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'सोहनी बाई को रिकॉर्ड कर धन्य हुई मेरी जिंदगी'

रेडियो जुबानी 8: 'एक सुरीला कलाकार भी था. जो अपने ही साज़ की भेंट चढ़ गया, जिसे वो अपनी ज़िंदगी से ज्यादा प्यार करता था.'

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लल्लनटॉप
17 मार्च 2016 (अपडेटेड: 12 मई 2016, 10:37 AM IST)
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पेश है ‘दी लल्लनटॉप’ की नई सीरीज ‘रेडियो जुबानी’ की 8वीं किस्त. इस सीरीज में हम आपको महेंद्र मोदी के लिखे रेडियो से जुड़े किस्से पढ़ा रहे हैं. बीकानेर में पैदा हुए महेंद्र मोदी मुंबई में रहते हैं. रेडियो में 40 साल से ज्यादा का एक्सपीरियेंस है. विविध भारती मुंबई में लंबे वक्त तक सहायक केंद्र निदेशक रहे.
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पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी, 5वीं, छठी और 7वीं किस्त में आपने छोटे से बच्चे की रेडियो के लिए शुरुआती दीवानगी पढ़ी. अब पढ़िए कि जब एक सुरीला कलाकार अपने ही साज़ की भेंट चढ़ गया, जिसे वो अपनी ज़िंदगी से ज्यादा प्यार करता था.
  अब मैं सादुल स्कूल में पढ़ रहा था. मेरा बैंजो वादन भी चल रहा था. स्कूल में मैं पढ़ाई के लिए कम और अपने बैंजो वादन के लिए ज़्यादा जाना जाने लगा था. पढ़ाई से इतर गतिविधियों में मेरे भाई साहब भी बहुत सक्रिय थे मगर चूंकि वो पढ़ाकू किस्म के रहे, उनका क्षेत्र रहा डिबेट, शतरंज और राजनीति. उन दिनों स्कूल कॉलेज में आज की तरह के चुनाव नहीं होते थे न चुनाव लड़ना सिर्फ गुण्डे बदमाशों का ही काम हुआ करता था. मेरे भाई साहब छोटे कद के हैं, चश्मा छठी-सातवीं कक्षा में ही लग गया था. क्लास में अव्वल आया करते थे. सभी अध्यापकों के अत्यंत प्रिय छात्र. ओम प्रकाश जी केवलिया हम सब के अत्यंत प्रिय अध्यापक थे. मगर केवलिया साहब के सबसे प्रिय छात्र थे मेरे बड़े भाई राजेन्द्र मोदी. केवलिया साहेब ने उन्हें नाम दिया था- छोटा गांधी. क्लास में अव्वल आने पर उन्होंने मेरे भाई साहब को एक बहुत ही सुन्दर पुस्तक इनाम में दी थी, 'बन्दा बैरागी'. किस प्रकार बन्दा बैरागी देश के लिए शहीद होते है, इस पर पद्य में ये इतनी शानदार किताब थी कि इसकी कुछ लाइंस मुझे आज भी याद हैं. केवलिया साहब की प्रेरणा से ही भाई साहब स्कूल के प्रधानमंत्री पद के लिए खड़े हुए और बहुत अच्छे अंतर से अपने प्रतिद्वंद्वी सूर्य प्रकाश को मात दी. आदरणीय गुरुदेव ओम प्रकाश केवलिया का निधन अभी कुछ ही साल पहले हुआ है. इसे मैं अपना सौभाग्य मानता हूं कि हम दोनों भाइयों पर केवलिया साहब का अत्यंत स्नेह रहा. हां ये बात और है कि दोनों पर उनके इस अप्रतिम स्नेह के कारण अलग अलग थे.
