2016 में ‘दी लल्लनटॉप’ ने आपको महेंद्र मोदी के संस्मरणों पर आधारित श्रृंखला‘रेडियो ज़ुबानी’ की 20 किस्तें पढ़ाई थी. महेंद्र जी की व्यस्तताओं के चलते येसिलसिला थोड़ा रुक गया था, जिसे अब फिर से चलाया जा रहा है. इस सीरीज में महेंद्रमोदी के लिखे रेडियो से जुड़े किस्से पढ़ने मिलेंगे. साथ ही वो किस्से-कहानियां भीजिनपर आधारित नाटक रेडियो पर प्रसारित हुए. बीकानेर में पैदा हुए महेंद्र मोदीमुंबई में रहते हैं. विविध भारती के अवकाशप्राप्त चैनल हेड हैं. अभी दशक भर पहले तक रेडियो हमारी ज़िंदगी का अहम हिस्सा हुआ करता था. बदलते समय मेंरेडियो भले ही थोड़ा साइडलाइन हो गया हो लेकिन हमारी यादों में इसकी जगह हमेशा केलिए महफूज़ है. 90 के दशक से पहले पैदा हुए हर शख्स के पास रेडियो को लेकर एक कहानीज़रूर-ज़रूर होती है. रेडियो के श्रोता रहे लोगों के पास ही जब कहने के लिए बहुत कुछहोता है, तो उस शख्स के संस्मरणों की गठरी कितनी समृद्ध होगी, जिसने ज़िंदगी के 40साल रेडियो को दिए हो! रेडियो के नॉस्टैल्जिया की सैर कराने के लिए महेंद्र मोदीबिल्कुल फिट शख्स हैं. तो पढ़े जाए रेडियो से जुड़े किस्से महेंद्र मोदी की ज़ुबानी.ये 33वीं किस्त है.--------------------------------------------------------------------------------बी ए सेकण्ड ईयर का रिज़ल्ट आ गया था. मैं बी ए फाइनल में आ गया था. कॉलेज खुलने मेंकुछ रोज बाकी थे. कुछ ही वक्त बाद बारिशें भी आने वाली थीं. वैसे तो अगर नहर कापानी उपलब्ध हो तो फसलें थोड़ी आगे पीछे भी ली जा सकती हैं, लेकिन खरीफ की फसलों कोबोने के वक्त मौसम थोड़ा नम और गरम होना चाहिए और काटने के वक्त सूखा. इन फसलों मेंधान, ज्वार, बाजरा, मौठ, मूंग, गन्ना आदि बोई जा सकती है. नहर में पानी तो भरपूर थालेकिन ज़मीन पर पसरी हुई रेत सदियों से प्यासी थी. और धान जैसी फसल को खेत में खड़ापानी चाहिए और गन्ने को भी काफी पानी चाहिए. नहर का मिज़ाज आगे जाकर कैसा रहेगा, इसबारे में हम लोग कुछ नहीं जानते थे इसलिए फैसला लिया गया कि रेगिस्तान में होनेवाली फसलें यानि ज्वार, बाजरा, मौठ, मूंग ही बोई जाएं. इनकी बुवाई का मौसम आ चुकाथा. मुझे एक बार फिर कमर कसनी पडी क्योंकि बुवाई के लिए ट्रैक्टर्स किराए पर लेनेथे. ज़मीन को हमवार करने के लिए और पानी लगाने के लिए मजदूर लगाने थे.मैं और काशीराम मामा जी एक बार फिर चल पड़े रेगिस्तान के साँपों से और पीवणों सेमुलाकात करने. जो झोंपड़े आरजी तौर पर बनाए गए थे, वो सब आँधियों की नज्र हो चुकेथे. लिहाजा अनूपगढ़ से कुछ खाटें, बल्लियाँ और दीगर सामान खरीद कर लाया गया और दोझोंपड़े खड़े किये गए और खुले मैदान में तीन मचान मैंने मामा जी के मना करने केबावजूद बनवाए. उन्होंने कहा “बेटा इस तरह मचानों पर चढ़कर खेती नहीं हो सकती.” लेकिनमेरे दिमाग में पीवणे से बचने का यही रास्ता आया. बाकी साँपों से तो जागते मेंमुलाक़ात होगी, तो इंसान सावचेत रह सकता है, लेकिन जो दुश्मन रात को सोते में हमलाकरता है, उससे निपटने का रास्ता तो यही है कि वो हम तक पहुँच ही न सके. चार-चारबल्लियों को खडा करके उनपर खाटें मजबूती से बाँध दी गईं. ज़मीन से करीब 8-9 फीट ऊंचीबंधी हुई खाट पर चढ़ने के लिए रस्सी का सहारा लिया जाता था, जिसे ऊपर चढ़ने के बादऊपर खींच लिया जाता था. हमने अपनी तरफ से हिफाज़त का पूरा इंतजाम कर लिया था और अबहम जुट गए थे, रेत के टीलों को पाटकर ज़मीन को बराबर करने में.रेत के टीलों पर बीच बीच में फोग, सिणिया, आक, डोके और कहीं कहीं कैर जैसेज़ीरोफाइट्स की रेगिस्तानी झाडियाँ उगी हुई थीं. जिनके बारे में मैं कॉलेज के एक सालके साइंस बायो के कोर्स में पढ़ चुका था. उस वक्त मुझे ये कहाँ पता था कि इन झाडियोंसे इतनी जल्दी सामना होने वाला है. फोग की झाडियों को तो हम काटकर सूखने के लिए डालदेते थे क्योंकि वो खाना बनाने के लिए ईंधन के तौर पर इस्तेमाल की जा सकती थी. डोकेऔर सिनिये झोंपड़े बनाने के काम आते थे. आक किसी काम नहीं आता था लेकिन सबसे बड़ामसला था, इन सबको उखाडकर ज़मीन को खाली करना . एक एक झाडी पर जब कस्सी चलाई जाती थीतो दर्ज़नों सांप फूं-फूं करके अपनी गर्दनें ज़मीन से बाहर निकाल लेते थे. सदियों सेबसे हुए उन बाशिंदों की जगह पर इंसान ने हमला बोला था. खेत में काम करने वालेज़्यादातर मजदूर पंजाबी थे.