साल था 2001. दिसंबर 13. कानपुर के चकेरी में मैं ठंड से कांप रहा था. पतला स्वेटरपहने अपने भाई का इंतजार कर रहा था. वो एयरफोर्स का मेडिकल देने गया था. मैं मोरलसपोर्ट बन के गया था. पर ठंड इतनी कि दिन में ही शाम हो गई थी. मैं जहां खड़ा था,वहां पेड़ थे. लोग भी नहीं थे. एक कुत्ता था. वो कभी वहीं पड़े रहता, कभी निकललेता. उसे देख के जान में जान आती. क्योंकि पर्सनली मैं भूतों पर विश्वास करता हूं.अकेले में लगता है कि कोई आ जाएगा. पर वहां से मैं हिल नहीं रहा था. क्योंकि भाई नेबोला था कि यहीं रहना. मैं आया दो घंटे में. भाई को दी गई जुबान की कीमत होती है.अगर वहां से हिला और भाई आ गया तो कैसे ढूंढेगा. उस वक्त फोन तो था नहीं.फिर हिम्मत हारकर, बड़ा सोच-विचारकर मैं उस जगह की सीध में थोड़ा चल के कॉर्नर परखड़ा हो गया. वहां कुछ लोग आग ताप रहे थे. कुछ गरमा-गरमी भी हो रही थी. मैं भी वहींखड़ा हो गया. पर जब उनकी बातें सुनीं तो ठंड खत्म हो गई. पता चला कि इंडियनपार्लियामेंट पर अटैक हुआ है. इतना बम आया था कि आधा पार्लियामेंट उड़ जाता. आधे सेज्यादा सांसद मारे जाते. अंधाधुंध गोलियां चली थीं. ये वो अटैक था जो सक्सेसफुलहोता तो दुनिया में अब तक का हुआ सबसे बड़ा हमला होता. ऐसा कभी नहीं हुआ था. एक देशकी संसद को उड़ा देना बहुत ही दुस्साहसिक काम था. वॉर से नीचे कुछ ना होता. हालांकिइतना भी कम नहीं था लड़ाई के लिए. भारत की ये अग्निपरीक्षा थी. उस दिन.लश्कर-ए-तैय्यबा और जैश-ए-मोहम्मद के ट्रेन किए 9 आतंकवादी कार में आए. कारों परहोम मिनिस्ट्री और पार्लियामेंट के लेबल लगे हुए थे. उस वक्त राज्य सभा और लोक सभादोनों स्थगित थे. पार्लियामेंट बिल्डिंग में एक साथ कई सांसद खड़े थे. आतंकवादी कारसे सीधा अंदर घुस गए. सिक्योरिटी की ये बहुत भयानक गलती थी. क्योंकि कारों में ए के47, ग्रेनेड, पिस्टल भरे पड़े थे. पाकिस्तान से सीधा कॉन्टैक्ट हो रहा था.आतंकवादी हड़बड़ी में थे. कार ले जाकर सीधा उप-राष्ट्रपति कृष्णकांत की गाड़ी मेंठोंक दिए. बाहर निकले और दनादन फायरिंग शुरू कर दी.कमांडोसीआरपीएफ की कॉन्स्टेबल कमलेश कुमारी यादव ने सबसे पहले देखा और आगाह करना शुरूकिया.पर उनको गोली लग गई और उनकी मौत हो गई. आतंकवादी फायरिंग करते रहे. पर उनका बमफटा नहीं. एक इतनी हड़बड़ी में था कि बम उसके अंदर ही पिघलने लगा था. वो तड़फड़ानेलगा था. सीआरपीएफ और पुलिस ने तुरंत मोर्चा संभाल लिया था. एक घंटा तक गोलियां चली.सारे आतंकवादी मार दिए गए. 5 पुलिसवाले भी मरे. एक माली भी मारा गया. पर बारूद कासामना करने के लिए ये सारे खड़े थे. एक भी नेता को कुछ नहीं हुआ. इन द लाइन ऑफड्यूटी मरने वालों ने ड्यूटी पूरी की थी.जब आगे जांच हुई तो चार लोग पकड़े गए. अफजल गुरु, शौकत हुसैन, गिलानी और नवजोतसंधू. नवजोत संधू को 5 साल की सजा हुई. क्योंकि उस पर जानकारी छिपाने का आरोप था.बाकी को मौत की सजा हुई. अफजल को तो फांसी हो भी गई. 12 साल बाद. गिलानी के खिलाफसबूत नहीं मिले. वो छूट गया. जबकि उसे हमले का मास्टर माइंड बताया गया था. वोदिल्ली यूनिवर्सिटी में टीचर था. शौकत को आजीवन कारावास हुआ. पर अच्छे व्यवहार कीवजह से उसे सजा पूरी होने के 9 महीने पहले ही छोड़ दिया गया.गिलानी, अफजल गुरु और शौकत हुसैन20 दिसंबर 2001 को भारत ने कश्मीर और पंजाब के बॉर्डर पर सेना को इकट्ठा करना शुरूकर दिया. 1971 की लड़ाई के बाद पहली बार इतनी संख्या में सेना इकट्ठा हुई थी. एकदमयुद्ध छिड़ने ही वाला था. पर दुनिया भर से हस्तक्षेप होने लगा. सबसे ज्यादा दबावअमेरिका की तरफ से था. क्योंकि अमेरिका में उसी साल हमला हुआ था. और वो अफगानिस्तानमें लड़ाई लड़ रहे थे. इसके लिए उनको सबसे ज्यादा पाकिस्तान की जरूरत थी. कहते हैंकि भारतीय सेना बॉर्डर पर लड़ने के लिए व्याकुल हो रही थी. पर इंतजार ने फ्रस्ट्रेटकर दिया था. ये भारत के लिए बहुत मुश्किल घड़ी थी. लोग उस घड़ी का कांटा पकड़ केझूल जाना चाहते थे. कि समय आगे ना बढ़े. आग कम ना हो. जंग हो के रहे. पर ये सच हैकि जंग से भला तो नहीं ही होता. गुस्सा निकल जाता. 5 मरे थे. और मरते. कैसे झेलते?फिर भारत ने वो किया जो दुनिया में किसी देश ने नहीं किया था. माफी और बात कीशुरूआत. यहीं से पॉलिसी चेंज हुई. ये वो पॉलिसी थी जो भविष्य में सबकी पॉलिसी काआधार बनेगी. अभी तक वही होते आया था कि खून का बदला खून से लेंगे. पर इससे निकलताकुछ नहीं. सबसे ताकतवर पॉलिसी वही है कि अपने आप को सुरक्षित और ताकतवर बनाओ. सामनेवाले को बातों से डिप्लोमैटिकली झुकाओ. सुनने में कमजोर सा लगता है. पर ये सबसेसुरक्षित पॉलिसी है. उसके बाद भारत और अमेरिका के संबंध बहुत बदले. तब से भारत नेप्रगति ज्यादा की है. उतावलेपन की बजाय दूरदर्शिता ज्यादा जरूरी थी. भारत ने दुनियाके सामने ये नज़ीर रखी थी. वक्त के साथ इसे याद रखा जाएगा. भारत चाहता तो हमला करसकता था. कोई कुछ नहीं कर पाता. भारत के पास वजह थी और ताकत भी. कोई दबा ना पाता.--------------------------------------------------------------------------------यासीन भटकल, इंडियन मुजाहिदीन का पहला आतंकी जिसे दोषी पाया गया