केंद्र सरकार बैंकों को क्यों दे रही है 83,000 करोड़ रुपये?
जानिए इससे आपको क्या फायदा होगा?
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केंद्र सरकार बड़े सरकारी बैंकों को 83,000 करोड़ रुपये देने जा रही है, ताकि बैंकों की स्थिति को सुधारा जा सके.
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देश के कई सरकारी बैंक आईसीयू में हैं. उनको लाइट सपोर्ट सिस्टम पर रखा गया है. 'डॉक्टर अरुण जेटली' उनको इंजेक्शन दे रहे हैं. उनमें जान फूंकने की कोशिशें लगातार चल रही हैं. इन बैंकों की धड़कन बंद न हो, इसके लिए साल भर पहले 2 लाख 11 हज़ार करोड़ रुपए का पैकेज दिया गया. अब फिर 41 हज़ार करोड़ रुपए की मदद का ऐलान हुआ है. आखिर ये बैंकों का संकट है क्या? क्या वाकई बैंकों को पैसे की ज़रूरत है? बैंकों के इस संकट का हमारी जेब पर क्या असर होगा? इन सारे सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे हम आज, दी लल्लनटॉप के खास सेगमेंट आसान भाषा में.
सबसे पहले ये समझते हैं कि बैंकों का संकट है क्या?

अकेले नीरव मोदी पंजाब नेशनल बैंक से 13,000 करोड़ रुपये से ज्यादा पैसे लेकर फरार हो गया है.
देश में कुल 21 सरकारी बैंक हैं. इस कैटेगरी में वो बैंक आते हैं, जिनमें सरकार की हिस्सेदारी 51 फीसदी से ज्यादा है. सरकार के बड़े बैंकों में भारतीय स्टेट बैंक और पंजाब नेशनल बैंक का नाम सबसे ऊपर है. इसके बाद दूसरे बैंकों का नंबर आता है. इन बैंकों के बुरे दिन कोई 10 साल पहले शुरू हुए थे. साल 2008 में अमेरिका से शुरू हुई आर्थिक मंदी ने हिंदुस्तान के कारोबार और उद्योगों को भी अपनी चपेट में ले लिया. भारत में भी कंपनियां बंद होने लगीं. लोग बेरोजगार होने लगे.
फिर क्या हुआ? क्या सरकार ने लोगों को अपने हाल पर छोड़ दिया?

आर्थिक मंदी के दौरान मनमोहन सरकार ने देश में खुले हाथ से लोन बांटे, ताकि आम लोगों पर असर न पड़े. हालांकि इसकी वजह से बैंक कंगाल हो गए.
उस वक्त की मनमोहन सिंह की सरकार ने इसका एक तोड़ निकाला. और तोड़ ये था कि सरकारी बैंक उद्योगों को अपना कामकाज बढ़ाने के लिए ज्यादा से ज्यादा लोन दें. यही नहीं, जो कंपनियां बैंकों के लोन की किस्त नहीं चुका पा रही हैं, उनको फिर से लोन दिया जाए. तकनीकी भाषा में इसे 'लोन रीस्ट्रक्चरिंग' बोलते हैं. नतीजा ये हुआ कि बैंकों ने उद्यमियों और कारोबारियों को धड़ाधड़ लोन बांटने शुरू कर दिए. बैंकों से यही एक चूक हो गई है. और वो ये कि बैंकों ने लोन लेने वाले धुरंधरों के कागजात की गहरी जांच-पड़ताल नहीं की.
बिना जांच-पड़ताल के लोने देने से क्या हुआ?

आईडीबीआई ने विजय माल्या को भी लोन दिया था, जिसे लेकर माल्या विदेश भाग गया.
बैंकों ने खुले हाथ से उद्योगों की मदद की. इसमें उन्होंने अपनी माली हालत को भी नहीं देखा. बैंकों के कर्ज देने का ये सिलसिला साल 2013 तक खूब चला. मगर 2014 से हालात बदलने लगे. कारोबारी बैंकों की किस्त चुकाने में आनाकानी करने लगे. शुरुआत में बैंकों ने कारोबारियों के साथ आपस में सेटलमेंट करने की कोशिश की. मगर हालात काबू में नहीं आए.
और हालात कैसे बिगड़ते चले गए?

