मुख्यमंत्री की रेस में गहलोत ने पायलट को कैसे दी पटखनी?
सचिन पायलट आखिर तक अड़े रहे. जानिए सत्ता के गलियारे में क्या-क्या हुआ.

क्या आपने देवता और दानवों की कहानी सुनी है? कहानी जिसमें ब्रह्मा जी दोनों को बिना हाथ सिकोड़े लड्डू खाने के लिए कहते हैं. रूपकों से माफ़ी मांगकर दो मुख्यमंत्रियों के चुनाव देखिए. पहला, 2014 के अक्टूबर में हुआ हरियाणा विधानसभा चुनाव. 1966 में हरियाणा राज्य बनने के बाद पहली दफा बीजेपी को सूबे में बहुमत मिला था. मुख्यमंत्री पद के लिए सबसे आगे थे राव इंद्रजीत सिंह, कैप्टन अभिमन्यु, प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष राम विलास शर्मा और बीजेपी किसान मोर्चे से जुड़े हुए ओपी धनकड़. मनोहर लाल खट्टर इस पूरी दौड़ में वाइल्डकार्ड एंट्री थे. 21 अक्टूबर को चंडीगढ़ में नए चुने गए विधायकों की मीटिंग बुलाई गई. वैंकय्या नायडू और दिनेश शर्मा को दिल्ली से चंडीगढ़ भेजा गया था. सारा मामला निपटाने के लिए.
मनोहर लाल खट्टर बीजेपी के बजाए संघ से आते थे. विधायकों और संगठन पर कोई खास पकड़ नहीं थी. जातिगत समीकरण के हिसाब भी जाट-यादव बाहुल्य वाले सूबे में कहीं से फिट नहीं बैठते थे. 21 तारीख की शाम को उनके नाम का एलान कर दिया. ऐसा नहीं था कि खट्टर के चुनाव का विरोध नहीं हुआ. लेकिन इस सारे 'खून-खराबे' को बीजेपी ने बड़ी सफाई से निपटा लिया.
इसके चार साल बाद 3 राज्यों में कांग्रेस को बहुमत मिला. तीनों ही राज्यों में कांग्रेस चुनाव से पहले ही खेमे में बंटी हुई थी. चुनावी जीत ने कांग्रेस दफ्तर के भीतर चल रही लड़ाई को सड़क पर ला दिया. 13 तारीख को दी लल्लनटॉप 12, तुगलक लेन के सामने की सड़क पर खड़ा था. हमने वहां जो देखा वो आपके सामने पेश कर रहे हैं.

11 दिसंबर को राजस्थान के विधानसभा चुनाव के नतीजे आए. कांग्रेस जैसे-तैसे करके यह मुकाबला जीतने में कामयाब रही. 12 दिसंबर को कांग्रेस के नए चुने गए विधायकों की मीटिंग बुलाई गई थी. इसमें नए मुख्यमंत्री का चुनाव होना था. केसी वेणुगोपाल को केंद्र की तरफ से पूरे मामले को निपटाने के लिए भेजा गया था. विधायक दल में अशोक गहलोत को पर्याप्त समर्थन था. 8 निर्दलीय भी उन्हें समर्थन देने की बात कह चुके थे. खबर आई कि शाम 4.30 के करीब कांग्रेस प्रदेश कार्यालय में प्रेस कॉन्फ्रेंस होगी और अशोक गहलोत के नाम की घोषणा हो जाएगी. कांग्रेस ने राज्यपाल से मिलने के लिए शाम 7 बजे का समय भी ले रखा था. प्रदेश कांग्रेस कार्यालय के बाहर सचिन पायलट और अशोक गहलोत के समर्थकों की भीड़ थी. घोषणा अब हुई, तब हुई के बाद शाम को नई खबर आई. अशोक गहलोत, सचिन पायलट और केसी वेणुगोपाल चार्टर प्लेन से दिल्ली रवाना हो रहे हैं. थोड़ी देर में नया अपडेट आया कि दिल्ली आना फिलहाल के लिए टल गया है.
इसके अगले दिन 13 दिसंबर की सुबह जल्द ही तीनों नेता दिल्ली पहुंच चुके थे. सुबह 10 बजे इन तीनों लोगों की राहुल गांधी के आवास 12 तुगलक लेन में मुलाकात होनी थी. इधर मध्यप्रदेश में भी शाम को यह खबर आ चुकी थी कि दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कमलनाथ के मामले में सहमति जता दी है. लेकिन सुबह होने तक मध्य प्रदेश का मामला भी उलझ गया. ऐसे हालात में 12 तुगलक लेन के सामने वाली सड़क जंग का मैदान बनी हुई थी.
सुबह 10.49 को सिल्वर रंग की एक मित्सुबिसी पजेरो के लिए 12 तुगलक लेन के सामने लगे बैरिके़ड पीछे खिसकाए जाने लगे. गाड़ी का नंबर था DL3C CN0493. गाड़ी को देखते ही मीडिया के कैमरों ने उसकी खिड़की पर 'हमला' बोल दिया. सचिन पायलट ने शुरुआत में इस तरह से बर्ताव किया जैसे खिड़की के बाहर उन्हें कुछ दिखाई नहीं दे रहा है. आखिरकार उन्होंने अपने दोनों हाथ जोड़ दिए. इस माहौल में दी गई सबसे संतुलित प्रतिक्रिया. सचिन पायलट के भीतर जाते ही तमाम रिपोर्टर यह अपडेट देने के लिए कैमरों के सामने आ गए. अपडेट दी जाने लगी. सूत्रों के हवाले से खबर आ रही थी कि अंदर मुख्यमंत्री का नाम तय किया जा रहा है.

