ट्वीट करने पर इस महिला को सऊदी में जेल क्यों हुई?
सऊदी अरब के इतिहास में सबसे लम्बी सजा पाने वाली सलमा अल-शेहाब कौन हैं?

मार्च 2018 की बात है. लूजीन अल हैदलोल UAE में अपने घर में बैठी थी, जब कुछ हथियार बंद लोगों ने उन्हें किडनैप कर किया. आंखें खुली तो उन्होंने खुद को सऊदी अरब की जेल में पाया. वो अकेली नहीं थी. उनके साथ और भी कई लोग थे. इन लोगों को जिस जगह पर रखा गया था, सऊदी अरब में उसे द होटल या ‘ऑफिसर्स गेस्ट हाउस’ के नाम से जाना जाता है. यहां पहुंचने का मतलब है बेइंतिहा टॉर्चर. लुजेन की बहन आलिया ने लुजेन से मुलाकात के बाद बताया कि उसके शरीर पर जगह- जगह चोट के निशान थे, उसके हाथ हिल रहे थे, और वो ठीक से खड़ी भी नहीं हो पा रही थी.
लुजेन का जुर्म क्या था?उसने सऊदी अरब की औरतों के लिए एक अधिकार मांग लिया था- गाड़ी चलाने का अधिकार. कमाल की बात ये है कि जून 2018 में सरकार ने ये अधिकार दे भी दिया. लेकिन लुजेन की रिहाई नहीं हुई. साल 2020 में लुजेन को आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा देने और सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने के आरोप में 5 साल की सजा सुनाई गई. इस मामले पर अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने आवाज उठाई. प्रेशर बढ़ा तो मार्च 2021 में लुजेन की रिहाई हो गई. लेकिन उनके विदेश जाने पर बैन बरक़रार रहा.
इस बीच लुजेन ने अपनी बहन आलिया के जरिए पता लगाने की कोशिश की कि UAE में उसके ठिकाने की खबर सऊदी सरकार को कैसे लगी. उसने अपना फोन कनाडा में कुछ साइबर एक्सपर्ट्स को भेजा. तब पता चला कि उसके फोन की जासूसी हो रही थी. और जासूसी के लिए जिस सॉफ्टवेयर का उपयोग हुआ था, वो सऊदी अरब ने इजराइल के NSO ग्रुप से खरीदा था. NSO वही कंपनी है जिसके पेगासस स्पाईवेयर पर पिछले सालों में काफी हंगामा हुआ था.
बहरहाल सुजैन की रिहाई महिलाओं और अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए आवाज उठाने वालों के लिए एक बड़ी जीत थी. लेकिन विडम्बना देखिए कि इन्हीं लूजीन को जिस ट्वीट पर पहले सजा और फिर रिहाई मिली, उसी ट्वीट को रीट्वीट करने के लिए अब सऊदी अरब में एक महिला को 34 साल के लिए जेल में डाल दिया है.
आज जानेंगे,
-सऊदी अरब के इतिहास में सबसे लम्बी सजा पाने वाली सलमा अल-शेहाब कौन हैं?
--क्या है सऊदी अरब का गार्डियनशिप लॉ?
-साथ ही जानेंगे कहानी उस ऐप की, जो सऊदी अरब में पुरुषों को महिलाओं पर नजर रखने में मदद करता है.
पहले सिलसिलेवार ढंग से समझते हैं कि सलमा अल-शेहाब कौन है और उनके साथ हुआ पूरा घटनाक्रम क्या है?
सऊदी अरब की राजधानी है रियाद. यहां शेहाब एक यूनिवर्सिटी में लेक्चरर हुआ करती थीं. उनका मन मेडिसिन की पढ़ाई में था, इसलिए 2018 में वो ब्रिटेन चली गई.
यहां उन्होंने लीड्स यूनिवर्सिटी के PHD कोर्स में दाखिला लिया. दिसंबर 2020 में छुट्टियों के दौरान वो अपने परिवार से मिलने के लिए वापिस सऊदी अरब आई. इरादा था कि इस बार पति और बच्चों को भी साथ ले जाएगी.
अगले साल फरवरी में कॉलेज खुला तो शेहाब के दोस्तों ने पाया कि वो कॉलेज नहीं आई है.
