'मीस कौल मारातारू कीस देबू का हो'
भारत की एक विलुप्तप्राय परंपरा 'मिस्ड कॉल' के अस्तित्व पर बढ़ते संकट की तरफ ध्यान दिला रहे हैं पुंज प्रकाश.
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फोटो - thelallantop
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हर आम खास की पहुंच में मोबाइल फोन आए महज डेढ़ दशक हुए हैं. इतने ही वक्त में सोसाइटी में मेजर चेंजेज़ आए हैं. न जाने कितने ट्रेंड चले कितने टेक्नोलॉजी की सुनामी में बह गए. उन्हीं मे से एक परंपरा है मिस कॉल मारने की है. करने की नहीं, मारने की. अब ये विलुप्त होने की कगार पर है. उसी पर चिंता जाहिर कर रहे हैं पुंज प्रकाश. पुंज प्रकाश लेटेस्ट तकनीकों से लैस मल्टीमीडिया इंसान हैं. NSD दिल्ली से इनका पुराना नाता है.
मोबाइल फोन जब नया - नया आया था और मध्य या उसके नीचे के वर्ग के हाथों में पहुंचा अथवा पहुँच रहा था, तो कुछ लोगों ने कड़ी मेहनत करके "मिस्ड कॉल एक्सपर्ट" की डिग्री हासिल की थी। वो किसी जादूगर की तरह इतनी सफ़ाई से मिस्ड कॉल मारते थे कि उनकी इस कला पर अच्छे से अच्छा मिस्ड कॉल उठाऊ लोग भी वाह - वाह कर उठते थे। इसी काल में कुछ लोगों ने मिस्ड कॉल उठाऊ की डिग्री भी हासिल किए। उनकी भी यह कला किसी पिसी सरकार से कम तो नहीं ही था। पिद्दी से पिद्दी मिस्ड कॉल उठा लेने में उन्हें ऐसी महारथ हासिल हो गई थी कि अच्छे से अच्छा मिस्ड कॉल मारक इन्हें मिस्ड कॉल मारने से घबराता था। किसी दिन यदि इन्हें कोई मिस्ड कॉल मार लेता था तो वह किसी उपलब्धि से कम तो नहीं ही मानी जाती थी। ठीक उसी वक्त मोबाइल फोन में एक सपोर्टिंग गैजेट नुमा एक क्रांतिकारी आविष्कार नुमा एक चिप अवतरित हुआ था। एक छोटा सा भगजोगनीनुमा चीज़, जिसे मोबाईल के पीछे चिपका भर देना होता था और वह मोबाईल रिंग होने से पहले ही जलने लगता था। मोबाइल का मालिक सतर्क हो जाता और फोन रिंग होते ही झट से कॉल उठा लेता। हमारे एक परम मित्र हैं। हम सब उन्हें प्रेम से मिस्टर एलडी बाबू कहते हैं। अब इस एलडी का क्या मतलब है, मत पूछिएगा। क्योंकि सार्वजनिक तौर पर हम बता नहीं सकते और यदि बता दिया तो आप सहन नहीं कर पाएंगें और यदि हमने बता दिया और आपने सहन जैसा कुछ कर लिया तो हमारी जो बड़ी ही मेहनत से बनाई "शराफत के चौकीदार" की इमेज से, उसका किला भड़भड़ा के ज़मींदोह हो जाएगा। तो शराफत बहुत कुछ जान लेने में नहीं है बल्कि शराफ़त है कुछ जानने और कुछ न जानने में; या फिर जान बूझकर अनजान बने रहने में। वैसे भी चाचा सर्वेश्वरदयाल सक्सेना कहते हैं कि - "कुछ भी ठीक से जान लेना, खुद से दुश्मनी ठान लेना है।" अब जब बड़े बुज़ुर्ग कुछ कहते हैं तो दिल न करते हुए कुछ बातें मान ही लेनी चाहिए। वो जो