राहुल गांधी से मिलने जाते सचिन पायलट.
सचिन पायलट के भीतर जाने के चार मिनट बाद राजस्थान में पर्यवेक्षक बनाकर भेजे गए केसी वेणुगोपाल बैरिकेड्स की तरफ पैदल चलते हुए आए. उन्होंने मीडिया से कोई खास बात नहीं ही. बस इतना ही कह पाए कि मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा जल्द ही होने जा रही है. इसके बाद मीडिया की भीड़ से निकलकर मलयाली चैनलों के कैमरों की तरफ मुड़ गए. पास ही खड़े हिंदी चैनल के कैमरामैन ने अपने साथी से कहा, "अरे ये हमें नहीं देगा बाइट. सिर्फ इन्हें ही देगा." वेणुगोपाल को कितनी हिंदी समझ में आती है इस बात पर तयशुदा तरीके से कुछ नहीं कहा जा सकता, लेकिन यह तय है कि यह बात उनके कानों में जरूर पहुंची होगी. वेणुगोपाल ने मलयाली चैनलों को बाइट दी और सामने खड़ी स्विफ्ट डिजायर में बैठकर चल गए.
11 बजकर 18 मिनट पर अशोक गहलोत की सफ़ेद टाटा सफारी के लिए बैरिकेड पीछे खिसकाए गए. कैमरा पर्सन्स के 'हमले' और अशोक गहलोत की प्रतिक्रया में वही दोहराव था. अंदर मीटिंग चल रही थी. मुख्यमंत्री का नाम तय किया जा रहा था. अपडेट दिए जा रहे थे. सुबह से ही राजस्थान के मुख्यमंत्री का सरकारी सुरक्षा जत्था 12 तुगलक लेन के बाहर खड़ा था. यह तय माना जा रहा था कि दोनों में से कोई एक मुख्यमंत्री का तमगा लेकर बाहर निकलेगा.
11 बजकर 27 मिनट पर सचिन पायलट राहुल गांधी के आवास से बाहर निकले. इस बार उन्होंने किसी भी तरह की प्रतिक्रिया नहीं दी. उनकी खिड़की पर 'हमला' बोल रहे एक कैमरा पर्सन ने कहा, "ये नहीं बन रहा भाई. इसका चेहरा उतरा हुआ है." पत्रकारों के लंबे-चौड़े सूत्र जो बात कायदे से नहीं बता पा रहे थे, इस कैमरा पर्सन ने उसे पहली झलक में दर्ज कर लिया. इसके दस मिनट बाद अशोक गहलोत भी राहुल गांधी के आवास से निकल गए. आधा दर्जन कैमरा पर्सन्स 100 मीटर तक अशोक गहलोत की गाड़ी के साथ दौड़ते रहे. अशोक गहलोत तुगलक लेन के सामने की सड़क से बाएं मुड़ गए थे. इससे पहले सचिन पायलट की गाड़ी दाईं तरफ मुड़ी थी.

