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'जिस दोस्त को घर नहीं रोका, उस रात डाकुओं ने उसका गला काटा'

रेडियो जुबानी 6: पुराने दोस्त, पुराने शहर को छोड़ना अगर आपको भी चुभता है, तो ये किस्सा आपके लिए है.

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लल्लनटॉप
15 मार्च 2016 (Updated: 12 मई 2016, 10:39 AM IST)
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पेश है ‘दी लल्लनटॉप’ की नई सीरीज ‘रेडियो जुबानी’ की छठी किस्त. इस सीरीज में हम आपको महेंद्र मोदी के लिखे रेडियो से जुड़े किस्से पढ़ा रहे हैं. बीकानेर में पैदा हुए महेंद्र मोदी मुंबई में रहते हैं. रेडियो में 40 साल से ज्यादा का एक्सपीरियेंस है. विविध भारती मुंबई में लंबे वक्त तक सहायक केंद्र निदेशक रहे.mahendra modi-2पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी, 5वीं किस्त में आपने छोटे से बच्चे की रेडियो के लिए शुरुआती दीवानगी पढ़ी. अब पढ़िए कि रेडियो और दोस्तों की यादों के बीच जब छोड़ना पड़ा एक शहर.
पांचवीं क्लास पास करने के बाद सवाल ये उठा कि किस स्कूल में दाखिला लिया जाए क्योंकि राजकीय प्राथमिक पाठशाला संख्या-1 में छठी कक्षा तो थी नहीं. घर से थोड़ी ही दूर रतन बिहारी जी के पार्क में एक मिडिल स्कूल था, श्री गंगा संस्कृत विद्यालय. पिताजी को लगा मुझे थोड़ी संस्कृत पढ़नी चाहिए और उन्होंने मुझे इस स्कूल में डाल दिया. सारे पुराने साथी छूट गए. पता लगा मेरे खास दोस्तों श्याम सुन्दर, श्याम प्रकाश व्यास और बृजराज सिंह ने सादुल स्कूल में एडमिशन लिया है. मन बहुत दुःखी हुआ. लगा कहीं कुछ खो गया है. बाद की ज़िंदगी में बड़े बड़े झटके खाए तो अपने इस दुःख को याद करके हंसी आती थी मगर उस वक्त यही महसूस हुआ कि नहीं. अपने दोस्तों को छोड़कर जाने के बराबर कोई दुःख हो ही नहीं सकता. नया स्कूल, नए सहपाठी, नए अध्यापक और नया परिवेश. बहुत रोकते रोकते भी शुरू-शुरू के दिनों में मुझे रोना आ जाता था. तब मुझे संभाला एक लड़के करनी सिंह राठौड़ ने. वो मुझे प्रधानाध्यापक के पास ले गया. मुझे लगा वो मुझे नौ नंबर स्कूल के श्री किशन मास्टर जी की तरह डांटेंगे या हो सकता है एकाध थप्पड़ भी जड़ दें. मैं करणी सिंह से मिन्नतें करने लगा, “नहीं, मुझे उनके पास मत ले जाओ”, मगर वो नहीं माना और मुझे घसीटकर उनके पास ले गया. मैं सहमा हुआ सा उनके कमरे में पहुंचा. प्रधानाध्यापक जी ने प्यार से मुझे बुलाकर मेरी पीठ पर हाथ रखा तो मैं ज़ोर से फूट पड़ा. उन्होंने पानी मंगवाकर मुझे दिया और बोले, “बच्चे क्यों रो रहे हो? क्या तुम्हें किसी ने मारा?”
मैंने रोते रोते कहा, “नहीं”. “तो किसी अध्यापक ने डांटा” मैंने कहा, “नहीं” “तो फिर क्या हुआ है? क्यों रो रहे हो?”
