न्यूक्लियर फ़ाइल चुराकर क्या करने वाले थे डोनाल्ड ट्रम्प?
डॉनल्ड ट्रम्प के पास फ़्रांस के राष्ट्रपति की सेक्स लाइफ की डिटेल्स कहां से आई?

दुनिया का सबसे ताकतवर देश अमेरिका. यहां के पूर्व राष्ट्रपति हैं डोनाल्ड ट्रम्प. राष्ट्रपति रहे हुए हमेशा अपने अजीबोगरीब बयानों के लिए ख़बरों में रहे. कभी नार्थ कोरिया के राष्ट्रपति ‘किम जोंग उन’ को रॉकेट मैन बुला देते तो कभी कहते कि अमेरिका में बन रही बॉर्डर वॉल का खर्चा मेक्सिको देगा. ये सब चुटकुलिया बयान थे, मजाक में उड़ा दिए गए. लेकिन ट्रम्प की लापरवाही का भयानक अंजाम होना था.
साल 2020 में चुनाव में हारने के बाद ट्रम्प ने हार मानने से इंकार कर दिया, कहने लगे कि चुनाव में धांधली हुई है. ट्रम्प के फैंस ने ये सब सुना और जिस दिन चुनाव पर मुहर लगनी थी, अमेरिकी संसद को चारों ओर से घेर लिया. कैपिटल बिल्डिंग के अंदर घुस गए. खूब हंगामा हुआ. आखिरकार ट्रम्प ने मरे मन से वाइट हाउस खाली किया. लेकिन इसके बावजूद भी कभी नहीं माना कि चुनाव में उनकी हार हुई थी. नियम के अनुसार कोई व्यक्ति 2 टर्म तक अमेरिका का राष्ट्रपति रह सकता है. इसका मतलब हुआ कि ट्रम्प दुबारा राष्ट्रपति बन सकते हैं. और अमेरिकी मीडिया की रिपोर्ट्स की मानें तो ऐसा करने की उनकी पूरी मंशा है. अमेरिका के अगले राष्ट्रपति चुनाव 2024 में होने हैं.

इस बीच ट्रम्प एक बार दुबारा ख़बरों में हैं. बीते दिनों उनके मार-अ-लागो घर पर FBI ने रेड डाली. रिपोर्ट्स के अनुसार ट्रम्प अपने साथ वाइट हाउस के कई खुफिया दस्तावेज़ भी ले गए थे. लगभग 300 ऐसे दस्तावेज़ ट्रम्प के घर से बरामद हुए. इस रेड की चर्चा अमेरिका में हर तरफ है. विरोधियों का कहना है कि ट्रम्प अब एक आम नागरिक हैं. ऐसे में टॉप सीक्रेट दस्तावेज़ अपने पास नहीं रख सकते. जवाब में ट्रम्प ने कहा कि राष्ट्रपति रहते हुए उन्होंने ये दस्तावेज़ डीक्लासिफाई कर दिए थे. जब पूछा गया कि कब और कहां किए, तो ट्रम्प ने जवाब दिया, अपने मन में. ट्रम्प के इस बयान के बाद अमेरिका में बहस छिड़ गई है कि क्या राष्ट्रपति ऐसा कर सकते हैं?
कल यानी मंगलवार को वाशिंगटन पोस्ट अखबार ने इस मामले में एक रिपोर्ट पब्लिश की. और सूत्रों के हवाले से बताया कि ट्रम्प के घर से मिले दस्तावेज़ टॉप सीक्रेट क्लियरेंस से ऊपर की श्रेणी के हैं. रिपोर्ट के अनुसार इनमें से एक दस्तावेज़ में एक दूसरे देश के न्यूक्लियर प्रोग्राम की जानकारी है. आज जानेंगे,
ट्रम्प के घर से और क्या-क्या मिला है?