कहते हैं, अपने अनुभव की अनुभूति से ही तो कहते हैं। अनुभव गलत हो सकता है, अनुभूति का गलत होने का चांस कम होता है। वैसे भी अच्छी प्रेम कविताएँ, कहानियां, उपन्यास, नाटक आदि इत्यादि अमूमन लेखक सठियाने के बाद ही लिख पाता है। शायद तब तटस्थता भाव आ जाता होगा और प्रेम की गंगा में सराबोर करने की "बीज" शक्ति भी बढ़ जाती होगी। जो भी हो। बिना साठियाए उस अनुभूति का वर्णन करूँ भी तो कैसे? वैसे सठियाने की कोई उम्र नहीं होती या क्या पता होती भी हो। वैसे क्या जवानी में सठियाया नहीं जा सकता? बिलकुल जा सकता है। लोग कहते हैं कि कुछ लोग पैदा ही ऐसे होते हैं। बहरहाल, बात एलडी बाबू की। एलडी नामक शब्द से प्रेरणा लेकर एक शब्द और बना एलडीगिरी। एलडी संज्ञा बना और एलडीगिरी कर्म। इन दोनों शब्द और इसके भावार्थ से कुछ लोग बड़ी ही अच्छी तरह वाकिफ हैं और उचित मौकों पर इसका प्रयोग भी करते रहते हैं। जो वाकिफ़ नहीं भी हैं, वो भी इस संज्ञा और कर्म से अछूते तो बिलकुल ही नहीं हैं। तो एलडी बाबू का ज़िक्र यहाँ इसलिए क्योकि मिस्ड कॉल मारने में इनका कोई जवाब ही नहीं होता। ये इतनी सफाई से मिस्ड कॉल नामक इस जादू को अंजाम देते कि हमारी सारी इन्द्रियां और कुछ एक्स्ट्रा इन्द्रियां भी खुली की खुली और बंद की बंद रह जाती।
मोबाइल फोन जब नया - नया आया था और मध्य या उसके नीचे के वर्ग के हाथों में पहुंचा अथवा पहुँच रहा था, तो कुछ लोगों ने कड़ी मेहनत करके "मिस्ड कॉल एक्सपर्ट" की डिग्री हासिल की थी। वो किसी जादूगर की तरह इतनी सफ़ाई से मिस्ड कॉल मारते थे कि उनकी इस कला पर अच्छे से अच्छा मिस्ड कॉल उठाऊ लोग भी वाह - वाह कर उठते थे। इसी काल में कुछ लोगों ने मिस्ड कॉल उठाऊ की डिग्री भी हासिल किए। उनकी भी यह कला किसी पिसी सरकार से कम तो नहीं ही था। पिद्दी से पिद्दी मिस्ड कॉल उठा लेने में उन्हें ऐसी महारथ हासिल हो गई थी कि अच्छे से अच्छा मिस्ड कॉल मारक इन्हें मिस्ड कॉल मारने से घबराता था। किसी दिन यदि इन्हें कोई मिस्ड कॉल मार लेता था तो वह किसी उपलब्धि से कम तो नहीं ही मानी जाती थी। ठीक उसी वक्त मोबाइल फोन में एक सपोर्टिंग गैजेट नुमा एक क्रांतिकारी आविष्कार नुमा एक चिप अवतरित हुआ था। एक छोटा सा भगजोगनीनुमा चीज़, जिसे मोबाईल के पीछे चिपका भर देना होता था और वह मोबाईल रिंग होने से पहले ही जलने लगता था। मोबाइल का मालिक सतर्क हो जाता और फोन रिंग होते ही झट से कॉल उठा लेता। हमारे एक परम मित्र हैं। हम सब उन्हें प्रेम से मिस्टर एलडी बाबू कहते हैं। अब इस एलडी का क्या मतलब है, मत पूछिएगा। क्योंकि सार्वजनिक तौर पर हम बता नहीं सकते और यदि बता दिया तो आप सहन नहीं कर पाएंगें और यदि हमने बता दिया और आपने सहन जैसा कुछ कर लिया तो हमारी