बहुत प्यार से बोल रहे थे वो. क्या जवाब देता मैं? क्या जवाब था मेरे पास? मैंने तब तक किसी अध्यापक को अपने छात्र के साथ इतने प्यार से बोलते हुए नहीं देखा था, इसलिए एक ओर जहां मैं इस नए वातावरण में अपने आपको अकेला पाने की वजह से रो रहा था वहीं प्रधानाध्यापक के इस प्यार भरे व्यवहार ने मेरा रोना और तेज़ कर दिया था. क्योंकि मुझे लगा यही शायद वो दामन है जिसमें मुंह छुपाकर मैं अपने सारे आंसू बहा सकता हूं. अपने मन का पूरा गुबार मैंने उनके दामन को सौंप दिया. मैं थोड़ा प्रकृतिस्थ हुआ. मैंने गौर से उनके चेहरे को देखा. वहां एक अजीब सा वात्सल्य मुझे नज़र आया. मेरा रोना थम गया था मगर रह रहकर सिसकियां अब भी आ रही थीं. उन्होंने मुझे दुलारते हुए कहा, 'बच्चे, जब भी तुम्हें कोई दिक्कत हो तुम सीधे मेरे पास चले आया करो. मैंने हां में सर हिलाया और करणी सिंह के साथ आकर क्लास में बैठ गया. अब करणी सिंह से मेरी दोस्ती हो गयी थी और मुझे लगने लगा कि नहीं. मैं इस स्कूल में अकेला नहीं हूं. कम से कम दो लोग हैं जो किसी भी मुसीबत में मेरी सहायता करेंगे. मुझे पता लगा, हमारे प्रिंसिपल का नाम पण्डित गंगाधर शास्त्री है और वो संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान हैं. इस घटना के 33 बरस बाद जब मैं आकाशवाणी, उदयपुर में पोस्टेड था प्रोग्राम क्यूशीट में यही नाम देखकर चौंक पड़ा था. मुझे एक बार को लगा कि नहीं ये पण्डित जी कोई और होंगे क्योंकि......!
खैर मैंने पूछा इनकी रिकॉर्डिंग कब है? पता लगा दो दिन बाद. जिस दिन रिकॉर्डिंग थी उस दिन मैं स्टूडियो बिल्डिंग में समय से पहले ही पहुंच गया और पण्डित जी का इन्तजार करने लगा. थोड़ी ही देर में पण्डित जी ने मेन् गेट में प्रवेश किया और मैं चकित रह गया, उनकी शक्ल-सूरत, चाल-ढाल किसी में कोई फर्क नहीं आया था. मैं आगे बढ़ा और उनके चरणों में झुक गया. उन्होंने मेरे चेहरे की तरफ देखा, आशीर्वाद दिया मगर न पहचान पाने का भाव उनके चेहरे पर साफ़ पढ़ा जा सकता था, जो स्वाभाविक भी था.
कहां एक छठी-सातवीं का छात्र और कहां 42 बरस की अधेड़ावस्था की ओर तेज़ी से बढ़ता इंसान. मैंने उनकी उलझन को दूर किया. उन्हें अपना नाम और स्कूल का नाम बताया तो उन्हें भी सब कुछ याद आ गया. वैसे तो हर अध्यापक अपने जीवनकाल में हज़ारों छात्रों को पढ़ाता है और उसके लिए किसी भी छात्र को याद रखना आसान नहीं होता मगर ये मेरा सौभाग्य ही मानता हूं कि पढ़ाई में बहुत असाधारण न होते हुए भी मेरे अध्यापकों ने अक्सर मुझे याद रखा है. मुझे एक बार फिर से याद आ गए छठी और सातवीं क्लास के वो दिन जब मैंने आधा छठी का और आधा सातवीं का साल पण्डित जी के सान्निध्य में गुज़ारा था और उसी दौरान उनकी प्रेरणा से “संस्कृत भारती” “संस्कृत प्रबोध” और “संस्कृत विनोद” एक के बाद एक तीन परीक्षाएं पास कर ली थीं. यानि सातवीं कक्षा में मैंने संस्कृत में ग्रेजुएशन स्तर प्राप्त कर लिया था और ये सब पण्डित गंगाधर शास्त्री जी के प्रोत्साहन से ही हो पाया था. जानते हैं अभी अभी मेरे उदयपुर के एक साथी दीपक मेहता ने मुझे बताया कि मेरे वो गुरु ईश्वर की कृपा से आज भी ज़िंदा हैं और नाथद्वारा के दिलीप शर्मा ने बताया है कि हालांकि वो आजकल अस्वस्थ हैं मगर जब दिलीप ने उन्हें मेरे बारे में बताया तो वो बहुत खुश हुए और मेरे लिए ढेरों आशीर्वाद भिजवाए हैं.