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मेरा संगीत प्रेम ज़ोरों पर था. मैं बैंजो तो बजाता ही था, जब भी मौक़ा मिलता. कोशिश करता कि किसी दूसरे साज़ पर भी हाथ आज़माऊं. मेरे ताऊ जी लोकदेवता राम देव के बहुत बड़े भक्त थे. पश्चिमी राजस्थान में रामदेव की बहुत मान्यता है. भाद्रपद में भक्तों के जत्थे के जत्थे बीकानेर से एक सौ बीस मील यानि लगभग पौने दो सौ किलोमीटर की पैदल यात्रा करके आज भी जोधपुर ज़िले के रामदेवरा नामक स्थान पर पहुंचते हैं, जहां बाबा रामदेव का मंदिर बना हुआ है और एक बहुत गहरी बावली बनी हुई है. इस राम देवरा को बीकानेर और आस पास के क्षेत्रों में रूणीचा कहा जाता है और बावली को हमारे यहां बावड़ी कहते हैं. हर साल दो बार इस जगह मेला भरता है, जहां दूर दूर से यात्री आकर इस बावड़ी में स्नान करते हैं और बाबा के दर्शन करते हैं. अरे इस जगह की एक खास बात तो मैंने आपको बताई ही नहीं. जानते हैं जब आप बाबा रामदेव के मंदिर में प्रवेश करते हैं तो मंदिर के अंदर एक मज़ार बना हुआ पाते हैं. सभी लोग इसी मज़ार की पूजा करते हैं और सुबह शाम मज़ार की आरती भी उतारी जाती है. इस मंदिर में जितने हिन्दू तीर्थ करने आते हैं उतने ही मुस्लिम ज़ियारत करने आते हैं. हिंदू इन्हें पुकारते हैं, “रामदेव बाबा” और मुसलमान इन्हें कहते हैं “राम सा पीर”. आज तो ज़माना बदल चुका है, किसी मंदिर में कोई भी जा सकता है मगर इस मंदिर में कभी भी ऊंच-नीच, छोटे बड़े का भेद-भाव नहीं किया गया और हमेशा से ही हर धर्म, हर जाति के लिए इस मंदिर के द्वार खुले रहे हैं. ये बात कहां तक सच है कहां नहीं जा सकता. मगर लोग ऐसा कहते हैं कि यहां बहुत बड़े-बड़े पर्चे यानि चमत्कार होते थे. बावड़ी की रचना कुछ इस तरह की है कि ऊपर लोहे का एक जंगला लगा हुआ है, और एक तरफ से सीढ़ियां अंदर तक गई हुई हैं. कहा जाता है कि जब कोई चमत्कार होना होता था तो उस व्यक्ति को बाबा रामदेव पुकारते थे और वो व्यक्ति भागता हुआ उस बावड़ी की तरफ जाता था.
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इन्हीं बाबा रामदेव के परम भक्त थे मेरे ताऊ जी . हर महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को उनके घर एक बड़ा आयोजन हुआ करता था जिसे जम्मा कहा जाता था. पास के ही एक गांव सुजानदेसर के मंदिर के (जहां ताऊ जी रोज पैदल फेरी देने जाया करते थे ), पांच-सात पुजारी शाम से पहले ही आकर इकट्ठे हो जाया करते थे. ढेर सारी गुड़ की लापसी या चावल और चने की दाल बनती थी और हम सब लोग मिलकर गुड़ की उस लापसी या चावल और दाल के स्वाद का आनंद उठाया करते थे. उसके बाद घर के बाहर बनी हुई एक बड़ी सी चौकी पर जाजम बिछाकर सब लोग बैठ जाते थे. एक थैली में से मजीरे जिन्हें हम छमछमा कहते थे सब बच्चों के हाथ में दे दिए जाते थे. बड़े मजीरों की जोड़ी, ढोलक और खडताल