विपक्ष को एक रखने के लिए कांग्रेस को फिर से बलिदान देना पड़ रहा है
कर्नाटक में मुख्यमंत्री की कुर्सी कुर्बान किए अभी एक महीना भी नहीं बीता है

26 मई 2018. दिल्ली की बजाए बैंगलोर देश की सियासत का नर्व सेंटर बना हुआ था. मौक़ा नए चुने गए मुख्यमंत्री कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण का था, लेकिन मंच पर मौजूद 12 अलग-अलग दलों के नेता नए सियासी प्रमेय को सिद्ध करते दिखाई दे रहा था. कुमार के शपथ ग्रहण की इस तस्वीर को विपक्ष की एकता की हुंडी के तौर पर पेश किया गया जिसे 2019 के लोकसभा चुनाव में भुनाया जाएगा.
कई पॉलिटिकल पंडितों विपक्षी एकता को हवाई किला बता रहे थे. उनका तर्क था कि एक छतरी के नीचे आने पर विपक्ष के पाले में बैठे कई क्षेत्रीय दलों के मुफाद आपस में टकराएंगे. इनमें से कई क्षेत्रीय क्षत्रप ऐसे भी हैं जिन्होंने अपनी कांग्रेस के विरोध से अपने सियासत की शुरुआत की थी. ऐसे में बीजेपी के विरोध में सभी सियासी दलों का एक होना संभव नहीं होगा. बहरहाल यह 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले की कयासबाजी भर थी. किसे पता था कि इस विपक्षी एकता का लिटमस टेस्ट चुनाव से सालभर पहले हो जाएगा.
कायदे के हिसाब से भारत का उपराष्ट्रपति राज्यसभा का अध्यक्ष होता है. कई दफा उपराष्ट्रपति साहब दूसरे कामों में व्यस्त होते हैं. ऐसे में उनकी जगह सदन की कार्यवाही चलाने का दारोमदार उपसभापति पर होता है. पिछले छह साल से पीजे कुरियन यह जिम्मेदारी संभाल रहे थे. 2012 में वो दूसरी दफा केरल से कांग्रेस की टिकट पर राज्यसभा के सांसद बने थे. अगस्त 2012 में के.रहमान खान का कार्यकाल खत्म होने के बाद उन्हें उपसभापति के पद के लिए निर्विरोध चुना गया था. उस समय मनमोहन सिंह ने उनको उपसभापति का प्रस्ताव सदन में रखा था और विपक्ष में बैठे अरुण जेटली ने इसका समर्थन किया था. छह साल बाद परिस्थियां थोड़ी बदल गई हैं. इस बार उपसभापति चुनाव में कांग्रेस और बीजेपी एक-दूसरे के आमने-सामने हैं.
क्या है नंबर गेम
बीजेपी इस समय राज्यसभा की सबसे बड़ी पार्टी है. कुल 241 में से उसके पास 69 सीट हैं. जेडीयू अकाली दल, शिवसेना, बोडो फ्रंट, आरपीआई, एनपीएफ, नॉमिनेटेड और निर्दलीय मिलाकर कुल 108 सांसद बीजेपी के खेमे में खड़े हैं. बीजेपी-शिवसेना की हालिया तकरार को देखते हुए अगर सेना के तीन सांसद कम कर दिए जाएं तो यह आंकड़ा घटकर 105 पर आ जाता है.

राज्यसभा में अलग-अलग दलों की ताकत
कांग्रेस बीजेपी के बाद सदन की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है. कमाल की बात है कि उसके पास राज्यसभा में लोकसभा से ज्यादा सांसद हैं. यह राजनीति के लिहाज से वो खगोलीय दृश्य है जो 70 साल में एक बार देखने को मिला है. कांग्रेस के पास फिलहाल 51 सीटें हैं. इसमें अगर आरजेडी. डीएमके, एनसीपी, एसपी, बीएसपी,केरला कांग्रेस, जेडीएस, आईयूएमएल की सीटों को मिला दिया जाए तो इस खेमे की ताकत 86 पर पहुंचती है.
इस नंबर गेम की असली प्लेयर है टीएमसी. उसके पास 13 सांसद हैं. इसके अलावा आम आदमी पार्टी के पास 3, लेफ्ट के पास 6 और टीडीपी के पास 6 सांसद हैं. इनेलो का भी एक सांसद इसी खुद को दोनों खेमों से दूर किए हुए है. कमाल की बात है कि ममता बनर्जी, चंद्रबाबू नायडू, सीताराम येचुरी और अरविन्द केजरीवाल चारों कुमारस्वामी के शपथ के वक़्त एकसाथ मंच पर मौजूद थे. हालांकि ये दल कांग्रेस के साथ गठबंधन में नहीं है लेकिन इनके कांग्रेस के साथ जाने की संभावना ज्यादा है. अगर यह खेमा कांग्रेस के साथ चला जाता है तो उसकी गिनती 116 पर पहुंच जाएगी. फिलहाल राज्यसभा में कुल 241 सांसद हैं. अपना उपसभापति चुनवाने के लिए किसी भी खेमे को 121 सीटें चाहिए होंगी. कुल मिलाकर कागज पर कांग्रेस का पलड़ा भारी दिख रहा है.