नीरव मोदी जैसे कारोबारियों ने बैंकों को हजारों करोड़ रुपये का चूना लगाया है.
उस वक्त लोन लेने वाले ज्यादातर कारोबारी कर्ज वापस नहीं कर पाए. शराब कारोबारी विजय माल्या का साढ़े नौ हज़ार करोड़ रुपए का और नीरव मोदी का साढ़े 11 हज़ार करोड़ रुपए का बैंकों का बकाया इसी दौर का है. नतीजा, आज देश के बैंकों का करीब साढ़े 8 लाख करोड़ रुपए का कर्ज डूबने की कगार पर है. बैंकिंग की भाषा में इसे नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स यानी एनपीए कहते हैं. एनपीए की कैटेगरी में वो लोन आता है, जिसके बैंक में वापस जमा होने के आसार कम होते हैं. जब कोई कंपनी या शख्स लगातार तीन महीने तक लोन की किस्त नहीं चुका पाता है, तब बैंक उस लोन को एनपीए की कैटेगरी में डाल देते हैं. बैंकों का एनपीए लगातार बढ़ रहा है. एक रिपोर्ट के मुताबिक इस वक्त 38 बैंकों का एनपीए 8 लाख 41 हज़ार करोड़ रुपए से ज्यादा है. इनमें से 90 फीसदी लोन सरकारी बैंकों का है.
तो बैंकों को क्या फर्क पड़ा?

हालात बिगड़े तो सरकार ने कई बैंको के विलय की भी मंजूरी दे दी थी. बैंक ऑफ बड़ौदा के साथ विजया बैंक और देना बैंक का विलय होने का भी फैसला हो चुका है.
कर्ज की रकम वापस न आने से बैंकों को तीन तरफा मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा है. पहली, उनकी लोन देने की क्षमता घट गई. दूसरी, मुनाफे में कमी आई. और तीसरी मुसीबत ये हुई कि बैंकों में नकदी की कमी हो गई. बैंकों की खस्ता हालत देख रिज़र्व बैंक ने कोई साल भर पहले 21 में से 11 सरकारी बैंकों पर पीसीए यानी प्रोंप्ट करेक्टिव एक्शन की कार्रवाई कर दी. पीसीए की कार्रवाई होने से कमजोर बैंक लोन कम बांट पाते हैं. साथ ही उनको बेसल के कुछ सख्त मानकों का भी पालन करना होता है.
क्या होता है पीसीए?

आरबीआई के पास ये अधिकार है कि अगर कोई बैंक तय नियमों का पालन न करे, तो वो उसपर ऐक्शन ले सकता है.
किसी भी बैंक का काम तय मानकों के मुताबिक न होने पर RBI प्रोंप्ट करेक्टिव एक्शन यानी त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई करता है. मतलब ये कि अगर बैंक सीधे रास्ते नहीं चल रहा है, तो रिज़र्व बैंक उस पर डंडा चला सकता है. ठीक वैसे ही जैसे बैल को सीधे रास्ते पर लाने के लिए किसान डंडे का सहारा लेता है. रिज़र्व बैंक ने भी कुछ ऐसा ही किया और बैंकों की लगाम थोड़ी कस दी. पीसीए के तहत बैंकों पर नई ब्रांच खोलने, लोन बांटने से रोकने और बैंकों को हुए फायदे के बंटवारे से रोकने जैसी कार्रवाई की जाती है. हालात ज्यादा बिगड़ने पर रिज़र्व बैंक मैनेजमेंट पर जुर्माना और प्रतिबंध जैसे एक्शन भी लेता है. ज़रूरी होने पर बैंक के बोर्ड को बदल भी सकता है.
अब बेसल नार्म्स क्या हैं?

