लोकभारती प्रकाशन से किताब आई है. किताब का नाम 'भारत माता धरती माता' उसी में राममनोहर लोहिया के निबंध संकलित हैं. एक निबंध है रामायण पर जिसमें लोहिया धर्म औरराजनीति की बात करते हैं. तुलसी की रामायण की बात करते हैं. इसमें ग्वेथे का भीजिक्र है और कम्बन का भी.--------------------------------------------------------------------------------धर्म और राजनीति का रिश्ता बिगड़ गया है. धर्म दीर्घकालीन राजनीति है और राजनीतिअल्पकालीन धर्म. धर्म श्रेयस् की उपलब्धि का प्रयत्न करता है, राजनीति बुराई सेलड़ती है. हम आज एक दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थिति में हैं, जिसमें कि बुराई से विरोध कीलड़ाई में धर्म का कोई वास्ता नहीं रह गया है और वह निर्जीव हो गया है, जबकिराजनीति अत्यधिक कलही और बेकार हो गयी है. तुलसी की रामायण में निश्चय कि सोना,हीरा, मोती बहुत है, लेकिन उसमें कूड़ा और उच्छिष्ट भी काफी है. इन दोनों को धर्मसे इतना पवित्र बना दिया गया है कि भारतीय जन की विवेक-दृष्टि लुप्त हो गयी है.लोहियादृष्टि गहरी और व्यापक हुए बिना न आनन्द मिलता है, न समझ. तुलसी की रामायण मेंआनन्द के साथ-साथ धर्म भी जुड़ा हुआ है, धर्म शाश्वत मानी में और वक़्ती भी. तुलसीकी कविता से निकली है अनगिनत रोज की उक्तियाँ और कहावतें, जो आदमी को टिकाती हैं,और सीधे रखती हैं. साथ ही ऐसी भी कविता है जो एक बहुत की क्रूर अथवा क्षण-भंगुरधर्म के साथ जुड़ी हुई है, जैसे शुद्र या नारी की निन्दा और गऊ, विप्र की पूजा.मोती को चुनने के लिए कूड़ा निगलना जरूरी नहीं है, न ही कूड़ा साफ करते वक्त मोतीको फेंकना.तुलसी महान हैं यह कहना अनावश्यक है. जरूरत है बताने की उन चीजों को जिनमें उनकीमहत्ता फूटती है. तुलसी के बारे में मैं अपनी निजी राय बता दूँ, जिसको मानना ज़रूरीनहीं है, तुलसी एक रक्षक कवि थे. जब चारों तरफ से अझेल हमलें हों तो बचाना, थामना,टेक देना, शायद ही तुलसी से बढ़कर कोई कर सकता है. जब साधारण शक्ति आ चुकी हो,फैलाव, खोज, प्रयोग, नूतनता और महाबल अथवा महा-आनन्द के लिए दूसरी या पूरक कविताढूँढ़नी होगी.लोहिया का एक कथनआनन्द, प्रेम और शान्ति का आह्वान तो रामायण में है ही, पर हिन्दुस्तान की एकताजैसा लक्ष्य भी स्पष्ट है. सभी जानते हैं कि राम हिन्दुस्तान के उत्तर दक्षिण कीएकता के देवता थे, कि पूर्व-पश्चिम एकता के देवता थे कृष्ण और, कि आधुनिक भारतीयभाषाओं का मूल स्रोत रामकथा है. कम्बन की तमिल रामायण, एकनाथ को मराठी रामायण,कीर्तिवास की बंगला रामायण और ऐसी ही दूसरी रामायणों ने अपनी-अपनी भाषा को जन्म औरसंस्कार दिया.यहाँ मैं बतला दूँ कि खोतानी (तुर्की) रामायण तो राम और लक्ष्मण दोनों की शादी सीतासे करा देती है, और थाई और कम्बोज और हिन्देशिया की रामायणों में वही दिखाया गया हैजो कि कुछ प्राचीन भारतीय रामायणों में है, कि सीता की ननद उसके साथ ऐसी मसखरी करतीहै कि जिसमें उसके पास रावण का चित्र रख दिया कि सीता व्यग्र हो उठे. इन सबसे यहपता चलता है कि मूल राम-कथा आवश्यक वस्तु है न कि उसकी बारीकियां.लोहियातुलसी रामायण की धार्मिक कविता ऐसी है कि जैसी, शायद दुनिया भर में और कोई कवित्वमयनहीं है, लेकिन बिना किसी संदेह के यह कहा जा सकता है कि वह विवेक को दबा देने कीओर प्रवृत्त करती है. जहाँ धर्म निरपेक्ष कवि शेक्सपियर और ग्वेथे या कालिदास भी,पाठक में, उसकी समीक्षा-बुद्धि की अवरुद्ध किये बिना कविता और विस्तीर्ण वातावरणनिर्मित करते हैं, वहाँ रामायण जिस किसी विषय पर जो कुछ कहती है, उसे पवित्र बनादेती है. कम से कम अधिकांश पाठकों और श्रेताओं पर यही असर पड़ता है. रोजमर्राह केरीति-रिवाज एक ऐसे शाश्वत मूल्य प्राप्त कर लेते हैं जैसे कि उन्हें कभी नहीं करनाचाहिए. औरतों या पिछड़े वर्गों या जातियों के खतरनाक स्वरूप सम्बन्धी विचारसुप्रतिष्ठित किये गये हैं. इन उत्कृष्ट पंक्तियों को हमेशा याद रखना चाहिए.