वो भारतीय जिसने खत्म कर दी अंग्रेज़ों को सलाम करने की परंपरा
अपने पुत्र के मौत की चिट्ठी पढ़कर भी काम करते रहे. आज ही के दिन राजा राममोहन राय दुनिया को अलविदा कह गए थे.

3. बेटे की मौत की खबर भी हिला नहीं सकी
कुछ लोगों का मानना था कि राममोहन राय ब्रह्मज्ञानी थे. उन पर किसी तरह की दुनियावी घटनाओं का असर नहीं होता. इसका पता लगाने के लिए एक बार उनके दो मित्रों ने योजना बनाई और उन्हें एक पत्र भेजा, जिसमें लिखा था कि आपके पुत्र की दुर्घटना में मौत हो गई है. राममोहन राय ने पत्र पढ़ा. थोड़ी देर के लिए वो परेशान दिखे इसके बाद वो फिर से अपना काम करने लगे. कुछ ही समय में उन्होंने अपने आपको संभाल लिया था. ब्रह्मज्ञानी हो ना हों, खुद को कंट्रोल करना जानते थे.
4. जब अंग्रेज़ अफसर को सलाम नहीं किया
उस समय नियम था कि अगर कोई अंग्रेज़ अफसर दिखाई दे तो इंडियंस को अपनी सवारी से उतरकर सलाम करना होता था. ऐसा न करने पर सज़ा मिलती थी. एक दिन राममोहन राय अपनी पालकी में कहीं जा रहे थे. रास्ते में कलकत्ता के कलक्टर सर फ्रेडरिक हैमिल्टन खड़े थे. पर पालकी वाले ने अनजाने में पालकी नहीं रोकी. यह बात कलक्टर साहब को बुरी लग गई. उन्होंने इनकी पालकी रुकवाई और राममोहन राय को बुरा-भला कहने लगे. इस घटना का राममोहन राय पर गहरा असर पड़ा. उन्होंंने इसकी शिकायत लॉर्ड मिंटो से की. जिसकी वजह से बाद में इस नियम को खत्म कर दिया गया.
5. हिन्दू होने के बाद भी दफनाया गया
1830 में राजा राममोहन राय इंग्लैण्ड के लिए रवाना हुए. उस समय के मुगल शासक अकबर द्वितीय ने उन्हें अपने एम्बेसेडर के रूप में इंग्लैण्ड भेजा था. क्योंकि राममोहन राय ही उस समय के सबसे पढ़े-लिखे व्यक्तियों में से एक थे. उनको 11 भाषाएं आती थीं. इंग्लैण्ड पहुंचने पर तमाम जानी-मानी हस्तियां उनसे मिलने के लिए आईं. वहां उनका शेड्यूल काफी बिज़ी था और काम का बोझ भी काफी था जिसकी वजह से उनका स्वास्थ्य काफी खराब रहने लगा. 27 सितम्बर 1833 को ब्रिस्टल के पास स्टैप्लेटॉन में मेनिन्जाइटिस के कारण उनकी मौत हो गई. और वहीं पर उन्हें दफना दिया गया. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उस वक़्त लंदन में दाह-संस्कार पर रोक थी. लेकिन 1843 में दुबारा ऑर्नोस वेल में उनकी समाधि बनाई गई. ब्रिटिश स्कॉलर विलियम प्रिंसेप ने इस समाधि का निर्माण करवाया था, जो कि बंगाली गुम्बद या छतरी की तरह है.

ये स्टोरी शिव ने की है
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