RBI गवर्नर उर्जित पटेल ने इस्तीफा दे दिया और सरकार को थैंक यू भी नहीं बोला
इस्तीफे में जो लिखा वो पढ़ने लायक है.
Advertisement

फोटो - thelallantop
Quick AI Highlights
Click here to view more
RBI गवर्नर उर्जित पटेल ने इस्तीफा दे दिया. तत्काल प्रभाव से. वजह के खाते में पर्सनल रीज़न बताया है. अपने रेज़िग्नेशन लेटर में उन्होंने अपने RBI के साथियों को धन्यवाद दिया है. और सरकार के बारे में एक शब्द नहीं लिखा है. कोई धन्यवाद नहीं, कुछ नहीं. अमूमन कोई ऐसे बेमन से ही सही सबको थैंक यू ज़रूर टिकाता है. ये रहा उनका रेज़िग्नेशन लेटर:

उर्जित पटेल का रेज़िग्नेशन लेटर.
5 राज्यों के चुनाव नतीजे 11 दिसंबर को आने है. जो भाजपा को चिंता में डालने वाले बताए जा रहे हैं. नतीजों की पूर्वसंध्या पर उर्जित पटेल का इस्तीफा बीजेपी की मुश्किलों में कुछ और इज़ाफ़ा करेगा. भले ही ये अचानक हुआ लग रहा हो पर ऐसा है नहीं. पिछले कुछ दिनों से ऐसी अटकलें बराबर लगाई जा रही थीं. आज वो अंदेशा सच साबित हुआ और उर्जित पटेल पद छोड़ गए.
नीचे डिटेल में जानिए कि वो कौन सी वजहें रहीं जिससे उर्जित पटेल को ये फैसला लेना पड़ा. सरकार बनाम RBI मामले की पूरी जानकारी हमसे लीजिए:
अभी सरकार सीबीआई के झगड़ों से उबरी भी नहीं थी कि आरबीआई का संकट आ गया. सरकार और आरबीआई की आपस में बन नहीं रही है. बातें इतनी बिगड़ चुकी थी कि कई दिनों से कहा जा रहा था कि आरबीआई के गवर्नर उर्जित पटेल इस्तीफा दे सकते हैं. मसखरे जहां सीबीआई और आरबीआई की तुक मिला रहे थे, वहीं विरोधी कह रहे थे कि मोदी सरकार तमाम बड़ी संस्थाओं को बर्बाद करने में लगी है. आरबीआई से सरकार का विवाद गंभीर क्यों है, इसका जवाब आपने कक्षा-6 की सामाजिक अध्ययन की किताब में पढ़ा था. एक लाइन होती थी. “आरबीआई सरकार का बैंकर और बैंकों का बैंकर है”. सरकार अपने ही बैंकर से उलझ जाए तो असर आप पर होगा ही. इसलिए सबसे पहले हालिया विवाद और उसकी शुरुआत कहां से हुई ये जान लीजिए.
डिप्टी गवर्नर ने कहा, सम्मान करो हमारा, वर्ना नुकसान होगा तुम्हारा

RBI के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने बैंक के स्वायत्तता की बात की और फिर हंगामा शुरू हो गया.
इस बवाल की शुरुआत 26 अक्टूबर, 2018 को हुई. उस दिन आरबीआई के डिप्टी गवर्नर डॉ. विरल आचार्य ने मुंबई में एडी श्रॉफ मेमोरियल लेक्चर दिया. आरबीआई की आज़ादी के ऊपर बात की और कहा-
फिर आई एआईआरबीईए की प्रेस रिलीज़

ऑल इंडिया रिज़र्व बैंक एम्प्लॉइज़ एसोसिएशन या अखिल भारतीय रिजर्व बैंक कर्मचारी संघ (एआईआरबीईए) की प्रेस रिलीज़ की एक प्रति.
एआईआरबीईए मतलब अखिल भारतीय रिजर्व बैंक कर्मचारी संघ. उसने एक प्रेस रिलीज़ ज़ारी की. डिप्टी गवर्नर, की बात से सहमति जताई और कहा-
सरकारें टी-20 खेलना चाहती हैं, क्योंकि वो पांच साल के लिए आती हैं. उनका कार्यकाल छोटा होता है. ऐसे में वो आरबीआई ऐसे काम करा लेना चाहती हैं, जो लोक-लुभावन हो, जनता को उससे तुरंत राहत मिले. अर्थव्यवस्था चमकीली सी नज़र आए. मौद्रिक नीतियां ऐसी हों, जो सरकार के मेनिफेस्टो को जस्टिफाई करें.
लेकिन आरबीआई टेस्ट मैच खेलना चाहती है

