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जब जावेद अख्तर को यश चोपड़ा की ज़िद के आगे हारना पड़ा

पेश है जावेद अख्तर के बड्डे पर उनका एक लल्लनटॉप इंटरव्यू.

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17 जनवरी 2021 (अपडेटेड: 17 जनवरी 2021, 05:43 AM IST)
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जावेद अख्तर. इनका भी परिचय देना पड़े, तो भइया आपका कुछ नहीं हो सकता. उनका एक चौचक इंटरव्यू पढ़ना चाहोगे? तो पढ़ो, सिर्फ दो सवाल है -


1. आपकी जिंदगी की पहली किताब, जो पढ़ी और याद रही?

देखिए. ये जवाब देना मुश्किल है. मैंने पढ़ना शुरू कर दिया था पांच-छह साल की उमर से. ये बिलकुल सच है. मेरी मदर जो थीं, वो बहुत सारी कहानियों की किताबें देती थीं. छोटी-छोटी, पतली किताबें आती थीं. एक छोटी किताब का टाइटल आज तक याद है- मजदूर का बेटा. कहानी कुछ ऐसी है कि एक गरीब लड़का है. किस तरह पढ़ना शुरू करता है. कैसे पोस्टल लैंप के नीचे पढ़ता है. ये सब बच्चों के लिए लिखी कहानियां थीं. सबसे पहले जिन कहानियों ने असर डाला, जिन्होंने शौक पैदा किया, वो थीं. लेकिन आज सोचता हूं. उस जमाने में उपलब्ध थीं और जो अब बच्चों की कहानियां हैं, उनमें क्या फर्क है. क्या कोई मां आज के दौर में बच्चे को कोई कहानी पढ़ने को देगी, जिसका नाम होगा 'मजदूर का बेटा'?

ये तो हुई बचपन की बात. जिस घर में हम पले-बढ़े, वहां प्रगतिशील आंदोलन का बड़ा बोलबाला था. तो उम्र कुछ बढ़ने पर जो सीरियस फैन मैं हुआ, वो था कृष्ण चंदर का. मैंने अपने स्कूल और कॉलेज में कृष्ण चंदर को बहुत पढ़ा. उनका सब कुछ. पहले हिंदी और उर्दू ही पढ़ता था. अंग्रेजी नॉवेल 15-16 की उम्र में पढ़ा था. ये था के. अब्बास का लिखा हुआ 'इंकलाब'. हालांकि, तब तक मैंने और भी विदेशी भाषा के नॉवेल पढ़े थे, मगर ये सब ट्रांसलेशन थे. मसलन, गोर्की और चेखव के, जो उर्दू में थे.

2. आप तो फिल्में लिखते थे. फिर गीतकार कैसे बने?

इत्तेफाक की बात है. 78-79 में मैंने शाइरी लिखनी शुरू की. कहीं छपवाता नहीं था. कुछ लोग थे, जिन्हें मैं सुनाता था. जिनमें एक थे डॉ. राही मासूम रजा. इसके अलावा डॉ. धर्मवीर भारती और उनकी पत्नी पुष्पा जी थे. हरिवंश राय बच्चन और कैफी आजमी साहब थे. इन सबको सुनाता था.

हमारे फिल्मी दोस्तों में अमिताभ बच्चन और यश चोपड़ा थे, जो कभी-कभार श्रोता बना करते थे. उस दौरान यश चोपड़ा 'सिलसिला' करके एक फिल्म बना रहे थे. इसमें हीरो शायर था. असल में जो शायर साहब हीरो के लिए शाइरी और गीत लिखने वाले थे, वो बीमार पड़ गए. या शायद इस कहानी और फिल्म से उनका दिल ऊब गया था. तब यश जी मेरे पास आए और बोले, 'आप मेरे गाने लिख दें.'

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ये बात मुझे बहुत दिनों बाद डोगरी की साहित्यकार पद्मा सचदेव जी ने बताई. वे और धर्मवीर भारती एक ही ग्रुप में थे. तो पद्मा जी ने भी मेरी कुछ नज्में सुनी थीं. पद्मा जी ने लता मंगेशकर जी से मेरी तारीफ की थी. लता जी और यश जी भाई बहन की तरह थे. लता जी ने भी सजेस्ट किया यश जी को कि शायर दूसरा नहीं मिल रहा, तो जावेद से क्यों नहीं लिखवाते. तब यश जी मेरे पास आए. मैंने इनकार करने की बहुत कोशिश की, मगर उन्होंने मुझसे लिखवा ही लिया. फिर मुझे मजा आने लगा. और ऐसा वक्त भी आया कि स्क्रिप्ट लिखना पॉसिबल नहीं रहा. गाने लिखने में ही मसरूफ रहा. हालांकि, अब मैं वापस स्क्रिप्ट लिख रहा हूं. अभी-अभी दो खत्म की हैं.


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