अमेरिकी में दस्तावेज़ों की क्लासिफिकेशन की प्रक्रिया क्या है
साथ ही तुलना करते हुए जानेंगे कि भारत में ख़ुफ़िया जानकारी को लेकर क्या नियम हैं?
साल 1974. अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने पद से इस्तीफ़ा दे दिया. उन पर अपनी प्रतिद्वंद्वी डेमोक्रेटिक पार्टी की जासूसी का इल्जाम लगा था. इसे वॉटरगेट स्कैंडल के नाम से जाना जाता है. निक्सन के इस्तीफे के बाद राष्ट्रपति बने जेराल्ड फोर्ड ने उन्हें प्रेसिडेंशियल पार्डन यानी माफी दे दी. निक्सन के कार्यकाल में हुए काम की जांच हुई. पता चला कि वाइट हाउस छोड़ते हुए निक्सन ने सभी दस्तावेज़ जला दिए थे. इसके चलते साल 1978 में अमेरिका में एक नया क़ानून बना. प्रेसिडेंशियल रिकार्ड्स एक्ट यानी PRA. PRA के तहत राष्ट्रपति के कार्यकाल के दौरान उनके दस्तावेज़, ईमेल और सभी पत्र पब्लिक प्रॉपर्टी माने गए. तब से प्रथा चली आ रही है कि राष्ट्रपति का कार्यकाल ख़त्म होते ही सभी दस्तावेज़ नेशनल आर्काइव में जमा कर दिए जाते हैं.
फिर साल 2016 में ट्रम्प अमेरिका के राष्ट्रपति बने. जनवरी 2021 में उनका कार्यकाल ख़त्म हुआ. और जाते हुए वो व्हाइट हाउस से कुछ बक्से भी अपने साथ ले गए. पता चला कि इन बक्सों में न सिर्फ ट्रम्प के पर्सनल दस्तावेज़ थे, बल्कि वो कई टॉप सीक्रेट दस्तावेज़ भी अपने साथ ले गए. टॉप सीक्रेट दस्तावेज़ माने क्या? अमेरिका सहित कई देशों में राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी जानकारी को तीन लेवल में क्लासिफाई किया जाता हैं.
पहला और सबसे निचला लेवल है- कॉन्फिडेन्शियल. इस लेवल की जानकारी को पब्लिक के साथ साझा नहीं किया जाता. मसलन हथियारों और मिलिट्री शक्ति से जुड़ी जानकारी.
इसके ऊपर सीक्रेट लेवल होता है. इसमें वो जानकारी होती है जिसके लीक होने से विदेश रिश्तों पर असर पड़ सकता है. इसके अलावा इंटेलिजेंस और टेक्नोलॉजी से जुड़ी जानकारी भी इसी लेवल पर क्लासिफाई की जाती है.
सबसे ऊपर का लेवल होता है टॉप सीक्रेट - वो जानकारी जिसके बाहर आने से देश की सुरक्षा को अभूतपूर्व क्षति हो सकती है. मसलन देश के दुश्मनों से जुड़ी जानकारी या न्यूक्लियर हथियार जैसे संवेदनशील मुद्दों की जानकारी. कोई अगर इन दस्तावेज़ों को एक्सेस करना चाहे तो उसकी प्रक्रिया क्या है?
सीक्रेट दस्तावेज़ों को एक्सेस करने के लिए अलग-अलग लेवल के क्लियरेंस दिए जाते हैं. उन्हें भी जानकारी के हिसाब से क्लासिफाई किया जाता है. मसल अगर किसी व्यक्ति को टॉप सीक्रेट जानकारी से जुड़ा काम है, तो उसे पहले टॉप सीक्रेट क्लियरेंस लेना जरूरी है. क्लियरेंस हासिल करने के लिए अलग-अलग लेवल की सुरक्षा जांच से गुजरना होता है. और इन तीन लेवल्स के अलावा कुछ स्पेशल क्लियरेंस भी होते हैं, जिनका स्कोप किसी विशेष प्रोजेक्ट तक ही सीमित रहता है. इस जानकारी को लीक करने पर सजा का प्रावधान है. सजा के लिए अमेरिका में एस्पियोनाज़ एक्ट नाम का क़ानून है. हालिया समय में जिन लोगों पर एस्पियोनाज़ एक्ट के तहत केस दर्ज़ हुआ है, उनमें एडवर्ड स्नोडन और जूलियन असांज का नाम प्रमुख है.