पहले ही दिन जब कुछ बूजे(झाडियाँ) उखाडे गए और एक मजदूर कस्सी पर कुछ लादे मेरी तरफआया तो मैंने उससे पूछा “की ल्याया प्राह?”(क्या लाया भाई?) उसने हँसते हुए जवाबदिया “कोज नईं जी बेली हैंगे”(कुछ नहीं जी दोस्त हैं अपने). हालांकि मैं हमेशा सेसांप को मारने के खिलाफ रहा, लेकिन उस वक्त जब मेरे मजदूर थोड़ी-थोड़ी देर में कस्सीपर दर्ज़नों मरे हुए सांप लटका कर लाते थे, तो सिवाय दुखी होने के मैं कुछ नहीं करसकता था, क्योंकि दो दुश्मन जब आमने सामने हों तो फिर जिसे मौक़ा मिल गया, वही वारकर देगा. मजदूर अक्सर बताते थे, साब, कस्सी चलाने में एक सेकंड की देर हो जाती तोआज मुझे काट जाता ये काला बेली. मैं जानता था कि जब फसलें खडी होंगी और चूहे उनफसलों को नुक्सान पहुंचाएंगे, तो यही सांप होंगे जो उन चूहों का खात्मा करके,वास्तव में हमारे बेली या दोस्त साबित होंगे मगर उस वक्त तो सवाल था वजूद का. अगरहम उन्हें नहीं मारते हैं, तो हमारा वजूद खत्म हो जाएगा क्योंकि वो हमें काटखायेंगे इसलिए मजबूरन उनके वजूद को खत्म करना पड रहा था.खाना वहीं झोंपड़े के एक किनारे एक मजदूर बना कर खिलाया करता था. कभी कभी रेत मेंउगी हुई खुंभी (जंगली मशरूम) मिल जाती थी, कभी कोई मजदूर फोफलिया(सुखाये हुए टिंडे)या कुम्मट(एक रेगिस्तानी झाडी की फलियों के सूखे हुए बीज) आस पास की किसी जगह से लेआता, यही सब्जियां बनती थी और जब इनमे से कुछ भी नहीं होता तो फिर वही मोटे भुजियाका साग, आलू या फिर दाल. घी आस-पास के गाँवों से मिल जाता था, तो चुपड़ी रोटी भीमयस्सर हो जाती थी, वरना मोटी मोटी रूखी रोटिया. ये सच है कि खेत आने से बिलकुलपहले मैं पावभर घी रोजाना खा रहा था और अब ज़्यादातर रूखी रोटियां नसीब हो रही थी,लेकिन ईमानदारी से कह सकता हूँ कि दिन भर खेत में मेहनत करने के बाद मिली वो रूखीरोटियां और दाल बीकानेर में रूटीन में पाव भर घी के साथ खाए जा रहे खाने से कम लज़ीज़नहीं लगती थी.जंगली झाड़ियां.हालांकि हमने सोने के लिए मचान का इंतजाम कर लिया था इसलिए पीवणे का डर बहुत कम होगया था, लेकिन उस जंगल में सिर्फ पीवणे ही नहीं थे. वो पता नहीं कितनी तरह केजानवरों का आशियाना था, जिसपर कब्जा करने हम जा पहुंचे थे. एक रात काशी राम मामा जीजोर से चिल्ला कर अपने मचान से कूद गए. जहां कूदे वहीं एक काला, बड़ा सा बिच्छू बैठाहुआ था. मामाजी के वज़न से बिच्छू का तो कचूमर निकल गया, लेकिन मरते मरते उसनेमामाजी के पिछवाड़े में डंक मार दिया. वो और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगे. मैं अपनीरस्सी नीचे लटकाकर उसके सहारे नीचे उतरा. तब तक दो तीन मजदूर, जो वहाँ सोये हुए थेआ गए. टॉर्च की रोशनी में हमने देखा कि एक तरफ एक बड़ा सा काले रंग का बिच्छू मरापड़ा था और दूसरी तरफ मामा जी चिल्ला रहे थे. हमने उनके बिच्छू बूटी (एक तरह की जगलीझाडी में लगने वाला टिकियानुमा सूखा हुआ फल, जिसके बारे माना जाता है कि वो बिच्छूका ज़हर सोख लेता है) लगाया. वो बराबर अपने मचान की तरफ अंगुली से इशारा कर रहे थे.मैंने पूछा कि वो मचान से गिरे कैसे? तब भी उन्होंने मचान की तरफ इशारा किया.मैंने एक मजदूर को ऊपर चढाया तो उसने मचान को अच्छी तरह देखा और बताया कि वहाँ कुछनहीं था. कुछ घंटे बाद जब मामा जी थोड़े ठीक हुए तो उन्होंने बताया कि नींद मेंउन्हें लगा कि मचान पर उनके पास कोई सांप है. वो घबराकर नीचे कूद पड़े. वैसे इतनेऊंचे मचान पर सांप के चढ़ने का कोई इमकान तो नहीं बनता लेकिन हम ऊपरवाले की बनाई हरचीज़ को तो नहीं जानते, हो सकता है बांडी (एकिस कैरेनेटिस) जैसा कोई छोटा सांप जिसकेलिए कहा जाता है कि वो उछल कर ऊँट पर बैठे आदमी को भी काट खाता है, उछलकर मचान परचढ गया हो या फिर ये भी हो सकता है कि मचान पर चढ़ने के लिए काम आने वाली रस्सी कोउन्होंने सांप समझ लिया हो और डर के मारे कूद पड़े हों.