पेश है ‘दी लल्लनटॉप’ की नई सीरीज ‘रेडियो जुबानी’ की 9वीं किस्त. इस सीरीज में हमआपको महेंद्र मोदी के लिखे रेडियो से जुड़े किस्से पढ़ा रहे हैं. बीकानेर में पैदाहुए महेंद्र मोदी मुंबई में रहते हैं. रेडियो में 40 साल से ज्यादा का एक्सपीरियेंसहै. विविध भारती मुंबई में लंबे वक्त तक सहायक केंद्र निदेशक रहे. अब तक आप इससीरीज की कई किस्तें पढ़ चुके हैं. अब पढ़िए कि जब एक 16-17 का लड़का लड़कियों केकॉलेज में घुसकर बजाने लगा बैंजो.-------------------------------------------------------------------------------- कितनी छोटी होती है इंसान की ज़िंदगी? शुरू में उसे इस बात का अहसास नहीं होता.बचपन में हर बच्चा जल्दी बड़ा होना चाहता है और इस बात में फख्र महसूस करता है कि वोबड़ा हो गया है. वो जब 4-5 साल का होता है, तब भी मां बाप के सामने तरह तरह से साबितकरने की कोशिश करता है कि वो बड़ा हो गया है. जब प्राइमरी क्लासेज़ में आता है तब भीउसे लगता है, अब वो एलकेजी या यूकेजी में नहीं है, बड़ा हो गया है. फिर जब छठीसातवीं में आता है तो उसे लगता है कि अब तो उसकी गिनती बडों में होनी ही चाहिए.यानी वो तब तक बड़ा होने के लिए जी जान से कोशिश करता है जब तक कि वास्तव में बड़ानहीं हो जाता. जब सब ये मान लेते हैं कि वो बड़ा हो गया है और हर बात में टोकने लगतेहै, ऐसा मत करो, वैसा मत करो. अब तुम बड़े हो गए हो. तब उसके पांव के नीचे से ज़मीनखिसकने लगती है और वो अपने बचपन को मिस करने लगता है. बचपन को मिस करने का येसिलसिला जीवन भर चलता है, ये बात अलग है कि जैसे जैसे बूढ़ा होता जाता है. रेडियोजुबानी की पहली किस्त बचपन के साथ साथ जवानी के दिनों को भी मिस करने लगता है. एकबात आपने महसूस की है या नहीं, मैं नहीं जानता, बचपन में समय की गति बहुत धीमी होतीहै शायद इसीलिए बच्चा जल्दी बड़ा होना चाहता है. मगर धीरे धीरे समय की गति बढ़ने लगतीहै और फिर वो बढ़ती ही जाती है. आप ज़रा याद करके देखिए 20 साल पहले घटी कोई घटनाआपको काफी दूर लगती होगी मगर 10 साल पहले की कोई और घटना उससे आधी दूरी पर महसूसनहीं होगी, बल्कि आधी से बहुत कम दूरी पर लगेगी और 5 साल पहले की घटना तो ऐसा लगेगाकि कल ही घटी हो. यानी समय की गति समान नहीं रहती. जैसे जैसे ज़िंदगी में आगे बढतेहैं, समय की गति भी बढ़ती जाती है. जब वो अंतिम दिन आता है, जब उसे इस दुनिया कोछोड़कर जाना होता है तब उसे लगता है अरे, ज़िंदगी तो इतनी जल्दी गुज़र गई. मैं तो इसेठीक से जी भी नहीं पाया. मुझे थोड़ा सा समय काश मिल सके. मगर उसे जाना होता है तोजाना ही होता है. ऐसे में वो लोग बहुत सुखी रहते हैं जो भगवान में, धर्म में,धार्मिक मान्यताओं में, पुनर्जन्म में गहरा विश्वास रखते हैं क्योंकि उन्हें लगताहै. ये शरीर छोड़कर मुझे तो बस दूसरे शरीर में जाना है. मैं पूजा करुंगा, धर्म कर्मकरुंगा तो ईश्वर मुझे किसी अच्छे घर में जन्म देंगे. दान-धर्म