भारत की बात करें तो यहां गोपनीय जानकारी के प्रबंधन के लिए बने क़ानून का नाम है ऑफिसियल सीक्रेट्स एक्ट (OSA). OSA को 1923 में लागू किया गया था. और आजादी के बाद इसे ज्यों का त्यों अपना लिया गया. ये क़ानून सरकारी मुलाजिमों सहित आम नागरिकों पर सामान रूप से लागू होता है. इस क़ानून के तहत खुफिया जानकारी लीक करने पर 14 साल कारावास की सजा हो सकती है.
इसके अलावा दो और क़ानून हैं. पब्लिक रिकार्ड्स एक्ट, 1993 और पब्लिक रिकॉर्ड रूल्स, 1997. इन दोनों में खुफिया जानकारी को संभालने और डीक्लासिफाई करने का तरीका बताया गया है. अमेरिका के बरअक्स भारत में ख़ुफ़िया जानकारी के लिए तीन क्लासिफिकेशन लेवल्स के अलावा एक चौथा लेवल भी होता है. जिसका नाम है रिस्ट्रिक्टेड. कैसे तय होता है कि कौन सी जानकारी किस लेवल पर होगी?
साल 2010 में भारत सरकार ने’ सेन्ट्रल सेक्रेट्रिएट मैन्युअल ऑफ ऑफिस प्रोसीजर’ जारी किया. जिसमें, खुफिया जानकाट्री को कैसे ट्रीट किया जाएगा, इसका प्रोसीजर बताया गया था. इसके मुताबिक़ भारत में टॉप सीक्रेट जानकारी जॉइंट सेक्रेटरी लेवल से नीचे नहीं साझा की जा सकती. वहीं सीक्रेट फाइल्स अंडर सेक्रेटरी लेवल तक ही रखी जाती हैं.
अब ये भी जान लेते हैं कि ख़ुफ़िया जानकारी को डीक्लासिफाई करने का क्या तरीका है.
पब्लिक रिकॉर्ड एक्ट, 1993 के अनुसार,
“भारत सरकार अंडर सेक्रेटरी लेवल और उससे ऊपर के किसी लेवल के अधिकारी को डीक्लासिफिकेशन की जिम्मेदारी दे सकती है”.
इसके अलावा दस्तावेज़ों को हर पांच साल में रिव्यू किया जाता है. और 25 साल पूरे होने पर इन दस्तावेज़ों को नेशनल आर्काइव में ट्रांसफर कर दिए जाने का नियम है. हालांकि 1974 में हुए पोखरण परमाणु परिक्षण सहित कई ऐसे दस्तावेज़ों को नेशनल आर्काइव में जमा नहीं किया गया है. ऐसी ही एक रेपोर्ट और है, भगत-हैंडरसन ब्रुक्स रिपोर्ट. इस रिपोर्ट में 1962 में भारत को चीन से मिली हार की समीक्षा की गई है. 60 साल बाद भी ये रिपोर्ट पब्लिक डोमेन में अवेलबल नहीं हो पाई है.