एकिस कैरेनेटिस सांप.बहरहाल इस वाकये ने मुझे भी काफी डरा दिया था और जब ये खबर घूमते घामते मेरे घरपहुँची तो माँ और पिताजी दोनों ही इस बात से घबरा गए कि हम दिन रात किनपरिस्थितियों में रह रहे हैं. उन्होंने कहलवाया कि मैं फ़ौरन वापस बीकानेर लौट जाऊं.सुस्त ज़माना था. सो इस बुलावे को मुझ तक पहुँचते पहुँचते 15-20 दिन लग गए. इस बीचहमने लगभग खेतों की बुवाई कर दी थी, लेकिन ये भी सच है कि इस दौरान मेरी न जानेकितने साँपों से मुलाक़ात हुई, कितने बिच्छुओं को अपने पैरों तले रौंदा और मचान परसोने के बावजूद कितनी बार उठ उठ कर नमक की डळी मुंह में डालकर देखा कि कहीं मुझेपीवणे ने तो नहीं पी लिया है.बीकानेर पहुंचकर देखा कि माँ की फ़िक्र की मारे हालत खराब थी. उन्होंने पिताजी कोसाफ़ साफ़ कह दिया कि ज़मीन चाहे रहे या जाए, मैं उन सांप बिच्छुओं के बीच जाकर नहींरहूँगा. इधर सभी लोग अपने अपने काम में मसरूफ थे, इसलिए खेतों का पूरा काम काशीराममामा जी पर ही छोड़ दिया गया. नतीजा वही हुआ जो इस तरह के हालात में होता है. हर कुछदिन में खेतों से रुपयों की मांग आने लगी, कभी किसी काम के लिए, कभी किसी काम केलिए. सबने यही सोचा कि जब खेती हो रही है तो पैसा तो खर्च होगा ही. इकट्ठे करकेरुपये खेतों में भेजे जाते रहे. ख़बरें आती रही कि ज्वार, बाजरा, मूंग, मौठ सबशानदार लहलहा रहे हैं. एक दो बार बीकानेर से जाकर कोई उनका मुआयना भी कर आया मगरकोई भी वहाँ रुका नहीं. राजस्थान में एक बहुत पुरानी कहावत है, “खेती धणियाँ सेती”.यानि खेती तभी हो सकती है, जबकि मालिक खुद खेतों में मौजूद रहे. यहाँ सब लोगबीकानेर में रहना चाहते थे और पूरी खेती को काशीराम मामा जी के भरोसे छोड़ दिया गयाथा. थोड़े ही दिनों में खबर आई कि फसल पक गयी है और कटाई चल रही है. यहाँ तक फिर भीसब कुछ ठीक चल रहा था, मगर इसके बाद जो खबर आई वो बहुत भयानक थी. वो खबर एक दिनकाशीराम मामा जी खुद लेकर आये कि चोर रातोंरात पूरी फसल उठाकर ले गए और अब खेतोंमें सिवाय घास के कुछ नहीं बचा है.मामा जी ने सोने का अंडा देने वाली मुर्गी को ही काट लिया है, सबको ऐसा लगा, लेकिनफिर भी सबने फिर हिम्मत की और उनसे खेतों में जाकर रहने को कहा ताकि रबी की फसल कीतैयारी की जा सके. पानी की कोई कमी थी नहीं. गेहूं चना, सरसों और जौ की बुवाई कीगयी. इसमें काफी पैसा खर्च हुआ लेकिन इस बार बकौल काशीराम मामा जी फसल पर पाला पडगया और अच्छी भली खड़ी फसल चौपट हो गयी. कुल मिलाकर दो तीन बार सबने एक रिश्तेदार परभरोसा किया ताकि उन्हें भी कुछ फायदा हो सके और बीकानेर में बैठे हुए हम लोगों कीभी कुछ खेती की ज़मीनें अपनी हो जाएँ, लेकिन आखिरकार वही सदियों पुरानी कहावत ही सहीसाबित हुई,“खेती धणियाँ सेती.”रेगिस्तान में खेती हमेशा से मसला रही है.कुछ साल तक ज़मीन के लिए सरकार के खजाने में सालाना रक़म भरी गयी और ज़मीन को बटाई परदिया गया. कुछ बरसों तक वो लोग कुछ मामूली रकम लाकर हाथों पर रखते रहे और उसके बादउन्होंने लिखकर दे दिया कि इस ज़मीन पर खेती वो करते हैं, इसलिए इसका मालिकाना हकउन्हें मिल जाना चाहिए. हमें इस सबकी कानोकान कोई खबर ही नहीं हुई. सरकारी अफसरोंने कई बार खेतों का दौरा किया और पाया कि हम लोग वहाँ कहीं थे ही नहीं. हमें ज़मीनसे बेदखल कर दिया गया और वो ज़मीन उन लोगों को मिल गयी जिन्हें हम उसे बटाई पर दियाकरते थे. इस तरह ज़िंदगी का ये एक चैप्टर बहुत नुकसान के साथ खत्म हुआ. इसके बाद कईबार ऐसे मौके आये जब कुछ दोस्त सरकारी अफसरों ने मेरे सामने ये पेशकश की कि कुछखेती की ज़मीन वो मुझे अलॉट करवा सकते हैं लेकिन मैंने उसे कभी मंज़ूर नहीं किया. इसवाकये के बरसों बाद कोटा के पास के गाँव सोगरिया के सरपंच ने तो गाँव में रिहायशीऔर गाँव से लगी हुई खेती की ज़मीन को ले लेने पर, बहुत प्यार के साथ इतना ज़बरदस्तदबाव डाला कि मेरे लिए इनकार करना मुश्किल हो गया, लेकिन खैर वो वाकया मैं जब कोटापोस्टिंग की बातें बताने की बारी आयेगी तब सुनाऊंगा.