अंतरराष्ट्रीय मानकों को पूरा करने के लिए भारतीय बैंकों को करीब 4.22 लाख करोड़ रुपये की ज़रूरत है.
किसी भी बैंक को अपना कामकाज चलाने के लिए रिज़र्व बैंक के तय मानकों का पालन करना होता है. और रिज़र्व बैंक बंधा है स्विटजरलैंड के एक शहर बेसल से. बेसल मानक बैंकिंग का इंटरनेशनल स्टैंडर्ड है. इसे दुनिया भर में बैंकिंग सिस्टम को एक आकार देने के लिए साल 1980 में लागू किया गया था. अब तक इसके तीन चरण लागू किए जा चुके हैं. तीसरे चरण के बेसल नार्म्स साल 2010 में लांच किए गए थे. इन मानकों में एक बड़ा स्टैंडर्ड था बैंकों का पूंजी आधार बढ़ाना. मतलब बैंकों को अपने पास नकदी और बॉन्ड के रूप में अब ज्यादा पैसा रखना होगा. एक रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय बैंकों को बेसल-3 नियमों को पूरा करने के लिए करीब 4.22 लाख करोड़ रुपए की एक्स्ट्रा पूंजी चाहिए. सभी बैंकों को इन मानकों को मार्च 2019 तक पूरा करना था. बैंकों के संकट को देखते हुए RBI ने इसे एक साल बढ़ाकर मार्च 2020 कर दिया है.
नतीजा क्या हुआ?

आरबीआई ने ऐक्शन लिया, जिसकी वजह से कई बैंक नए लोन नहीं दे पा रहे थे.
नतीजा ये हुआ कि RBI ने इलाहाबाद बैंक, यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया, कॉरपोरेशन बैंक, आईडीबीआई बैंक, यूको बैंक, बैंक ऑफ इंडिया, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, इंडियन ओवरसीज बैंक, ओरियंटल बैंक ऑफ कॉमर्स, देना बैंक और बैंक ऑफ महाराष्ट्र आदि बैंकों को पीसीए में डाला. पीसीए की कार्रवाई होने से कर्ज लुटा चुके बैंकों का संकट और गहरा हो गया. बैंकों ने उद्योगों के साथ-साथ आम लोगों को भी लोन देने में आनाकानी करना शुरू कर दिया. इससे मौजूदा सरकार पर उद्योगों का दबाव बढ़ने लगा. सरकार पर बैंकों को संकट से उबारने का जिम्मा आ गया. पूरे कारोबारी सिस्टम के बैठने का खतरा जो था. आखिर में सरकार ने गुजरे साल 2 लाख 11 हजार करोड़ रुपए के पैकेज का ऐलान किया.
अब बात सरकार के पैकेज की

केंद्र सरकार ने कहा कि वो सरकारी बैंकों को दो साल के अंदर और भी पैसे देगी.
बैंकों के संकट को देखते हुए मोदी सरकार ने अक्टूबर 2017 में एक अहम फैसला लिया. सरकार ने ऐलान किया कि पब्लिक सेक्टर के बैंकों को 2 साल के भीतर 2 लाख 11 हजार करोड़ की पूंजी मुहैया कराई जाएगी. इसमें 18,139 करोड़ रुपए केंद्र सरकार के बजट में मिशन इंद्रधनुष योजना के जरिए दिए गए. मिशन इंद्रधनुष एक सात आयामी योजना है. इसका मकसद प्राइवेट बैंकों की तरह सरकारी बैंकों का वर्क कल्चर ठीक करना है. साथ ही, 1 लाख 35 हजार करोड़ रिकैपिटलाइजेशन बांड्स के माध्यम से बैंकों को देने का फैसला हुआ. बाकी 58 हजार करोड़ रुपए बैंकों को शेयर बेचकर जुटाने थे.
ये रिकैपिटलाइजेशन बांड क्या हैं?