इसके अलावा 1965 और 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध का भी कोई सरकारी इतिहास अवेलबल नहीं हैं. साल 1999 में हुए कारगिल युद्ध के बाद कारगिल रिव्यू कमिटी का गठन किया गया था. कमिटी ने एक रिपोर्ट जारी की थी. जिसे संसद में पेश किया गया था. लेकिन इस रिपोर्ट के एनेक्सचर को अभी तक सीक्रेट रखा गया है. जो 22 वॉल्यूम का है. और हर वॉल्यूम में 100 पन्नों की जानकारी है. इसमें पाकिस्तानी सेना के पास से मिले खत, डायरी और मैप्स की जानकारी हैं. साल 2021 में भारत सरकार ने डीक्लासिफिकेशन के लिए एक नई पॉलिसी की घोषणा की. जिसके अनुसार अब युद्ध की स्थिति में दो साल के अंदर एक रिव्यू कमिटी का गठन होगा. और पांच साल के भीतर युद्ध के रिकॉर्ड डीक्लासिफाई किए जाएंगे.
चलिए अब जानते हैं, ट्रम्प अपने साथ जो डाक्यूमेंट्स ले गए, उनकी गोपनीयता का लेवल क्या है. और वो FBI के हाथ लगे कैसे?
ट्रम्प के वाइट हॉउस छोड़ने के बाद ही नेशनल आर्काइव्स इन दस्तवाज़ों को हासिल करने में लगा हुआ था. इस बीच ट्रम्प को कई बार रिक्वेस्ट भेजी गई कि वो ये ये दस्तावेज़ जमा करा दें. फिर इसी साल जून में ट्रंप ने एफिडेविट जमा करते हुए कहा कि वो सभी दस्तावेज़ जमा करा चुके हैं. अमेरिकी जस्टिस डिपार्टमेंट इससे संतुष्ट नहीं था. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार ट्रम्प के किसी नजदीकी व्यक्ति ने जानकारी दी थी कि ट्रम्प के फ्लोरिडा वाले आवास पर सरकारी दस्तावेज़ मौजूद है. इस आवास का नाम है, मार-अ -लागो. अपने कार्यकाल के दौरान ट्रम्प अपना अधिकतर वक्त यहीं बिताते थे.
विदेशी राष्ट्राध्यक्षों की मेहमान नवाजी भी यहीं की जाती थी. कार्यकाल ख़त्म होने के बाद भी ट्रम्प विदेशी मेहमानों को बुलाते हैं. आंशका है कि इन विदेशी आगंतुकों की ख़ुफ़िया दस्तावेज़ों तक पहुंच हो सकती है. इसलिए अमेरिकी सरकार जल्द से जल्द से ये दस्तावेज़ वापस लाना चाहती थी. ट्रम्प के इंकार के बाद पिछले महीने आठ तारीख को मार-अ-लागो पर रेड मारी गई. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार FBI टीम को खास निर्देश दिए गए थे कि वो न्यूक्लियर हथियारों से जुड़े दस्तावेज़ों पर खास ध्यान दें. रेड में करीब तीन सौ दस्तावेज़ जब्त किए गए. पिछले दिनों एक तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी, जिसमें दिख रहा था कि मार-अ-लागो के एक कमरे के फर्श पर ये दस्तावेज़ बिखरे हुए थे. दस्तावेज़ों में है क्या?
यूं तो अमेरिकी सरकार ने इन दस्तावेज़ों का खुलासा नहीं किया है. लेकिन वाशिंगटन पोस्ट ने सरकारी सूत्रों से इस मामले में एक रिपोर्ट पब्लिश की है. जिसके अनुसार इस रेड में मिले कई दस्तावेजों में बहुत संवेदशील जानकारी है. इतनी कि FBI के अधिकारियों को इन दस्तावेज़ों को रिव्यू करने के लिए अलग से क्लियरेंस लेने की जरुरत पढ़ रही है. रिपोर्ट के अनुसार ट्रंप के पास से मिले दस्तावेज़ों में टॉप सीक्रेट लेवल के करीब 100 दस्तावेज़ हैं. इनमें से एक दस्तावेज़ की खास चर्चा हो रही है, जिसमें बताया जा रहा कि एक दूसरे देश की न्यूक्लियर डिफेंस से जुड़ी डिटेल्स हैं. हालांकि ये देश कौन सा है, इसका जिक्र रिपोर्ट में नहीं है. एक और दस्तावेज़ है जिससे अमेरिका के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं.
