नकलता के महावन में नकली पनीर अमर बेल है!
मुझे यह कतई समझ में नहीं आता कि दिल्ली में रहने वाले नकली पनीर से क्यों डरते हैं. उनकी तो हवा भी ऐसी है कि अच्छे-अच्छे फेफड़ों की हवा निकाल दे. और पानी? मिस्टर इंडिया में मोगैम्बो जिस पूल में डुबोकर गद्दारों को मारता था उसमें लक्ष्मी नगर का ही पानी भरा होता था.

सामने से आती उस एम्बुलेंस को सिर्फ मैंने नहीं देखा. जेब से झांकती 30 सेंटीमीटर की पटरी भी उससे मुखातिब हुई. भीतर कोपभवन में दुबकी दो कलमों ने भी उसे महसूस किया. परीक्षा के लिए और कोई औजार मेरे पास था भी नहीं. और हिंदी की परीक्षा के लिए इससे ज्यादा उपकरणों की जरूरत भी मुझे नहीं थी.
परीक्षा चाहे हिंदी की हो या एपीआरओ की, अपने उपकरणों से ज्यादा भरोसा मैंने अपने दोस्तों पर किया. कई मौकों पर मैंने सेंटर पर जाकर ही नए और ताज़ातरीन दोस्त बनाए. आम एम्बुलेंसों की तुलना में उस गाड़ी की रफ्तार कुछ मंद थी क्योंकि उसे किसी की जान बचाने की जल्दी नहीं थी. राजकीय कॉलेज के ठीक बराबर में स्थित मुर्दाघर के गेट पर आकर वो एम्बुलेंस रुकी. दरवाजे से बह रही थी पानी की धार. भीतर लाश के साथ बर्फ भी थी, जिसे खरीदते हुए किसी ने भी असली-नकली की पहचान नहीं की होगी.
नकली बर्फ की पहचान कैसे की जा सकती है? नकली होकर भी उस बर्फ ने अपना काम किया. लाश को जिंदा रखा. ठीक एक दिन पहले भूगोल की परीक्षा में लिखे मेरे सारे जवाब भी नकल मारकर लिखे गए थे यानी ‘नकली’ थे. लेकिन उस रोज बर्फ ने अपना काम किया और दो महीने बाद मेरे लिखे उत्तरों ने. लाश और मैं दोनों पास हो गए. उस रोज मैंने नकलता को जाना. उसके महत्व को समझा. और यह सीखा कि अगर आप किसी के काम आ रहे हैं तो नकली होने में कोई बुराई नहीं है. अगर यह क्षमादान बर्फ और भूगोल को मिल सकता है तो पनीर को क्यों नहीं?
बाजार में हड़कंप है. हर कोई व्याकुल है. ऋषियों के यज्ञ में मानो किसी ने हड्डियां फेंक दी हों. चप्पलों से कुचल दी गई हैं चीटिंयों की बांबियां और बरसात से खेत में ही बिखर गई है सरसों की फसल. मेढकों ने मोड़ लिया है मुंह संभोग से और पड़ गया है सूखा. इस अन्याय पर सब चुप हैं. सुरक्षित महसूस कर रहे हैं वीगन और थम नहीं रही कार्निवोरसों की हंसी. खौफ में हैं मुर्गियां और बकरों की पत्नियां क्योंकि शाकाहारियों के भीतर पैदा हुआ है शंका का बीज. और बाजार में बिकने वाले ठंडे, मुलायम, नर्म, नम और सफेद पनीर को घोषित कर दिया गया है 'नकली'.
विकल्पों के अभाव से जूझ रहे शाकाहारियों के पास पनीर ही इकलौती ऐसी चीज थी जिसे महाजुटानों में आगे कर दिया जाता था. लेकिन अब उस पर भी नकली का ठप्पा लगा दिया गया है. पनीर वो अकेली लग्जरी थी जिसे खाकर निम्न मध्यमवर्गीय इतरा लेता था. लेकिन अब उसे बेसहारा कर दिया गया है. हर बार पनीर खाते हुए उसने पूरी ईमानदारी से टुकड़ों का संरक्षण किया और मटर पर निर्भरता बढ़ाई. कभी भूल से अगर एक बार में पूरा टुकड़ा खा लिया तो घंटों दुखी हुआ. ग्लानि में डूब गया.