पता नहीं ये सब कुछ जो हो रहा था ये अच्छा हो रहा था या बुरा हो रहा था. इन्सानकहाँ सोच पाता है कि उसके एक लम्हे के अमल का उसकी पूरी ज़िंदगी पर क्या असर होगा?वो तो बस फ़ौरी असर को ही देख पाता है. कई बार जब ज़िंदगी के पिछले सफे उलट कर देखताहूँ, तो सोचता हूँ कि अगर मैं उस वक्त उस ज़मीन को छोड़कर भागता नहीं, तकलीफें उठाकरजमे रहता तो एक किसान होता और ऐसा किसान जिसके पास डेढ़ सौबीघा ज़मीन, न जाने कितनेट्रैक्टर और भी न जाने क्या क्या होता जिनकी कीमत पचासों करोड में होती. मेरे भाईसाहब के दोस्त डॉक्टर रविन्द्र गहलोत के पिताजी ने तकलीफें देखकर भी 50 बीघा ज़मीनकी देखभाल की और उसके मालिक बन गए तो उनकी औलादें आज करोड़ों की जायदाद की मालिकहैं.बीकानेर लौटने के बाद मैंने देखा कि मेरे नाम आयी डाक में दो खत एच सी सक्सेना साहबके, एक उनके बेटे अजय का और दो खत उनकी बेटी रेखा के थे. मैंने सबको खोला और पढ़ा.करीब करीब सबमें पिछले ड्रामा की बातें की गयी थीं और हम लोगों की मेहमाननवाजी कीचर्चा थी लेकिन सक्सेना साहब की तहरीर में जहां अपनापन और दुआएं थीं, रेखा के खतमें अपनापन और ख़ुलूस था. अजय के खत से कुछ कुछ तकल्लुफ़ झलक रहा था. दोस्तों कीतादाद तो कभी कम नहीं रही लेकिन इस परिवार से जो दोस्ती शुरू हुई उसका अपना एक अलगही मयार था. सक्सेना साहब के हर खत में इसरार रहता था, जयपुर आओ, अगर हो सके तोवहाँ रहकर हमारे साथ नाटक करो, अगर किसी वजह से ये मुमकिन न हो तो वैसे ही कुछ दिनआकर साथ रहो.डाकिया महज़ ख़त नहीं खुशियां भी लाता था.वक्त गुज़रता रहा, जयपुर जाना नहीं हो पा रहा था. सक्सेना साहब, रेखा और अजय के हरखत में बाकी सारी बातों के साथ साथ, जयपुर का बुलावा बदस्तूर अपनी जगह पर कायम रहरहा था. इसी बीच मैंने तय किया कि मैं बैंक पी ओ का इम्तहान दूंगा. बी ए फाइनल मेंथा इसलिए मैं उस इम्तहान की शर्तें पूरी कर रहा था. मैं दो दिन के लिए जयपुर पहुँचगया. सक्सेना साहब के हुकुम की तामील करते हुए, मैं उनके तेलीवाडे वाले घर पहुँचगया. छोटा सा किराए का घर था जिसमे सक्सेना साहब अपनी पत्नी और तीन बच्चों विजय,अजय और रेखा के साथ रह रहे थे.अगले ही दिन मेरा इम्तहान था. इम्तहान दिया तो सही, लेकिन मैं उससे बहुत मुतमईननहीं था. घर लौटा तो थोडा उदास था. सक्सेना साहब जैसे ही दफ्तर से लौटकर आये, अपनेउसी पारसी थियेटर के अंदाज़ में बोले, “क्यों उदास हो? पेपर ठीक नहीं हुआ? कोई बातनहीं. अभी तो ज़िंदगी का पहला पेपर दिया है तुमने और अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है?”फिर अपनी बीवी से बोले “चलो जी आज कुछ पकौड़े-वकौडे बनाओ. बैठेंगे, बोतल खोलेंगे,महेंद्र का मूड ठीक करेंगे.”आंटी जी और रेखा पकौड़ों की तैयारी में लग गए. सक्सेना साहब ने व्हिस्की की बोतलनिकाली और मुझसे बोले “आओ दो पैग लगा लो, मूड ठीक हो जाएगा.” मैंने मुस्कुरा करउनसे कहा “अंकल मेरे पिताजी रोज दो पैग खाना खाने से पहले लेते हैं और हर रोज मुझेभी ऑफर करते हैं लेकिन मैं शराब नहीं पीता तो उन्हें हाथ जोड़ लेता हूँ. आप भी मेरेलिए उतने ही मोहतरम हैं, सो जैसे उन्हें हाथ जोड़ता हूँ, आपको भी जोड़ लेता हूँ.”उन्होंने मुस्कुराकर कहा “ बेटा, नहीं पीते हो ये बहुत अच्छी बात है, लेकिन बीकानेरमें नाटक के रोज आप सब लोग अलग चले गए थे और मैंने ये भी सुना कि सब लोग तुम्हारेघर गए हैं, तो मुझे लगा, शायद तुम लोग हम बूढ़े लोगों के साथ बैठना पसंद नहीं करते.और तुम लोगों ने तुम्हारे घर जाकर पी होगी.” मैंने कहा “जी अंकल, मैं सब लोगों कोअपने घर ही ले गया था लेकिन मैंने खाने में तो सबका साथ दिया, पीने में नहीं. मेरेघर में ही मुझे इन सब बातों को छुपाने की ज़रूरत नहीं है, तो भला आपसे क्योंछुपाऊँगा?”