पंडित जी के प्रोत्साहन से जहां मैंने ये परीक्षाएं पास कीं, वहीं अब मैं स्टेज पर खुलकर बैंजो के प्रोग्राम देने लगा था और अपने स्कूल के लिए कई प्रतियोगिताओं में इनाम जीतकर लाने लगा था. छठी और सातवीं के इन दो सालों की ये उपलब्धियां निश्चित ही मेरे लिए अभूतपूर्व थी मगर इस बीच जो कुछ मैंने खोया उसे भी मैं जीवन भर नहीं भूल पाऊंगा. वो रात... वो डरावनी रात आज भी मेरी आंखों में, मेरे जेहन में ज्यों की त्यों ज़िंदा है जिसकी वजह से आज ये एपिसोड में लिख रहा हूं और जो मेरे एक नाटक “लम्हों ने खता की थी......” की विषयवस्तु बनी.
छठी कक्षा का आधा साल गुजरा था. तब तक करणी सिंह के अलावा आशुतोष कुठारी और जगमोहन् व्यास जैसे कुछ और दोस्त भी बन गए थे और दो महीनों की तैयारी में संस्कृत भारती परीक्षा पास कर लेने की वजह से टीचर्स भी मुझसे ठीक से पेश आने लगे थे कि एक दिन स्कूल से घर लौट कर आया तो पता चला, पिताजी का तबादला सरदारशहर हो गया है और हमें एक हफ्ते में अपना बोरिया बिस्तर बांधकर बीकानेर से रवाना होना है. दिल धक् से रह गया. इतनी मुश्किल से नए स्कूल के वातावरण में ढाला था मैंने अपने आपको. अब फिर सब कुछ शून्य से शुरू करना पड़ेगा? मैं नहीं जानता था कि नियति अपने गर्भ में मेरे लिए कितना ज़बरदस्त अभिशाप लिए बैठी है, वरना मैं कुछ भी करता सरदार शहर नहीं जाता. मेरी बाई (दीदी) बीकानेर में रहती थीं. उनके पास रहकर ही वक्त गुज़ार लेता. मगर नहीं नियति ने कुछ और ही तय कर रखा था और मैं उसी के इशारों पर चलते हुए पिताजी, मां और भाई साहब के साथ एक सुबह सरदारशहर आ गया, अपने दोस्तों के पीछे छूट जाने का अफ़सोस दिल में छुपाये हुए. दूर रिश्ते की मेरी एक नानी कसाइयों के मोहल्ले में रहती थीं, उनका ऊपर का हिस्सा हमने किराए पर ले लिया. दिन किसी तरह गुज़रा. शाम गहराने लगी तो मैं बिजली का स्विच ढूंढने लगा. वहां न तो कोई स्विच था और न ही कोई बल्ब. पता चला सरदारशहर के ज़्यादातर इलाकों में बिजली नहीं थी और ये मोहल्ला उन्हीं इलाकों में से एक में था. चौराहे पर नज़र दौड़ाई तो देखा, एक आदमी सीढ़ी कंधे पर रखकर आया और वहां लगे हुए लैम्प पोस्ट पर चढ़कर उसने उसमें मिट्टी का तेल डाला और उसे जला दिया. मिट्टी के तेल का वो नन्हा सा दिया घनघोर अंधेरे से लड़ने की जी तोड़ कोशिश करने लगा. मगर क्या औकात थी उस छोटे से दिये की. उस घुप्प अंधेरे के सामने?
अन्धेरा उस दिये की हिमाक़त को देखकर अट्टहास कर उठा. मेरा मन घबरा गया. नहीं, नहीं दरअसल ये कोई अट्टहास नहीं था. कसाइयों का मोहल्ला था. किसी घर में बंधे बकरे को शायद अगली सुबह आने वाली अपनी मौत की आहट सुनाई दे गई थी और वो ज़ोर से चीख पड़ा था. बड़ी ही दर्दनाक थी वो चीख. आज भी उस चीख को याद कर मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं.
