पेश है ‘दी लल्लनटॉप’ की नई सीरीज ‘रेडियो जुबानी’ की छठी किस्त. इस सीरीज में हमआपको महेंद्र मोदी के लिखे रेडियो से जुड़े किस्से पढ़ा रहे हैं. बीकानेर में पैदाहुए महेंद्र मोदी मुंबई में रहते हैं. रेडियो में 40 साल से ज्यादा का एक्सपीरियेंसहै. विविध भारती मुंबई में लंबे वक्त तक सहायक केंद्र निदेशक रहे. पहली, दूसरी,तीसरी, चौथी, 5वीं किस्त में आपने छोटे से बच्चे की रेडियो के लिए शुरुआती दीवानगीपढ़ी. अब पढ़िए कि रेडियो और दोस्तों की यादों के बीच जब छोड़ना पड़ा एक शहर.-------------------------------------------------------------------------------- पांचवीं क्लास पास करने के बाद सवाल ये उठा कि किस स्कूल में दाखिला लिया जाएक्योंकि राजकीय प्राथमिक पाठशाला संख्या-1 में छठी कक्षा तो थी नहीं. घर से थोड़ी हीदूर रतन बिहारी जी के पार्क में एक मिडिल स्कूल था, श्री गंगा संस्कृत विद्यालय.पिताजी को लगा मुझे थोड़ी संस्कृत पढ़नी चाहिए और उन्होंने मुझे इस स्कूल में डालदिया. सारे पुराने साथी छूट गए. पता लगा मेरे खास दोस्तों श्याम सुन्दर, श्यामप्रकाश व्यास और बृजराज सिंह ने सादुल स्कूल में एडमिशन लिया है. मन बहुत दुःखीहुआ. लगा कहीं कुछ खो गया है. बाद की ज़िंदगी में बड़े बड़े झटके खाए तो अपने इस दुःखको याद करके हंसी आती थी मगर उस वक्त यही महसूस हुआ कि नहीं. अपने दोस्तों को छोड़करजाने के बराबर कोई दुःख हो ही नहीं सकता. नया स्कूल, नए सहपाठी, नए अध्यापक और नयापरिवेश. बहुत रोकते रोकते भी शुरू-शुरू के दिनों में मुझे रोना आ जाता था. तब मुझेसंभाला एक लड़के करनी सिंह राठौड़ ने. वो मुझे प्रधानाध्यापक के पास ले गया. मुझेलगा वो मुझे नौ नंबर स्कूल के श्री किशन मास्टर जी की तरह डांटेंगे या हो सकता हैएकाध थप्पड़ भी जड़ दें. मैं करणी सिंह से मिन्नतें करने लगा, “नहीं, मुझे उनके पासमत ले जाओ”, मगर वो नहीं माना और मुझे घसीटकर उनके पास ले गया. मैं सहमा हुआ साउनके कमरे में पहुंचा. प्रधानाध्यापक जी ने प्यार से मुझे बुलाकर मेरी पीठ पर हाथरखा तो मैं ज़ोर से फूट पड़ा. उन्होंने पानी मंगवाकर मुझे दिया और बोले, “बच्चे क्योंरो रहे हो? क्या तुम्हें किसी ने मारा?” मैंने रोते रोते कहा, “नहीं”. “तो किसीअध्यापक ने डांटा” मैंने कहा, “नहीं” “तो फिर क्या हुआ है? क्यों रो रहे हो?” बहुतप्यार से बोल रहे थे वो. क्या जवाब देता मैं? क्या जवाब था मेरे पास? मैंने तब तककिसी अध्यापक को अपने छात्र के साथ इतने प्यार से बोलते हुए नहीं देखा था, इसलिए एकओर जहां मैं इस नए वातावरण में अपने आपको अकेला पाने की वजह से रो रहा था वहींप्रधानाध्यापक के इस प्यार भरे व्यवहार ने मेरा रोना और तेज़ कर दिया था. क्योंकिमुझे लगा यही शायद वो दामन है जिसमें मुंह छुपाकर मैं अपने सारे आंसू बहा सकता हूं.अपने मन का पूरा गुबार मैंने उनके दामन को सौंप दिया. मैं थोड़ा प्रकृतिस्थ हुआ.