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सत्य साईं : एक औसत जादूगर, जिसे तमाम लोग बाबा मानते थे

आज बड्डे है.

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केतन बुकरैत
23 नवंबर 2020 (अपडेटेड: 23 नवंबर 2020, 07:58 AM IST)
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ऐश्वर्या राय. सचिन तेंदुलकर. सुनील गावस्कर. अर्जुन रणतुंगा. सनथ जयसूर्या. निर्मल चन्द्र सूरी. गुंडप्पा विश्वनाथ. अटल बिहारी वाजपेयी.

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इन सभी में क्या कॉमन है? ये सभी एक धोखेबाज़ के भक्त थे. धोखेबाज़, जिसने खुद को बाबा कहना शुरू कर दिया था. सत्य साईं बाबा. इनसे मेरी पहली मुलाक़ात हुई मेरी ताई जी के घर पर. वो ऊपर लिखी महान हस्तियों में तो शामिल नहीं थीं मगर उनके ही जैसे सत्य साईं की भक्त थीं. कैंसर से मर गईं. अस्पताल जाने से पहले सत्य साईं की फ़ोटो के पैर छूकर गई थीं. ज़िन्दा वापस न लौटीं. बाद में मालूम चला कि सचिन तेंदुलकर भी सत्य साईं भक्त थे. बाबा की मौत पर आंसू बहाते भी दिखे. मगर सच्चाई का ऐसा है कि सामने आ ही जाती है. दूरदर्शन पर एक अवॉर्ड सेरेमनी आ रही थी. सत्य साईं ने एक अवॉर्ड दिया. अपना हाथ हिलाया और उनके हाथ में एक माला आ गयी. अपने आप. ठीक वैसा जैसा दूरदर्शन के भगवान वाले सीरियल्स में दिखाई देता है. उन्होंने वो माला उस अवॉर्ड जीतने वाले के गले में पहना दी. सब खुश. लेकिन जब उस क्लिप को गौर से देखा जाए तो मालूम पड़ता है कि जिस व्यक्ति ने वो अवॉर्ड जीतने वाले को देने के लिए बाबा को पकड़ाया था, उसने चुपके से वो माला बाबा के हाथ में ट्रांसफर कर दी थी. https://www.youtube.com/watch?v=bYaJBHI_-Pc बाबा के भेद खुलने लगे थे. ये इन्टरनेट की दुनिया है. यहां सब कुछ एक्सपोज़ होता है. बाबा की एक और गजब की ट्रिक थी. हाथ से भभूत निकालने की. वो हाथ को सीधा रख हवा में हिलाते थे. हथेली सीधी और नीचे की ओर. वो गोल-गोल घुमाते थे और फिर भक्तों की हथेली में भभूत रख देते थे.  मानो हवा में से निकाला हो. या स्वयं से लेकर आये हों. मालूम चला कि हाथ में पहली दो अंगुलियों के बीच एक चाक का छोटा सा टुकड़ा रखते थे. ये चाक ज़्यादा कठोर नहीं होती थी. ऐसी होती थी कि ज़रा सा जोर लगाने पर मसली जा सकती थी. सत्य साईं उसे ही मसलते हुए भक्त के हाथों में भभूत गिरा देते थे. भक्त लोट जाते थे. दंभ करते थे कि हजारों की भीड़ में बाबा ने उन्हें चुना. वो ये नहीं जान रहे थे कि बाबा ने उन्हें चुना तो है लेकिन आशीर्वाद देने के लिए नहीं बल्कि उल्लू बनाने के लिए. भक्ति जब सिर पे चढ़ती है तो आंखें होते हुए भी आदमी अंधा हो जाता है. इससे बड़ा नशा कोई नहीं. इससे घातक भी नहीं. सत्य साईं एक घटिया जादूगर था. और कुछ नहीं. घटिया इसलिए क्यूंकि वो खुलकर अपने जादूगरी के पेशे को भी नहीं स्वीकारता था. बल्कि एक सिद्धपुरुष का चोगा पहने फिरता था. इस चोगे को उतारने की अभूतपूर्व कोशिश की तो जादूगर पीसी सरकार जूनियर