलन जीत पाए.

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16 सितंबर 2017 (अपडेटेड: 16 सितंबर 2017, 06:20 PM IST)
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जो पुरुष नहीं कर पाए, वो इन महिलाओं ने किया. सीकर किसान आंदोलन को सफल बनाने वाली महिलाओं का एक समूह.
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राजस्थान में एक जिला है नागौर. नक़्शे में देखेंगे तो राजस्थान के ठीक बीच में आपको यह जिला दिखाई देगा जिसकी एक बांह पश्चिम की तरफ बढ़ी हुई है. यह इलाका दरअसल थार की शुरुआत है. नागौर के रेलवे स्टेशन से करीब 20 किलोमीटर दूर एक गांव है, रायधनु.

एक बार की बात है..

बात सामंती दौर की है. खरीफ की फसल कटने का समय था. यह दावे के साथ इसलिए लिखा जा रहा क्योंकि अर्धमरुस्थलीय इलाका होने के कारण यहां साल में सिर्फ एक फसल होती है. किसानों का एक कुनबा भी अपने खेत पर कटाई में जुटा हुआ था. घर पर एक महिला थी जिसे दोपहर का खाना लेकर खेत जाना था.
वो अपने घर पर ओखली में खीचड़े (पश्चिमी राजस्थान में बाजरे से बनाई जानी वाली खिचड़ी) के लिए बाजरा कूट रही थी. तभी राजा का किणवारिया (लगान वसूल करने वाला) उसके घर पर आ धमका. उस औरत को किणवारिए की नीयत ठीक नहीं लगी. उसने घर पर आने का कारण पूछा तो किणवारिए ने जवाब दिया कि वो लाग (लगान) लेने के लिए आया हुआ है. औरत ने जवाब दिया कि उसे लाग लेने के लिए खेत में होना चाहिए.
औरत दोपहर का खाना लेकर खेत में पहुंची. सब लोगों के खा लेने के बाद उसने सबको बताया कि किणवारिया घर पर आया था. उसने जबरदस्ती करने की कोशिश की. बचाव में उस औरत ने ओखली में धान कूटने वाले मूसल से पीट-पीट कर उसकी हत्या कर दी.
यह सूचना मिलने के बाद रायधनु का यह किसान कुनबा और उनके साथ कुछ दूसरे परिवारों ने रातों-रात गांव छोड़ दिया. करीब 70 किलोमीटर की यात्रा करके ये लोग नागौर जिले में कुचेरा के पास अड़वड़ गांव के पास बस गए. आज भी इस किसान परिवार की पीढ़ियां यहां रह रही हैं. इतिहास की किताबों के पास इतनी फुर्सत नहीं होती कि वो इस किस्म की कहानियों को दर्ज कर सकें. लेकिन यह कहानियों के तौर पर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती रहती हैं.
नागौर में मिर्ची सुखाती एक महिला. रैंडम. (फोटोः राजस्थान डायरेक्ट)
नागौर में मिर्ची सुखाती एक महिला. रैंडम. (फोटोः राजस्थान डायरेक्ट)

ये कहानी अब सुनाने की वजह

दरअसल अखबार, टीवी और फिल्मों के जरिए हमारे मन में किसी एक इलाके के बारे में ख़ास छवि बैठा दी जाती है. राजस्थान की औरतों की छवि के साथ आप अपने मन में घूंघट को बैठा चुके हैं. ऐसा नहीं है कि यह पूरी तरह से गलत है लेकिन यह पूरी तस्वीर पेश नहीं करता. जैसा कि पी. साईनाथ कहते हैं, भारत में किसानी के काम का 60 फीसदी हिस्सा औरतों के पल्ले पड़ता है.

दरअसल समाज के एलीट तबके के पास यह सुभीता है कि उसे खेतों में काम नहीं करना करना पड़ता. इसलिए यह तबका अपनी औरतों को घूंघट में रख कर अपनी मान-मर्यादा की शेखी बघार सकता है. इसके उलट किसान परिवार में औरत घर से बाहर के काम भी एक इकाई की तरह गिनी जाती है. जब कटाई करते-करते आपकी कमर टूट कर दोहरी होने हो जाती है, उस समय आप इस बात की चिंता नहीं कर सकते कि आपका आंचल ठीक जगह पर है या नहीं. इसका ये मतलब कतई नहीं कि यहां औरतों को बहुत आजादी हासिल है. लेकिन घूंघट तब तक ही चल पाता है जब तक वो काम के आड़े न आए.

