साध्वी प्रज्ञा, इंडिया टुडे के राहुल कंवल के साथ एक बातचीत के दौरान गाय के ऊपरहाथ फेरती हैं और उसके फायदे गिनाती हैं. वो ये भी बताती हैं कि गाय की पीठ पर एकविशेष तरीके से ही हाथ फेरना चाहिए. इसका डेमो देते हुए कहती हैं - जैसे ही अपनयहां से इनको ऐसे हाथ प्रतिदिन अगर घुमाते हैं तो बीपी हमारा कंट्रोल हो जाता है.आपको मालूम है ये? और... गौशाला में सबसे अच्छी साधना होती है... तपस्या होती है...ग़लत कह रही हूं क्या? [Sic] पीछे से उनके समर्थक उनकी बात पर हामी भरते हैं, इससेउनका जोश और बढ़ जाता है और फिर वो केवल बीपी पर ही नहीं रुकती बल्कि अबकी कैंसर तकजा पहुंचती है- मैं, कैंसर की पेशेंट... मैंने गोमूत्र से और पञ्चगव से बनी औषधियोंसे अपने को ठीक किया... अपना कैंसर ठीक किया है. [Sic] पञ्चगव का अर्थ भी उन्होंनेएक्सप्लेन किया- गौ घृत, गौ दुग्ध, गौ मूत्र, गोबर और दही. इसके बाद राहुल कंवललॉजिकल बातें करने लगते हैं. जो शायद ही साध्वी को पसंद आई होंगी. लेकिन चुनावीमाहौल में शायद साध्वी ने संयम से काम लिया होगा और अतार्किक लेकिन संयमित जवाबदिया होगा. राहुल पूछते हैं - डॉक्टर लोग कहेंगे कि ये कैसी बातें कर रही हैंसाध्वी जी. साध्वी उत्तर देती हैं- ये, मैं प्रत्यक्ष प्रमाण हूं इसका भी. [Sic] अब साध्वी की इस बात को केवल हंसी में उड़ाना मुझे बहुत असंवेदनशील लगता है. मुझेउनकी पूरी बात ही निहायत घटिया और असंवेदनशील लगती है और मैं प्रत्यक्ष प्रमाण हूंइसका.मैं एक घटना आपको बताता हूं उस बंदे का नाम भी नहीं बदल रहा हूं. - मेरा पड़ोसीथा. अरविंद नाम था. मैं सेकंड फ्लोर में रहता था, वो मुझसे ऊपर थर्ड फ्लोर में.मुझसे उसकी कभी बात नहीं हुई. लेकिन मेरी बीवी और उसकी बीवी अच्छी दोस्त बन गईंथीं. दोनों एक साथ जिम जाती थीं. अरविंद के दो छोटे-छोटे बच्चे थे. चूंकि मेरी छत,उनकी फर्श थी तो बच्चों की धमाचौकड़ी की आवाज़ें देर रात तक आती थीं. अभी कुछ दिनोंपहले मुझे पता लगा कि अपने अर्ली थर्टीज़ में जी रहा वो बंदा अब नहीं रहा. होने कोमुझे 2-3 महीने पहले पता चल गया था कि उसे कैंसर है. लेकिन चूंकि मुझसे लगता था किकैंसर क्यूरेबल भले ही न हो लेकिन औषधियों से जीवन को बढ़ाया ज़रूर जा सकता है, इसलिएडिटेक्ट होने के केवल दो ही महीने में उसकी मृत्यु हो जाने पर मुझे दुःख और आश्चर्यदोनों हुए. अब ऊपर से आवाज़ें आना बंद हो गयी हैं. बहरहाल मेरा उद्देश्य आपको इमोशनलकरना नहीं, फैक्ट्स से अवगत कराना है. तो हुआ क्या कि जब मैं अपने मकान मालिक कोकिराया देने पहुंचा तो उत्सुकतावश उनसे भी अपने 'दुखद आश्चर्य' को शेयर किया. तबजाकर शॉकिंग बात पता चली. वो ये कि जब अरविन्द को कैंसर डिटेक्ट हुआ तो वो एलोपेथीके बदले सीधे हरिद्वार चला गया. ऐसी ही किसी साधु, साध्वी के चक्कर में. मकान मालिकने मुझे बताया कि डेढ़ महीने में वो पहचान में नहीं आ रहा था. 23 किलो वजन घट गयाथा. अब कीमोथेरेपी वगैरह भी कारगर न थीं. दोस्तो इसके आगे मुझे कुछ नहीं कहनाक्यूंकि आप समझ गए होंगे कि क्यों साध्वी की बात सच या फैक्ट तो छोड़िए हास्यास्पदतक नहीं है. अब हम इस कन्वर्सेशन की इतनी ही बात करेंगे. अब बात करेंगे नरेंद्रमोदी की एक खबर की. खबर है 19 फरवरी, 2019 की. उस खबर की हैडिंग देखिए -प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाराणसी में देश के दूसरे सबसे बड़े कैंसर हॉस्पिटलका लोकार्पण किया. तो दोस्तो अब आप ही बताओ,जब गोबर और गोमूत्र से कैंसर ठीक हो जारहा है तो मोदी जी ने क्या इस हॉस्पिटल का लोकार्पण करके बेवकूफी की? आप इस पूरेमुद्दे में किसके पक्ष में हैं? मोदी के या साध्वी के. ओह! सॉरी!! ये दोनों तो एकही पक्ष के हैं. याद है न अमित शाह का हालिया बयान, साध्वी को डिफेंड करते हुए-जहां तक साध्वी प्रज्ञा का सवाल है तो कहना चाहूंगा कि हिंदू टेरर के नाम से एकफर्जी केस बनाना गया था, दुनिया में देश की संस्कृति को बदनाम किया गया, कोर्ट मेंकेस चला तो इसे फर्जी पाया गया. बेशक ये दूसरे मुद्दे पर समर्थन था. लेकिन अभीभारतीय राजनीति में इतनी परिपक्वता कहां कि खुलकर किसी एक ही बंदे की एक बात काविरोध और दूसरी का समर्थन कर सकें. फिर चाहे वो पक्ष का हो या विपक्ष का. और जिसतरह उन्हें भोपाल से टिकट मिल गया और पार्टी की लीडरशिप ने उनपर विश्वास जताया इसपर कुछ भी कहना राहुल कंवल के इंटरव्यू में पूछे गए सवाल सरीखा होगा- डॉक्टर लोगकहेंगे कि ये कैसी बातें कर रही हैं साध्वी जी. --------------------------------------------------------------------------------वीडियो देखें:हिंदी नही आती तो क्या हुआ, गाना तो आता है-