सरकारें अपना फायदा देखती हैं, जबकि RBI को पूरे देश की अर्थव्यवस्था देखनी होती है.
आरबीआई लंबा सोचती है. दूर की नज़र रखती है. इसलिए वो ‘चट से दवाई खाई, फट से आराम हो जाए’ वाले इलाज़ में यकीन नहीं रखती. जब आरबीआई बना, तो उसे उसके काम समझाये गए थे. कहा गया आप “वित्तीय प्रणाली के विनियामक और पर्यवेक्षक” होंगे. मतलब, देश में बैंकिंग कैसे चलेगी, इसके लिए बड़े मानदंड बनाएंगे और ये देखेंगे कि वो फॉलो हो रहे हैं या नहीं. इससे होगा क्या? जिनके पैसे जमा हैं. मतलब आम लोग, उनके हितों की रक्षा होगी. सरकार या किसी बैंक के उलटे-सीधे काम से आपके पैसे नहीं डूबेंगे. आपका बैंकों में भरोसा बना रहेगा. यही सब सोचकर कई बार आरबीआई सरकार की बातों से एग्री नहीं करती.
इस पूरे विवाद की जड़ कहां हैं?

RBI के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य (बाएं) और गवर्नर उर्जित पटेल (दाएं) दोनों एक साथ हैं और इसकी वजह से सरकार परेशान हैं.
दो महीने से तनातनी बढ़ी हुई है. अभी सरकार की तरफ से ये तक कहा जा रहा है कि आरबीआई की भी सीमाएं हैं. उसकी स्वायत्तता पर सरकार का नियंत्रण है. जनहित का हवाला दिया गया. कहा गया कि जनहित में आरबीआई को कुछ फ़ैसले लेने के लिए मजबूर भी किया जा सकता है. समस्या का मुख्य कारण बैंकों के कर्जे हैं. पिछले तीन-चार साल से सरकार और आरबीआई इस दिशा में काम कर रहे थे कि कर्ज़ ठीक हों, बैंकों को कसा जाए, कर्ज़दारों पर सख्ती हो.
ताज़ा विवाद के तीन कारण
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया और सरकार के बीच शुरू हुए विवाद की तीन प्रमुख वजहें हैं.
1. बैंकों पर सख्ती

बैंकों के एनपीए पर RBI ने सख्ती की, तो सरकार को परेशानी होने लगी.
सरकार ने पहले तो आरबीआई से ये कहा कि चलो-चलो, हम दोनों साथ में काम करेंगे. बैंकों पर कड़ाई करेंगे. रिजर्व बैंक बात मान गया, उसने 11 बैंक भी चुन लिए जिन्होंने अपनी सीमाओं से ज़्यादा कर्ज़ दिए थे. उनके पास पर्याप्त पूंजी नहीं थी, तो उन पर कड़ाई भी कर दी. कुछ नियमों में बांध दिया. कर्ज़ देने से रोका गया, शाखाएं बढ़ाने से रोक दिया. बोनस देने से रोक दिया. उनका लक्ष्य बनाया गया कि वो अपनी पूंजी जुटाएं. जून तक सरकार को भी इसमें कोई दिक्कत नहीं थी. अचानक सरकार ने गोलपोस्ट चेंज कर दिया. कहने लगी, “यार आरबीआई, तुम तो बहुत स्ट्रिक्ट हो. ये पूरी प्रोसेस बहुत कठिन है. इससे तो कर्ज़ की किल्लत हो रही है. इसमें ढील दो.”
2. बिजली क्षेत्र का कर्ज