पुजारियों के सुपुर्द कर दी जाती थीं और उसी वक्त ताऊ जी अंदर से निकालकर लाते थे, वो चीज़ जो मुझे इस जम्मे में सबसे ज़्यादा आकर्षित करती थी. वो था एक पुराना हारमोनियम, जिसे सिर्फ और सिर्फ जम्मे के दिन ही ओरे (बिल्कुल अंदर के कमरे) में से निकला जाता था. मैं बेमन से छमछमे बजाता रहता था मगर मेरी निगाह हारमोनियम पर अटकी रहती थी. मैं बैंजो तो बजाता ही था इसलिए हारमोनियम बजाना मेरे लिए बहुत मुश्किल नहीं था मगर फिर भी जो चीज़ हमारी पहुंच में नहीं होती, वो हमें ज़्यादा आकर्षित करती है. रात भर में कई बार जम्मा देने वाले पुजारियों के लिए चाय बनती और बार बार वो चिलम भी सुलगाते. ऐसे में मुझे मौक़ा मिल जाता हारमोनियम बजाने का. हारमोनियम बजाने वाले पुजारी चिलम सुलगाने लगते और कोई भजन शुरू हो जाता तो मैं आंखों ही आंखों में ताऊ जी से पूछता कि हारमोनियम मैं संभाल लूं? और वो आंखों ही आंखों में हामी भर देते थे और इस तरह मैं हारमोनियम संभाल लिया करता था.
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उन दिनों सेवानिवृत्ति की उम्र 57 वर्ष थी. अचानक राजस्थान सरकार ने सेवानिवृत्ति की उम्र घटा कर 55 बरस कर दी. हजारों लोग जो 55 और 57 के बीच के थे..... एक साथ घर भेज दिए गए. इन हजारों लोगों में मेरे ताऊजी भी शामिल थे. अब उन्हें बीकानेर लौटना ही था.ताऊ जी के तीन बड़े बेटे पहले से ही बीकानेर में रहने लगे थे, अब ताऊजी, ताई जी, गणेश भाई साहब, विमला, रतन, निर्मला और मग्घा को लेकर बीकानेर आ गए थे. विमला, निर्मला और मग्घा का दाखिला महिला मंडल स्कूल में और रतन का दाखिला सादुल स्कूल में करवा दिया गया मगर ताऊजी के आमदनी के स्रोत बहुत सीमित हो गए थे. बहुत सिद्धांतवादी रहे वो जीवनभर. उन्होंने कभी भी ट्यूशन व्यवस्था को बढ़ावा नहीं दिया. बोर्ड से उनके पास इम्तहानों की कॉपियां आया करती थीं जो सेवानिवृत्ति के बाद भी चालू रह सकती थी मगर नौकरी के आखिरी दिनों में पदमपुर में अपनी ही एक औलाद के हाथों वो कुछ इस तरह छले गए कि उनके हाथ से आमदनी का ये स्रोत हमेशा के लिए छिन गया. अब उन्होंने एलएलबी की अपनी डिग्री को झाड़ पोंछकर निकाला और वकालत शुरू कर दी. बड़े ही जीवट के इंसान थे वो. बहुत सी भाषाओं पर उनकी बहुत अच्छी पकड़ थी. वो संस्कृत, पालि और प्राकृत के भी बहुत अच्छे विद्वान थे और उनका हस्तलेख ऐसा सुन्दर था कि उसके सामने छपे हुए शब्द भी फीके लगते थे. शाम के वक्त मैं देखता वो पालि और प्राकृत भाषाओं के हस्तलिखित ग्रंथों की अपने हाथ से हूबहू वैसी ही प्रतियां बनाया करते थे. उन्होंने मुझे बताया कि बीकानेर में अगर चंद नाहटा जी की पांडुलिपियों की एक लायब्रेरी है. वो उस लायब्रेरी में मौजूद ग्रंथों की प्रतिलिपियां बनाकर रख रहे हैं ताकि शोधकर्ताओं को मूल पांडुलिपियों को छूना न पड़े. ताऊ जी जब छुट्टियों में