उस शाम खूब पकौड़े खाए गए. सक्सेना साहब ने पीने के दौरान और पीने के बाद अपनीज़िंदगी के कई राज़ खोलकर मेरे सामने रख दिए. किस तरह ड्रामा के लिए अपने जूनून कीवजह से अपनी ज़िंदगी में उन्होंने दुःख उठाये. सारी कहानी मेरे सामने बिना किसी लागलपेट के उन्होंने रख दी. उन्होंने मुझसे कहा “तुम्हें नहीं लगता कि तुम्हारी आंटीकुछ नाराज़ है मुझसे ?” मैं भला इस बात का क्या जवाब देता? मैं जी-जी करके रह गया.इस पर वो बोले, “देखो महेंद्र... मेरे लिए ड्रामा महज़ एक दिलजोई का ज़रिया नहीं है.मैंने इसे अपना मज़हब माना है और इसके लिए अब तक कई कुर्बानियां दी हैं और हरकुर्बानी देने को तैयार हूँ.”“जी अंकल”"कुछ वक्त पहले मेरा मन हुआ एक ड्रामा करने का जिसका नाम था 'बीवियों का मदरसा'.”“जी”“ये एक ऐसी बच्ची की कहानी है जिसे एक बूढा बचपन में अगवा करके अपने बड़े सेकिलेनुमा महल में ले आता है, इस नीयत से कि जब ये बड़ी होगी तो मैं इससे शादीकरूँगा. वो लड़की बड़ी होती है तो उस बूढ़े की कोशिश रहती है कि उस लड़की की नज़र किसीभी जवान मर्द पर ना पड़े. जब वो किसी जवान को देखेगी ही नहीं, उसके लिए वो बूढा हीएक मात्र मर्द होगा इस दुनिया का. पूरे नाटक में बहुत से सीन और डायलॉग थे जिसे लोगवल्गर मानते हैं.”“जी”मैंने तय किया कि बूढ़े का रोल मैं खुद करूँगा और..........”“जी”“और लड़की का रोल करेगी मेरी बेटी रेखा.”मैं एकदम चौंक गया. मैंने धीरे से कहा “ये क्या सोचा अंकल आपने?”“क्यों? ड्रामा तो आखिर ड्रामा है. वो फनकार ही क्या हुआ जो इस रास्ते में आने वालेचैलेंजेस को एक्सेप्ट ना करे ?” मैं खामोश रहा क्योंकि उनकी बात का मेरे पास कोईजवाब नहीं था. वो ग्लास से एक सिप लेते हुए बोले “देखो महेंद्र, मेरा उसूल ये हैकि या तो आप कोई काम करिये मत और अगर करते हैं तो पूरी ईमानदारी के साथ करिये.मैंने भी बस अपना काम ईमानदारी के साथ किया.”“फिर आपने वो ड्रामा किया?”“बिलकुल किया. लेकिन तुम्हारी आंटी तब से ही मुझसे नाराज़ हैं. कहती हैं कि समाज मेंहर तरफ थू थू हो रही है. लेकिन महेंद्र, मुझे परवाह नहीं समाज की. बस अफ़सोस है तोसिर्फ इस बात का कि मेरी बीवी ने भी मेरे जज्बे को नहीं समझा.”“अंकल बहुत छोटा हूँ मैं अपनी कोई भी राय देने के लिए. आपके जज्बे को सलाम करता हूँलेकिन एक माँ के सोचने के जाविए का भी पूरा एहतराम करता हूँ.”“ठीक है भई. तुम दोनों को ही नाराज़ नहीं करना चाहते. खैर, मैं सिर्फ इतना जानता हूँकि अपनी जगह पर मैं गलत नहीं था.”“जी अंकल”उस रात वो बहुत देर तक मुझसे बातें करते रहे. वो चाहते थे कि उनका बेटा अजय नेशनलस्कूल ऑफ ड्रामा में एडमिशन ले और बहुत बड़ा डायरेक्टर बने. बातें करते करते ही हमलोग उस रात पता नहीं कितने बजे सोये.अगले दिन मैंने सक्सेना साहब से कहा, मैं आज रात में बीकानेर निकलना चाहता हूँ. वोअपने उसी पारसी थियेटर के अंदाज़ में बोले “अरे..... इतनी क्या जल्दी है? आये हो तोदो चार दिन रहो हमारे साथ.”मैंने एक नज़र आंटी, विजय और रेखा के चेहरे की तरफ डाली. मुझे लगा कि कहीं ऐसा न होकि सक्सेना साहब तो मुझे रोक रहे हों मगर बाकी लोगों को ये नागवार गुज़रे. लेकिननहीं. मैंने पाया कि बाकी लोगों के चेहरे पर जो तास्सुरात थे वो भी सक्सेना साहब केइसरार की ताईद कर रहे थे. मैंने कहा “जी अंकल. जैसा आपका हुकुम. मैं दो दिन और रुकजाता हूँ.”और मैं दो रोज और रुक गया. इन्हीं दो दिनों में मेरी मुलाक़ात अजय और रेखा नेअजयराज, हरी शर्मा, नरेन्द्र गुप्ता, सिन्हा और अपने कई साथी कलाकारों से करवाई औरविजय ने अपने एक दोस्त भरत दुबे से. इसी दौरान रेखा की सहेली सुमन से भी मुलाक़ातहुई. इन सब लोगों से जो एक बार मुलाक़ात हुई तो सबने कहा “क्या बीकानेर में पड़े हो,ड्रामा करना है तो जयपुर आओ.”मैंने मन ही मन सोचा कि अगर कभी मौक़ा मिलेगा तो कुछ बरस जयपुर आकर ज़रूर रहूँगा,ताकि यहाँ के आर्टिस्ट्स के साथ ड्रामा कर सकूं. दो रोज बाद मैं बीकानेर वापस चलागया. पी ओ के इम्तहान में मेरा सलेक्शन नहीं हुआ था. बी ए की पढाई चलती रही. इस सालमुझे एक ही साल के पेपर्स देने थे इसलिए थोड़ा रिलेक्स्ड था.ड्रामा रिहर्सल की प्रतीकात्मक तस्वीर.