मैंने गौर से उनके चेहरे को देखा. वहां एक अजीब सा वात्सल्य मुझे नज़र आया. मेरारोना थम गया था मगर रह रहकर सिसकियां अब भी आ रही थीं. उन्होंने मुझे दुलारते हुएकहा, 'बच्चे, जब भी तुम्हें कोई दिक्कत हो तुम सीधे मेरे पास चले आया करो. मैंनेहां में सर हिलाया और करणी सिंह के साथ आकर क्लास में बैठ गया. अब करणी सिंह सेमेरी दोस्ती हो गयी थी और मुझे लगने लगा कि नहीं. मैं इस स्कूल में अकेला नहीं हूं.कम से कम दो लोग हैं जो किसी भी मुसीबत में मेरी सहायता करेंगे. मुझे पता लगा,हमारे प्रिंसिपल का नाम पण्डित गंगाधर शास्त्री है और वो संस्कृत के प्रकाण्डविद्वान हैं. इस घटना के 33 बरस बाद जब मैं आकाशवाणी, उदयपुर में पोस्टेड थाप्रोग्राम क्यूशीट में यही नाम देखकर चौंक पड़ा था. मुझे एक बार को लगा कि नहीं येपण्डित जी कोई और होंगे क्योंकि......! खैर मैंने पूछा इनकी रिकॉर्डिंग कब है? पतालगा दो दिन बाद. जिस दिन रिकॉर्डिंग थी उस दिन मैं स्टूडियो बिल्डिंग में समय सेपहले ही पहुंच गया और पण्डित जी का इन्तजार करने लगा. थोड़ी ही देर में पण्डित जी नेमेन् गेट में प्रवेश किया और मैं चकित रह गया, उनकी शक्ल-सूरत, चाल-ढाल किसी मेंकोई फर्क नहीं आया था. मैं आगे बढ़ा और उनके चरणों में झुक गया. उन्होंने मेरे चेहरेकी तरफ देखा, आशीर्वाद दिया मगर न पहचान पाने का भाव उनके चेहरे पर साफ़ पढ़ा जा सकताथा, जो स्वाभाविक भी था. कहां एक छठी-सातवीं का छात्र और कहां 42 बरस की अधेड़ावस्थाकी ओर तेज़ी से बढ़ता इंसान. मैंने उनकी उलझन को दूर किया. उन्हें अपना नाम और स्कूलका नाम बताया तो उन्हें भी सब कुछ याद आ गया. वैसे तो हर अध्यापक अपने जीवनकाल मेंहज़ारों छात्रों को पढ़ाता है और उसके लिए किसी भी छात्र को याद रखना आसान नहीं होतामगर ये मेरा सौभाग्य ही मानता हूं कि पढ़ाई में बहुत असाधारण न होते हुए भी मेरेअध्यापकों ने अक्सर मुझे याद रखा है. मुझे एक बार फिर से याद आ गए छठी और सातवींक्लास के वो दिन जब मैंने आधा छठी का और आधा सातवीं का साल पण्डित जी के सान्निध्यमें गुज़ारा था और उसी दौरान उनकी प्रेरणा से “संस्कृत भारती” “संस्कृत प्रबोध” और“संस्कृत विनोद” एक के बाद एक तीन परीक्षाएं पास कर ली थीं. यानि सातवीं कक्षा मेंमैंने संस्कृत में ग्रेजुएशन स्तर प्राप्त कर लिया था और ये सब पण्डित गंगाधरशास्त्री जी के प्रोत्साहन से ही हो पाया था. जानते हैं अभी अभी मेरे उदयपुर के एकसाथी दीपक मेहता ने मुझे बताया कि मेरे वो गुरु ईश्वर की कृपा से आज भी ज़िंदा हैंऔर नाथद्वारा के दिलीप शर्मा ने बताया है कि हालांकि वो आजकल अस्वस्थ हैं मगर जबदिलीप ने उन्हें मेरे बारे में बताया तो वो बहुत खुश हुए और मेरे लिए ढेरोंआशीर्वाद भिजवाए हैं. पंडित जी के प्रोत्साहन से जहां मैंने ये परीक्षाएं पास कीं,वहीं अब मैं स्टेज पर खुलकर बैंजो के प्रोग्राम देने लगा था और अपने स्कूल के लिएकई प्रतियोगिताओं में इनाम जीतकर