करुंगा तो मेरा अगलाजन्म सुधर जाएगा. वगैरह वगैरह, मगर हर चीज़ को तर्क की कसौटी पर कसने वाले इंसान इनसब बातों पर विश्वास नहीं कर सकते. जीवन के इस दर्शन की शुरुआत उसी वक्त हो जाती हैजब बच्चा बहुत छोटा होता है. वो अपने आस पास जो कुछ होता है उसे देखता है और ईश्वर,धर्म, समाज, स्वर्ग, नर्क, पुनर्जन्म, पूजा–पाठ इन सबके बारे में उसके विचार बननेलगते हैं. मैंने बचपन से देखा कि मेरे पिताजी बहुत मन से दुर्गा की पूजा किया करतेथे. उनसे मेरे भाई साहब ने और मैंने भी ये संस्कार लिए मगर मेरे पिताजी कभी भीपंडितों की पोंगापंथी को स्वीकार नहीं करते थे. स्वर्ग, नर्क, धर्म, कर्म, इन सबकोवो विज्ञान की कसौटी पर कसकर फेल कर चुके थे. रेडियो जुबानी- 2 मैं भी इन सब बातोंपर कभी विश्वास नहीं कर पाया. मेरे पिताजी ने कालांतर में जब मेरी मां की मृत्युहुई तो पूजा पाठ करना बिल्कुल बंद कर दिया. हालांकि पूजा-पाठ में मेरा बहुत विश्वासकभी नहीं रहा मगर जब उन्होंने पूजा-पाठ करना छोड़ा तो उनके साथ ही साथ मैंने भीपूजा-पाठ को तिलांजलि दे दी. मेरे भाई साहब आज भी नियमित रूप से पूजा करते हैं मगरजब भी उनसे इस बारे में बात होती है तो वो कहते हैं यार इतने सालों का एक रूटीन बनाहुआ है उसे तोड़ने का मन नहीं करता, इसके अलावा और कोई बात नहीं है. स्कूल में पढ़ताथा, घर में हर तरह के त्यौहार मनाये जाते थे. मगर मेरे पिताजी उन त्योहारों केसामाजिक पक्ष पर ही ज़ोर देते थे. धार्मिक पक्ष को हंसी में उड़ा देते थे. नतीजा येहुआ कि मेरे दिमाग़ में भी धीरे धीरे बैठने लगा कि ईश्वर कुछ नहीं होता. ईश्वर कीरचना लोगों ने अपने स्वार्थ के लिए की और उसके नाम पर अपना पेट भरते हैं. और 9वीं10वीं कक्षा में पहुंचते-पहुंचते पूरी तरह नास्तिक हो गया. इसी समय में मैंने एकतरफ जहां सुकरात, प्लेटो, हैरेक्लिटस जैसे ग्रीक दार्शनिकों को पढ़ना शुरू किया,वहीं सांख्य, बौद्ध, जैन, योग, चार्वाक, मीमांसा, न्याय आदि भारतीय दर्शनों को पढ़नाशुरू किया. इन सबका विवरण देना यहां मौजूं नहीं होगा, बस इतना कहूंगा कि सबसेज़्यादा अपने आपको तर्क पर आधारित कहने वाला न्याय दर्शन भी मुझे कोई रास्ता नहींदिखा सका और मैं पूरी तरह से नास्तिक हो गया ऐसे में मैंने नीत्शे को पढ़ा तो लगाशायद जो नीत्शे की सोच है वो सच्चाई के ज़्यादा करीब है. मैं आज भी नास्तिक हूं औरमरते दम तक रहूंगा . हालांकि मैं जानता हूं कि नास्तिक होना कितना तकलीफदेह है? आपके सामने कोई भगवान नहीं हैं, आपको बचाने कोई देवी देवता नहीं आयेंगे और आपके मरनेके बाद आपका अस्तित्व मात्र आपके बाद की एक पीढ़ी तक घर में टंगी हुई एक तस्वीर तकसीमित हो जाएगा. वो भी अगर आपकी औलाद लायक हुई तो वरना वो आपकी नहीं, सिर्फ अपनीऔलादों की तस्वीरों से अपने घर को सजाना पसंद करेंगे. यानी आपके इस दुनिया से जानेके बाद सब खत्म. आप ने चाहे कैसे भी कर्म किये हों, मृत्यु के पश्चात