RBI चाहती थी कि बिजली क्षेत्र का कर्ज भी बैंकों के कर्ज की तरह माना जाए, लेकिन सरकार चाहती है कि बिजली क्षेत्र का कर्ज अलग रखा जाए.
बिजली क्षेत्र के फंसे कर्जों पर विवाद है. एक साल पहले तक सरकार और आरबीआई ने तय किया कि किसी भी क्षेत्र का फंसा जो कर्ज़ा यानी NPA होगा, उसे हम एक जैसा मानेंगे. फिर सरकार को लगा नहीं यार, बिजली कंपनियों के NPA को अलग ट्रीटमेंट मिलना चाहिए. आरबीआई से कहा, दो पैमाने बनाते हैं. बाकी कर्ज़े अलग मानेंगे, पावर सेक्टर का कर्ज़ अलग. अब आरबीआई कह रहा है कि ऐसा नहीं चल सकता है.
3. नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियां

आरबीआई नॉन बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों का कर्ज खुदपर नहीं ंलादना चाहती है.
विवाद NBFC को लेकर है. माने नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियां. ऐसी कंपनियां, जिनमें पूंजी की दिक्कत है, कर्ज़ फंसा हुआ है, पैसे नहीं लौटाए गए हैं,फंड की दिक्कत है. सरकार चाहती है कि रिज़र्व बैंक ऐसी कंपनियों की भी जिम्मेदारी उठा ले. लेकिन रिजर्व बैंक कहता है कि एक बात पर टिको न. बार-बार नियम मत बदलो. और NBFC को फंड देने का सवाल तो है ही नहीं. यहां बैंक्स अपने टिके रहने के लिए पैसे नहीं जुटा पा रहे हैं तो हम NBFC को कैसे छूट दे दें. सरकार कहती है कि इस समय कर्ज़ की ज़रूरत है, अर्थव्यस्व्था गिर रही है इसलिए इस समय आरबीआई को इतनी सख्ती नहीं दिखानी चाहिए. सरकार ऐसा क्यों कह रही है. क्योंकि चुनाव सामने हैं, उसे अर्थव्यवस्था में कुछ फैंसी आंकड़े दिखाने हैं, वरना उसका चुनाव फंस जाएगा.
क्या है आरबीआई ऐक्ट का सेक्शन 7, जिसके इस्तेमाल की बात कह रही है सरकार

RBI के नियम में एक सेक्शन 7 का जिक्र है, जिसका अब तक कभी भी इस्तेमाल नहीं किया गया है.
इस पूरे विवाद में सरकार ने जब ये कहा कि जनहित में वो आरबीआई को अपनी बात मानने को बाध्य कर सकती है तो आरबीआई ऐक्ट के सेक्शन 7 का ज़िक्र होने लगा. आज तक कभी इसका यूज नहीं हुआ है. आम दिनों में सरकार बस आरबीआई को सुझाव देती है कि ऐसा कर सकते हैं या चलो यार ऐसा करके देखते हैं? लेकिन सेक्शन 7 लागू होने पर चीजें बदल जाएंगी. अगर सेक्शन 7 लागू हो जाता है तो-
# सरकार जनता के हित के लिए सरकार बार-बार गवर्नर को निर्देश दे सकती है कि क्या करना है क्या नहीं.
# कामकाज सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स को सौंप दिया जाएगा. ये लोग आरबीआई की पावर में जितने काम हैं, सब कर सकते हैं.
# काम-काज के तरीके बदल जाएंगे. क्योंकि आज तक ये सेक्शन कभी लागू नहीं हुआ. इसलिए कई बातों पर क्लियरिटी नहीं है कि वो कैसे चलेंगी.
तो अब क्या होगा?
ये जानने के लिए हमने अपने विशेषज्ञ और इंडिया टुडे हिंदी के एडिटर अंशुमान तिवारी से बात की. उन्होंने बताया-