लाने लगा था. छठी और सातवीं के इन दो सालों की येउपलब्धियां निश्चित ही मेरे लिए अभूतपूर्व थी मगर इस बीच जो कुछ मैंने खोया उसे भीमैं जीवन भर नहीं भूल पाऊंगा. वो रात... वो डरावनी रात आज भी मेरी आंखों में, मेरेजेहन में ज्यों की त्यों ज़िंदा है जिसकी वजह से आज ये एपिसोड में लिख रहा हूं और जोमेरे एक नाटक “लम्हों ने खता की थी......” की विषयवस्तु बनी. छठी कक्षा का आधा सालगुजरा था. तब तक करणी सिंह के अलावा आशुतोष कुठारी और जगमोहन् व्यास जैसे कुछ औरदोस्त भी बन गए थे और दो महीनों की तैयारी में संस्कृत भारती परीक्षा पास कर लेनेकी वजह से टीचर्स भी मुझसे ठीक से पेश आने लगे थे कि एक दिन स्कूल से घर लौट कर आयातो पता चला, पिताजी का तबादला सरदारशहर हो गया है और हमें एक हफ्ते में अपना बोरियाबिस्तर बांधकर बीकानेर से रवाना होना है. दिल धक् से रह गया. इतनी मुश्किल से नएस्कूल के वातावरण में ढाला था मैंने अपने आपको. अब फिर सब कुछ शून्य से शुरू करनापड़ेगा? मैं नहीं जानता था कि नियति अपने गर्भ में मेरे लिए कितना ज़बरदस्त अभिशापलिए बैठी है, वरना मैं कुछ भी करता सरदार शहर नहीं जाता. मेरी बाई (दीदी) बीकानेरमें रहती थीं. उनके पास रहकर ही वक्त गुज़ार लेता. मगर नहीं नियति ने कुछ और ही तयकर रखा था और मैं उसी के इशारों पर चलते हुए पिताजी, मां और भाई साहब के साथ एकसुबह सरदारशहर आ गया, अपने दोस्तों के पीछे छूट जाने का अफ़सोस दिल में छुपाये हुए.दूर रिश्ते की मेरी एक नानी कसाइयों के मोहल्ले में रहती थीं, उनका ऊपर का हिस्साहमने किराए पर ले लिया. दिन किसी तरह गुज़रा. शाम गहराने लगी तो मैं बिजली का स्विचढूंढने लगा. वहां न तो कोई स्विच था और न ही कोई बल्ब. पता चला सरदारशहर केज़्यादातर इलाकों में बिजली नहीं थी और ये मोहल्ला उन्हीं इलाकों में से एक में था.चौराहे पर नज़र दौड़ाई तो देखा, एक आदमी सीढ़ी कंधे पर रखकर आया और वहां लगे हुए लैम्पपोस्ट पर चढ़कर उसने उसमें मिट्टी का तेल डाला और उसे जला दिया. मिट्टी के तेल का वोनन्हा सा दिया घनघोर अंधेरे से लड़ने की जी तोड़ कोशिश करने लगा. मगर क्या औकात थी उसछोटे से दिये की. उस घुप्प अंधेरे के सामने? अन्धेरा उस दिये की हिमाक़त को देखकरअट्टहास कर उठा. मेरा मन घबरा गया. नहीं, नहीं दरअसल ये कोई अट्टहास नहीं था.कसाइयों का मोहल्ला था. किसी घर में बंधे बकरे को शायद अगली सुबह आने वाली अपनी मौतकी आहट सुनाई दे गई थी और वो ज़ोर से चीख पड़ा था. बड़ी ही दर्दनाक थी वो चीख. आज भीउस चीख को याद कर मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं. वो अंधेरी रात किसी तरह गुज़री.