जो बड़ी ही मेहनत से बनाई "शराफत के चौकीदार" की इमेज से, उसका किला भड़भड़ा के ज़मींदोह हो जाएगा। तो शराफत बहुत कुछ जान लेने में नहीं है बल्कि शराफ़त है कुछ जानने और कुछ न जानने में; या फिर जान बूझकर अनजान बने रहने में। वैसे भी चाचा सर्वेश्वरदयाल सक्सेना कहते हैं कि - "कुछ भी ठीक से जान लेना, खुद से दुश्मनी ठान लेना है।" अब जब बड़े बुज़ुर्ग कुछ कहते हैं तो दिल न करते हुए कुछ बातें मान ही लेनी चाहिए। वो जो कहते हैं, अपने अनुभव की अनुभूति से ही तो कहते हैं। अनुभव गलत हो सकता है, अनुभूति का गलत होने का चांस कम होता है। वैसे भी अच्छी प्रेम कविताएँ, कहानियां, उपन्यास, नाटक आदि इत्यादि अमूमन लेखक सठियाने के बाद ही लिख पाता है। शायद तब तटस्थता भाव आ जाता होगा और प्रेम की गंगा में सराबोर करने की "बीज" शक्ति भी बढ़ जाती होगी। जो भी हो। बिना साठियाए उस अनुभूति का वर्णन करूँ भी तो कैसे? वैसे सठियाने की कोई उम्र नहीं होती या क्या पता होती भी हो। वैसे क्या जवानी में सठियाया नहीं जा सकता? बिलकुल जा सकता है। लोग कहते हैं कि कुछ लोग पैदा ही ऐसे होते हैं। बहरहाल, बात एलडी बाबू की। एलडी नामक शब्द से प्रेरणा लेकर एक शब्द और बना एलडीगिरी। एलडी संज्ञा बना और एलडीगिरी कर्म। इन दोनों शब्द और इसके भावार्थ से कुछ लोग बड़ी ही अच्छी तरह वाकिफ हैं और उचित मौकों पर इसका प्रयोग भी करते रहते हैं। जो वाकिफ़ नहीं भी हैं, वो भी इस संज्ञा और कर्म से अछूते तो बिलकुल ही नहीं हैं। तो एलडी बाबू का ज़िक्र यहाँ इसलिए क्योकि मिस्ड कॉल मारने में इनका कोई जवाब ही नहीं होता। ये इतनी सफाई से मिस्ड कॉल नामक इस जादू को अंजाम देते कि हमारी सारी इन्द्रियां और कुछ एक्स्ट्रा इन्द्रियां भी खुली की खुली और बंद की बंद रह जाती।
रिलायंस के स्मार्ट का ज़माना था और बीएसएनएल का सिम हासिल कर लेना मैट्रिक के आयरन गेट वाली डिग्री को हासिल कर लेने से कम कठिन कार्य नहीं था। बीएसएनएल के इतने नखरे कि उतने में मेनका, रंभा, उर्वशी धरती पर आके ता थैया करने लगें। घंटो लाइन में लगके, पता नहीं कितने प्रकार के कागज़ और फोटो जमा करके, हफ़्तों दर हफ़्तों इंतज़ार करने के बाद भी जिन्हें बीएसएनएल का सिम कार्ड हासिल हो जाता उनकी गिनती मिल्खा सिंह और पीटी उषा में होने लगती। बीएसएनएल के सिम कार्ड का मालिक होना किसी जर्मन शेफर्ड के मालिक होने से कम गुमान की बात नहीं थी। अब यह किसे पता था कि भविष्य के गर्भ में बीएसएनएल - भाई साहेब नहीं लगेगा, हो जानेवाला था।