उर्जित पटेल का रेज़िग्नेशन लेटर.
5 राज्यों के चुनाव नतीजे 11 दिसंबर को आने है. जो भाजपा को चिंता में डालने वाले बताए जा रहे हैं. नतीजों की पूर्वसंध्या पर उर्जित पटेल का इस्तीफा बीजेपी की मुश्किलों में कुछ और इज़ाफ़ा करेगा. भले ही ये अचानक हुआ लग रहा हो पर ऐसा है नहीं. पिछले कुछ दिनों से ऐसी अटकलें बराबर लगाई जा रही थीं. आज वो अंदेशा सच साबित हुआ और उर्जित पटेल पद छोड़ गए.
नीचे डिटेल में जानिए कि वो कौन सी वजहें रहीं जिससे उर्जित पटेल को ये फैसला लेना पड़ा. सरकार बनाम RBI मामले की पूरी जानकारी हमसे लीजिए:
अभी सरकार सीबीआई के झगड़ों से उबरी भी नहीं थी कि आरबीआई का संकट आ गया. सरकार और आरबीआई की आपस में बन नहीं रही है. बातें इतनी बिगड़ चुकी थी कि कई दिनों से कहा जा रहा था कि आरबीआई के गवर्नर उर्जित पटेल इस्तीफा दे सकते हैं. मसखरे जहां सीबीआई और आरबीआई की तुक मिला रहे थे, वहीं विरोधी कह रहे थे कि मोदी सरकार तमाम बड़ी संस्थाओं को बर्बाद करने में लगी है. आरबीआई से सरकार का विवाद गंभीर क्यों है, इसका जवाब आपने कक्षा-6 की सामाजिक अध्ययन की किताब में पढ़ा था. एक लाइन होती थी. “आरबीआई सरकार का बैंकर और बैंकों का बैंकर है”. सरकार अपने ही बैंकर से उलझ जाए तो असर आप पर होगा ही. इसलिए सबसे पहले हालिया विवाद और उसकी शुरुआत कहां से हुई ये जान लीजिए.
डिप्टी गवर्नर ने कहा, सम्मान करो हमारा, वर्ना नुकसान होगा तुम्हारा

RBI के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने बैंक के स्वायत्तता की बात की और फिर हंगामा शुरू हो गया.
इस बवाल की शुरुआत 26 अक्टूबर, 2018 को हुई. उस दिन आरबीआई के डिप्टी गवर्नर डॉ. विरल आचार्य ने मुंबई में एडी श्रॉफ मेमोरियल लेक्चर दिया. आरबीआई की आज़ादी के ऊपर बात की और कहा-
'जो सरकारें RBI की आज़ादी का सम्मान नहीं करतीं, वो आज नहीं तो कल बाजारों में वित्तीय खलबली पैदा करेंगी ही करेंगी. ये ‘सेल्फ गोल’ करने सरीखा है.'उन्होंने अपनी बात के पक्ष में अर्जेंटीना का उदाहरण दिया. बताया कि कैसे वहां 2010 में हुए सरकार और केंद्रीय बैंक के क्लैश से अर्जेंटीना भारी वित्तीय संकट में फंस गया था. अब आरबीआई के नंबर 2 के मुखिया अगर ऐसी बात कहते हैं तो ये बड़ी बात है. ये सीधे-सीधे सरकार के सामने खड़े होने जाने और ये 'तुम ग़लत कर रहे हो' कहने जैसा है.
फिर आई एआईआरबीईए की प्रेस रिलीज़

ऑल इंडिया रिज़र्व बैंक एम्प्लॉइज़ एसोसिएशन या अखिल भारतीय रिजर्व बैंक कर्मचारी संघ (एआईआरबीईए) की प्रेस रिलीज़ की एक प्रति.
एआईआरबीईए मतलब अखिल भारतीय रिजर्व बैंक कर्मचारी संघ. उसने एक प्रेस रिलीज़ ज़ारी की. डिप्टी गवर्नर, की बात से सहमति जताई और कहा-
'डिप्टी गवर्नर ने वो मौके याद दिलाये हैं जब सरकार ने आरबीआई की भूमिका को कम करने की कोशिश की है. इसे अपंग करना चाहा है, जिसको आरबीआई स्वीकार नहीं कर सकता.'इस पूरे प्रकरण में सरकार के टी-20 वाले रवैये की बात हो रही है. जिसका जिक्र डिप्टी गवर्नर ने किया था. इसे भी समझ लीजिए
सरकारें टी-20 खेलना चाहती हैं, क्योंकि वो पांच साल के लिए आती हैं. उनका कार्यकाल छोटा होता है. ऐसे में वो आरबीआई ऐसे काम करा लेना चाहती हैं, जो लोक-लुभावन हो, जनता को उससे तुरंत राहत मिले. अर्थव्यवस्था चमकीली सी नज़र आए. मौद्रिक नीतियां ऐसी हों, जो सरकार के मेनिफेस्टो को जस्टिफाई करें.
लेकिन आरबीआई टेस्ट मैच खेलना चाहती है