दूसरे रोज़ सुबह हुई फिर एक चीख से. खिड़की में जाकर खड़ा हुआ, तो देखा, एक बकरे कागला रेता जा रहा था और वो चिल्लाये जा रहा था. मैंने सोचा, अभी इसका गला पूरा काटदिया जाएगा और ये शांत हो जाएगा, मगर ये क्या? उसका आधा गला काटकर छोड़ दिया गया थातड़पने और चिल्लाने के लिए. मैं एकदम सन्न. मैंने पिताजी से पूछा कि इस बकरे का गलाआधा काटकर क्यों छोड़ दिया उस आदमी ने? तो उन्होंने बताया कि इसे हलाल करना कहतेहैं. पूरे दिन उस बकरे का आधा कटा हुआ वो गला, उसकी वो तड़पती देह और दिल को दहलानेवाली चीखें मेरे ज़ह्नोदिल पर छाई रहीं. उसी दिन पिताजी मुझे दाखिला करवाने के लिएहनुमान संस्कृत विद्यालय लेकर गए. प्रिंसिपल के कमरे में हम लोग पहुंचे तो मेरा दिलप्रार्थना कर रहा था “भगवान करे... प्रिंसिपल कह दें कि हमारे यहां जगह नहीं है, हमइसे एडमिशन नहीं दे सकते. और फिर तो पिताजी को मुझे बीकानेर वापस भेजना ही पड़ेगा.'मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ, प्रिंसिपल ने मेरा और मेरे पिताजी का स्वागत किया और मेराएडमिशन हो गया. पिताजी मुझे प्रिंसिपल के कमरे में छोड़कर घर लौट गए और मैं एक बारफिर अजनबियों के बीच में खडा था. मुझे रोना आने लगा जिसे बड़ी मुश्किल से मैंनेरोका. मुझे प्रिंसिपल सर का चपरासी क्लास में लाकर छोड़ गया था. उस समय क्लास मेंकोई टीचर नहीं था. मैं रुआंसा सा कमरे के एक कोने में जाकर खड़ा हो गया, तभी क्लासका मॉनीटर मेरे पास आया और बोला, “नया आया है?” मैंने हां में गर्दन हिला दी. वोफिर बोला, 'मेरा नाम तेजकरण छाजेड़ है. मैं क्लास का मॉनीटर हूं, आ तेरे बैठने कीव्यवस्था करता हूं'. मैं क्या करता? उसके पीछे पीछे चल पड़ा.... मेरे कानों में रहरहकर पिछली रात सुनी बकरे की चीख गूंज रही थी. मुझे लग रहा था, अभी मेरे गले से भीवैसी ही चीख निकल पड़ेगी और कुछ लोग मुझे दबोच लेंगे जैसे कि मैं अपनी कल्पना में उसबकरे को दबोचे जाते हुए देख रहा था. मुझे लग रहा था, अब तक उस बकरे को दबोच कर काटडाला गया होगा और शायद उसकी खाल उतारी जा रही होगी. अभी मेरी भी खाल उसी तरह सेउधेड़ी जाएगी . मेरा मन कर रहा था इस डरावने माहौल से बस किसी तरह भागकर बीकानेरपहुंच जाऊं. नहीं पढ़ना है मुझे. तेजकरण ने कुछ बच्चों को इधर उधर किया और एक लड़केके पास मेरी बैठने की व्यवस्था कर दी. वो बोला, “देख ये कल्याण सिंह है. बहुत अच्छालड़का है, इसलिए तेरी व्यवस्था इसके साथ की है मैंने.” आज सोचता हूं, नियति ने क्योंमेरे साथ ये खेल खेला? बीकानेर में ही पढ़ता रहता तो उस भगवान का क्या बिगड़ जाता?क्यों मुझे बीकानेर से लाकर इस लड़के कल्याण सिंह की बगल में लाकर बिठा दिया था? मैंनज़रें नीची किये चुपचाप बैंच पर कल्याण सिंह के साथ बैठ गया तो कल्याण सिंह बोला“क्या बात है भायला (दोस्त), बहुत उदास है? जवाब में मेरी आंखों से टप-टप दो आंसूटपक गए. कल्याण सिंह बोला, 'अरे रोने क्यों लगा? तू चिंता मतकर यहां सारे टीचर्सबहुत अच्छे हैं, कभी नहीं मारते और अब तो हम लोग भायले बन गए हैं. अरे तेज करण देखतो इस छोरे को रोने लगा है ये.' तेज करण भी वहां आ गया और मुझे दिलासा देने लगा.