पटना के एग्जीबिशन रोड पर पंजाब नेशनल बैंक की एक शाखा है. इस बैंक की खाता संख्या0380000100030687 में करीब दो हजार रुपए पड़े हुए हैं. इस बैंक अकाउंट के मालिक कोदुनिया छोड़े हुए 55 साल हो गए हैं. बैंक इस अकाउंट में हर 6 महीने में बिना नागाब्याज जमा कर देता है. बैंक ने इसे अपने पहले अकाउंट का दर्जा दिया हुआ है. येअकाउंट है भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद का. जिनके राष्ट्रपति चुनावके खाते में 5,07,400 वोट थे.आपने कभी सोचा है कि भारत का संविधान जब नवंबर 1949 में ही बनकर तैयार हो गया था तोउसे 26 जनवरी 1950 को लागू क्यों किया गया? दरअसल 26 जनवरी की तारीख भारत की आजादीकी लड़ाई में बहुत ख़ास थी. 1929 में इसी दिन लाहौर अधिवेशन में कांग्रेस ने पूर्णस्वराज की घोषणा की थी. संविधान सभा के लोग इसी दिन को यादगार बनाना चाहते थे,इसलिए इसे गणतंत्र दिवस के रूप में चुना गया.राजेंद्र बाबू की चलती तो हम किसी और दिन गणतंत्र दिवस मनातेएक आदमी इस दिन को चुने जाने से खुश नहीं था. वो थे राजेंद्र प्रसाद. वो परंपरावादीहिंदू थे और उनके मुताबिक ये दिन ज्योतिष के हिसाब से ठीक नहीं था. पंडित नेहरूआधुनिक खयाल वाले नेता थे, जिनके लिए ज्योतिष शास्त्र कोई ख़ास महत्व नहीं रखता था.अंत में ना चाहते हुए भी राजेंद्र प्रसाद ने 26 जनवरी, 1950 को 10 बज कर 24 मिनट परअश्विन नक्षत्र में राष्ट्रपति पद की शपथ ली. साल भर से चल रही वैचारिक लड़ाई में येनेहरू के लिए सांत्वना पुरस्कार था. वो ये जंग काफी पहले हार चुके थे.राजगोपालाचारी को राष्ट्रपति बनाने की जंग.नेहरू और राजगोपालाचारी1949 के मध्य में जब संविधान बनने की प्रक्रिया अपने आखिरी दौर में थी, नए लोकतंत्रके राष्ट्रपति के चुनाव को लेकर सरगर्मी तेज हो गई. नेहरू का विचार था किराजगोपालाचारी को देश का पहला राष्ट्रपति होना चाहिए. एक तो वो पहले से गवर्नर जनरलके तौर पर काम कर रहे थे. उन्हें राष्ट्रपति बनाने के लिए महज टाइटल में बदलाव करनाथा. दूसरा राजगोपालाचारी की 'सेक्युलरिज्म' पर समझदारी नेहरू से मेल खाती थी. वहींकांग्रेस के कई नेता राजाजी को इसलिए स्वीकार करने को तैयार नहीं थे क्योंकिउन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन को बीच में छोड़ दिया था. जून 1949 में ब्लिट्ज में इसबाबत खबर छपी-"राजाजी के समर्थकों का तर्क है कि राजेंद्र प्रसाद का स्वास्थ्य इतने मेहनत भरेकाम की गवाही नहीं देता. वहीं कांग्रेस के कई नेता राजाजी को उनके अतीत की वजह सेस्वीकार नहीं करना चाह रहे हैं."जब नेहरू का झूठ पकड़ा गया! नेहरू उनके चुनाव के प्रति इतने उतावले थे कि इसके लिएउन्होंने झूठ बोलने से गुरेज नहीं किया. पूर्व इंटेलिजेंस अफसर रहे आरएनपी सिंहअपनी किताब "नेहरू ए ट्रबल्ड लेगेसी" में उस वाकये का जिक्र करते हैं. हुआ ये था कि10 सितम्बर, 1949 को नेहरू ने प्रसाद को एक खत लिखा. इस खत का मजमून ये था किउन्होंने सरदार पटेल से नए राष्ट्रपति के बारे में बात की. इस बातचीत में ये तय हुआकि राजाजी को ही राष्ट्रपति बनाया जाना चाहिए.राजेंद्र प्रसाद को सरदार पटेल का ये विचार हजम नहीं हुआ और उन्होंने इस बारे मेंपता करने की कोशिश की. अगले दिन उन्होंने नेहरू को जवाबी खत लिखा. जिसमें उन्होंनेनेहरू को इस बात के लिए काफी खरी-खोटी सुनाई. उन्होंने साफ़ कहा कि पार्टी में उनकीहैसियत का खयाल रखते हुए उनके साथ बेहतर बर्ताव किया जाना चाहिए. उन्होंने इस खत कीएक कॉपी सरदार पटेल को भी भेज दी.पटेल को गृहमंत्री पद की शपथ दिलवाते राजेंद्र प्रसादजब ये खत नेहरू की टेबल पर आया, तो उन्हें समझ में आ गया कि वो इस मामले में बंदगली में फंस चुके हैं. उन्होंने आधी रात तक बैठकर अपनी सफाई तैयार की. अपने जवाबीखत में उन्होंने लिखा-"जो भी मैंने लिखा था, उससे वल्लभभाई का कोई लेना-देना नहीं है. मैंने अपने अनुमानके आधार पर वो बात लिखी थी. वल्लभभाई को इस बारे में कुछ भी पता नहीं है."आखिर नेहरू क्यों चाहते थे कि राजेंद्र बाबू राष्ट्रपति ना बनें? दरअसल कांग्रेस उससमय कई विचारधाराओं वाला संगठन हुआ करता था. उस समय लड़ाई ये चल रही थी कि आखिर कौनसी विचारधारा कांग्रेस की आधिकारिक विचारधारा होगी. नेहरू पश्चिम में पढ़े-लिखे थे.उनके खयालात उस वक़्त के मुताबिक काफी खुले थे. वो समाजवाद के समर्थक थे. रूस कीप्रगति से प्रभावित थे. वो राजनीति में धर्म का किसी भी किस्म का हस्तक्षेप नहींचाहते थे. राजेंद्र प्रसाद नेहरू के इस खांचे में फिट नहीं बैठते थे.अगली कड़ी में पढ़िए किस्सा उस खत का जो राजेंद्र प्रसाद ने बड़े गुस्से में लिखा था.इस खत को पहुंचना था पंडित नेहरू के पते पर, लेकिन एक नेता की सलाह पर यह खतराजेंद्र प्रसाद की जेब में धरा रह गया.--------------------------------------------------------------------------------वीडियो- महामहिम: देश का इकलौता राष्ट्रपति, जिस पर गोलियां चलीं