2017 में आते हैं

सीकर से जब आप एनएच 52 की तरफ निकलते हैं तो तकरीबन 20 किलोमीटर दूर खूड़ा गांव के पास आपको पहला टोल प्लाजा मिलता है. यहां तकरीबन 8,500 गाड़ियां हर दिन निकलती हैं. 11 से 13 सितम्बर के बीच इस टोल प्लाजा पर काम करने वाले लोगों के लिए वक़्त गुजारना मुश्किल हो गया था. एम्बुलेंस और इमरजेंसी गाड़ियों को छोड़ कर किसी भी गाड़ी ने इस टोल प्लाजा के बैरियर्स पर दस्तक नहीं दी थी. यह ब्यौरा हम टोल प्लाजा के इंचार्ज बृजेश के हवाले से आपके सामने पेश कर रहे हैं.
दरअसल इस टोल प्लाजा से करीब 700 मीटर पहले एक गांव पड़ता है, रशीदपूरा. 11 से 13 तारीख के बीच ऑल इंडिया किसान सभा ने कर्जा माफ़ी की मांग को लेकर चक्काजाम की घोषणा की थी. इस टोल प्लाजा पर करीब 1000 लोग चक्काजाम करके बैठे हुए थे. किसान सभा ने सीकर जिले में चक्काजाम के लिए 360 से ज्यादा चौकियां बनाई थीं. इसके अलावा गांव-गांव में लोग जाम लगा कर बैठ गए. चौकियों की संख्या 360 से बढ़कर 600 से ऊपर पहुंच गई. सत्यजीत भींचर किसान सभा की तरफ से रशीद्पुरा चौकी के प्रभारी थे. वो कहते हैं -
"तीन दिन तक पूरा गांव सड़क पर था. हम अपना घर छोड़ कर हाईवे के किनारे पर ही रह रहे थे. सिर्फ नहाने के लिए बारी-बारी से घर जाते. किसान सभा की तरफ से हमें आदेश दिए गए थे कि सेना की गाड़ी, एम्बुलेंस, परीक्षा देने जाने वाले स्टूडेंट्स, मरीज और विदेश जा रहे लोगों के अलावा किसी को भी आगे नहीं जाने दिया जाए. हमने इस आदेश को पूरी तरह से लागू किया."
किसान आंदोलन के दौरान सीकर में धरना संभाले हुए महिलाएं.
हालिया किसान आंदोलन के दौरान सीकर में धरना संभाले हुए महिलाएं.

सत्यजीत भले ही इस चौकी के इंचार्ज हों लेकिन इस चक्का जाम में असल भूमिका निभाई महिलाओं ने. 14 की शाम जब आंदोलन की जीत का जश्न खत्म हुआ तभी हम रशीद्पुरा पहुंचे. यहां की एक ढाणी (मुख्य गांव से दूर खेतों में बने घर) कुछ महिलाएं दी लल्लनटॉप से बात करने के लिए जुट रही थीं. कुछ महिलाएं अभी रास्ते में थीं और अभी औपचारिक बातचीत शुरू होने में थोड़ा वक़्त था. चाय आ चुकी थी. महिलाएं आपस की बातचीत में व्यस्त थीं. "तीन दिनां'उ रोड पर सागे पड़या हां, अब घर एकला आवडे इ कोनी." माने - तीन दिन रोड पर साथ-साथ रह रहे थे, अब घर पर अकेले रहते हुए मन नहीं लगेगा.
महिलाओं ने आंदोलन में क्या किया
इस दौरान औरतों की भूमिका को लेकर हमें जवाब मिला प्रभाती से. उन्होंने बताया -
"पूरी रात हम चौकी पर रहते. सुबह पौ फटने के साथ ही घर लौटते. गाय-भैंस दुहते और चौकी पर दूध पहुंचाते ताकि वहां मौजूद दूसरे लोग चाय पी सकें. इसके बाद घर के काम करते. दही बिलोते. रोटी और छाछ लेकर 8-9 बजे के करीब फिर से चौकी पर डट जाते."
अक्सर हमारे गांव-देहात में महिलाएं खेत से आगे नहीं बढ़ पाती हैं. शहर-बाजार जैसी जगहों पर जाने के लिए उनके साथ एक मर्द का होना सामाजिक ढांचे के हिसाब से जरूरी शर्त है. ऐसे में ये औरतें सड़कों पर उतर गईं. क्या इन्हें पुलिस का डर नहीं लगा? साना कहती हैं -
"डर किस चीज का लगेगा? वो मोदी जी, जो सरकार हैं, वो काला नाग है. हमारे बेटे गोली खाएंगे सामने जाकर, हमारे मर्द गोली खाएंगे सामने जा कर, हमारे बूढ़े पिताजी घर में भूखे मरेंगे. अब हमें किस चीज का डर रह गया है. हमारी बहन-बेटी जब घर से बाहर निकलती है तो ऐसा लगता है कि सुरक्षित वापस आएगी या नहीं आएगी. हमारे पास किस चीज का डर रह गया है? मर्दों के सड़क पर उतरने से कुछ नहीं होगा, मर्दों के साथ कंधा मिला कर चलना पड़ेगा. अभी नहीं, आगे भी."
इन महिलाओं का वीडियोः