रोते रोते आखिर आंसू भी तो साथ छोड़ देते हैं न? खैर चार छह दिन में मेरा मन लगनेलगा था. तेजकरण और कल्याण सिंह दोनों ही मेरा बहुत ख़याल रखते थे. कल्याण सिंह कागांव सरदारशहर से 60-70 किलोमीटर दूर था और उसके पिताजी बैंक में चौकीदार थे. हरशनिवार को शाम को कल्याण सिंह के पिताजी उसे गांव जाने वाली बस में बिठा देते थे औरसोमवार को वो वापस सरदारशहर आ जाया करता था. बाकी दिन वो बैंक में अपने पिताजी केसाथ ही रहता था. कभी कभी मैं, कल्याण सिंह और तेजकरण साथ बैठ कर पढ़ा करते थे.कल्याण सिंह का तो घर वहां था नहीं, इसलिए कभी हम तीनों मेरे घर रह जाते और कभी तेजकरण के घर. दिन इसी तरह गुज़र रहे थे. हम तीनों ही क्लास में पढ़ने में सबसे आगे थे.हम तीनों अच्छे अंक लाने की कोशिश तो करते थे मगर हमारी दोस्ती पर उसका कोई असरनहीं पड़ता था. कल्याण सिंह और तेजकरण मेरे पक्के दोस्त बन गए थे और मेरी हर समस्याका समाधान भी. मैं अब थोड़ा नॉर्मल हो गया था. इसी बीच छठी कक्षा के इम्तिहान आ गए.रिज़ल्ट आया तो कल्याण सिंह क्लास में पहले नंबर पर आया, मैं दूसरे नंबर पर औरतेजकरण तीसरे नंबर पर. हम तीनों बहुत खुश थे. लग रहा था हम तीनों ही क्लास मेंअव्वल आये हैं. इम्तिहान के बाद छुट्टियां हो गईं. अब मुझे बीकानेर जाने से रोकनेवाला कोई नहीं था क्योंकि पिताजी ने वादा किया था कि छुट्टियों में वो मुझे बीकानेरभेज देंगे. रतन, निर्मला और मग्घा भी तो आनेवाले थे बीकानेर. मेरा मन एक ओर उनसेमिलने को बेताब था वहीं कल्याण सिंह और तेजकरण को छोड़ने का बहुत अफ़सोस भी हो रहा थामगर कल्याण का घर तो वहां था नहीं. उसे तो हर हाल में अपने गांव जाना ही था, इसलिएबड़ी अजीब सी दुविधाओं में घिरा मैं छुट्टियों में बीकानेर आ गया. अगर मुझे पता होताकि मेरे वापस आते ही कल्याण के साथ ये सब कुछ होने वाला है तो मैं किसी भी हालत मेंन उसे गाँव जाने देता और न ही खुद बीकानेर आता. छुट्टियां खत्म हुई और 21 जून कोमैं वापस सरदारशहर आ गया क्योंकि एक जुलाई से स्कूल खुलने वाले थे. एक जुलाई कोबहुत खुश खुश स्कूल गया और कल्याण और तेजकरण को देख कर फिर मेरा मन भर आया. हमतीनों दोस्त गले लगकर मिले और पहली बार मैंने देखा कि मेरी आंखों में आये आंसुओं नेकल्याण की आंखें भी भर दीं. हमने एक दूसरे से वादा किया, चाहे कुछ भी हो जाए. हमपूरे जीवन एक दूसरे से अलग नहीं होंगे. हा हा हा....! हम जीवन की बात कर रहे थे मगरहम जानते कहां थे कि जीवन क्या होता है? कल्याण की बात तो खैर छोड़िए मगर कहां है वोहमेशा कत्था अपने मुंह में डाले रहने वाला तेजकरण? हां, तेजकरण के पिताजी का असममें कत्थे का व्यापार था और उसकी आदत पड़ गई थी अपने घर में मौजूद रहने वाले कत्थेमें से एक टुकड़ा अपने मुंह में डाल लेने की और उसे चूसते रहने की. अगर आज कहीं देशके किसी कोने में बैठा तेजकरण मेरी इस बात को पढ़ रहा हो तो मैं उससे आग्रह करूंगा,दोस्त मैं आज भी तुम्हें बहुत याद करता