वो अंधेरी रात किसी तरह गुज़री. दूसरे रोज़ सुबह हुई फिर एक चीख से. खिड़की में जाकर खड़ा हुआ, तो देखा, एक बकरे का गला रेता जा रहा था और वो चिल्लाये जा रहा था. मैंने सोचा, अभी इसका गला पूरा काट दिया जाएगा और ये शांत हो जाएगा, मगर ये क्या? उसका आधा गला काटकर छोड़ दिया गया था तड़पने और चिल्लाने के लिए. मैं एकदम सन्न. मैंने पिताजी से पूछा कि इस बकरे का गला आधा काटकर क्यों छोड़ दिया उस आदमी ने? तो उन्होंने बताया कि इसे हलाल करना कहते हैं. पूरे दिन उस बकरे का आधा कटा हुआ वो गला, उसकी वो तड़पती देह और दिल को दहलाने वाली चीखें मेरे ज़ह्नोदिल पर छाई रहीं. उसी दिन पिताजी मुझे दाखिला करवाने के लिए हनुमान संस्कृत विद्यालय लेकर गए. प्रिंसिपल के कमरे में हम लोग पहुंचे तो मेरा दिल प्रार्थना कर रहा था “भगवान करे... प्रिंसिपल कह दें कि हमारे यहां जगह नहीं है, हम इसे एडमिशन नहीं दे सकते. और फिर तो पिताजी को मुझे बीकानेर वापस भेजना ही पड़ेगा.' मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ, प्रिंसिपल ने मेरा और मेरे पिताजी का स्वागत किया और मेरा एडमिशन हो गया. पिताजी मुझे प्रिंसिपल के कमरे में छोड़कर घर लौट गए और मैं एक बार फिर अजनबियों के बीच में खडा था. मुझे रोना आने लगा जिसे बड़ी मुश्किल से मैंने रोका. मुझे प्रिंसिपल सर का चपरासी क्लास में लाकर छोड़ गया था. उस समय क्लास में कोई टीचर नहीं था. मैं रुआंसा सा कमरे के एक कोने में जाकर खड़ा हो गया, तभी क्लास का मॉनीटर मेरे पास आया और बोला, “नया आया है?” मैंने हां में गर्दन हिला दी. वो फिर बोला, 'मेरा नाम तेजकरण छाजेड़ है. मैं क्लास का मॉनीटर हूं, आ तेरे बैठने की व्यवस्था करता हूं'. मैं क्या करता? उसके पीछे पीछे चल पड़ा.... मेरे कानों में रह रहकर पिछली रात सुनी बकरे की चीख गूंज रही थी. मुझे लग रहा था, अभी मेरे गले से भी वैसी ही चीख निकल पड़ेगी और कुछ लोग मुझे दबोच लेंगे जैसे कि मैं अपनी कल्पना में उस बकरे को दबोचे जाते हुए देख रहा था. मुझे लग रहा था, अब तक उस बकरे को दबोच कर काट डाला गया होगा और शायद उसकी खाल उतारी जा रही होगी. अभी मेरी भी खाल उसी तरह से उधेड़ी जाएगी . मेरा मन कर रहा था इस डरावने माहौल से बस किसी तरह भागकर बीकानेर पहुंच जाऊं. नहीं पढ़ना है मुझे. तेजकरण ने कुछ बच्चों को इधर उधर किया और एक लड़के के पास मेरी बैठने की व्यवस्था कर दी. वो बोला, “देख ये कल्याण सिंह है. बहुत अच्छा लड़का है, इसलिए तेरी व्यवस्था इसके साथ की है मैंने.” आज सोचता हूं, नियति ने क्यों मेरे साथ ये खेल खेला? बीकानेर में ही पढ़ता रहता तो उस भगवान का क्या बिगड़ जाता? क्यों मुझे बीकानेर से लाकर इस लड़के कल्याण सिंह की बगल में लाकर बिठा दिया था? मैं नज़रें नीची किये चुपचाप बैंच पर कल्याण सिंह के साथ बैठ गया तो कल्याण सिंह बोला “क्या बात है भायला (दोस्त), बहुत उदास है?