ने. महीनों तक सत्य साईं से मिलने की अर्जी रिजेक्ट होते जाने पर पीसी सरकार जूनियर ने एक स्वांग रचा. वो बंगाल के एक इंडस्ट्रियलिस्ट के बेटे का रूप धर के गए. तुरंत ही बाबा ने अन्दर बुला लिया. बाबा से कमरे के अन्दर होती मुलाकात यानी दर्शन मिलने पर सरकार जूनियर ने उनसे एक गिफ्ट मांगा. बाबा ने इंतज़ार करने को कहा. दूसरे कमरे में गए. और 2 मिनट बाद बाहर आये. जिस दौरान बाबा कमरे के अन्दर थे, सरकार जूनियर ने कमरे में रखी खाने की एक प्लेट अपने पास छुपा ली. वापस आने पर बाबा ने अपने हाथ को हवा में घुमाया और 'न जाने कहां से' उनके हाथ में संदेश मिठाई आ गयी. पीसी सरकार इसी का इंतज़ार कर रहे थे. उन्होंने तुरंत बाबा से कहा, "बाबा मुझे संदेश नहीं, रसगुल्ला पसंद है." और अपनी छुपी हुई मिठाई की प्लेट से संदेश को रसगुल्ले में बदल दिया. बाबा जी को काटो तो खून नहीं. उन्होंने सरकार को भगा दिया. बाद में सरकार ने कहा, "वो कोई बाबा नहीं है. वो जादूगर है. वो भी अच्छा नहीं है. वो इतना बेकार है कि जादूगरों का नाम बर्बाद कर रहा है." और इसी के बाद बाबा ने देश के प्रधानमंत्री नरसिंहा राव के सामने एक जादू किया था जो दूरदर्शन पर भी रिकॉर्ड हुआ. एडिटर को जब सत्य साईं की कारीगरी दिखाई दी तो वो क्लिप कभी भी टीवी पर प्रसारित ही नहीं हुआ. मगर हां, सत्य साईं पर बीबीसी ने एक डाक्यूमेंट्री बनाई. इस डाक्यूमेंट्री में सत्य साईं की पोल-पट्टी खोली गयी है. बाबा के आश्रम पर एक बोर्ड लगा हुआ था. जो कहता था, "Why fear when I am here?" यानी मेरे होते हुए डर कैसा? और वही बाबा, खुद को मारने आये लोगों के सामने पहुंचता है, तो भाग खड़ा होता है. अगर दिव्य शक्ति धारण की हुई थी तो क्यूं नहीं उन्हें सदबुद्धि दी या उनके हथियारों को निरस्त कर दिया? उन्होंने तो वही किया जो आम आदमी करता. सत्य साईं तो खुद को भगवान कहते थे. सत्य साईं के तमाम मंदिर, तमाम अस्पताल, तमाम वॉटर सप्लाई प्रोजेक्ट और स्कूल वगैरह मौजूद हैं. इन सभी बातों से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता. अस्पताल हैं तो उनमें लोगों का इलाज होता है. वॉटर सप्लाई प्रोजेक्ट है तो लोग पानी भी पी रहे हैं. स्कूल हैं तो बच्चे पढ़ भी रहे हैं लेकिन हमें ये बात मान लेनी चाहिए कि इनके पीछे लगा पैसा धोखेबाजी का पैसा है. उस पैसे को हजारों-लाखों लोगों की भावनाओं से खेलकर, उन्हें अंधेरे में रखकर, उन्हें उनकी ही आंखों के सामने बुद्धू बनाकर, चंदे और डोनेशन के नाम पर वसूला गया है. ये सभी बातें अभी तक छलावे की ओर इन्डिकेट कर रही थीं. लेकिन इसके अलावा भी ऐसा बहुत कुछ है जो बाबा के सामने खड़ा हुआ है. इनमें सेक्शुअल हैरासमेंट मुख्य है. सिडनी से आये बैंकर डि क्रेकर पांच साल तक बाबा के भक्त थे. साल 2000 में द सन्डे एज में उनके बुरे अनुभव छपे. स्वीडन में रहने वाले कोनी लारसन ने भी टेलिग्राफ को अपने साथ हुई बर्बरता को बताया. कोनी 21 साल तक बाबा के भक्त रहे थे.
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