क्या है “शक्सगाम घाटी” का पूरा विवाद और इतिहास, जिस पर भारत-चीन फिर आमने-सामने हैं
Shaksgam Valley Dispute and History Explained: चीन और भारत के बीच सीमा विवाद को लेकर एक बार फिर तल्खियां बढ़ती नजर आ रही हैं. भारत के दावे वाले क्षेत्र में चीनी निर्माण पर आपत्ति जताने के बाद चीन ने भी भड़काऊ बयान दिया है. ऐसे में जानिए क्या है इस विवाद की पूरी कहानी.
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भारत और चीन बातचीत के जरिए सीमा विवाद को सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं. बीते दो साल में पीएम मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच दो बार मुलाकात भी हुई. जिसके बाद इसमें तेजी लाने की भी कोशिश की गई. लेकिन हाल ही में दोनों देशों के बीच ऐसी बयानबाजी हुई, जिससे सीमा विवाद पर तनाव फिर बढ़ गया है. पूरे विवाद के केंद्र में है शक्सगाम घाटी.
शक्सगाम घाटी एक ऐसा क्षेत्र है, जिस पर कानूनी रूप से भारत का हक है, लेकिन पहले पाकिस्तान ने उस पर कब्जा किया और फिर 'गिफ्ट' के तौर पर चीन को दे दिया. भारत ने कभी भी इस पर चीन और पाकिस्तान का दावा नहीं माना और उनका इस पर गैरकानूनी कब्जा बताया है. सुरक्षा और संप्रभुता, दोनों लिहाज से भारत के लिए यह क्षेत्र बेहद महत्वपूर्ण है.
अब कैसे शुरू हुआ विवाद?हाल ही में रिपोर्ट आई थी कि चीन अपनी CPEC परियोजना के तहत शक्सगाम घाटी में बुनियादी ढांचे बना रहा है. इसमें एक ऑल वेदर रोड शामिल है, जिसकी लंबाई 75 किमी और चौड़ाई लगभग 10 मीटर है. भारतीय विदेश मंत्रालय से इस पर सवाल पूछा गया तो मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा,
शक्सगाम घाटी भारतीय क्षेत्र है. हमने 1963 में हुए तथाकथित चीन-पाकिस्तान सीमा समझौते को कभी मान्यता नहीं दी है. हमने लगातार यह कहा है कि यह समझौता अवैध और अमान्य है. हम तथाकथित चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) को भी मान्यता नहीं देते हैं, जो भारतीय क्षेत्र से होकर गुजरता है और पाकिस्तान के अवैध कब्जे में है.
इस पर चीनी विदेश मंत्रालय ने भड़काने वाला बयान दिया. चीनी प्रवक्ता माओ निंग माओ निंग ने इस क्षेत्र को चीन का हिस्सा बताते हुए कहा कि यहां इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण करना पूरी तरह से जायज़ है. उन्होंने कहा,
चीन और पाकिस्तान ने 1960 के दशक में एक सीमा समझौता किया था और दोनों देशों के बीच सीमा तय की थी. यह संप्रभु देशों के रूप में चीन और पाकिस्तान का अधिकार है.

ऐसे में समझना जरूरी है कि आखिर शक्सगाम घाटी को लेकर पूरा विवाद और इसका इतिहास क्या है. कैसे पहले पाकिस्तान ने इस पर कब्जा जमाया और फिर चीन को दे दिया. इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक शक्सगाम घाटी पूर्वी काराकोरम रेंज में सियाचिन ग्लेशियर के पास स्थित है. इसे ट्रांस काराकोरम ट्रैक्ट के नाम से भी जाना जाता है. इसकी सीमा उत्तर में चीन के शिनजियांग क्षेत्र और दक्षिण और पश्चिम में पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (POJK) से लगती है.
क्यों महत्वपूर्ण है शक्सगाम घाटी?शक्सगाम घाटी भारत के लिए दो कारणों से बहुत महत्वपूर्ण है - क्षेत्रीय और सैन्य. यह घाटी दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र सियाचिन ग्लेशियर के पास है. यहां से काराकोरम पास तक सीधा रास्ता है. सियाचिन से भारत पाकिस्तान पर सीधी नजर रखता है. वहीं काराकोरम पास से भारत चीनी गतिविधियों पर नजर रख सकता है. इस तरह शक्सगाम घाटी पर नियंत्रण से भारत की चीन के साथ LAC और पाकिस्तान के साथ LoC पर सैन्य स्थिति पर सीधा असर पड़ता है.

