देश अपने काम में लगा है. कोई बीवी के साथ टीवी देख रहा है. कहीं बुआ टीवी देखतेहुए पालक काट रही हैं. कहीं पपुआ टीवी देखते हुए कंपट चाट रहा है. कोई टीवी पर मैचदेख रहा है तो कोई डियर जिंदगी का प्रमोशन इवेंट. ये सब किस्मत वाले लोग हैं. न्यूजचैनल नहीं देख रहे. न्यूज देख रहे छोटे चाचा कुर्सी पर उछल पड़ते हैं. जब नीचे लालपट्टी पर लिखा आता है "भावुक हुए पीएम." वो डर जाते हैं कि आज पता नहीं कौन सासंदेश देंगे. क्या बंद करेंगे? अगले दिन अखबारों के फ्रंट पेज पर भी यही छपा मिलताहै. भावुक हुए पीएम. लो जिनको नहीं पता था वो भी जान गए. पीएम का भावुक होना देश केलोगों के लिए शर्म की बात है. ये लोग इतना एडजस्ट नहीं कर सकते. कि बार बार पीएम कोसफाई देनी पड़ती है. वो भी आंखों में आंसू भरकर. हमको तो चुल्लू भर आंसू... सॉरीपानी में डूब मरना चाहिए. लेकिन हम डूब मर नहीं रहे इसका मतलब ये नहीं कि हम भावुकनहीं हैं. या कभी हुए नहीं. चलो तुमको बचपन की सैर करा लाएं. हम एकदम सुबह से भावुकहो जाते थे. जैसे ही मम्मी कहतीं "नहाओ-खाओ-स्कूल जाओ." अनवरत आंसू झरते थे. वहांइतने मारू मास्टरों के बीच में दिन भर ऐसे रहना होता था जैसे बत्तीसी के बीच मेंजीभ. वहां जाकर कोई टीचर होमवर्क दिखाने को कहता. फिर हमारी तरफ लकड़ी का वेलफर्निश्ड पटरा लेकर बढ़ता. उसका पहला कदम उठने से पहले हम भावुक हो जाते थे. लेकिनतब दुनिया ऐसी नहीं थी बंधु. या शायद हमारे सामने कैमरा नहीं था. एक उम्र हमारीभावुकता को हमारा काहिलपना, कांइयांपन, नकारापन और ऐसे ही न जाने कितने पन समझाजाता रहा. किसी ने हमारी भावुकता को वैसे हाथोंहाथ नहीं लिया जैसे पीएम को लियाजाता है. बालपने से युवा हुए. युवा, इस देश का युवा यूज होने का दूसरा नाम है. अगरवो गर्लफ्रेंड के पापा से पैसे लेकर सिलेंडर वाली लाइन में खड़ा होने नहीं जाता तोउसे पॉलिटिकल पार्टियां यूज करती हैं. छोटे से बड़े लेवल तक. छोटी पहुंच वाले युवापार्टी के छोटे नेता से 10 रुपए का पेट्रोल डलाकर दिन भर रैली करता है. बड़ा युवामाइक थामकर भावुक बयान देता है. इस लेक्चर के लिए माफी चाहता हूं लेकिन भूमिका तोबांधनी पड़ती है न. तो भावुकता ने युवावस्था में भी हमारा साथ नहीं छोड़ा. जब लड़कीने हमारी भावनाओं को रिजेक्ट किया तो एक दिन दारू पीकर घर आ गया. तब पता चला पापातो बुजुर्ग हैं, लेकिन वो भी भावुक होते हैं. और वो भावुक होकर रोते नहीं हैं. वोभावुक होते हैं तो जूता हाथ में ले लेते हैं. और फिर मम्मी भावुक हो जाती हैं. हांमम्मी भावुक होकर रोती हैं. मम्मी रो रोकर कहती जाती हैं "रहने दो. छोड़ दो. अब मारही डालोगे क्या इसको?" इससे अंदाजा तो लग ही गया होगा कि हम खानदानी भावुक हैं. घरमें सब भावुक हैं. लेकिन जब गांव-घर के बाहर कदम रखा तो पता चला कि हम अकेले भावुकलोग नहीं हैं. भावुकता ऐसे हर शख्स की आंखों से चू रही है जैसे बरसात में कच्चा घरचू रहा होता है. आज जब टीवी पर पीएम को भावुक होते देखा तो आंसू पोंछते हुए हम भीघर से निकले. सारा देश भावुक है जी. घर से निकलते ही मौसमी का जूस बेचने वाला मिला.वैसे उसके ठेले पर सुबह से भीड़ रहती थी. आज सिर्फ भावुकता खड़ी है. वो आंसू नहींला सकता आंखों में. सोच लेता है कि "मेरे अकेले का दुख तो है नहीं. सब लोग तो नहींरो रहे." अगर वो टीवी देख रहा होता तो उसको पता चलता कि नहीं, कुछ लोग भावुक होकरआंसू भी बहाते हैं. लाइनों में लगे लोग भावुक हैं. पीएम के फैसले से आधे खुश हैं.कहते हैं कि "नोटबंदी का फैसला अच्छा था, बस तैयारी में कच्चा था." लेकिन उनकीभावुकता का कोई खास मोल नहीं है. क्योंकि वो लाइन में हैं. ऑनलाइन नहीं. अगर वोऑनलाइन होते तो वो ऐप पर जाकर सर्वे में हिस्सा ले सकते थे. और आधा खुश होने कीबजाय 93 परसेंट खुश हो सकते थे. इस हिसाब से उसी की भावुकता वेरीफाइड है जो ऑनलाइनहै. जो लाइन में है, उसे तो रोने का भी हक नहीं. भाईसाब भावुक तो पूरा देश हैहमारा. एक खोजोगे हजार मिलेंगे. "जा सिमरन जा, जी ले अपनी जिंदगी" वाला सीन देखकरभावुक हो जाते हैं हम. फिल्मों के आखिर में जब सब अच्छा हो जाता है तो भावुक होतेहैं. लाल बत्ती पर कंधे पर मरियल सा बच्चा चिपकाए भिखारन को देखकर भी भावुक होतेहैं. अगर कोई गाड़ी ज्यादा स्पीड पोंकती बगल से निकल जाए तो भावुक होकर गरिया देतेहैं. लेकिन इस भावुकता में वो बात नहीं है. इस भावुकता की कोई औकात नहीं है. पहलेभावुक होने की योग्यता अर्जित करो. फिर तुम्हारे रोने पर तुमको डिफेंड करने के लिएपीछे भारी भीड़ खड़ी होगी.--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ें: शादी के लिए पैसे निकालना चाहते हो तो तैयार रहो इन शर्तों के लिए!दुनिया को एक करना है तो नोट फूंक दो, सिक्के गला दो