हूँ, तुम जहां कहीं भी हो, मुझसे संपर्ककरो, मुझे, यकीन जानो, दूसरा जीवन मिल जाएगा. जुलाई का महीना था, बादल घिरने लगेथे. जैसा कि मैंने बताया घर में बिजली का कनेक्शन नहीं था, रात में आसमान में छायेकाले काले बादलों के बीच चमकती बिजली बहुत डरावनी लगती थी. पता नहीं क्यों ऐसेडरावने मौसम में मेरे मोहल्ले के घरों में बंधे हुए बकरे कुछ ज़्यादा ही डर जाते थेऔर कुछ इस तरह चीखने लग जाते थे कि मेरा दिल रह रहकर धक् धक् कर उठता था. इसी बीचवो शनिवार आगया. हर शनिवार कल्याण सिंह अपने गांव जाता था मगर उस दिन सुबह से ही रहरहकर बारिश हो रही थी और कल्याण सिंह के पिताजी को उस दिन अपने मैनेजर साहब के साथबीकानेर जाना था, इसलिए उन्होंने कल्याण सिंह को कहा कि वो ऐसे खराब मौसम में गांवन जाए क्योंकि गाँव दूर था और उस ज़माने में न तो बसें आज जितनी अच्छी हुआ करती थींऔर न ही सड़कें. उन्होंने कल्याण सिंह को कहा कि वो आज गांव न जाकर बैंक में हीचपरासी आसू राम के पास सो जाए. स्कूल में उसने मुझे ये बताया कि वो गांव नहीं जारहा है, बैंक में ही रहेगा. स्कूल खत्म होने तक मौसम और भी खराब हो गया था. 5 बजेही इतना अन्धेरा हो गया था मानो रात हो गयी हो. बादल इस तरह गरज रहे थे मानो अभीपूरी धरती को निगल जायेंगे. मेरा घर स्कूल से बैंक जाते हुए रास्ते में पड़ता था.स्कूल से निकल कर मैं और कल्याण मेरे घर तक पहुंचे तब तक वो भयंकर गरजते हुए बादलबरसने लगे थे. मैंने कल्याण को ज़बरदस्ती अपने घर में खींच लिया. हम लोग भीग चुकेथे. मैंने उसे तौलिया दिया और कहा “ कल्याण, यार बहुत तेज़ बारिश होने लगी है, बादलगरज रहे हैं, कल छुट्टी है, तेरे पिताजी भी यहां नहीं हैं, तू बैंक जाकर क्याकरेगा?तू मेरे यहां क्यों नहीं रुक जाता ? वो बोला, “नहीं यार पिताजी कहकर गए हैंकि मैं बैंक में आसू चाचाजी के पास ही रहूं. अब अगर मैं उनकी बात नहीं मानूंगा तोवो नाराज़ हो जायेंगे. इससे अच्छा तो ये है कि तू अपने पिताजी से पूछ ले, हम दोनोंबैंक चलते हैं और तू वहाँ मेरे साथ ही रह जाना.” मैं जिद करने लगा कि वो मेरे घर रहजाए मगर वो बोला “देख यार मेरे पिताजी तो बीकानेर जा चुके हैं और मुझे कहकर गए हैंकि मैं बैंक में रहूं. अब अगर मैं यहां रहूंगा तो उनकी आज्ञा के बिना रहना पड़ेगा,लेकिन तेरे तो पिताजी यहीं हैं, तू उनकी इजाज़त ले सकता है, चल न, पिताजी से पूछ लेऔर मेरे साथ बैंक चल, हम खूब बातें करेंगे... प्लीज़.........”हम दोनों अपनी अपनीजिद पर अड़े रहे. वो कहता रहा, बैंक चल हम दोनों वहां रहेंगे और मैं कहता रहा, तूमेरे घर ही रह जा. बारिश कम हो गयी थी मगर हमारे बीच कोई सझौता नहीं हो पा रहा था.जब कोई समझौता नहीं हुआ तो यही तय हुआ कि वो बैंक जाकर अपने आसू चाचा जी के पाससोयेगा और मैं अपने घर. वो निकल पड़ा. मैं पता नहीं क्यों बेचैन होकर तब भी उसकीमिन्नतें कर रहा था, “यहीं रह जा न यार.......” मगर वो नहीं माना. आगे बढ़ता गया....