जवाब में मेरी आंखों से टप-टप दो आंसू टपक गए. कल्याण सिंह बोला, 'अरे रोने क्यों लगा? तू चिंता मतकर यहां सारे टीचर्स बहुत अच्छे हैं, कभी नहीं मारते और अब तो हम लोग भायले बन गए हैं. अरे तेज करण देख तो इस छोरे को रोने लगा है ये.' तेज करण भी वहां आ गया और मुझे दिलासा देने लगा. रोते रोते आखिर आंसू भी तो साथ छोड़ देते हैं न? खैर चार छह दिन में मेरा मन लगने लगा था. तेजकरण और कल्याण सिंह दोनों ही मेरा बहुत ख़याल रखते थे. कल्याण सिंह का गांव सरदारशहर से 60-70 किलोमीटर दूर था और उसके पिताजी बैंक में चौकीदार थे. हर शनिवार को शाम को कल्याण सिंह के पिताजी उसे गांव जाने वाली बस में बिठा देते थे और सोमवार को वो वापस सरदारशहर आ जाया करता था.
बाकी दिन वो बैंक में अपने पिताजी के साथ ही रहता था. कभी कभी मैं, कल्याण सिंह और तेजकरण साथ बैठ कर पढ़ा करते थे. कल्याण सिंह का तो घर वहां था नहीं, इसलिए कभी हम तीनों मेरे घर रह जाते और कभी तेज करण के घर. दिन इसी तरह गुज़र रहे थे. हम तीनों ही क्लास में पढ़ने में सबसे आगे थे. हम तीनों अच्छे अंक लाने की कोशिश तो करते थे मगर हमारी दोस्ती पर उसका कोई असर नहीं पड़ता था. कल्याण सिंह और तेजकरण मेरे पक्के दोस्त बन गए थे और मेरी हर समस्या का समाधान भी. मैं अब थोड़ा नॉर्मल हो गया था. इसी बीच छठी कक्षा के इम्तिहान आ गए. रिज़ल्ट आया तो कल्याण सिंह क्लास में पहले नंबर पर आया, मैं दूसरे नंबर पर और तेजकरण तीसरे नंबर पर. हम तीनों बहुत खुश थे. लग रहा था हम तीनों ही क्लास में अव्वल आये हैं. इम्तिहान के बाद छुट्टियां हो गईं. अब मुझे बीकानेर जाने से रोकने वाला कोई नहीं था क्योंकि पिताजी ने वादा किया था कि छुट्टियों में वो मुझे बीकानेर भेज देंगे. रतन, निर्मला और मग्घा भी तो आनेवाले थे बीकानेर. मेरा मन एक ओर उनसे मिलने को बेताब था वहीं कल्याण सिंह और तेजकरण को छोड़ने का बहुत अफ़सोस भी हो रहा था मगर कल्याण का घर तो वहां था नहीं. उसे तो हर हाल में अपने गांव जाना ही था, इसलिए बड़ी अजीब सी दुविधाओं में घिरा मैं छुट्टियों में बीकानेर आ गया. अगर मुझे पता होता कि मेरे वापस आते ही कल्याण के साथ ये सब कुछ होने वाला है तो मैं किसी भी हालत में न उसे गाँव जाने देता और न ही खुद बीकानेर आता.
छुट्टियां खत्म हुई और 21 जून को मैं वापस सरदारशहर आ गया क्योंकि एक जुलाई से स्कूल खुलने वाले थे. एक जुलाई को बहुत खुश खुश स्कूल गया और कल्याण और तेजकरण को देख कर फिर मेरा मन भर आया. हम तीनों दोस्त गले लगकर मिले और पहली बार मैंने देखा कि मेरी आंखों में आये आंसुओं ने कल्याण की आंखें भी भर दीं.
हमने एक दूसरे से वादा किया, चाहे कुछ भी हो जाए. हम पूरे जीवन एक दूसरे से अलग नहीं होंगे. हा हा हा....! हम जीवन की बात कर रहे थे मगर हम जानते कहां थे कि जीवन क्या होता है? कल्याण की बात तो खैर छोड़िए मगर कहां है वो हमेशा कत्था अपने मुंह में डाले रहने वाला तेजकरण? हां, तेजकरण के पिताजी का असम में कत्थे का व्यापार था और उसकी आदत पड़ गई थी अपने घर में मौजूद रहने वाले कत्थे में से एक टुकड़ा अपने मुंह में डाल लेने की और उसे चूसते रहने की. अगर आज कहीं देश के किसी कोने में बैठा तेजकरण मेरी इस बात को पढ़ रहा हो तो मैं उससे आग्रह करूंगा, दोस्त मैं आज भी तुम्हें बहुत याद करता हूँ, तुम जहां कहीं भी हो, मुझसे संपर्क करो, मुझे, यकीन जानो, दूसरा जीवन मिल जाएगा.