मार्च में ब्रिटेन में कोविड लॉकडाउन लग गया. सबको लगा कि यात्रा पर पाबंदी के चलते शेहाब ब्रिटेन नहीं आ पाई होगी. 6 महीने बाद भी जब शेहाब नहीं लौटी तो उनके दोस्तों ने पता लगाने के कोशिश की. तब पता चला कि शेहाब को सऊदी सरकार ने जेल में डाल दिया है. उन पर लगे आरोपों में शामिल था कि उन्होंने लूजीन अल हैदलोल के ट्वीट को रीट्वीट किया है. रियाद के अदालत ने उन्हें 6 साल की सजा सुनाई. शेहाब ने इस फैसले के खिलाफ अपील की.
इस बार अदालत ने माना कि उनके गुनाहों के हिसाब से उनकी सजा काफी कम है. इसलिए सजा को बढ़ाकर 34 साल कर दिया. साथ ही रिहा होने के बाद और 34 सालों तक देश से बाहर जाने पर पाबंदी लगा दी गई.

अदालती आर्डर के हिसाब से शेहाब को काउंटर-टेररिज्म क़ानून के तहत सजा दी गयी है. ये क़ानून फरवरी 2014 में लागू हुआ था. क्या कहता है ये क़ानून?
इस क़ानून के मुताबिक़ कोई भी हरकत जो समाज या सरकार के लिए खतरा हो सकती है, उसे आतंकी गतिविधि माना जाएगाा. ऐसे शख्स के घर पर पुलिस रेड मार सकती है और उसके फोन और इंटरनेट एक्टिविटी को ट्रैक कर सकती है. इसी क़ानून के तहत शेहाब को 34 साल की सजा मिली है. इसके अलावा सऊदी अदालत ने उनका ट्विटर अकाउंट बंद करने की बात भी कही है. हालांकि अभी तक उनका ट्विटर अकाउंट बंद नहीं हुआ है. ट्विटर पर उनके फॉलोवर्स की संख्या लगभग ढाई हजार और इंस्टाग्राम पर 160 है. उनके अकाउंट पर नजर डालें तो अधिकतर ट्वीट्स उनके परिवार और कोविड से जुड़े हैं. उनका आख़िरी ट्वीट 13 जनवरी 2021 को किया गया था, जिसमें उन्होंने एक गाने का वीडियो पोस्ट किया था.
जिस ट्वीट पर मुकदमा चला वो क्या था?इस ट्वीट में महिलाओं के लिए जरूरी मेल गार्जियनशिप सिस्टम को ख़त्म करने के बात कही गई थी. ये सिस्टम क्या है, इसके लिए हमें साउदी अरब के कानून को समझना होगा-
सऊदी अरब में शरिया क़ानून चलता है. शरिया क़ानून के पांच अलग-अलग स्कूल हैं. इनमें से चार स्कूल सुन्नी समुदाय से जुड़े हैं -हंबली, हनफ़ी, मालिकी और शफ़'ई. इनके अलावा और एक शिया सिद्धांत है, जिसे शिया जाफ़री कहा जाता है. सऊदी अरब का क़ानून शरिया के हनबली स्कूल के हिसाब से चलता है. बाकी मुस्लिम देशों के मुकाबले सऊदी अरब के क़ानून की एक खासियत है कि ये कोडिफाइड नहीं है. यानी अदालत का फैसला पूरी तरह जजों की व्याख्या पर निर्भर करता है. इसके अलावा क़ानून का एक मुख्य पहलू है प्रेसिडेंट या नजीर. यानी नए फैसले देते हुए पुराने फैसलों को आधार बनाना. लेकिन सऊदी क़ानून में इसकी भी कोई जगह नहीं है. साल 2001 में पहली बार सऊदी क़ानून को कोडिफाइड करने की कोशिश की गई थी. इसके बाद 2007 में एक और कोशिश हुई लेकिन दोनों बार ये हो नहीं पाया. साल 2018 में सऊदी सरकार की तरफ से एक रूल बुक इश्यू की गयी. लेकिन ये रूल बुक सिर्फ पेटेंट लॉ और कॉर्पोरेट लॉ तक सीमत थी. क्रिमिनल, निजी और परिवारिक मामलों में अभी भी सब कुछ जज की नीयत पर निर्भर करता था. साल 2018 में क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान ने क़ानून में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव करते हुए कुछ नए नियम इश्यू किए. नए नियमों के अनुसार औरतों को गाड़ी चलाने का अधिकार मिला. साथ ही मेल गार्जियनशिप को भी गैर-जरूरी बना दिया गया.
