एक डिप्लोमैट की आवाज में फैज की शायरी का रंग
फैज को बड़े मकबूल गायकों ने गाया है, लेकिन शशि त्रिपाठी भी सुनने लायक गा गई हैं. सितार के पसमंजर में उनकी आवाज पुरसुकूं लगती है. प्रयोगों से रहित, सिंपल और सोबर.
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शशि त्रिपाठी, बाएं.
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क्या आप ऐसे डिप्लोमैट को जानते हैं जो बहुत शानदार गाता हो? कई हो सकते हैं. लेकिन साल 1992 में जलवा था कराची में भारत की उस वक्त की उप-वाणिज्यदूत शशि त्रिपाठी का.
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ये जो आवाज आपने सुनी, ये शशि त्रिपाठी की थी. पेशे से डिप्लोमेट शशि ने पाकिस्तान में अपना कार्यकाल खत्म होने से ठीक पहले फैज़ अहमद फैज की कुछ नज्में रिकॉर्ड की थीं, जो उनकी सबसे बड़ी पहचान बन गया. 1970 बैच की IFS अफसर शशि चार साल तक पाकिस्तान में रहीं. उन्होंने तय किया कि वह वहां के सबसे सम्मानित शायर के तराने गाकर वहां से विदा लें. फैज अहमद फैज उनके पसंदीदा थे. उन्होंने फैज कुछ नज्में अपनी आवाज में रिकॉर्ड करवाईं और 'होमेज टू फैज' नाम से एक एलबम के तौर पर उन्हें रिलीज किया.
पाकिस्तान में उनके जानने वालों का दायरा काफी बड़ा रहा, लेकिन किसी को अंदाजा नहीं था कि जलसों में भाषण देने वाली इस आवाज ने सुरों को भी साध रखा है. शशि ने न तो कोई रियाज की और न ही तबले की ताल का सहारा लिया. सिर्फ सितार की संगत में यह रिकॉर्डिंग करवाई. रिकॉर्डिंग की ईएमआई कंपनी ने.
फैज को बड़े मकबूल गायकों ने गाया है, लेकिन शशि त्रिपाठी भी सुनने लायक गा गई हैं. सितार के पसमंजर में उनकी मीठी और सुरीली आवाज पुरसुकूं लगती है. प्रयोगों से रहित, सिंपल और सोबर.इसके लिए उन्होंने खास तौर पर उर्दू सीखी. उस समय 'इंडिया टुडे' से बातचीत में उन्होंने कहा था, 'उर्दू मीठी जुबान है. शायरी के लिए बिल्कुल उपयुक्त, इसमें जज्बातों को व्यक्त करने की ताकत है. फैज के बारे में मुझे अच्छी बात यह लगती है कि उनकी शायरी उम्मीद जगाती है. हर दिल को छूती है, सीमाओं को भी लांघती है.'