अगर विपक्ष एक होता है तो बीजेपी को हार का सामना करना पड़ सकता है
नवीन पटनायक की बीजू जनता दल के पास 9, केसीआर की तेलंगाना राष्ट्र समिति के पास 6 और वाइएसआर कांग्रेस के पास 2 सीटें हैं. इनकी कुल जोड़ 17 पर पहुंचती है. तीनों दल अजीब धर्मसंकट में फंसे हुए हैं. तीनों राज्यों में 2019 के लोकसभा चुनाव के साथ ही विधानसभा चुनाव भी होने हैं. तेलंगाना और ओड़िसा में कांग्रेस मुख्य विपक्षी दल है. ऐसे में चुनाव से पहले वो कांग्रेस के पाले में जाने से रहे. बीजेपी के साथ जाने पर अल्पसंख्यक वोटों के छिटकने का खतरा भी नहीं उठाया जा सकता. जगन मोहन रेड्डी उस मोर्चा का हिस्सा नहीं बन सकते जिसमें चंद्रबाबू नायडू उनके बगलगीर हों. ऐसे में एक संभावना यह भी है कि ये तीनों दल खुद को वोटिंग से दूर रखें. ऐसे स्थिति में बहुमत का जरुरी आंकड़ा 113 पर आ जाएगा.
विपक्षी एकता का लिटमस टेस्ट
कांग्रेस के हाल के कर्नाटक विधानसभा चुनाव में यह साबित करने की कोशिश की है कि वो क्षेत्रीय दलों को बराबरी का दर्जा देने के लिए तैयार है. दोगुनी सीट होने के बावजूद कर्नाटक में कांग्रेस ने ना सिर्फ मुख्यमंत्री पद को गठबंधन के नाम पर कुर्बान कर दिया बल्कि कई बड़े मंत्रालय भी जेडीएस को थमा दिए. राज्यसभा में उपसभापति के चुनाव में उसे एकबार फिर से ऐसा करने के लिए मजबूत होना पड़ सकता है.

चंद्रबाबू नायडू टीएमसी के पक्ष में विपक्ष को एक करने में जुटे हुए हैं.
सूत्रों की माने तो टीएमसी अपने सांसद को उपसभापति की कुर्सी पर देखना चाहती है. वो अपनी तरफ से सुकेंदु रॉय का नाम आगे बढ़ा रही है. टीएमसी के सांसद डेरिक ओ'ब्रायन लगातार चंद्रबाबू नायडू के संपर्क में बने हुए हैं. सूत्र बताते हैं कि चंद्रबाबू ने हाल ही में उद्धव ठाकरे से बात की है. वो चाहते हैं कि शिवसेना भले ही विपक्ष के उम्मीदवार को समर्थन ना करे, वो बीजेपी के विरोध में वोटिंग का बहिष्कार भी कर ही सकती है. ऐसे में बीजेपी के लिए बहुमत जुटाना लगभग असंभव हो जाएगा.
कुल मिलाकर चंद्रबाबू नायडू इस पूरे चुनाव की धुरी बने हुए हैं. वो एक तरफ शिवसेना को बीजेपी गठबंधन से तोड़ने की कोशिश में लगे हुए हैं वहीं दूसरी तरफ वो कांग्रेस को तृणमूल के उम्मीदवार के लिए मनाने में लगे हुए हैं. अगर वो कांग्रेस को मना भी लेते हैं तो लेफ्ट को टीएमसी के उम्मीदवार के लिए तैयार करना टेढ़ी खीर साबित हो सकता है. हाल के पंचायत चुनाव में हुई हिंसा में लेफ्ट के कई कारकूनों को टीएमसी के हमले झेलने पड़े थे. ऐसे में सीपीएम पर टीएमसी के साथ ना जाने का एक नैतिक दबाव होगा. कुमारस्वामी के शपथग्रहण को अभी एक महीना नहीं हुआ है और विपक्षी एकता का नारा अपनी पहली अग्नि-परीक्षा से गुजर रहा है.
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