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मुरादाबाद की ट्रेनो... रेखा कब आएगी?

रेखा के हाथ में एक जादू था. वो पानी भी बेस्वाद उबालती थी. शायद उसके पास कोई सीक्रेट मसाला था जिसे अच्छे-खासे खाने में डालकर एक सेकेंड में बेस्वाद बनाया जा सकता था. उसका खाना खराब था लेकिन भूख और निर्भरता का वजन उस दिन थोड़ा ज्यादा निकला. रेखा सिर्फ वही चीजें अच्छी बना पाती थी जो उसे खुद खाने में अच्छी लगती थीं. वो आती किचन रूपी लैब में कुछ प्रयोग करती और हम चूहों को खिला देती.

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1 मई 2026 (पब्लिश्ड: 08:58 PM IST)
satire on maids
उसका रहना हमें सजीव बनाता है.
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पुष्पेश पंत कहते हैं कि जीव के जन्म से लेकर मृत्यु तक सारी लड़ाई सिर्फ दो चीज़ों की है. भोग और संभोग. एक उम्र के बाद संभोग सिर्फ हसरतों तक सिमट जाता है. लेकिन अन्नप्राशन के दूध से लेकर शव के मुंह में डाला जाने वाला तुलसीदल इस बात की पुष्टि करता है कि भोजन हमारा साथ कभी नहीं छोड़ता. 'ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत सूर्य है', विज्ञान का विद्यार्थी होने के बावजूद मैं इस सूक्ति को नकारता हूं और लौट-लौट जाता हूं 'भूखे भजन न होय गोपाला' की तरफ. भूख के लिए इंसान बंदरों सा नाचता है. नए शहर में किराए के एक कमरे और हफ्ते में दो बार सिट्रिज़ीन से ज्यादा मुझे जरूरत थी भोजन के स्थायी इंतज़ाम की और इस तरह मैं नोएडा की मेडों के अंडरवर्ल्ड में दाखिल हुआ.

घोर अंग्रेज़ीदां स्कूलों की प्राइमरी कक्षाओं के बाद ये एक ऐसा अंडरवर्ल्ड था जिसपर महिलाएं हावी थीं. इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि खाना बनाना बेहद मेहनत और सलाहियत का काम है. पेट को एब्यूज़ करते-करते एक रोज दरवाज़े पर दस्तक हुई और रेखा मेरी जिंदगी में आई.

जब मैंने पहली बार रेखा को देखा तो लगा कि कोई इसे कैसे तलाक दे सकता है. लेकिन जैसे ही उसने मुंह खोला और अधरों से चिपकी हुई राजश्री से टकराते हुए कुछ शब्द प्रस्फुटित हुए, मैं उसके पति के बारे में सोचकर मायूस हो गया. मैंने सोचा कोई इससे शादी कैसे कर सकता है. मुरादाबादी लहजे में उसने कहा- '2500 लेउंगी एक जने का'. रेखा की आवाज़ भी पीतल जैसी सख़्त थी. उसे किचन में आता देख स्टील के बर्तन भी पिघल गए. मैं मन ही मन अपने फैसले पर अफ़सोस कर रहा था. गलत फैसले लेने में मेरा कोई सानी नहीं है. काश मेरे पास भी रेखा के पति जैसा हुनर होता.

अगले दिन रेखा की पहली फिल्म रिलीज हुई. नोएडा आने के बाद मैंने बड़े पैमाने पर खराब खाना खाया है. इस शहर में कुछ भी खाकर मरा जा सकता है. बिरयानी भी और तरबूज़ भी. दरअसल सुकरात के सामने दो विकल्प थे. दूसरा नोएडा का खाना था. रेखा ने अपनी पहली रसोई में आलू और चने की सब्जी बनाई. 'आलोचना' का संधि विच्छेद. वो सब्जी खाकर मैं समझ गया कि सुकरात क्या खाकर मरे थे.