मेल गार्जियनशिप का मतलब सऊदी महिलाओं को कई सारे कामों के लिए एक मेल गार्जियन की इजाजत चाहिए होती थी. महिलाओं को अकेले यात्रा की इजाजत नहीं थी, किसी सरकारी दस्तावेज़ को हासिल करने के भी भी पुरुष गार्जियन की इजाजत चाहिए थी. यहां तक कि अगर कोई सर्जरी करानी है तो भी पुरुष गार्जियन की पर्मिशन लेनी पड़ती थी. 2019 में हुए बदलाव के बाद मेल गार्जियनशिप की शर्तों को खत्म कर दिया गया. अब सिर्फ 21 साल से कम उम्र की महिलाओं के लिए गार्जियनशिप आवश्यक है.
मुहम्मद बिन सलमान के लिए ये बदलाव, ये दिखाने का तरीका था कि सऊदी अरब नई दिशा में जा रहा है. लेकिन सच्चाई क्या है, ये जानने के लिए सिर्फ एक आंकड़ा सुनिए.
सऊदी अरब के नागरिकों के अधिकारों के लिए काम करने वाली एक संस्था है, ESOHR. फुल फॉर्म है, यूरोपियन सऊदी ऑर्गनाइजेशन फॉर ह्यूमन राइट्स. ESOHR की एक रिपोर्ट के अनुसार हर साल लगभग 1 हजार महिलाएं सऊदी अरब से निकलने के कोशिश करती हैं. नए क़ानून के हिसाब से महिलाओं को देश से अकेले बाहर जाने की इजाजत है. लेकिन इनमें से कुछ ही सफल हो पाती हैं. वो भी तब, जब कोई पुरुष उन्हें इसकी इजाजत दे. मेल गार्जियनशिप का पुराना सिस्टम बैकडोर से अभी भी लागू है. और इस लागू करने के लिए उपलब्ध है एक सरकारी ऐप.
इस ऐप का नाम है एब्शर. इस ऐप के जरिए पति, पिता या भाई, यानी कोई भी मेल गार्जियन किसी लड़की को ट्रैक कर सकता है. खासकर तब जब वो महिला अपना पासपोर्ट यूज़ करने की कोशिश करे. पासपोर्ट दिखाते ही गार्जियन के पास एक अलर्ट आता है कि फलां महिला या लड़की, पासपोर्ट यूज़ कर रही है. इस ऐप का साफ़ मकसद है महिलाओं की यात्रा करने की आजादी पर निगरानी रखना. 2019 में जब ये ऐप रिलीज़ हुआ था, तब दुनियाभर के महिला संगठनों की ओर से इसके खिलाफ आवाज उठाई गई. गूगल और एप्पल से इस ऐप को उनके स्टोर से हटाने को कहा गया. लेकिन दोनों ने ये कहते हुए इंकार कर दिया कि ये ऐप उनके प्लेटफॉर्म के नियमों का उल्लंघन नहीं करता.
एक आंकड़े के अनुसार सऊदी अरब के 80% जनता ट्विटर और बाकी सोशल मीडिया पर एक्टिव है. और माना जाता है कि सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान सोशल मीडिया को एक हथियार की तरह यूज़ करते हैं. उनकी ताकत कहां तक है, इसकी एक बानगी देखिए,
साल 2019, जनवरी का महीना. अमेज़न के मालिक जेफ़ बेज़ोस ट्विटर के जरिए घोषणा करते हैं कि वो अपनी पत्नी से तलाक लेने वाले हैं. मीडिया में अगले कुछ दिन तक बेज़ोस के बैंक बैलंस का हिसाब चलता रहता है. फिर कुछ दिनों बाद एक अमेरिकी मैगज़ीन रिपोर्ट छापती है. पता चलता है कि बेजोस का एक पत्रकार से अफेयर चल रहा था. इस रिपोर्ट में बाकायदा दोनों के बीच भेजे गए मेसेज भी छापे गए थे. इतने बड़े आदमी के प्राइवेट मेसेज लीक कैसे हो गए, ये बड़ा सवाल था.