सरकारें अपना फायदा देखती हैं, जबकि RBI को पूरे देश की अर्थव्यवस्था देखनी होती है.
आरबीआई लंबा सोचती है. दूर की नज़र रखती है. इसलिए वो ‘चट से दवाई खाई, फट से आराम हो जाए’ वाले इलाज़ में यकीन नहीं रखती. जब आरबीआई बना, तो उसे उसके काम समझाये गए थे. कहा गया आप “वित्तीय प्रणाली के विनियामक और पर्यवेक्षक” होंगे. मतलब, देश में बैंकिंग कैसे चलेगी, इसके लिए बड़े मानदंड बनाएंगे और ये देखेंगे कि वो फॉलो हो रहे हैं या नहीं. इससे होगा क्या? जिनके पैसे जमा हैं. मतलब आम लोग, उनके हितों की रक्षा होगी. सरकार या किसी बैंक के उलटे-सीधे काम से आपके पैसे नहीं डूबेंगे. आपका बैंकों में भरोसा बना रहेगा. यही सब सोचकर कई बार आरबीआई सरकार की बातों से एग्री नहीं करती.
इस पूरे विवाद की जड़ कहां हैं?

RBI के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य (बाएं) और गवर्नर उर्जित पटेल (दाएं) दोनों एक साथ हैं और इसकी वजह से सरकार परेशान हैं.
दो महीने से तनातनी बढ़ी हुई है. अभी सरकार की तरफ से ये तक कहा जा रहा है कि आरबीआई की भी सीमाएं हैं. उसकी स्वायत्तता पर सरकार का नियंत्रण है. जनहित का हवाला दिया गया. कहा गया कि जनहित में आरबीआई को कुछ फ़ैसले लेने के लिए मजबूर भी किया जा सकता है. समस्या का मुख्य कारण बैंकों के कर्जे हैं. पिछले तीन-चार साल से सरकार और आरबीआई इस दिशा में काम कर रहे थे कि कर्ज़ ठीक हों, बैंकों को कसा जाए, कर्ज़दारों पर सख्ती हो.
ताज़ा विवाद के तीन कारण
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया और सरकार के बीच शुरू हुए विवाद की तीन प्रमुख वजहें हैं.
1. बैंकों पर सख्ती

बैंकों के एनपीए पर RBI ने सख्ती की, तो सरकार को परेशानी होने लगी.
सरकार ने पहले तो आरबीआई से ये कहा कि चलो-चलो, हम दोनों साथ में काम करेंगे. बैंकों पर कड़ाई करेंगे. रिजर्व बैंक बात मान गया, उसने 11 बैंक भी चुन लिए जिन्होंने अपनी सीमाओं से ज़्यादा कर्ज़ दिए थे. उनके पास पर्याप्त पूंजी नहीं थी, तो उन पर कड़ाई भी कर दी. कुछ नियमों में बांध दिया. कर्ज़ देने से रोका गया, शाखाएं बढ़ाने से रोक दिया. बोनस देने से रोक दिया. उनका लक्ष्य बनाया गया कि वो अपनी पूंजी जुटाएं. जून तक सरकार को भी इसमें कोई दिक्कत नहीं थी. अचानक सरकार ने गोलपोस्ट चेंज कर दिया. कहने लगी, “यार आरबीआई, तुम तो बहुत स्ट्रिक्ट हो. ये पूरी प्रोसेस बहुत कठिन है. इससे तो कर्ज़ की किल्लत हो रही है. इसमें ढील दो.”
2. बिजली क्षेत्र का कर्ज