इसी दौरान भाई साहब का तबादला पीलवा से बीकानेर के नज़दीकी गाँव नौरंगदेसर में होगया था. ये गाँव बीकानेर से महज़ 25 किलोमीटर दूर जयपुर रोड़ पर था. उन्होंने तय कियाकि वो रहेंगे बीकानेर में हमारे साथ ही और रोजाना कुछ वक्त के लिए नौरंगदेसरजायेंगे. जब बाकी वक्त में वो बीकानेर रहने लगे, तो आस पास के लोग डॉक्टर की ज़रूरतपड़ने पर उनके पास आने लगे. वो भी क्या करते? जब मरीज़ आयें तो इलाज तो करना ही था.ऐसे में उन्हें थोड़ी मदद की ज़रूरत भी पड़ती थी. मैं घर में होता तो उनकी मदद करदेता. धीरे धीरे ये एक रूटीन बन गया. वो बाकायदा एक क्लिनिक चलाने लगे और मैं उनकाअसिस्टेंट बन गया. कई बार कुछ सीरियस मरीज़ आ जाते, तब भी हम दोनों भाई उन्हें संभाललेते थे. मैंने इंट्रा मस्क्यूलर, इंट्रा वेनस सब तरह के इंजेक्शन लगाने सीख लिए औरछोटे मोटे ऑपरेशन भी हम लोग करने लगे. मैं ऑपेरशन के पहले की पूरी तैयारी करना भीसीख गया था और ऑपरेशन के बाद घाव पर टाँके लगाना भी.भाई साहब को तो नौरंगदेसर अपनी ड्यूटी पर भी जाना होता था, लेकिन मरीजों का तो कोईवक्त नहीं होता. कई बार जब भाई साहब घर पर नहीं होते थे, मरीज़ आ जाते थे, मैं क्याकरता? उस ज़माने में फोन तो हुआ नहीं करते थे कि भाई साहब से सलाह करता. कभी समझ मेंआता, तो कोई दवा दे देता था,अगर समझ नहीं आता तो पूनम जोशी भाई साहब के पास भेजदिया करता था, जो भाई साहब के ही साथी थे. धीरे धीरे मैं एक नीम हकीम बन गया औरमेरी जेब में ठीक ठाक पैसा भी इस पेशे से आने लगा. इधर ट्यूशंस तो मैं फर्स्ट ईयरसे ही कर रहा था. इस तरह अपना खर्च चलाने के लायक मैं हो गया था. बस कमी थी तो वक्तकी कमी थी. कॉलेज जाना, ट्यूशन पढ़ाना, खेलने जाना, डॉक्टरी करना, ये सब कुछ चौबीसघंटों में बड़ी मुश्किल से होते थे. फिर भी ज़िंदगी चल रही थी.इसी बीच सक्सेना साहब का खत आया कि वो “यहूदी की लड़की” नाटक फिर से एक बार करने जारहे हैं और चाहते हैं कि इस बार मैं उसे देखने जयपुर जाऊं.'यहूदी की लड़की' आगा हश्र कश्मीरी का बहुत मशहूर नाटक है.उस ज़माने में रिज़र्वेशन वगैरह तो हुआ नहीं करते थे. बस एक चादर लेकर यार्ड में जाकरट्रेन में जगह रोकनी होती थी. मैं भी जा पहुंचा अपना सामान लेकर रेलवे स्टेशन केयार्ड में, जहां ट्रेन खड़ी थी. एक ऊपर की बर्थ रोकी और सो गया उसपर. अगले दिनसक्सेना साहब के घर पहुंचा. सक्सेना साहब, आंटी, रेखा, विजय बहुत खुश हुए. हाँ, अजयके चेहरे से मैं समझ नहीं पाया कि वो खुश हुआ या नाखुश. मैं ड्रामा से तीन चार रोजपहले चला गया था और पूरे वक्त सक्सेना साहब के साथ ही लगा रहा. नतीजतन स्टेज के कईमामलों में उनसे काफी कुछ सीखने को मिला, जो आगे जाकर ज़िंदगी भर काम आया.ड्रामा बहुत ही कामयाब रहा. यहूदी का रोल खुद सक्सेना साहब ने किया और उनकी बेटीराहील का रोल अरुणा नाम की एक लड़की ने किया. दोनों ही बाकी सारे कैरेक्टर्स पर भारीपड रहे थे. आगे जाकर, आगा हश्र कश्मीरी के इस ड्रामा को मैंने सक्सेना साहब कोखिराजेअकीदत के तौर पर आल इंडिया रेडियो, उदयपुर में किया जिसकी हर तरफ बहुत तारीफ़हुई. अब जब बात चल रही है सक्सेना साहब की, तो पाठक मुझे माफ करें, इस बार बीच केसारे वाकयों को अगले एपिसोड्स के लिए छोड़ते हुए उनकी ही बात पूरी कर देता हूँ.मैं एम् ए कर रहा था तो साथ के कुछ स्टूडेंट्स, कुछ फॉर्म्स लेकर आये. मुझे नहींपता था कि क्या फॉर्म हैं ये और किसलिए है? एक दोस्त ने मेरे आगे रखा एक फॉर्म औरमुझे कहा “दस्तखत कर दो.” मैंने दस्तखत कर दिए. कुछ दिन बाद बिजली डिपार्टमेंट सेएक खत आया कि फलां तारीख को आपका इम्तहान है. मैं इम्तहान भी दे आया. एक महीने बादपता चला कि उस इम्तहान में जिसमे कई सौ लोग शामिल हुए थे, तीन लोग पास हुए हैं औरउन तीन लोगों में से एक खुशकिस्मत मैं हूँ. अब मैंने देखा कि आखिर वो इम्तहान थाकिस पोस्ट के लिए? पता लगा कि बिजली डिपार्टमेंट में यू डी सी की पोस्ट थी. यू डीसी यानि अपर डिवीज़न क्लर्क. घर के लोगों को बताया तो सबने कहा, छोडो ये क्लर्कीनहीं करनी. आस पास के उन लोगों की नज़र में ये एक बहुत बड़ी पोस्ट थी, जो बड़ी मुश्किलसे एल डी सी लगे थे और उन्हें पता था कि 17-18 साल की नौकरी के बाद वो इस पोस्ट परपहुंचेंगे. ऐसे ही लोगों में मेरा एक दोस्त रघु था, जो हायर सैकेंडरी के बाद एल डीसी लग गया था और जानता था कि इस पोस्ट पर पहुँचने में उसे 15 साल और लगेंगे.