बेजोस ने तहकीकात का जिम्मा एक सिक्योरिटी कंपनी को सौंपा. कंपनी ने बेजोस के फोन की जांच की. तब पता चला कि इस लीक के तार सऊदी अरब से जुड़े थे. साल 2018 में अमेज़न सऊदी अरब में 3 डेटा सेंटर बनाने वाली थी. क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान के लिए ये एक बड़ी जीत थी. फिर उसी साल सऊदी पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या हो गई, जिसमें मुहम्मद बिन सलमान का नाम आया. खशोगी तब वाशिंगटन पोस्ट के लिए काम कर रहे थे. और वाशिंगटन पोस्ट के मालिक जेफ़ बेजोस थे. FTI कन्सल्टिंग नाम की कंपनी इस मामले की जांच कर रही थी. पूरी जांच के बाद उन्होंने पाया कि मुहम्मद बिन सलमान के इशारे पर बेजोस के मेसेज लीक हुए. हालांकि इस मामले में दावा ये भी किया गया कि सबूत पुख्ता नहीं हैं, लेकिन बेजोस अपने रुख पर कायम रहे.
अब इस केस का एक और पहलू देखिए जो सलमा अल-शेहाब की धार्मिक पहचान से जुड़ा है. शेहाब शिया समुदाय से आती हैं, जो सऊदी अरब में अल्पसंख्यक हैं. सऊदी अरब सरकार का शियाओं की बेवजह गिरफ्तारी और उत्पीड़न का लम्बा रिकॉर्ड रहा है. सऊदी अरब मृत्यु दंड की सजा के लिए भी भी कुख्यात है. एक रिपोर्ट के अनुसार साल 2022 के पहले 6 महीनों में ही सऊदी अरब सरकार 120 लोगों को मृत्यदंड दे चुकी है. ये संख्या पिछले दो सालों की कुल संख्या से भी ज्यादा है.
इनमें से 81 लोगों को मार्च महीने में एक ही दिन में फांसी पर चढ़ा दिया गया था. मारे गए लोगों में से अधिकतर शिया समुदाय से आते थे. ESOHR की रिपोर्ट के अनुसार 81 में से 58 लोगों को जिन मामलों में फांसी हुई, वो सिर्फ चोरी-चकारी जैसी मामूली घटनाएं थी. और इनमें से भी 41 ऐसे थे जिन्होंने लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनों में हिस्सा लिया था. इस डर से कि इन लोगों को शहीद का दर्ज़ा मिलेगा, प्रदर्शन और भड़केंगे, इनमें से किसी का शरीर भी उनके परिवार को नहीं सौंपा गया.
अब आखिर में बात ट्विटर की, जिस पर इस मामले में उंगलियां उठ रही हैं. ट्विटर के इन्वेस्टर्स में से एक नाम है, पब्लिक इन्वेस्टमेंट फंड, PIF. ये सऊदी सरकार का फंड है जो सरकार के बिहाफ पर इन्वेस्टमेंट करता है. PIF के अध्यक्ष हैं, क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान. इसी के चलते ट्विटर पर आरोप लगता रहा है कि उसके कामकाज पर क्राउन प्रिंस का सीधा दखल है. इसी साल जुलाई महीने में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने सऊदी अरब का दौरा किया था. और वो क्राउन प्रिंस से भी मिले थे. तब मानवाधिकार संगठनों ने चेताया था कि इससे मुहम्मद बिन सलमान के मंसूबों को और बल मिलेगा. बाइडन कई बार कह चुके हैं कि वो जमाल खशोगी की हत्या के लिए क्राउन प्रिंस को दोषी मानते हैं. लेकिन इसके बावजूद हथियारों की डील और तेल के लालच में उन्होंने क्राउन प्रिंस से हाथ मिलाया. नतीजा सामने है. महज दो हफ्ते बाद सऊदी अरब ने एक औरत को महज ट्वीट करने के लिए 34 साल के लिए जेल में डाल दिया. साफ़ नजर आता है कि मुहम्मद बिन सलमान जिन सुधारों की बात करते हैं, उनका जमीन पर उतरना अभी काफी दूर की कौड़ी है.
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