जुलाई का महीना था, बादल घिरने लगे थे. जैसा कि मैंने बताया घर में बिजली का कनेक्शन नहीं था, रात में आसमान में छाये काले काले बादलों के बीच चमकती बिजली बहुत डरावनी लगती थी. पता नहीं क्यों ऐसे डरावने मौसम में मेरे मोहल्ले के घरों में बंधे हुए बकरे कुछ ज़्यादा ही डर जाते थे और कुछ इस तरह चीखने लग जाते थे कि मेरा दिल रह रहकर धक् धक् कर उठता था. इसी बीच वो शनिवार आगया. हर शनिवार कल्याण सिंह अपने गांव जाता था मगर उस दिन सुबह से ही रह रहकर बारिश हो रही थी और कल्याण सिंह के पिताजी को उस दिन अपने मैनेजर साहब के साथ बीकानेर जाना था, इसलिए उन्होंने कल्याण सिंह को कहा कि वो ऐसे खराब मौसम में गांव न जाए क्योंकि गाँव दूर था और उस ज़माने में न तो बसें आज जितनी अच्छी हुआ करती थीं और न ही सड़कें.
उन्होंने कल्याण सिंह को कहा कि वो आज गांव न जाकर बैंक में ही चपरासी आसू राम के पास सो जाए. स्कूल में उसने मुझे ये बताया कि वो गांव नहीं जा रहा है, बैंक में ही रहेगा. स्कूल खत्म होने तक मौसम और भी खराब हो गया था. 5 बजे ही इतना अन्धेरा हो गया था मानो रात हो गयी हो. बादल इस तरह गरज रहे थे मानो अभी पूरी धरती को निगल जायेंगे. मेरा घर स्कूल से बैंक जाते हुए रास्ते में पड़ता था. स्कूल से निकल कर मैं और कल्याण मेरे घर तक पहुंचे तब तक वो भयंकर गरजते हुए बादल बरसने लगे थे. मैंने कल्याण को ज़बरदस्ती अपने घर में खींच लिया. हम लोग भीग चुके थे. मैंने उसे तौलिया दिया और कहा “ कल्याण, यार बहुत तेज़ बारिश होने लगी है, बादल गरज रहे हैं, कल छुट्टी है, तेरे पिताजी भी यहां नहीं हैं, तू बैंक जाकर क्या करेगा?तू मेरे यहां क्यों नहीं रुक जाता ?
वो बोला, “नहीं यार पिताजी कहकर गए हैं कि मैं बैंक में आसू चाचाजी के पास ही रहूं. अब अगर मैं उनकी बात नहीं मानूंगा तो वो नाराज़ हो जायेंगे. इससे अच्छा तो ये है कि तू अपने पिताजी से पूछ ले, हम दोनों बैंक चलते हैं और तू वहाँ मेरे साथ ही रह जाना.”
