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ऐसी क्रांति के समय हमें क्या करना चाहिए?

कल को नाती-पोते पूछेंगे तब आप क्या कर रहे थे, तो मैं क्या कहूंगा, ऑफिस के Wi-Fi से वीडियो डाउनलोड कर रहा था?

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16 फ़रवरी 2016 (अपडेटेड: 16 फ़रवरी 2016, 05:03 PM IST)
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जब सारा देश क्रांति की ज्वाला में धधक रहा है. मैं समोसे में आ पड़े कच्चे मटर बीन कर फेंक रहा हूं. ये कितनी घातक स्थिति है. कल को जब नाती-पोते पूछेंगे कि 'उस वक़्त' आप क्या कर रहे थे, तो मैं क्या बताऊंगा? ऑफिस के वाई-फाई से मुफ्त में वीडियो डाउनलोड कर रहा था? या रिक्शे वाले से लड़ रहा था कि वो गोल चक्कर की बजाय 30 रुपये में गली नंबर छह तक छोड़ दे. मैं आज कल बहुत शर्मिंदा रहता हूं. अफज़ल के लिए नहीं. वो तो आतंकी था. मैं शर्मिंदा हूं क्योंकि मैं पार्टी नहीं बन पा रहा हूं. लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी से 3 साल में बी.ए. पास न कर पाने वाला दोस्त JNU पर डेढ़ किलोमीटर का व्याख्यान गोंच देता है. और मैं क्रांति का हिस्सा बनने की बाट ही देखता रह जाता हूं. जिस लड़की ने सिर्फ देखकर मुस्कुरा देने पर दर्जनों लड़कों को अपने मौसी के बेटों से पिटवा दिया वो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हैशटैग चला रही है. मुझे उस लड़की के लिखने से कभी कोई समस्या नहीं रही. मैं तो बस उन दर्जनों पिटने वाले लड़कों में एक था. क्रांति का हिस्सा बनने की राह में रोड़े भी बहुत हैं. आप मन बनाकर कोई पाला पकड़ो और उधर वीडियो फर्जी निकल जाता है. चौथा विश्व युद्ध वीडियोज से ही लड़ा जाएगा. तीसरा टीवी पर न्यूज चैनल्स की डिबेट्स में लड़ा ही जा रहा है. JNU को देख कभी-कभी रोना भी आता है. वहां के हालात पर नहीं. ये देखकर कि जितने दिन से वहां बवाल चल रहा है उतने दिन में हमारे इंजीनियरिंग कॉलेज में दो सेमेस्टर एक्जाम हो जाते. इंजीनियरिंग वाले कभी क्रांति नहीं ला सकते. वो मिड सेम और प्रैक्टिकल में ही खर्च हो जाते हैं. मैं समोसे से मटर निकालने में खर्च हो जाऊंगा.

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