मैं बहुत पशोपेश में था कि क्या करूं, तभी सक्सेना साहब का एक खत आया, जिसमेउन्होंने एक बार फिर से कहा था कि मुझे जयपुर जाकर स्टेज करना चाहिए और एक खत रेखाका आया था जिसमे उसने पूछा था कि मैं जयपुर कब जाने वाला हूँ. इस बीच चूंकि मेरेज्वाइनिंग के लिए तय तारीख निकल रही थी, मैंने एक खत मय 15 दिन के मेडिकलसर्टिफिकेट के बिजली डिपार्टमेंट के एस ई ऑफिस को भिजवा दिया था, ताकि मुझे सोचनेका मौका मिल सके.जब सक्सेना साहब और रेखा, दोनों के खत आये तो मेरे जेहन में एक ख़याल आया कि अगर मैंये नौकरी ज्वाइन कर लेता हूँ, तो जो भी तनख्वाह मिले, मेरे गुज़ारे लायक तो मिलेगाही, मगर मैं जयपुर में रहकर स्टेज अच्छी तरह सीख पाऊंगा और शायद वो मुझे मेरीज़िंदगी में आगे कुछ काम आये. मैंने पिताजी और भाई साहब से बात की. उनकी नज़र में येठीक क़दम नहीं था लेकिन जब मैंने उन्हें कहा कि आप इसे मेरी एक ट्रेनिंग ही समझलीजिए, वो मान गए और मैं जयपुर के लिए निकल पड़ा.सक्सेना साहब का अपने खत में खास इसरार था, कि अगर मैं जयपुर में रहूँगा तो आस पासकोई मकान देख लिया जाएगा, लेकिन एक बार मैं उनके साथ ही रुकूं. उनके इस हुकुम कोभला मैं कैसे टाल सकता था? मैं उनके घर पहुंचा. सक्सेना साहब, आंटी, अजय, विजय,रेखा सभी लोग बहुत खुश हुए. अगले दिन मैं तैयार होकर बताए हुए पते पर बिजलीडिपार्टमेंट के एस ई के दफ्तर पहुंचा. एक खास क्लर्कनुमा इन्सान ने बड़े ही ठंडेपनसे मेरा खैरमकदम किया, मेरे पेपर्स लेकर एक फ़ाइल बनाई और कहा, “चलिए, आपकीज्वाइनिंग एस ई साहब के रूम में होगी.”एक स्टैण्डर्ड सरकारी ऑफिस.मैं उनके पीछे-पीछे चल पड़ा. एस ई के कमरे में पहुंचकर मैंने गुड मॉर्निंग कहा,जिसका उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया. मेरे ऊपर से नीचे तक आग लग गयी लेकिन मैं खामोशरहा. मेरे साथ आये हैड क्लर्क ने मेरा नाम बता कर कहा, “सर ये ज्वाइन करने आयेहैं.” एस ई साहब का पारा एकदम से सातवें आसमान पर पहुँच गया. वो चिल्लाये, “आपको तोपन्द्रह दिन पहले आना चाहिये था.”मैंने अपने पर ज़ब्त करते हुए कहा, “मैं बीमार था. मेडिकल भेजा था मैंने.”“ऐसे मेडिकल तो पांच पांच रुपये में मिलते हैं.” ये कहते हुए उन्होंने वो मेडिकलनिकालकर मेरी तरफ फेंक दिया. अब मैं अपने पर ज़ब्त नहीं रख पाया. मैंने पूरी फ़ाइल एसई के मुंह पर फेंकते हुए कहा, “ऐसी दो टके की नौकरियां भी बहुत मिलती हैं. रखियेइसे अपने पास.” और मैं उनके कमरे से बाहर निकल पड़ा. पीछे से उनकी आवाजें मेरी समाअतसे टकराती रही, “मिस्टर मोदी. मिस्टर मोदी.” लेकिन मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा.मैंने सोचा, घरवालों की मर्जी के खिलाफ मैं यहाँ आया और ये इन्सान मुझसे अभी ऐसासलूक कर रहा है, तो आगे जब मैं इसका मातहत बन जाऊंगा तो क्या करेगा?मैंने रिक्शा लिया और सक्सेना साहब के घर आकर अपने कपडे समेटने लगा. आंटी ने कहा,“बेटा क्या हुआ? तुम्हें तो आज ज्वाइन करना था न? तुम इतनी जल्दी कैसे आ गए और कपडेक्यों समेट रहे हो?”“सॉरी आंटी, मैंने ज्वाइन नहीं किया और मैं वापस बीकानेर जाउंगा आज रात में.”“अरे बेटा क्या हुआ ? सक्सेना साहब को तो आने दो”“जी आंटी उनके आने के बाद ही जाऊंगा.” शाम को सक्सेना साहब आ गए, विजय भी और रेखाभी. मैंने जब पूरी कहानी सुनाई तो सक्सेना साहब बोले “ठीक किया बेटा तुमने. मैंजानता हूँ, तुम बिजली महकमे के क्लर्क बनने के लिए पैदा नहीं हुए हो, लेकिन मेरीख्वाहिश है कि जब आये ही हो तो तुम 15-20 दिन हम लोगों के साथ रहकर वापस लौटो."मेरे सामने अब कोई रास्ता नहीं था. मैं 15 दिन उनके साथ रहा और उन 15 दिनों में मैंबिलकुल उनके घर का ही एक फर्द बन गया, यहाँ तक कि जब 15 दिन बाद मैं वहाँ सेबीकानेर लौटने लगा तो आंटी रोने लगीं और रेखा की आखों में भी मुझे नमी नज़र आयी.