रीकैपिटलाइजेशन बांड को कुछ इस तरह समझें. मान लेते हैं किसी शख्स को 10,000 रुपए की ज़रूरत है. तो पहली सूरत ये होगी कि वो अपने किसी परिचित से ये रकम उधार ले ले. लेकिन अगर वो ऐसा नहीं करना चाहता है तो ये कर सकता है कि बाजार में जाए और अपनी औकात यानी क्रेडिट के हिसाब से लोगों से कहे कि आज आप हमको 10,000 रुपए दे दीजिए. पांच साल बाद हम आपको 15,000 रुपए लौटा देंगे. साथ ही हर साल कुछ रुपए ब्याज भी देते रहेंगे. और इस बात को एक कागज पर लिखकर बतौर गारंटी दे दे. बांड बाज़ार ठीक ऐसे ही काम करते हैं. अब ये रिकैपिटलाइजेशन बॉन्ड सरकार ने बैंक की ओर पैसे जुटाने के लिए जारी किए हैं.
क्या हैं इस बॉन्ड की खास बातें ?
मोदी सरकार ने बैंकों की मदद के लिए ये बॉन्ड जनवरी 2018 में जारी किए थे. इन पर सरकार ने साल में 7.48 फीसदी से लेकर 7.68 परसेंट तक का सालाना ब्याज देने का भरोसा दिया है. और ये 2028 से 2033 के बीच मैच्योर होंगे. मतलब ये कि जो भी इन बॉन्ड को लेगा, उसको हर साल एक तय ब्याज मिलता रहेगा. और जब इनका वक्त पूरा हो जाएगा, तब बॉन्ड की कीमत मय ब्याज खरीदार को दे दी जाएगी.
कौन लोग खरीद सकते हैं इन बॉन्ड्स को?

सरकार के ये बॉन्ड एलआईसी या फिर कोई भी और योजना खरीद सकती है.
इन बॉन्ड्स को बैंक खुद भी खरीदेंगे. इससे सरकार के पास पैसा आएगा. सरकार उस पैसे से फिर उसी बैंक के शेयर खरीद लेगी. सरकार के ये बॉन्ड एलआईसी, एंप्लाई प्रोविडेंट फंड ऑर्गनाइजेशन, यूटीआई म्यूचुअल फंड, नेशनल पेंशन सिस्टम, अटल पेंशन योजना जैसी योजनाओं को भी बेचे जा सकते हैं. लेकिन माना जा रहा है कि दूसरे बड़े निवेशक इसमें दिलचस्पी कम लेंगे. ऐसा इसलिए है, क्योंकि इनका मैच्योरिटी पीरियड काफी लंबा है. मगर सरकार के इस प्रयास से बैंकों की बैलेंस शीट दुरुस्त हो जाएगी. उनके पास नकदी भी तत्काल आ जाएगी.
फिर से पैकेज क्यों दिया सरकार ने?

बैंकों की वित्तीय स्थिति सुधारने वाले मसले पर ही मोदी सरकार और आरबीआई के बीच तकरार शुरू हुई थी.
सरकार के अक्टूबर 2017 के पैकेज के मुताबिक बैंकों को 1.35 लाख करोड़ की पूंजी बॉन्ड के जरिए दी जानी है. इस साल बैंकों को 65 हजार करोड़ रुपए की मदद की मिलनी थी. बैंकों के संकट को देखते हुए सरकार ने अब इसमें 41 हजार करोड़ रुपए की मदद और बढ़ाने का फैसला किया है. अब मार्च तक बैंकों को 83 हजार करोड़ रुपए की सहायता दी जाएगी. सरकार ने कुछ दिन पहले पंजाब नैशनल बैंक, इलाहाबाद बैंक, इंडियन ओवरसीज बैंक, आंध्रा बैंक और कॉरपोरेशन बैंक को 11,336 करोड़ रुपए की पहली किस्त उपलब्ध कराई है.
इसका क्या फायदा होगा?