राहुल गांधी के आवास पर मीटिंग के लिए पहुंचते अशोक गहलोत.
अशोक गहलोत के निकलने के तकरीबन 15 मिनट बाद ही उनके एक करीबी का मैसेज हमारे पास आया - "चीजें हमारे पक्ष में हैं. बात अपने तक ही रखना." हमने भी मीटिंग को खत्म मान लिया. खबर आई कि अशोक गहलोत और सचिन पायलट जयपुर के लिए रवाना होंगे. जयपुर पहुंचकर पायलट विधायकों के सामने अशोक गहलोत के नाम का प्रस्ताव रखेंगे जिसे सर्वसम्मति से पास कर दिया जाएगा. अशोक गहलोत राहुल गांधी के घर से निकलने के बाद सीधा एयरपोर्ट पहुंच गए. चार बजे उन्हें जयपुर पहुंचना था. इस घोषणा के बाद सीएम एस्कोर्ट की दो टीम जयपुर के सांगानेर हवाई अड्डे की तरफ निकल गईं.
इस घोषणा के दस मिनट बाद हिंसक प्रदर्शन की पहली खबर आई. सचिन पायलट के समर्थकों ने हिंडौन-महवा मार्ग पर जाम लगा दिया. इसके बाद पूर्वी राजस्थान में कई जगहों से हंगामे की खबरें आने लगीं. अब यह मामला कांग्रेस के लिए शर्म का बायस बनना शुरू हो गया. अशोक गहलोत एयरपोर्ट पर बैठे हुए थे. सचिन पायलट के आने का इंतजार कर रहे थे. आलाकमान ने दोनों को साथ जयपुर जाने का निर्देश दिया था ताकि कार्यकर्ताओं को एकता का सन्देश दिया जा सके.
सचिन पायलट दिल्ली में रुके रहे. जयपुर जाने का समय आगे बढ़ता रहा. खबर आई कि दोनों लोग 7.45 की फ्लाइट पकड़कर जयपुर पहुंचेगे. बिरधीचंद शर्मा, मूलचंद मीणा, हरिमोहन शर्मा जैसे कई नेता जयपुर के सांगानेर एयरपोर्ट पर दोनों की अगवानी के लिए पहुंच चुके थे. अशोक गहलोत की टिकट बुक हो चुकी थी. दिल्ली से जयपुर के लिए शाम 7.15 पर उड़ान भरने वाली एयर इंडिया की फ्लाईट संख्या AI 9643 की 17 नंबर सीट उनके नाम से आरक्षित कर दी गई. सांगानेर हवाई अड्डे के बाहर गहलोत के समर्थकों का जमावड़ा लगना शुरू हो गया.

सचिन पायलट को मुख्यमंत्री ना बनाने का विरोध में आगजनी करते कांग्रेस कार्यकर्ता.
शाम 6 बजे घटनाओं ने नया मोड़ लेना शुरू किया. खबर आई कि अशोक गहलोत, सूबे में कांग्रेस प्रभारी अविनाश पाण्डेय और केसी वेणुगोपाल को एयरपोर्ट से लौट आने का निर्देश दिया गया है. अब अशोक गहलोत के खेमे में तनाव बढ़ गया. इसके राहुल गांधी के आवास पर नए सिरे से मीटिंग का दौर शुरू हुआ. सूचना यह आई कि रात 11 बजे मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के नए मुख्यमंत्रियों का ऐलान हो जाएगा. रात 11.30 पर कमलनाथ के नाम का ऐलान हो गया लेकिन राजस्थान और छत्तीसगढ़ का पेंच फंसा रहा.
14 दिसंबर की सुबह नए सिरे से मीटिंग हुई. इससे पहले यह खबर आम हो चुकी थी कि सोनिया गांधी और प्रियंका की तरफ से अशोक गहलोत के नाम पर हरी झंडी दिखा दी है लेकिन राहुल सचिन के नाम को लेकर अड़े हुए हैं. सुबह करीब डेढ़ घंटे तक चली मीटिंग के बाद अशोक गहलोत के नाम पर सहमति जता दी गई.
इस पूरी उठापटक के बीच एक और आदमी था जो पूरी कहानी में कहीं नहीं था. इस आदमी का नाम है लक्ष्मी नारायण जायसवाल. जायसवाल साहब बिहार के मधेपुरा से दिल्ली पहुंचे हुए थे. वो कांग्रेस की खेत मजदूर यूनियन के कार्यकर्ता हैं. उनके एक हाथ में कांग्रेस युवा सन्देश की ताजा प्रति थी और दूसरे हाथ में अखबारों से भरा हुआ एक थैला. वो राहुल गांधी के आवास के बाहर मंडरा रहे थे. सिर्फ इस उम्मीद में कि राहुल गांधी से मुलाकात का एक मौक़ा मिल जाए. जब उनसे यह पूछा गया कि वो राहुल से क्या कहना चाहते हैं तो उनका कहना था - "हम 1998 से कांग्रेस के कार्यकर्ता हैं. इस देश को बचाने के लिए कांग्रेस को फिर से लाना बहुत जरूरी है. जब देश बचेगा तभी तो देह बचेगी."
कांग्रेस इस देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी है. हिंदी पट्टी के तीन राज्यों में जीत राजनीतिक फलक से गायब होती कांग्रेस के लिए नई संजीवनी बनकर उभरी थी. लेकिन मुख्यमंत्रियों के चुनाव को लेकर जितना खून बहाया गया है वो सबसे ज्यादा कांग्रेस को ही कमजोर करेगा. तीन राज्यों में जीत विपक्षी दल के लिए बड़ा मौक़ा था. लेकिन कांग्रेस ने यह मौक़ा गंवा दिया. नतीजों के बाद आपसी कलह की जो तस्वीर उभरकर आई है, उससे उबरने में कांग्रेस को लंबा समय लग जाएगा. और लोकसभा चुनाव में महज 4 महीने का वक़्त बचा है.
Watch Video: क्या गहलोत ने सीएम की कुर्सी के लिए अपनी गोटी पहले ही सेट कर ली है ?