आपको उनका कोईलाभ नहीं होने वाला है. और आप इस विश्वास के साथ नहीं मर सकते कि ये तो सिर्फ शरीरका बदलना ही है. रेडियो जुबानी की तीसरी किस्त मैं फिर से दूसरे जन्म में इस धरतीपर आऊंगा. बहुत डरावना लगता है न ये सोचकर कि मेरी मृत्यु के बाद मेरा कोई वजूद इसदुनिया में नहीं रहेगा. मैं हमेशा हमेशा के लिए खत्म हो जाऊंगा. मगर क्या कर सकतेहैं? आपने अपने जीवन का जो दर्शन तय किया है. वो आपकी सोच की जड़ों में इस तरह बैठचुका होता है कि आप बहोत चाहकर भी नहीं बदल सकते. मेरे रेडियो के कई कार्यक्रमोंमें मेरी इस विचारधारा का असर साफ़ दिखा भी है और... इस विषय पर अपने साथियों औरअफसरों से इस विषय में टकराव भी हुए हैं... मेरा मानना है कि धर्म और ईमान दो अलगअलग चीज़ें हैं. आप धर्म को न मानकर भी ईमानदार हो सकते हैं मगर ईमानदार हुए बिनाधार्मिक होने का कोई मायने नहीं है बल्कि ईमान के बिना धर्म का कोई अस्तित्व हीनहीं हो सकता. रेडियो जुबानी की चौथी किस्त स्कूल में इस विषय पर कभी कोई बात होनाबिल्कुल संभव नहीं था. अगर किसी अध्यापक से जीवन, दुनिया, ईश्वर, इन विषयों पर बातकरने की कोशिश करते तो वो डांटकर बिठा देते और हंसी उड़ाते कि पढाई तो होती नहींजीवन को समझने की कोशिश कर रहे हैं. मैथ्स के हमारे एक टीचर थे डी पी मित्तल साहब.बड़े ही लहीम शहीम इंसान. हाथ में हर वक्त एक डंडा. बहुत ही कड़क अध्यापक माने जातेथे. क्लास में हम दो तीन लड़के ऐसे थे जो गणित के पीरियड में दुनिया भर की बातेंकरने को तैयार रहते थे सिवाय मैथ्स के. मित्तल साहब ने एक दिन हम दोनों तीनों लड़कोंको एक उपाधि दे डाली. उन्होंने कहा, राजा महाराजाओं की सवारी जब चलती है, तो उसमेंकुछ बेहद खूबसूरत और सजे धजे घोड़े भी चलते हैं. इन्हें कोतल घोड़े कहा जाता है. येऔर किसी काम के नहीं होते. इनकी सवारी नहीं की जा सकती, इन पर सामान नहीं ढोया जासकता, ये युद्ध में भी काम नहीं आते. इन्हें तो बस सजा धजाकर रखिए. ये सिर्फ देखनेमें ही खूबसूरत लगते हैं. आप तीनों मेरे कोतल घोड़े हो. संगीत और नाटक जैसी विधाओंमें हर बार ढेरों तालियां और वाहवाही बटोरने वाले इंसान को कोतल घोड़े की ये उपाधिकैसी लगी होगी, आप समझ सकते हैं. लगा मैथ्स विषय को छोड़ दूं मगर फिर क्या करूंगा?ये समझ नहीं आ रहा था. ये मेरे जीवन का शायद बहुत कठिन वक्त था. दिल कर रहा था पढाईछोड़ दूं और कुछ ऐसा काम करुं जिस में संगीत हो मगर संगीत के आम कलाकारों की जोस्थिति देखता था, उसमें मैं अपने आपको फिट नहीं पाता था. इधर भाई साहब मेडिकल कॉलेजमें पहुंच गए थे और घर में सब लोग उन्हें डॉक्टर कहकर पुकारने लगे थे. आस पास केसभी लोगों की निगाहें अब मुझपर थीं कि मैं क्या लाइन पकड़ता हूं. मेरे ताऊजी के एकलड़के ने तो मेरी मां से एक दिन कह भी दिया “काकी, राजा (मेरे भाई साहब का घर कानाम) तो खैर मेडिकल कॉलेज में दाखिल हो गया है तो डॉक्टर बन ही जाएगा लेकिनमहेन्द्र किसी दिन कुछ बनेगा तब देखेंगे.