सरकार पैसे दे देगी तो बैंक और कर्ज बांट सकेंगे. साथ ही बैंक आरबीआई की सख्ती का सामना करने से भी बच जाएंगे.
सरकार के इस कदम से बैंकों के पास कर्ज बांटने के लिए ज्यादा पैसे उपलब्ध होंगे. और बैंकों को आरबीआई की तत्काल सुधारात्मक कार्रवाई से बाहर निकलने में मदद मिलेगी. सरकारी बैंकों की हालत सुधरेगी. 4 से 5 बैंक पीसीए के दायरे से बाहर निकल सकते हैं. जो बैंक अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं उनको ही ये पूंजी मिलेगी. पीएनबी और एसबीआई जैसे बड़े सरकारी बैंकों को इस साल ज्यादा पूंजी की जरूरत नहीं पड़ेगी.
सबसे पहले ये समझते हैं कि बैंकों का संकट है क्या?

अकेले नीरव मोदी पंजाब नेशनल बैंक से 13,000 करोड़ रुपये से ज्यादा पैसे लेकर फरार हो गया है.
देश में कुल 21 सरकारी बैंक हैं. इस कैटेगरी में वो बैंक आते हैं, जिनमें सरकार की हिस्सेदारी 51 फीसदी से ज्यादा है. सरकार के बड़े बैंकों में भारतीय स्टेट बैंक और पंजाब नेशनल बैंक का नाम सबसे ऊपर है. इसके बाद दूसरे बैंकों का नंबर आता है. इन बैंकों के बुरे दिन कोई 10 साल पहले शुरू हुए थे. साल 2008 में अमेरिका से शुरू हुई आर्थिक मंदी ने हिंदुस्तान के कारोबार और उद्योगों को भी अपनी चपेट में ले लिया. भारत में भी कंपनियां बंद होने लगीं. लोग बेरोजगार होने लगे.
फिर क्या हुआ? क्या सरकार ने लोगों को अपने हाल पर छोड़ दिया?

आर्थिक मंदी के दौरान मनमोहन सरकार ने देश में खुले हाथ से लोन बांटे, ताकि आम लोगों पर असर न पड़े. हालांकि इसकी वजह से बैंक कंगाल हो गए.
उस वक्त की मनमोहन सिंह की सरकार ने इसका एक तोड़ निकाला. और तोड़ ये था कि सरकारी बैंक उद्योगों को अपना कामकाज बढ़ाने के लिए ज्यादा से ज्यादा लोन दें. यही नहीं, जो कंपनियां बैंकों के लोन की किस्त नहीं चुका पा रही हैं, उनको फिर से लोन दिया जाए. तकनीकी भाषा में इसे 'लोन रीस्ट्रक्चरिंग' बोलते हैं. नतीजा ये हुआ कि बैंकों ने उद्यमियों और कारोबारियों को धड़ाधड़ लोन बांटने शुरू कर दिए. बैंकों से यही एक चूक हो गई है. और वो ये कि बैंकों ने लोन लेने वाले धुरंधरों के कागजात की गहरी जांच-पड़ताल नहीं की.
बिना जांच-पड़ताल के लोने देने से क्या हुआ?

आईडीबीआई ने विजय माल्या को भी लोन दिया था, जिसे लेकर माल्या विदेश भाग गया.
बैंकों ने खुले हाथ से उद्योगों की मदद की. इसमें उन्होंने अपनी माली हालत को भी नहीं देखा. बैंकों के कर्ज देने का ये सिलसिला साल 2013 तक खूब चला. मगर 2014 से हालात बदलने लगे. कारोबारी बैंकों की किस्त चुकाने में आनाकानी करने लगे. शुरुआत में बैंकों ने कारोबारियों के साथ आपस में सेटलमेंट करने की कोशिश की. मगर हालात काबू में नहीं आए.
और हालात कैसे बिगड़ते चले गए?