बीकानेर आते थे तो रतन, निर्मला और मग्घा तीनों अक्सर या तो मेरे घर रहते थे या फिर मैं उनके घर मगर रतन तो हर हाल में मेरे साथ ही रहता था. उन दिनों पता नहीं कैसे बीकानेर में मच्छर नाम की कोई चीज़ नहीं हुआ करती थी. गर्मी में मैं और रतन अपने मालिये (छत पर बना कमरा) की छत जिसे तिप्पड कहते हैं उसपर सोया करते थे. रात को जब हम दोनों अपने बिस्तर उठाये तिप्पड पर पहुंचते, चारों तरफ बिल्कुल शान्ति होती तो कई बार उस शान्ति को चीरती हुई एक सुरीली आवाज़ हमारे कानों से टकरा जाती और हम एक साथ या तो चिल्ला पड़ते “जगदीश जी” या फिर और भी ज़ोर से चिल्ला पड़ते “सोहनी बाई”. और बिस्तर तिप्पड पर जैसे तैसे फेंककर नीचे उतरते, एक दरवाज़े पर ताला लगाते और चल पड़ते शब्दभेदी बाण की तरह उस आवाज़ की दिशा में और सचमुच हम कभी रास्ता नहीं भूलते थे. और जा पहुंचते थे अपने टारगेट तक.
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वो मुस्कुरा पड़े. हम जैसे निहाल हो गए. सुबह चार बजे तक हम वो कथा सुनते रहे. जब कथा समाप्त हुई तो क्लेरिओनेट के वो सुरीले कलाकार उठकर हमारे पास आये क्योंकि वो समझ गए थे कि हम उन्हें सुनने के लिए ही बैठे थे. अब हमारा परिचय हुआ. उन्होंने बताया कि उनका नाम जगदीश है और वो एक बैंड में काम करते हैं. हमारे पास तो अपना परिचय देने के लिए था ही क्या? सिवा इसके कि हम दोनों एक अच्छे घर के बच्चे हैं और पढ़ाई कर रहे हैं. बस उस दिन से जब भी जगदीश जी की क्लेरिओनेट की मधुर तान हमारे कानों में पड़ती थी हम भागे चले जाते थे उन्हें सुनने के लिए और अक्सर उनसे बात होती थी. ये दोस्ती जो मेरे छात्र जीवन में शुरू हुई वो तब तक चलती रही जब तक जगदीश जी परिस्थितियों से जूझते हुए क्लेरिओनेट जैसे मुश्किल साज़ को अपनी सांसों की भेंट चढ़ाते रहे. आखिरकार उसी क्लेरिओनेट ने बड़ी बेरहमी से उनकी सांसों को लील लिया जिसपर तैरती हुई उनकी अंगुलियां उस बेजान क्लेरिओनेट को साक्षात् सरस्वती में बदल देती थीं. मगर अफ़सोस.....मैं उनके लिए बहुत कुछ करना चाहकर भी कुछ नहीं कर पाया. मैंने जब आकाशवाणी जॉइन किया. और 1977 में बीकानेर ट्रांसफर होकर आया तो बहुत कोशिश की कि जगदीश को किसी तरह स्टाफ आर्टिस्ट के तौर पर ले लिया जाए मगर मैं कुछ नहीं कर पाया क्योंकि तब तक वो बहुत कमज़ोर हो गए थे और विभाग की अपनी कुछ सरकारी किस्म की मजबूरियां थीं. आप शायद जानते होंगे कि इस तरह के साज़ बजाने वालों के फेफड़ों पर बहुत ज़ोर पड़ता है. उनके लिए ज़रूरी है कि वो अच्छा और संतुलित खाना खाएं वरना टीबी के कीटाणु तो हर वक्त वातावरण में रहते हैं, जैसे ही शरीर की शक्ति कम हुई वो तुरंत उस शरीर को अपनी गिरफ्त में ले लेते हैं. आज टीबी का इलाज बहुत आसान है, बहुत मुश्किल तब भी नहीं था मगर अच्छा खाना उस वक्त भी इलाज की पहली शर्त थी और आज भी है.