सीया राममय सब जग जानी. करहुँ प्रणाम जोरि जुग पानी.. या कत विधि सृजों नारी जगमाही. पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं.और, नारी को कलंकित करने वाली पंक्तियों को हँस कर टाल देना चाहिए कि ये पंक्तियाँकिसी शोक–संतप्त अथवा नीच पात्र के मुँह में हैं या ऐसे कवियों की हैं जोअपरिवर्तनशील युग में थे.लोहियाहम तुलसी को याद करें. नारी स्वतन्त्रता और समानता की जितनी जानदार कविता मैंनेतुलसी की पढ़ी और सुनी उतनी और कहीं नहीं, कम से कम इसे ज्यादा जानदार कहीं नहीं.अफसोस यह है कि नारी-हीनता वाली कविता तो हिन्दू नर के मुँह पर चढ़ी रहती है, लेकिननारी-सम्मान वाली कविता को वह भुलाये रहता है. ‘पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं’ कासम्बन्ध नारी से है. जब पार्वती का विवाह हो गया तब उनकी माँ नैना बिदाई के मौके परदुःखी होकर और समझाने-बुझाने पर संताप की वह बेजोड़ बात करती हैं, जो सारे संसार कीनाही-हृदय की चीख है.‘तक विधि सृजों नारी जग माहीं, पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं’.हिंदू नर इतना नीच हो गया है कि पहले तो इस चौपाई के पूर्वार्द्ध को भुला देने कीकोशिश की और फिर, कहीं-कहीं, उसने इसका नया पूर्वार्द्ध ही गढ़ डाला.‘कर-विचार देखहुँ मनमाहीं.’गजब है तुलसी ! क्या ममता, क्या नारी हृदय की चीख, क्या नर-नारी आदर्श जीवन कीसूचना. आखिर उसने संसार को किस रूप में जाना है.‘सियाराम-मय सब जग जानी’नर और नारी का स्नेहमय सम्बन्ध बराबरी की नींव पर हो सकता है. ऐसा सम्बन्ध कोई समाजअभी तक नहीं जान पाया. सीता और राम में भी पूरी बराबरी का स्नेह नहीं था. समाज केअन्दर व्याप्त गैरबराबरी का कण उसमें भी पड़ गया. फिर भी, जितना ज्यादा सीता,द्रौपदी और पार्वती इत्यादि को ऊँचे और स्वतंत्र आसन पर बैठाया है, उससे ज्यादाऊँचा नारी का आसन दुनिया में कहीं और कभी नही हुआ. यदि दृष्टि ठीक है तो राम-कथा औरतुलसी-रामायण की कविता सुनने या पढ़ने से नर-नारी के सम-स्नेह की ज्योति मिल सकतीहै.लोहिया का कहा कुछ औरऐसी दृष्टि, लगता है कि हिन्दुस्तान को बहुत ठोकर खाने के बाद ही मिलेगी. दहेज कीरकम बढ़ती चली जा रही है और जब माता-पिता उसे न दे पायेंगे और जब वह सब बढ़ेगा जिसेहिन्दुस्तान में अनर्थ कहा जाता है, तब लोग समझेंगे कि नारी को भी इसी तरह खोल दोजैसे नर को.तुलसी या और किसी भी रामायण में सामयिक और क्षण-भंगुर चीजें बहुत हैं. मिसाल के लिएबाल राम की पैजनियां. ये उस युग की प्रतीक हैं जहाँ मनुष्य को किसी न किसी खिलौनेके रूप में देखा जाता है. इन पैंजनियों को खतम करना ही है, चाहे वह नर के पैर मेंहो, चाहे नारी के पैर मे, केवल पैर मे नहीं हैं, और जगह भी. कन-छेदन, नर और नारीदोनों के, और नक-छेदन नारी के, कितने वीभत्स प्रकरण हैं. मणि, मुक्ता और कनक के लिएसभी रामायणों में एक अद्भुत लालसा मिलेगी. मुझे लगता है कि ये सब वैभव और ऐश्वर्यऔर सुख के प्रतीक हैं. शायद, मनुष्य को उनसे कभी छुटकारा नहीं मिलेगा. लेकिन वह समयतो अब खतम-सा हो रहा है, जब ये शक्ति और शासन के प्रतीक थे. ऐसे सब वर्णनों मेंतुलसी या और किसी कवि का दोष नहीं है. दोष अगर है तो समय का. अब समय फिर रहा है.इसलिए रामायण पढ़ते या सुनते समय पैजनियां, नकछेदन, मणि-मुक्ता वगैरह की बात कोआदर्श मन से छोड़ देना चाहिए, और उन्हें केवल बीते हुए जमाने के बीते हुए प्रतीक केसमान समझना चाहिए.https://www.youtube.com/watch?v=sDvbilvilIkhttps://www.youtube.com/watch?v=OuhMawj6SOo&feature=youtu.be