सरकार को भयभीत करने वाली बात
ऐसी कौन सी वजह थी जिसके चलते घर-बार छोड़ कर महिलाएं सड़क पर उतर गईं. इसका जवाब हमें प्रभाती देती हैं -
"बहुत परेशानी आने के बाद हम लोग सड़क के ऊपर गए. नहीं तो वहां क्या लेने जाते. न हमें पानी मिल रहा है, ना बिजली मिल रही है और ना ही मुआवजा. हमने पचास-पचास बीघे में प्याज बो कर देख लिया. सरकार ने हमें ऐसे बीज दिए कि वो जमीन से बाहर ही नहीं निकले. हमें सरकार ने ऐसे बीज क्यों दिए. आखिरकार हमें बोये हुए खेत को फिर से जोतना पड़ा.
दो साल ग्वार हमने घर में रखा कि जब ठीक भाव मिलेंगे तो बेचेंगे. आखिरकार घाटा खा कर हमें उसे बेचना पड़ा. उससे जो पैसा मिला उससे हम प्याज के बीज लेकर आए. 500 रूपए किलो में हम बीज लाए. सरकार ने बीच के पैसे वापस कर दिए लेकिन उसके अलावा जो घाटा हुआ उसका एक पैसा भी हमें नहीं मिला. आखिरकार हमें मजबूर होकर सड़क पर जाना पड़ा. देख लेना इस सरकार को हम मुंह के बल करके छोड़ेंगे. सरकार के लोग तो हैं थोड़े और हम दिन-रात बढ़ रहे हैं. अब हम औरतें सरकार से डरने वाली नहीं हैं."
इनका कॉमन सेंस बहुत तेज़ है
प्रभाती जिस तरीके से 'सरकार' और 'हम' की व्याख्या करती हैं वो बहुत दिलचस्प है. इस बात पर संदेह करने का अवकाश बच जाता है कि उन्हें इस बात की बुनियादी समझ है भी या नहीं कि इस देश में सरकार किस तरह से चल रही हैं. फिर भी वो हर कदम सरकार से लोहा लेने के लिए तैयार हैं. राजनीति की बहुत गहरी समझ न रखने वाली इन महिलाओं को इस आंदोलन का औचित्य समझाना कितना मुश्किल रहा होगा? इसका जवाब जनवादी महिला समिति की सरोज हमें देती हैं -
"2017 में राजस्थान सरकार का नया कानून आया. इस कानून के हिसाब से 6 महीने तक हम गाय के बछड़े को दूध पीते हुए उसकी मां से अलग नहीं कर सकते हैं. ऐसे में हमारे हाथ क्या लगना है. हम जानवर इसलिए ही तो पालते हैं ताकि उनसे दूध पा सकें. सबसे पहले हमने महिलाओं को यह बात बताई.
जब फसल नहीं होती, या फिर उसका दाम नहीं मिलता तब सबसे ज्यादा दबाव महिलाओं पर पड़ता है. उन्हें न सिर्फ खेत बल्कि घर-गृहस्थी भी संभालनी होती है. बुरे समय के लिए बचत करना भी हमारे ही पल्ले है. ऐसे में महिलाएं पुरुषों से ज्यादा खेती-किसानी की इस समस्या को भुगत रही हैं. जब किसान सभा की तरफ से निर्णय लिया कि चक्का जाम करना है तो हम भी कंधे से कंधा मिला कर खड़े हो गए. वैसे भी ज्यादातर मर्द सीकर में चल रहे महापड़ाव में थे. ऐसे में चक्का जाम की जिम्मेदारी को महिलाओं ने अपने दम पर पूरा किया."
आंदोलन. पूरी भागीदारी. जीत. जश्न. आगे की तैयारी. वो महिलाएं.
आंदोलन. पूरी भागीदारी. जीत. जश्न. आगे की तैयारी. वो महिलाएं.

रशीदपुरा इस चक्काजाम की सबसे महत्वपूर्ण चौकियों में थी. इस चौकी ने बीकानेर को आगरा से जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 52 को पूरी तरह से ब्लॉक करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी. यह सब महिलाओं की अगुवाई में हुआ.

घूंघट को दूरबीन की तरह उठा कर दुनिया देखने वाली महिलाओं की अगुवाई में.

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