नीरव मोदी जैसे कारोबारियों ने बैंकों को हजारों करोड़ रुपये का चूना लगाया है.
उस वक्त लोन लेने वाले ज्यादातर कारोबारी कर्ज वापस नहीं कर पाए. शराब कारोबारी विजय माल्या का साढ़े नौ हज़ार करोड़ रुपए का और नीरव मोदी का साढ़े 11 हज़ार करोड़ रुपए का बैंकों का बकाया इसी दौर का है. नतीजा, आज देश के बैंकों का करीब साढ़े 8 लाख करोड़ रुपए का कर्ज डूबने की कगार पर है. बैंकिंग की भाषा में इसे नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स यानी एनपीए कहते हैं. एनपीए की कैटेगरी में वो लोन आता है, जिसके बैंक में वापस जमा होने के आसार कम होते हैं. जब कोई कंपनी या शख्स लगातार तीन महीने तक लोन की किस्त नहीं चुका पाता है, तब बैंक उस लोन को एनपीए की कैटेगरी में डाल देते हैं. बैंकों का एनपीए लगातार बढ़ रहा है. एक रिपोर्ट के मुताबिक इस वक्त 38 बैंकों का एनपीए 8 लाख 41 हज़ार करोड़ रुपए से ज्यादा है. इनमें से 90 फीसदी लोन सरकारी बैंकों का है.
तो बैंकों को क्या फर्क पड़ा?

हालात बिगड़े तो सरकार ने कई बैंको के विलय की भी मंजूरी दे दी थी. बैंक ऑफ बड़ौदा के साथ विजया बैंक और देना बैंक का विलय होने का भी फैसला हो चुका है.
कर्ज की रकम वापस न आने से बैंकों को तीन तरफा मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा है. पहली, उनकी लोन देने की क्षमता घट गई. दूसरी, मुनाफे में कमी आई. और तीसरी मुसीबत ये हुई कि बैंकों में नकदी की कमी हो गई. बैंकों की खस्ता हालत देख रिज़र्व बैंक ने कोई साल भर पहले 21 में से 11 सरकारी बैंकों पर पीसीए यानी प्रोंप्ट करेक्टिव एक्शन की कार्रवाई कर दी. पीसीए की कार्रवाई होने से कमजोर बैंक लोन कम बांट पाते हैं. साथ ही उनको बेसल के कुछ सख्त मानकों का भी पालन करना होता है.
क्या होता है पीसीए?

आरबीआई के पास ये अधिकार है कि अगर कोई बैंक तय नियमों का पालन न करे, तो वो उसपर ऐक्शन ले सकता है.
किसी भी बैंक का काम तय मानकों के मुताबिक न होने पर RBI प्रोंप्ट करेक्टिव एक्शन यानी त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई करता है. मतलब ये कि अगर बैंक सीधे रास्ते नहीं चल रहा है, तो रिज़र्व बैंक उस पर डंडा चला सकता है. ठीक वैसे ही जैसे बैल को सीधे रास्ते पर लाने के लिए किसान डंडे का सहारा लेता है. रिज़र्व बैंक ने भी कुछ ऐसा ही किया और बैंकों की लगाम थोड़ी कस दी. पीसीए के तहत बैंकों पर नई ब्रांच खोलने, लोन बांटने से रोकने और बैंकों को हुए फायदे के बंटवारे से रोकने जैसी कार्रवाई की जाती है. हालात ज्यादा बिगड़ने पर रिज़र्व बैंक मैनेजमेंट पर जुर्माना और प्रतिबंध जैसे एक्शन भी लेता है. ज़रूरी होने पर बैंक के बोर्ड को बदल भी सकता है.
अब बेसल नार्म्स क्या हैं?