रेखा के हाथ में एक जादू था. वो पानी भी बेस्वाद उबालती थी. शायद उसके पास कोई सीक्रेट मसाला था जिसे अच्छे-खासे खाने में डालकर एक सेकेंड में बेस्वाद बनाया जा सकता था. उसका खाना खराब था लेकिन भूख और निर्भरता का वजन उस दिन थोड़ा ज्यादा निकला. रेखा सिर्फ वही चीजें अच्छी बना पाती थी जो उसे खुद खाने में अच्छी लगती थीं. वो आती किचन रूपी लैब में कुछ प्रयोग करती और हम चूहों को खिला देती. भेदभाव, छल और कपट से कोसों दूर. वो जब भी अपने लिए चाय बनाती हमें भी देती. उसने कभी हमें अकेले इंजेक्शन वाली लौकी और गोभी नहीं खाने दी. अपने घर पर भी वो बेचारी हमारी लाई हुई दूषित सब्जियां ही बनाती थी. बहुतायत वो मौन रहती. राजश्री खाते हुए बोलने का हुनर उसमें नहीं था. और जाते हुए सिंक में पिच्च से अपना वॉटरमार्क छोड़ जाती.

फिर एक रोज़ बारिश हुई. वो मेरी और रेखा की एक छत के नीचे से देखी गई आखिरी बारिश थी. परेशान रेखा पूरे घर में कुछ ढूंढ़ रही थी. वो नाराज़ थी. हम डरे हुए थे. बड़बड़ाते हुए वो बारी-बारी हर कमरे में गई. हमारे बैग चेक किए. अलमारियों को एक्सपोज़ कर दिया. असल में वो अपना छाता ढूंढ़ रही थी जिसे वो उस दिन लेकर ही नहीं आई थी. रेखा ने हम पर छाते की चोरी का बेबुनियाद आरोप लगाया. बारिश के रुकने का इंतजार किया और चली गई. उस दिन किसी ने कुछ नहीं खाया. उस दिन कोई खाना नहीं बना. ढेर सारे उलहाने देकर उसने हमें माफ़ तो कर दिया लेकिन फिर वो कभी नहीं लौटी. आज उसे गए हुए पूरा डेढ़ महीना हो गया है.  

सन्नाटा, न कूकर की सीटी है और न ही मसालों का धुआं. जीवन हो जैसे अखबार में निकला सुडोकू का खेल. न प्रेमिका का फोन रोमांचित कर पा रहा है और न पहाड़ों पर जाने की योजनाएं जो हर दिन के साथ एक-एक हफ्ता आगे खिसक जाती हैं. किसी भी गाने में अब वो पहले जैसी बात नहीं. क्या मुकेश, क्या सुखविंदर लगता है जैसे बस रेंक रहे हैं. कुचकुचाती गर्मी में भी पहली प्राथमिकता बारिश नहीं, कुछ और है. घर की याद में हर रोज़ दो की घात जुड़ जाती है.

हर चेहरा उदास है, हर कपड़े पर सिलवट है, हरा अब हरा नहीं है, कोई दवा अब असरदार नहीं है. चम्मचों पर धूल जम गई है. यूं तो बहुत से लोगों ने किचन में कदम रखे लेकिन उनमें से कोई भी किचन तक पहुंचा नहीं. स्वाद और सुगंध की ग्रंथि अब सूखने लगी है. न हंसी, न दुख, न शिकायतें कुछ सुनाई नहीं दे रहा.

भूख स्थाई अनुभूति है. भोजन एक अनवरत संघर्ष. उसे गए बमुश्किल डेढ़ महीना ही बीता होगा लेकिन ऐसा लगता है जैसे मानों उम्रें गुज़र गई हों. मुरादाबाद से आने वाली हर रेल उसकी आमद की आहट सी लगती है. ये बात भी ठीक है, इतनी उदासी क्यों, किसके लिए, किसी और के साथ भी चला जा सकता था लेकिन उसने वादा किया था कि वापस आऊंगी.

जोश मलीहाबादी का शेर है,

उस ने वादा किया है आने का
रंग देखो ग़रीब ख़ाने का

उसका रहना हमें सजीव बनाता है. क्रांति की ऊर्जा देता है. बिन उसके हम कुछ नहीं. रेखा एक दिन लौटेगी, अपने सीमित सवालों के साथ, उम्दा प्रदर्शन के साथ, चुटकी भर हाइजीन और टोकरी भर बेस्वाद लिए वो आएगी एक रोज जून में तरावट की तरह. रेखा जिसे ये बेरहम शहर 'मेड' कहता है, हम 'खाने वाली आंटी' बुलाते हैं.

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