खैर, तो एलडी बाबू कमाल की मिस्ड कॉल मारते और चूंकि हम सबमें थोड़ी बहुत कमाई वही करते थे तो फ्री कॉलिंग का पैक भी उन्हीं के मोबाईल में होता। यह फ्री कॉल पैक मिस्ड कॉल की कला पर पहला पूंजीवादी हमला था। मिस्ड कॉल करना और मिस्ड कॉल उठा लेना, यह सबकुछ टॉम और जेरी से कुछ कम मज़ेदार नहीं था। लेकिन स्मार्टफोन के आगमन, कॉल दरों का सस्तापन, और वाट्सअप - फेसबुक के पुरज़ोर आक्रमण ने इस "महान" कला और खेल को लगभग लुप्त सा कर दिया है। फिर भी यदि आज भी कोई मिस्ड कॉल मारता है तो उसे कोटि - कोटि नमन करने का दिल करता है। हाँ, टेलीकॉम विभाग ने कभी कोई मिस्ड कॉल मारक और उठाऊ की डिग्री नहीं बांटी, इसलिए यदि कोई केजरीवाल मानसिकता से ग्रसित होकर डिग्री की मांग करता है तो वह देशद्रोही है और कला और जादू विरोधी भी। हालाँकि दुनियां का बड़े से बड़ा इंजीनियर के मुंह पर पान, गुटखा और खैनी का पीक थूकते हुए मिस्ड कॉल नामक इस महान विधा ने जवानी में कदम रखने से पहले ही दम तोड़ा दिया। लेकिन इसकी चर्चा परसाई चच्चा के "एक हसीना पांच दीवाने" की हसीना से कम हसीन नहीं है। यह कला न होती तो गाने बजाने में कई महान और क्रांतिकारी गीत नहीं रचे गए होते। मसलन - तोरा माई के मिस कौल मार देनी रे गलती से या मिस कौल मारा तारु कीस देबू का हो या लौंडिया पटाएगें मिस कौल से। लेखक की वर्तमान पहुँच हिंदी और भोजपुरी तक है इसका यह अर्थ कत्तई नहीं कि देश की अन्य महान भाषाओँ और बोलियों में मिस्ड कॉल नामक इस महान विधा के सौंदर्य का वर्णन करते हुए गीत - संगीत न रचे गए होंगें। निश्चित रूप से ही रचे गए होंगें। वैसे भी देश की किसी भी भाषा और बोली में कालिदासिया बवासीर और हनी सिंह भोकन्दर से पीड़ित लोगों की कभी कोई कमी रही ही नहीं। हर शहर में एक से एक ताकतवाला क्लीनिक हैं लेकिन यह रोग घटने के बजाय दिन ब दिन और बढ़ ही रहा है। केवल यह ही क्यों इन महान रचनाओं का रसास्वादन करने वाले लोग या लोगनुमा वस्तु की संख्या में भी दिन दोगुनी और रात चौगुनी तरक्की हो रही हैं। छठ, दुर्गा पूजा, सरस्वती पूजा आदि पावन अवसरों पर ऐसे गीतों का किसी लुंगी छाप डीजे के सहयोग से सामूहिक और तेज़ आवाज़ में सुनने - सुनाने की कला तो लाउडस्पीकर के आगमन काल से ही जारी है। यह बात अलग है कि पहले "कटहर के कोवा तू खाइबू, त ई मोटका मुंगरवा के खाई" नामक "भक्ति" संगीत बजता था और अब "तोरा माई के मीस कौल मार देनी रे, गलती से" बजता है। वैसे भक्तिरस का मज़ा और दोगुना हो जाता है जब इसी धुन पर कुछ शब्दों को फेर बदलकर सच में भक्ति रस की सृष्टि की जाती है। जैसे मूल गाना है - "तोरा माई के मीस कौल मार देनी रे, गलती से" अब इसी तर्ज़ पर भक्ति गीत रचा गया - "देवी माई के मीस कौल मार देनी रे, गलती से।" अब किसी मंदिर के प्रांगण में यह गीत बज रहा हो और ऑरिजिनल गीत के बोल भी साथ ही साथ कान या दिमाग (यदि है तो) में बजने लगे - तब? आएगा न पटियाला पैक में कॉकटेल का मज़ा?