देखना... ये हमारी ही तरह रहेगा” ये बातकुछ समय बाद मुझे मेरी मां ने उस वक्त बताई जब मैं रेडियो नाटक के उस ऑडिशन में पासहुआ जिसमें 350 लोग बैठे थे और सिर्फ 3 लोग पास हुए थे. बहुत खुश हुईं थीं वो औरमुझे कहा था, 'लोग चाहे कुछ भी कहें तुम ज़रूर इस लाइन में अपना नाम कमाओगे. ज़रूरीथोड़े ही है कि सब लोग पढाई में ही नाम कमाएं.” वैसे मैं आपको बता दूं कि हायरसेकेंडरी में मेरे 55 पर्सेंट नंबर बने थे. मुझे इन्जीनियरिंग में सिविल ब्रांच मिलरही थी जो मुझे कतई पसंद नहीं थी. अब सवाल ये था कि आखिर हायर सेकेंडरी के बाद क्याकरूँ मैं? संगीत के पीछे मैं पागल था. मैं चाहता था कि संगीत की शिक्षा लूं मगरमेरा दुर्भाग्य देखिये, उस ज़माने में बीकानेर में लड़कों के कॉलेज में संगीत नहींथा. संगीत सिर्फ और सिर्फ लड़कियों का विषय मन जाता था. अमर चंद जी जैसे कुछ कलाकारथे जो संगीत जानते थे मगर सिखाने में उनकी कोई रुचि नहीं थी. एक दिन मेरा दिमाग पतानहीं कैसे खराब हुआ, मैंने साईकिल उठाई और चल पड़ा महारानी सुदर्शना गर्ल्स कॉलेज कीओर. लड़कियों की कॉलेज में 16-17 साल के लड़के को अंदर कौन घुसने दे? रेडियो जुबानीकी पांचवीं किस्त बाहर खड़े चौकीदार की बहुत मिन्नतें कीं कि बस एक बार मुझेप्रिंसिपल साहिबा से मिला दें. मैं इधर उधर देखूंगा भी नहीं. मैंने यहाँ तक कहा किवो चाहें तो मेरी आंखों पर पट्टी बांध दें ताकि मैं किसी लड़की की तरफ न देख सकूं.आखिर उसे दया आई और वो मुझे प्रिंसिपल के कमरे में ले गया और डरते डरते कहा कि मैडमजी ये लड़का आपसे मिलने की बहुत जिद कर रहा था. उन्होंने जलती हुई नज़रों से मुझेदेखा और बोलीं “ पुलिस को बुलाऊं? जानते हो लड़कियों की कॉलेज के अंदर आना तो दूर आसपास चक्कर लगाना भी जुर्म है और तुम्हें अंदर बंद किया जा सकता है.” मैं घबराया मगरकिसी तरह अपनी घबराहट पर काबू पाते हुए टूटे फूटे शब्दों में कहा, 'मैडम मैं संगीतपढ़ना चाहता हूं और संगीत आपकी कॉलेज के अलावा किसी भी दूसरे कॉलेज में नहीं है.'क्या मतलब? क्या तुम्हें लगता है कि तुम यहां संगीत पढ़ सकते हो? 'मेरी आपसेरिक्वेस्ट है कि चाहे आप मुझे क्लास में मत आने दीजिए मगर इम्तेहान देने के लिए नामको एडमिशन दे दीजिए क्योंकि लड़के प्रायवेट इम्तेहान भी नहीं दे सकते.' उन्होंनेसंगीत की लेक्चरर को अपने कमरे में बुलाया और कहा, “ये लड़का बड़ी जिद कर रहा है किइसे संगीत विषय के साथ बी ए करना है इसलिए इसे हम यहां एडमिशन दे दें.” वो लेक्चररमुस्कुराईं और बोलीं, “ ये कैसे संभव है?” मैंने कहा, “मैडम कोई रास्ता निकालिए न.संगीत मेरा जीवन है. अगर आप लोगों ने मना कर दिया तो मुझसे मेरा जीवन छीन जाएगा.”