बढ़ता गया..... अब भी अक्सर बारिश के मौसम में जब काले काले बादल गरजते हैं तो लगताहै, मैं वहीं... सरदारशहर के कसाइयों के मोहल्ले के उस घर के बाहर खड़ा कल्याण सिंहकी मिन्नतें कर रहा हूँ.... “यहीं रुक जा न यार....? मत जा ना कल्याण.....कहना मानले न मेरा” मगर होनी उसे बहुत शिद्दत से बुला रही थी. वो नहीं रुका. वो कल्याणसिंह... वो मेरा सबसे गहरा दोस्त मेरी मिन्नतों को ठुकराकर इस बात पर नाराज़ होकरचला गया कि मैंने उसकी बात नहीं मानी... मैं उसके साथ नहीं गया. मैं निराश होकर घरके अंदर लौट आया. बादल अब भी कहानियों के राक्षसों की तरह गरज रहे थे. आखिरकार मैंकल्याण सिंह के बारे में सोचते सोचते सो गया. अगले दिन का सूरज मेरे लिए मेरीज़िंदगी की सबसे भयंकर सुबह लेकर आया. आधी नींद में था कि पिताजी को माँ सेफुसफुसाकर कहते सुना “महेन्द्र को मत बताना, घबरा जाएगा” मैं चौंककर उठा.... मैंनेपूछा “क्या हुआ?” पिताजी चुप. मुझे लगा, ज़रूर कुछ अनहोनी हुई है. मैं चिल्लाया“बताइये न कि क्या हुआ?” उसके बाद उन्होंने जो कुछ बताया और जो तस्वीरें मैंने अगलेदिन अखबारों में देखीं, उसने मुझे एक बार को पूरी तरह खत्म कर दिया. उस रात कल्याणसिंह बैंक जाकर चपरासी आसू राम के पास सो गया था और खराब मौसम का फायदा उठाकर कुछडाकू बैंक में घुस गए थे. आसूराम बेचारा चपरासी था, कोई हथियार भी नहीं था उसकेपास. डाकू अपना काम आसानी से कर सकें इस लिए उन्होंने आसूराम को तलवार से काट डाला,तभी कल्याण सिंह की आंख खुल गयी, वो रोने लगा तो उन बेरहम डाकुओं ने उसका भी गलातलवार से रेत डाला. दूसरे दिन अखबार में जो फोटो छापा था, उसे मैं अंतिम सांस तकनहीं भूल सकता. एक खाट पर आसूराम का शव पड़ा था और उसके ऊपर कल्याण सिंह का शव थाजिसका गला आधा रेता हुआ था. ठीक उसी तरह जैसे मेरे मोहल्ले के कसाई बकरे का आधा गलारेत कर उसे चिल्लाने और मरने के लिए छोड़ दिया करते थे, हलाल के नाम पर मेरे कानोंमें कल्याण सिंह की वो चीखें गूंज रही थीं. और मेरी आंखों के आगे उसका वो आधा कटाहुआ गला स्थायी रूप से अंकित हो गया. मुझे लगा, उसका खून डाकुओं ने नहीं, मैंनेकिया है. अगर मैं उसे ज़बरदस्ती रोक लेता. तो आज वो भी इस दुनिया में होता. क्याबिगड़ जाता अगर मैं उसके पैर पकड़ लेता. या दो थप्पड़ मार कर ही रोक लेता. कम से कमउसकी जान तो नहीं जाती. आज भी जब कभी काले काले बादल आसमान में घुमड़ते हैं, बिजलीकड़कड़ाती है, लोग “मौसम अच्छा हो गया” कहकर पिकनिक पर निकल पड़ते हैं, तो उसका वोमुस्कुराता चेहरा, उसके घुंघराले बाल, उसका गोरा चेहरा... मेरी आंखों के सामने रहरहकर आ जाता है लेकिन तुरंत ही उसका वो आधा कटा हुआ गला. उससे उबलकर फैला हुआ खूनइन सबको धुंधला कर देता है और मेरे कानों में उसकी चीखें गूंजने लगती हैं और मैंफिर पछतावे से भर उठता हूं, '........काश मैं उस रात उसे अपने घर रोक लेता.'