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उस वक्त मैं कुछ नहीं समझा था कि जगदीश जी ने ऐसा क्यों कहा मगर थोड़ा बड़ा हुआ तो बहुत से फूंक का साज़ बजाने वाले कलाकारों का हश्र देखा तो उनकी बात समझ में आई. दूसरी आवाज़ जिसे सुनकर मैं और रतन खुशी से चिल्ला पड़ते थे. वो थी सोहनी बाई की आवाज़. दुबली पतली काया. चेहरे पर हल्का सा घूंघट और हाथ में तम्बूरा लिए हुए बड़ी सादगी से तान खींचती हुई सोहनी बाई. हम लोग आवाज़ की सीध में भागते हुए जा पहुंचते थे उस जागरण में जहां सोहनी बाई गा रही होती थीं. लगता था मीरा फिर से अवतार लेकर आ गयी हों इस धरती पर. सच बताऊं मेरे जीवन में तीन लोगों में मुझे मीरा के दर्शन हुए हैं. जुथिका रॉय जी, सोहनी बाई और महादेवी वर्मा. महादेवी जी के साथ अपने अनुभव मैं तब लिखूंगा जब कि आकाशवाणी इलाहाबाद की बातें लिखूंगा. सोहनी बाई की आवाज़ में कोई खास हरकत या गायकी नहीं थी. बहुत ही सीधा सीधा गाती थीं वो मगर दो चीज़ें ऐसी थीं जो उनके गाने को खास बना देती थीं. एक उनकी आवाज़ में ग़ज़ब का मिठास था और दूसरा समर्पण. वो सिर्फ लोक भजन गाती थीं और उनका भजन सुनकर ऐसा लगता था कि ईश्वर के प्रति वो इस क़दर समर्पित हो गई हैं कि स्वयं उनकी आत्मा परमात्मा का हिस्सा हो गयी हैं. मेरे कानों में आज भी उनका वो भजन गूंज रहा है, 'म्हाने अबके बचा ले म्हारी माय बटाऊ आयो लेवाने.....” सीधा सीधा शब्दार्थ लें तो एक बेटी अपनी मां से कह रही है कि हे मां तेरा दामाद मुझे लेने आ गया है तू मुझे इस बार बचा ले. मगर दरअसल ये मां, दामाद और बेटी, ये सब तो प्रतीक हैं. मृत्यु के आगमन पर इस दुनिया से जाती हुई आत्मा वेदना से तड़पती है और कहती है. कोई तो मुझे मृत्यु से बचा ले. मैं और रतन सोहनी बाई के भजन सुनने बैठते तो कब सुबह हो जाती हमें पता ही नहीं चलता. इसके बरसों बाद 1977 में जब मैं उदयपुर से ट्रान्सफर होकर बीकानेर आया और सबसे पहली बार सोहनी बाई को रिकॉर्ड किया तो मुझे लगा मेरा जीवन धन्य हो गया.