संगीत की मैडम बहुत मुलायमियत के साथ बोलीं, “ अच्छा बेटे तुम संगीत संगीत कर रहेहो, क्या तुमने संगीत किसी से सीखा है?” मैंने कहा, “जी नहीं मैडम.” वो बोलीं“अच्छा तुम संगीत में क्या कर सकते हो?” मैं उस वक्त तक बैंजो, हारमोनियम, बांसुरीबहुत अच्छी तरह बजाने लगा था और सितार, सारंगी और सरोद टूटा फूटा बजाने लगा था. मैंबोला, आप मुझे संगीत रूम में ले चलिए. जो कुछ में थोड़ा बहुत कर सकता हूं आपको उसकीबानगी दिखाता हूं.” मुझे म्यूजिक रूम में ले जाया गया. साथ में बहुत से लैक्चरर्सका काफिला हो गया था, तमाशा देखने. मुझे एक बार तो लगा. मुझे फांसी के फंदे की ओरले जाया जा रहा है और ये सारे तमाशबीन मुझे फांसी पर चढ़ाए जाने का तमाशा देखने जारहे हैं. रेडियो जुबानी की छठी किस्त हम लोग म्यूजिक रूम में बैठे. मैंने डरते डरतेहारमोनियम उठा लिया और मैडम से कहा आप किस सुर से गाएंगी? और क्या गाएंगी? मैं आपकेसाथ अलग अलग साज़ पर संगत करने की कोशिश करूँगा. उन्होंने बताया कि वो पांचवें कालेसे गाएंगी और दरबारी गाएंगी. मेरा भाग्य, मुझे एक सितार भी वहां मिल गया जो दरबारीके सुरों में मिला हुआ था और उनके सुर की बांसुरी भी मिल गयी. अब उन्होंने गानाशुरू किया. मैंने बारी बारी से उनके साथ हारमोनियम, बांसुरी और सितार बजाये. वोलगभग 15 मिनट गाती रहीं और मैं फुर्ती से बदल बदल कर साज़ उनके साथ बजाता रहा. 15मिनट बाद जब वो रुकीं तो उनकी आंखें भरी हुई थीं. उन्होंने मेरे सर पर हाथ फेरा औरबोली” शाबाश बेटा शाबाश तुमने ये सब कहां सीखा? मैं बोला “बस रेडियो के साथ बजा बजाकर, लेकिन मैडम अगर आप बुरा न मानें तो एक चीज़ मैं भी सुनना चाहता हूं.” वो बोली“हां हां ज़रूर, मगर क्या सुनाना चाहते हो?” मैंने कहा, “ये मैं नहीं आप तय करेंगी”.उन्होंने अचरज से पूछा, “क्या मतलब?” मैंने कहा “ जी मैडम अब हारमोनियम आप उठाइयेऔर कोई भी राग जो आप चाहें छेडिए. मैं उसी राग में गाऊंगा, थोड़ा बहुत आलाप लूंगा,ख़याल तो शायद मैं नहीं जानता रहूंगा मगर तराना भी गाऊंगा और तानें भी लूंगा.”उन्होंने राग ललित छेड़ा और मैं उसमें खो गया. गाता गया गाता गया. आंखें बंद करकेगाता ही चला गया. होश तब आया जब मैडम ने हारमोनियम बजाना रोका और पूरा म्यूजिक रूमतालियों की गडगडाहट से गूंज उठा. मैंने अपनी आंखें खोलीं. मुझे कुछ भी साफ़ दिखाईनहीं दे रहा था.. तब महसूस हुआ कि मेरी आंखें आंसुओं से सराबोर थीं.म्यूजिक की मैडमऔर प्रिंसिपल मैडम दोनों ने कहा, “हम बहुत प्रभावित हैं तुमसे मगर बेटा, हमारी भीकुछ मजबूरियां है, हम कुछ नहीं कर सकते. हां हमारे यहां जब भी कोई संगीत काप्रोग्राम होगा हम चाहेंगे तुम ज़रूर आओ. मैं वहां किसी प्रोग्राम का निमंत्रण लेनेनहीं गया था. मैंने उन्हें धन्यवाद कहा, उन दोनों के पैर छुए और अपनी साईकिल उठाकरधीरे धीरे कॉलेज के गेट से बाहर निकल गया, इस अहद के साथ कि अब मैं कभी नहींगाऊंगा. मैंने संगीत को अपने जीवन से खुरच खुरच कर निकाल फेंका. अब भी वो खुरचन रहरह कर बहुत दुःख देती है जब उसमें बड़ी गहरी टीस उठती है. रेडियो जुबानी की 7वींकिस्त रेडियो जुबानी की 8वीं किस्त