RBI चाहती थी कि बिजली क्षेत्र का कर्ज भी बैंकों के कर्ज की तरह माना जाए, लेकिन सरकार चाहती है कि बिजली क्षेत्र का कर्ज अलग रखा जाए.
बिजली क्षेत्र के फंसे कर्जों पर विवाद है. एक साल पहले तक सरकार और आरबीआई ने तय किया कि किसी भी क्षेत्र का फंसा जो कर्ज़ा यानी NPA होगा, उसे हम एक जैसा मानेंगे. फिर सरकार को लगा नहीं यार, बिजली कंपनियों के NPA को अलग ट्रीटमेंट मिलना चाहिए. आरबीआई से कहा, दो पैमाने बनाते हैं. बाकी कर्ज़े अलग मानेंगे, पावर सेक्टर का कर्ज़ अलग. अब आरबीआई कह रहा है कि ऐसा नहीं चल सकता है.
3. नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियां

आरबीआई नॉन बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों का कर्ज खुदपर नहीं ंलादना चाहती है.
विवाद NBFC को लेकर है. माने नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियां. ऐसी कंपनियां, जिनमें पूंजी की दिक्कत है, कर्ज़ फंसा हुआ है, पैसे नहीं लौटाए गए हैं,फंड की दिक्कत है. सरकार चाहती है कि रिज़र्व बैंक ऐसी कंपनियों की भी जिम्मेदारी उठा ले. लेकिन रिजर्व बैंक कहता है कि एक बात पर टिको न. बार-बार नियम मत बदलो. और NBFC को फंड देने का सवाल तो है ही नहीं. यहां बैंक्स अपने टिके रहने के लिए पैसे नहीं जुटा पा रहे हैं तो हम NBFC को कैसे छूट दे दें. सरकार कहती है कि इस समय कर्ज़ की ज़रूरत है, अर्थव्यस्व्था गिर रही है इसलिए इस समय आरबीआई को इतनी सख्ती नहीं दिखानी चाहिए. सरकार ऐसा क्यों कह रही है. क्योंकि चुनाव सामने हैं, उसे अर्थव्यवस्था में कुछ फैंसी आंकड़े दिखाने हैं, वरना उसका चुनाव फंस जाएगा.
क्या है आरबीआई ऐक्ट का सेक्शन 7, जिसके इस्तेमाल की बात कह रही है सरकार

RBI के नियम में एक सेक्शन 7 का जिक्र है, जिसका अब तक कभी भी इस्तेमाल नहीं किया गया है.
इस पूरे विवाद में सरकार ने जब ये कहा कि जनहित में वो आरबीआई को अपनी बात मानने को बाध्य कर सकती है तो आरबीआई ऐक्ट के सेक्शन 7 का ज़िक्र होने लगा. आज तक कभी इसका यूज नहीं हुआ है. आम दिनों में सरकार बस आरबीआई को सुझाव देती है कि ऐसा कर सकते हैं या चलो यार ऐसा करके देखते हैं? लेकिन सेक्शन 7 लागू होने पर चीजें बदल जाएंगी. अगर सेक्शन 7 लागू हो जाता है तो-
# सरकार जनता के हित के लिए सरकार बार-बार गवर्नर को निर्देश दे सकती है कि क्या करना है क्या नहीं.
# कामकाज सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स को सौंप दिया जाएगा. ये लोग आरबीआई की पावर में जितने काम हैं, सब कर सकते हैं.
# काम-काज के तरीके बदल जाएंगे. क्योंकि आज तक ये सेक्शन कभी लागू नहीं हुआ. इसलिए कई बातों पर क्लियरिटी नहीं है कि वो कैसे चलेंगी.
तो अब क्या होगा?
ये जानने के लिए हमने अपने विशेषज्ञ और इंडिया टुडे हिंदी के एडिटर अंशुमान तिवारी से बात की. उन्होंने बताया-
'RBI के पास जादू की छड़ी तो है नहीं. पैसे और फंड बैंकों के जरिये ही आते हैं. बैंक ही फाइनेंस का काम करते हैं. बैंकों के ही पैसे NBFC वाली कंपनियों में भी फंसे हैं. जब बैंकिंग में ही चुनौती है, जो हर तरह के संसाधनों का स्त्रोत है, तो कोई दूसरा क्षेत्र कैसे तरक्की करेगा. सरकार ने चुनाव देखकर पलटी मार दी है, लेकिन आरबीआई ऐसा नहीं कर सकता है. ये जनता के साथ धोखा होगा.'अब उर्जित पटेल के इस्तीफे ने मामले को और भी संगीन बना दिया है.