पनीर की महिमा के बारे में लिखने के लिए उपमाओं की खोज में मुझे सिर्फ मां याद आई. राजू की मां. जो कहती थी कि 'पनीर इत्ती-इत्ती थैलियों में सोनार की दुकान पर बिकेगा'. ज़रा सोचिए, अगर कोई पांच तोला पनीर लेकर आए और वो सोना नकली निकल जाए तो उस पर क्या बीतेगी.
मुझे यह कतई समझ में नहीं आता कि दिल्ली में रहने वाले नकली पनीर से क्यों डरते हैं. उनकी तो हवा भी ऐसी है कि अच्छे-अच्छे फेफड़ों की हवा निकाल दे. और पानी? मिस्टर इंडिया में मोगैम्बो जिस पूल में डुबोकर गद्दारों को मारता था उसमें लक्ष्मी नगर का ही पानी भरा होता था. और खाना? दिल्ली का स्ट्रीट फूड सुनील पाल के हास्य जैसा है. अनुव जैन के गाने जैसा है. मध्य प्रदेश के चुनाव जैसा है. जुलाई-अगस्त की उमस जैसा है. रात को सड़कों पर हवा को चीरती हुई निकलती हैं नासा की गाड़ियां. नशे की आदी हो चुकी हैं सब्जियां. खुले गड्ढों में बो दी गई है मौत और लोग हैं कि नकली पनीर से डर रहे हैं.
क्या नकली पनीर बनाना इतना आसान है? क्या किसी की भी नकल करना आसान है? क्या परीक्षा में नकल करके पास होना आसान था? नकली पनीर में भी खर्च होते हैं संसाधन और ईंधन. लगता है मजदूरों का श्रम और ज़रदोज़ी जैसी बारीकी. इस क्राफ्ट से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता. इसे नकारा नहीं जा सकता. पत्रकारों को एक स्टोरी नकली पनीर बनाने वालों की कला और क्राफ्ट पर भी करनी चाहिए.
लोग कहते हैं कि नकली पनीर में पाम ऑयल, केमिकल और यहां तक कि डिटर्जेंट का भी इस्तेमाल किया जाता है. लेकिन इन तत्वों को मिलाकर एक ऐसा पदार्थ गढ़ना जो देखने, छूने और काफी हद तक खाने में भी असली जैसा हो, कोई बच्चों का खेल नहीं है. लेकिन फिर भी निम्न मध्यमवर्गी और शाकाहारी इस वक्त डर में हैं.
तो हे निम्न मध्यमवर्गियों एवं शाकाहारियों, मेरे पास तुम्हें देने के लिए पनीर तो नहीं है लेकिन ढाढ़स जरूर है. आपके शरीर ने बहुत कुछ झेला है. आपने वैक्सीनों को बर्दाश्त किया. आपने असफलताएं देखीं. आपने परीक्षाएं दीं. आपने पलायन किया और घर छोड़ा. आपने किसी की याद में खूब शराब पी और आज भी आप जिंदा हैं. आपने खराब कवियों को सुना. दिल्ली में दिवाली मनाई और आप अभी भी जिंदा हैं. आपका शरीर अब तैयार है. शुद्ध पनीर खाने वाले आपके सामने टिक ही नहीं सकते. उनसे आपकी कोई तुलना ही नहीं है. उसे तो कोई भी खा सकता है. नकली पनीर खाने के लिए चाहिए मजबूत कलेजा और लोहे का लिवर. आप गांव जाइए और चढ़ जाइए मंच पर. ललकारिए- 'क्या किसी में हिम्मत है नकली पनीर खाकर सर्वाइव करने की?'
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