एक दूसरी रिपोर्ट के अनुसार इस दस्तावेज़ की हेडिंग है, ‘इन्फो: प्रेजिडेंट फ़्रांस’. अंदर क्या है, इसका कोई उल्लेख नहीं है लेकिन कयास लगाए जा रहे हैं कि इसमें फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से जुड़ी जानकारी हो सकती है. ट्रम्प कई बार मैक्रों की निजी जिंदगी के जुड़ी जानकारी होने की बात कह चुके हैं. रोलिंग स्टोन मैगजीन की एक रिपोर्ट बताती है कि ट्रम्प कई बार अपने दोस्तों के बीच डींगे हांकते हैं कि उनके पास मैक्रों की सेक्स लाइफ से जुड़ी जानकारी है. जो उन्हें इंटेलिजेंस से मिली है. इस मामले में ट्रम्प की ओर अगर कोई भी खबर पब्लिक में लीक हुई हो तो अमेरिकी फॉरेन रिलेशंस का जंजाल बन सकता है.
ट्रम्प का इस मामले में क्या कहना है?रेड की खबर आने के बाद ट्रम्प ने कहा था कि सरकार उन्हें दुबारा चुनाव लड़ने से रोकने के लिए ये सब कर रही है. क्लासिफाइड दस्तावेज़ों की बात पर उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति रहते हुए उन्होंने इन दस्तावेज़ों को डीक्लासिफाई कर दिया था. इस बात पर उनके विरोधियों और समर्थकों में बहस छिड़ गयी है. टेक्निकली देखें तो अमेरिका के राष्ट्रपति को किसी दस्तावेज़ को डीक्लासिफाई करने की ताकत है. लेकिन सवाल ये है कि ऐसा करने के लिए क्या राष्ट्रपति का लिखित या मौखिक बयान जरूरी है?. नियमों में इस बात का कोई जिक्र नहीं है. लेकिन व्यवहारिक तौर पर राष्ट्रपति अगर ये बात कम्यूनिकेट न करे तो बाकी लोग इस बारे में जानेंगे कैसे?
फिलहाल ये सवाल मीडिया में उछाले जा रहे हैं. कोर्ट में ये सवाल उठेगा अगर सरकार ट्रम्प के खिलाफ कोई केस दर्ज़ करती हैं. इस मामले में खुफिया जानकारी लीक करने के आरोप में ट्रम्प पर एस्पियोनाज़ एक्ट के तहत केस दर्ज़ हो सकता है. ट्विटर, फेसबुक आदि से ब्लॉक होने के बाद ट्रम्प इन दिनों अपने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म ट्रूथ शोसल का इस्तेमाल कर रहे हैं. रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने लिखा,
“न्यूक्लियर वेपन की बात झूठ है, जैसे रूस वाली बात झूठ थी, इम्पीचमेंट एक झूठ था. कोई है जो इन ख़बरों को प्लांट करवा रहा है ”
इसके अलावा ट्रम्प ने इस मामले में कोर्ट से एक अपील भी डाली. जिसके तहत वो FBI द्वारा जब्त दस्तावेज़ों के रिव्यू के लिए एक थर्ड पॉर्टी की नियुक्ति करने में सफल हो गए हैं. इस फैसले के बाद संभव है कि जस्टिस डिपार्टमेंट की जांच में लम्बा वक्त लग सकता है. कारण वही है, इस थर्ड पार्टी को भी पहले टॉप सीक्रेट क्लियरेंस लेने की जरुरत होगी.
इराक़,सद्दाम हुसैन और शिया-सुन्नी की पूरी कहानी!

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