अंतरराष्ट्रीय मानकों को पूरा करने के लिए भारतीय बैंकों को करीब 4.22 लाख करोड़ रुपये की ज़रूरत है.
किसी भी बैंक को अपना कामकाज चलाने के लिए रिज़र्व बैंक के तय मानकों का पालन करना होता है. और रिज़र्व बैंक बंधा है स्विटजरलैंड के एक शहर बेसल से. बेसल मानक बैंकिंग का इंटरनेशनल स्टैंडर्ड है. इसे दुनिया भर में बैंकिंग सिस्टम को एक आकार देने के लिए साल 1980 में लागू किया गया था. अब तक इसके तीन चरण लागू किए जा चुके हैं. तीसरे चरण के बेसल नार्म्स साल 2010 में लांच किए गए थे. इन मानकों में एक बड़ा स्टैंडर्ड था बैंकों का पूंजी आधार बढ़ाना. मतलब बैंकों को अपने पास नकदी और बॉन्ड के रूप में अब ज्यादा पैसा रखना होगा. एक रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय बैंकों को बेसल-3 नियमों को पूरा करने के लिए करीब 4.22 लाख करोड़ रुपए की एक्स्ट्रा पूंजी चाहिए. सभी बैंकों को इन मानकों को मार्च 2019 तक पूरा करना था. बैंकों के संकट को देखते हुए RBI ने इसे एक साल बढ़ाकर मार्च 2020 कर दिया है.
नतीजा क्या हुआ?

आरबीआई ने ऐक्शन लिया, जिसकी वजह से कई बैंक नए लोन नहीं दे पा रहे थे.
नतीजा ये हुआ कि RBI ने इलाहाबाद बैंक, यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया, कॉरपोरेशन बैंक, आईडीबीआई बैंक, यूको बैंक, बैंक ऑफ इंडिया, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, इंडियन ओवरसीज बैंक, ओरियंटल बैंक ऑफ कॉमर्स, देना बैंक और बैंक ऑफ महाराष्ट्र आदि बैंकों को पीसीए में डाला. पीसीए की कार्रवाई होने से कर्ज लुटा चुके बैंकों का संकट और गहरा हो गया. बैंकों ने उद्योगों के साथ-साथ आम लोगों को भी लोन देने में आनाकानी करना शुरू कर दिया. इससे मौजूदा सरकार पर उद्योगों का दबाव बढ़ने लगा. सरकार पर बैंकों को संकट से उबारने का जिम्मा आ गया. पूरे कारोबारी सिस्टम के बैठने का खतरा जो था. आखिर में सरकार ने गुजरे साल 2 लाख 11 हजार करोड़ रुपए के पैकेज का ऐलान किया.
अब बात सरकार के पैकेज की

केंद्र सरकार ने कहा कि वो सरकारी बैंकों को दो साल के अंदर और भी पैसे देगी.
बैंकों के संकट को देखते हुए मोदी सरकार ने अक्टूबर 2017 में एक अहम फैसला लिया. सरकार ने ऐलान किया कि पब्लिक सेक्टर के बैंकों को 2 साल के भीतर 2 लाख 11 हजार करोड़ की पूंजी मुहैया कराई जाएगी. इसमें 18,139 करोड़ रुपए केंद्र सरकार के बजट में मिशन इंद्रधनुष योजना के जरिए दिए गए. मिशन इंद्रधनुष एक सात आयामी योजना है. इसका मकसद प्राइवेट बैंकों की तरह सरकारी बैंकों का वर्क कल्चर ठीक करना है. साथ ही, 1 लाख 35 हजार करोड़ रिकैपिटलाइजेशन बांड्स के माध्यम से बैंकों को देने का फैसला हुआ. बाकी 58 हजार करोड़ रुपए बैंकों को शेयर बेचकर जुटाने थे.
ये रिकैपिटलाइजेशन बांड क्या हैं?