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अब ये पूछने की तो गुंजाइश ही नहीं रहती कि ये किसका भजन है. एक बार मैंने पूछा, 'बाई आपको इतने भजन याद कैसे रहते हैं? ये जो आपने अभी गाया वो मीरा का भजन था?” वो बड़ी सरलता से बोलीं.... “हुकुम.... मीरा बाई रो ई है (हुकुम मीरा बाई का ही है.)मैंने कहा “लेकिन कभी सुना नहीं ये भजन. वो थोड़ा घबरा गईं और बोलीं “अन्दाता म्हनै कीं ठा नईं है (अन्नदाता मुझे कुछ भी पता नहीं है) अब मैं चकराया. मैंने फिर भी मुलायमियत से कहा “बाई कहीं ऐसा तो नहीं है कि आप खुद भजन लिख लेती हैं और मीरा बाई और कबीर दास जी के नाम से गा देती हैं ....घूंघट की ओट से वो हलके से मुस्कुराईं और बोलीं “म्हारी काईं औकात सा ? मैं तो साफ़ अनपढ़ हूं. म्हने दसतक करना ई कोनी आवै. हूं काईं लिख्सूं ? (मेरी क्या औकात साब? मैं तो बिल्कुल अनपढ़ हूं. मुझे तो दस्तखत करने भी नहीं आते. मैं भला क्या लिख सकती हूं?) मैंने कहा “सच सच बताइये कि फिर आखिर बात क्या है?” तो वो हाथ जोड़कर बोलीं “भगवान री सौगन म्ह्नै कीं ठा नईं है. हूं तंदूरो नईं उठाऊं जद तईं म्हनै कीं पतों नईं रैवे कि मैं काईं गासूं पण तंदूरो उठाता ईं बा मावडी या बो बाबो जाणै हिवडेमें काईं उपजावै के आप ऊं आप जिको म्हारै मूंडै मैं आवै हूं गा दूं.... (जब तक मैं तंबूरा नहीं उठाती हूं, मुझे कुछ पता नहीं होता कि मैं क्या गाऊंगी मगर बस तम्बूरा हाथ में लेते ही या तो वो मां(मीरा) या वो बाबा(कबीर) हिवडे में उतर के जो कुछ उसमें उपजा देते हैं, मैं गाती चली जाती हूं......) हुकुम जिकी चीज नै हूं समझूं ई नईं बा म्हारी कियां हूं सकै? बा या तो बीं मावडी री हू सकै या फेर बीं बाबै री (हुकुम जिस चीज़ को मैं समझ ही नहीं सकती वो चीज़ मेरी कैसे हो सकती है? वो या तो उस मां मीरा बाई की हो सकती है या फिर उस बाबा कबीर दास की). उनकी आवाज़ से लगा उनकी आंखें छलछला आई हैं. मुझे लगा इस विषय में और कुछ कहना उनका दिल दुखाना होगा. वैसे भी मीरा बाई तो राजस्थान की धरती पर पैदा हुईं थीं मगर देश के हर हिस्से में मीरा बाई के भजन लोक कलाकारों द्वारा अलग अलग रूप में गाये जाते रहे हैं. कौन कह सकता है कि कौन कौन से भजन उनके खुद के रचे हुए हैं और कौन कौन से भजन महज़ उनके ऊपर घनघोर आस्था रखने वाले लोक कलाकारों के हृदयों ने रच दिए हों. मैंने उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया और.....मुझे लगा, मुझे आज मीरा बाई के दर्शन हुए हैं. आज वो सोहनी बाई हमारे बीच नहीं हैं. राजस्थान के बाकी केन्द्रों पर तो उनकी शायद ही कोई रिकॉर्डिंग होगी, पता नहीं आकाशवाणी बीकानेर पर भी उनके भजनों के कितने टेप्स इरेज़ कर, उनपर कमर्शियल रिकॉर्ड कर लिए गए होंगे, क्योंकि अब तो आकाशवाणी के हर केन्द्र पर पैसा कमाने पर ही ज़ोर दिया जाता है ना? आकाशवाणी कभी कला और कलाकारों का अवश्य ही पोषक रहा है मगर पिछले काफी समय से ज़्यादातर इस पर अधकचरे अफसर ही काबिज रहे हैं, जिन्हें न कला की समझ होती है और न ही अफसरी की तमीज़ वरना डेढ़ डेढ़ घंटे तक के मेरे पचासों ऐसे नाटक एक ही दिन में श्याम प्रभू एरेज़ नहीं करवा देते जिन्हें तैयार करने में कोटा के 30-40 कलाकारों ने एक एक महीने का वक्त दिया था. खैर...... ये कहानी फिर सही.
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