मैं जिद करने लगा कि वो मेरे घर रह जाए मगर वो बोला “देख यार मेरे पिताजी तो बीकानेर जा चुके हैं और मुझे कहकर गए हैं कि मैं बैंक में रहूं. अब अगर मैं यहां रहूंगा तो उनकी आज्ञा के बिना रहना पड़ेगा, लेकिन तेरे तो पिताजी यहीं हैं, तू उनकी इजाज़त ले सकता है, चल न, पिताजी से पूछ ले और मेरे साथ बैंक चल, हम खूब बातें करेंगे... प्लीज़.........”हम दोनों अपनी अपनी जिद पर अड़े रहे. वो कहता रहा, बैंक चल हम दोनों वहां रहेंगे और मैं कहता रहा, तू मेरे घर ही रह जा. बारिश कम हो गयी थी मगर हमारे बीच कोई सझौता नहीं हो पा रहा था. जब कोई समझौता नहीं हुआ तो यही तय हुआ कि वो बैंक जाकर अपने आसू चाचा जी के पास सोयेगा और मैं अपने घर. वो निकल पड़ा. मैं पता नहीं क्यों बेचैन होकर तब भी उसकी मिन्नतें कर रहा था, “यहीं रह जा न यार.......” मगर वो नहीं माना. आगे बढ़ता गया.... बढ़ता गया..... अब भी अक्सर बारिश के मौसम में जब काले काले बादल गरजते हैं तो लगता है, मैं वहीं... सरदारशहर के कसाइयों के मोहल्ले के उस घर के बाहर खड़ा कल्याण सिंह की मिन्नतें कर रहा हूँ.... “यहीं रुक जा न यार....? मत जा ना कल्याण.....कहना मान ले न मेरा” मगर होनी उसे बहुत शिद्दत से बुला रही थी. वो नहीं रुका. वो कल्याण सिंह... वो मेरा सबसे गहरा दोस्त मेरी मिन्नतों को ठुकराकर इस बात पर नाराज़ होकर चला गया कि मैंने उसकी बात नहीं मानी... मैं उसके साथ नहीं गया. मैं निराश होकर घर के अंदर लौट आया. बादल अब भी कहानियों के राक्षसों की तरह गरज रहे थे. आखिरकार मैं कल्याण सिंह के बारे में सोचते सोचते सो गया. अगले दिन का सूरज मेरे लिए मेरी ज़िंदगी की सबसे भयंकर सुबह लेकर आया. आधी नींद में था कि पिताजी को माँ से फुसफुसाकर कहते सुना “महेन्द्र को मत बताना, घबरा जाएगा” मैं चौंककर उठा.... मैंने पूछा “क्या हुआ?” पिताजी चुप. मुझे लगा, ज़रूर कुछ अनहोनी हुई है. मैं चिल्लाया “बताइये न कि क्या हुआ?”
उसके बाद उन्होंने जो कुछ बताया और जो तस्वीरें मैंने अगले दिन अखबारों में देखीं, उसने मुझे एक बार को पूरी तरह खत्म कर दिया. उस रात कल्याण सिंह बैंक जाकर चपरासी आसू राम के पास सो गया था और खराब मौसम का फायदा उठाकर कुछ डाकू बैंक में घुस गए थे. आसूराम बेचारा चपरासी था, कोई हथियार भी नहीं था उसके पास. डाकू अपना काम आसानी से कर सकें इस लिए उन्होंने आसूराम को तलवार से काट डाला, तभी कल्याण सिंह की आंख खुल गयी, वो रोने लगा तो उन बेरहम डाकुओं ने उसका भी गला तलवार से रेत डाला. दूसरे दिन अखबार में जो फोटो छापा था, उसे मैं अंतिम सांस तक नहीं भूल सकता. एक खाट पर आसूराम का शव पड़ा था और उसके ऊपर कल्याण सिंह का शव था जिसका गला आधा रेता हुआ था.
ठीक उसी तरह जैसे मेरे मोहल्ले के कसाई बकरे का आधा गला रेत कर उसे चिल्लाने और मरने के लिए छोड़ दिया करते थे, हलाल के नाम पर मेरे कानों में कल्याण सिंह की वो चीखें गूंज रही थीं. और मेरी आंखों के आगे उसका वो आधा कटा हुआ गला स्थायी रूप से अंकित हो गया. मुझे लगा, उसका खून डाकुओं ने नहीं, मैंने किया है.
अगर मैं उसे ज़बरदस्ती रोक लेता. तो आज वो भी इस दुनिया में होता. क्या बिगड़ जाता अगर मैं उसके पैर पकड़ लेता. या दो थप्पड़ मार कर ही रोक लेता. कम से कम उसकी जान तो नहीं जाती. आज भी जब कभी काले काले बादल आसमान में घुमड़ते हैं, बिजली कड़कड़ाती है, लोग “मौसम अच्छा हो गया” कहकर पिकनिक पर निकल पड़ते हैं, तो उसका वो मुस्कुराता चेहरा, उसके घुंघराले बाल, उसका गोरा चेहरा... मेरी आंखों के सामने रह रहकर आ जाता है लेकिन तुरंत ही उसका वो आधा कटा हुआ गला. उससे उबलकर फैला हुआ खून इन सबको धुंधला कर देता है और मेरे कानों में उसकी चीखें गूंजने लगती हैं और मैं फिर पछतावे से भर उठता हूं, '........काश मैं उस रात उसे अपने घर रोक लेता.'

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