रीकैपिटलाइजेशन बांड को कुछ इस तरह समझें. मान लेते हैं किसी शख्स को 10,000 रुपए की ज़रूरत है. तो पहली सूरत ये होगी कि वो अपने किसी परिचित से ये रकम उधार ले ले. लेकिन अगर वो ऐसा नहीं करना चाहता है तो ये कर सकता है कि बाजार में जाए और अपनी औकात यानी क्रेडिट के हिसाब से लोगों से कहे कि आज आप हमको 10,000 रुपए दे दीजिए. पांच साल बाद हम आपको 15,000 रुपए लौटा देंगे. साथ ही हर साल कुछ रुपए ब्याज भी देते रहेंगे. और इस बात को एक कागज पर लिखकर बतौर गारंटी दे दे. बांड बाज़ार ठीक ऐसे ही काम करते हैं. अब ये रिकैपिटलाइजेशन बॉन्ड सरकार ने बैंक की ओर पैसे जुटाने के लिए जारी किए हैं.
क्या हैं इस बॉन्ड की खास बातें ?
मोदी सरकार ने बैंकों की मदद के लिए ये बॉन्ड जनवरी 2018 में जारी किए थे. इन पर सरकार ने साल में 7.48 फीसदी से लेकर 7.68 परसेंट तक का सालाना ब्याज देने का भरोसा दिया है. और ये 2028 से 2033 के बीच मैच्योर होंगे. मतलब ये कि जो भी इन बॉन्ड को लेगा, उसको हर साल एक तय ब्याज मिलता रहेगा. और जब इनका वक्त पूरा हो जाएगा, तब बॉन्ड की कीमत मय ब्याज खरीदार को दे दी जाएगी.
कौन लोग खरीद सकते हैं इन बॉन्ड्स को?

सरकार के ये बॉन्ड एलआईसी या फिर कोई भी और योजना खरीद सकती है.
इन बॉन्ड्स को बैंक खुद भी खरीदेंगे. इससे सरकार के पास पैसा आएगा. सरकार उस पैसे से फिर उसी बैंक के शेयर खरीद लेगी. सरकार के ये बॉन्ड एलआईसी, एंप्लाई प्रोविडेंट फंड ऑर्गनाइजेशन, यूटीआई म्यूचुअल फंड, नेशनल पेंशन सिस्टम, अटल पेंशन योजना जैसी योजनाओं को भी बेचे जा सकते हैं. लेकिन माना जा रहा है कि दूसरे बड़े निवेशक इसमें दिलचस्पी कम लेंगे. ऐसा इसलिए है, क्योंकि इनका मैच्योरिटी पीरियड काफी लंबा है. मगर सरकार के इस प्रयास से बैंकों की बैलेंस शीट दुरुस्त हो जाएगी. उनके पास नकदी भी तत्काल आ जाएगी.
फिर से पैकेज क्यों दिया सरकार ने?

बैंकों की वित्तीय स्थिति सुधारने वाले मसले पर ही मोदी सरकार और आरबीआई के बीच तकरार शुरू हुई थी.
सरकार के अक्टूबर 2017 के पैकेज के मुताबिक बैंकों को 1.35 लाख करोड़ की पूंजी बॉन्ड के जरिए दी जानी है. इस साल बैंकों को 65 हजार करोड़ रुपए की मदद की मिलनी थी. बैंकों के संकट को देखते हुए सरकार ने अब इसमें 41 हजार करोड़ रुपए की मदद और बढ़ाने का फैसला किया है. अब मार्च तक बैंकों को 83 हजार करोड़ रुपए की सहायता दी जाएगी. सरकार ने कुछ दिन पहले पंजाब नैशनल बैंक, इलाहाबाद बैंक, इंडियन ओवरसीज बैंक, आंध्रा बैंक और कॉरपोरेशन बैंक को 11,336 करोड़ रुपए की पहली किस्त उपलब्ध कराई है.
इसका क्या फायदा होगा?

सरकार पैसे दे देगी तो बैंक और कर्ज बांट सकेंगे. साथ ही बैंक आरबीआई की सख्ती का सामना करने से भी बच जाएंगे.
सरकार के इस कदम से बैंकों के पास कर्ज बांटने के लिए ज्यादा पैसे उपलब्ध होंगे. और बैंकों को आरबीआई की तत्काल सुधारात्मक कार्रवाई से बाहर निकलने में मदद मिलेगी. सरकारी बैंकों की हालत सुधरेगी. 4 से 5 बैंक पीसीए के दायरे से बाहर निकल सकते हैं. जो बैंक अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं उनको ही ये पूंजी मिलेगी. पीएनबी और एसबीआई जैसे बड़े सरकारी बैंकों को इस साल ज्यादा पूंजी की जरूरत नहीं पड़ेगी.