जियोपॉलिटिकल स्ट्रैटेजिस्ट ब्रह्मा चेलानी शक्सगाम घाटी की रणनीतिक महत्तता बताते हुए एक्स पर लिखते हैं,
2024 से सैटेलाइट तस्वीरों और इंटेलिजेंस असेसमेंट से पता चलता है कि चीन शक्सगाम घाटी पर अब सिर्फ "इंफ्रास्ट्रक्चर" नहीं बना रहा, बल्कि वह भारत के खिलाफ एक नया मिलिट्री मोर्चा खोल रहा है. शक्सगाम में उसकी धीरे-धीरे कब्जा करने की रणनीति प्रोजेक्ट्स के तेजी से पूरे होने के साथ एक अहम मोड़ पर पहुंच रही है. 2024 के बीच तक चीन ने 4,805 मीटर ऊंचे अघिल पास से होते हुए लोअर शक्सगाम घाटी तक एक सड़क बना ली थी. इससे जिससे चीनी कंस्ट्रक्शन टीमें और शायद मिलिट्री पेट्रोल भी इंदिरा कोल में भारत के कंट्रोल वाले सियाचिन ग्लेशियर से 50 किमी के दायरे में पहुंच गई हैं.
उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि इसके नतीजे बहुत गंभीर हैं. दशकों से, भारत सियाचिन से दक्षिण से पाकिस्तान की तरफ फोकस करता आया है. लेकिन चीन ने जो नया रास्ता बनाया है, उससे वह उत्तर से भी दबाव डाल सकता है. इससे दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र में दो मोर्चों के बीच लड़ाई की संभावना बढ़ जाती है. चीन की तेज़ी से बढ़ती गतिविधियां सियाचिन-शक्सगाम-काराकोरम ट्रायंगल को एक संभावित टकराव वाली जगह में बदल रही हैं.

आजादी के समय शक्सगाम घाटी जम्मू-कश्मीर रियासत का हिस्सा मानी जाती थी, लेकिन उसका वहां कोई प्रशासनिक कंट्रोल नहीं था. अक्टूबर 1947 में जम्मू और कश्मीर के भारत में विलय के बाद, शक्सगाम घाटी कानूनी रूप से भारत का हिस्सा बन गई. हालांकि, 1947-48 की लड़ाई में जब पाकिस्तान ने गिलगित-बाल्टिस्तान पर कब्जा कर लिया तो उसके बाद धीरे-धीरे शक्सगाम घाटी पर भी अपना नियंत्रण बढ़ा लिया.
इंडिया टुडे के मुताबिक 1950 के दशक में चीन ने भी पूर्वी हुंजा के इलाकों में घुसना शुरू कर दिया. इन्हीं वजहों से तब भारत के साथ उसके संबंध तेजी से खराब हुए. लेकिन पाकिस्तान ने इसे चीन को खुश करने के एक मौके के रूप में देखा. इसके बाद चीन और पाकिस्तान ने 1963 में एक सीमा समझौता किया, जिसमें पाकिस्तान ने औपचारिक रूप से यारकंद नदी और शक्सगाम घाटी चीन को सौंप दी. हालांकि भारत ने कभी भी इस समझौते को स्वीकार नहीं किया और हमेशा से इसे अवैध बताते आया है. भारत का कहना है कि जब वह हिस्सा कानूनी रूप से भारत का है तो पाकिस्तान उसे चीन को कैसे दे सकता है और चीन उस पर अपना दावा कैसे कर सकता है. हालांकि चीन ने भारत की आपत्तियों की चिंता किए बगैर शक्सगाम घाटी पर अपना नियंत्रण बढ़ाना जारी रखा.
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चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) प्रोजेक्ट के तहत चीन ने वहां कई निर्माण भी किए, जिससे उसकी सेना के लिए उन इलाकों में मूवमेंट काफी हद तक आसान हुई है. अब यह भारत के लिए सुरक्षा के लिहाज से एक चुनौती बनता जा रहा है. हाल ही में जब शक्सगाम में नए निर्माण की खबरें आईं तो भारत ने फिर से उस पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई, लेकिन हमेशा की तरह चीन ने उसे अपना क्षेत्र बताते हुए निर्माण को सही ठहराया.
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