खतो-किताबत बराबर चलती रही. मैंने रेडियो में अनाउंसर और ट्रांसमिशन एग्जीक्यूटिवके इम्तेहान दिए. दोनों इम्तहान देने मैं जयपुर ही गया था और दोनों बार मैं सक्सेनासाहब के घर ही रुका था. एक शाम सक्सेना साहब अपनी व्हिस्की की बोतल खोलकर बैठे थे.मैं उनके पास बैठा, मूंगफलियां चबा रहा था कि उन्होंने एक सवाल किया, “महेंद्र,शादी के बारे में क्या इरादा है तुम्हारा?”अचानक आये इस सवाल का मुझसे कोई जवाब देते नहीं बना. मैं बस जी, जी कर रहा था किअजय, विजय और दो तीन आर्टिस्ट्स आ गए. सक्सेना साहब बोले, “खैर. फिर कभी बात करेंगेइस बारे में.”मैंने जवाब दिया “जी”मैं लौटकर बीकानेर आ गया था. सक्सेना साहब के खत बराबर आ रहे थे, लेकिन रेखा के खतदिनोदिन कम और छोटे होते जा रहे थे. इत्तेफाक से दोनों ही इम्तेहानों में मैं पासहो गया. पहले मुझे ऑफर मिला जोधपुर में अनाउंसर की पोस्ट का. मैंने वहाँ ज्वाइन करलिया. 6 महीने बाद मुझे ट्रांसमिशन एग्जीक्यूटिव का ऑफर उदयपुर के लिए मिल गया.मैंने 1976 में वहाँ ज्वाइन कर लिया. इसी बीच मेरी शादी हो गयी. ये सब मैं विस्तारसे आपको आगे के एपिसोड्स में बताऊंगा. शादी के तुरंत बाद सक्सेना साहब का खत मिलाकि वो 'यहूदी की लड़की' नाटक लेकर उदयपुर आ रहे हैं. नियत तारीख को वो टीम के साथउदयपुर पहुंचे. उनके साथ रेखा भी थी. मैंने उन्हें बहुत कहा कि वो मेरे घर रुकेंमगर पूरी टीम को छोड़कर, मेरे घर रुकने को वो तैयार नहीं हुए.ड्रामा बहुत अच्छा रहा. वो जयपुर लौट गए. कुछ ही दिनों बाद मुझे आकाशवाणी जयपुर सेएक ड्रामा में हिस्सा लेने का आर्डर मिला. मैं जयपुर पहुंचा और अपने एक दोस्त महेशश्रीमाली के घर रुका. किसी काम से बापू बाज़ार गया था, हल्की हल्की बारिश हो रहीथी. वहाँ रास्ते पर चल रहा था कि वही पारसी थियेटर वाली आवाज़ सुनाई दी. "महेंद्र,महेंद्र" मैंने चौंक कर पीछे देखा, सक्सेना साहब एक पान की दुकान के सामने खड़े थे.साथ में रेखा भी थी. मैं मुड़कर गया और उनके पाँव छुए. उन्होंने मुझे गले से लगालिया और रेखा जो अब तक चुपचाप खड़ी थी, उससे बोले “क्यों रेखा पहचानती नहीं हो क्याइसे?”रेखा एकदम हडबडा कर बोली, “हैलो महेंद्र.”मैंने भी कहा “हैलो रेखा.”सक्सेना साहब पता नहीं क्यों मन ही मन बुदबुदाए, “हुंह, हेलो महेंद्र.”मैंने चौंककर कहा “जी... आपने कुछ कहा ?”“नहीं बेटा.... कुछ नहीं...... अच्छा कहाँ जा रहे हो?”मेरे जवाब का इंतज़ार भी उन्होंने नहीं किया और बोले, “चलो घर चलते हैं. बारिश होरही है, पकौड़े बनवाकर खाए जायेंगे.” मैंने इधर-उधर देखा. उनके पास एक बजाज स्कूटरथा और वो दो लोग थे. मैंने कहा “जी आप दोनों चलिए, मैं रिक्शा लेकर आ जाऊंगा.”“क्यों रिक्शा क्यों? क्या तुम समझते हो कि मैं तुम दोनों को नहीं ढो सकता? अरे अभीइतना बूढा भी नहीं हुआ हूँ.”मैं थोड़ा पशोपेश में था कि वो फिर बोले “अरे कोई और नहीं है ये, अंडर सेक्रेटरीड्रामा की तुम्हारी महबूबा है ये. अरे ड्रामा को एक बार अमली ज़िंदगी में जी लोगे तोक्या हर्ज है?” और एक ऐसा अजीब सा ठहाका लगा कर वो हंस पड़े कि न जाने क्यों मैंबहुत डर गया.मैं कुछ नहीं बोला. सक्सेना साहब ने स्कूटर स्टार्ट किया, उनके पीछे रेखा बैठी औरउसके बाद मैं. स्कूटर पर बैठने के बाद उन्होंने बताया कि उन्होंने बजाजनगर में एकघर खरीद लिया है और हम वहीं जा रहे हैं. घर पहुंचे तो आंटी बहुत खुश हुईं. अजय तबतक नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा जा चुका था. फिर वही पकौड़े बने. सक्सेना साहब ने अपनीबोतल खोली और पैग पर पैग लेने लगे. मैं उनके साथ पकौडे चबाता रहा. आंटी पकौड़े बनारही थीं और रेखा हमें सर्व कर रही थी. कई बार लगा कि सक्सेना साहब कुछ कहना चाह रहेथे, लेकिन उन्हें मौका नहीं मिल रहा था क्योंकि हर 5-7 मिनट बाद रेखा कुछ पकौड़ेलेकर आ जाती थी. कुछ देर बाद सक्सेना साहब नशे में चूर हो चुके थे. आंटी ने मुझेकहा, “बेटा तुम यहीं सो जाओ.”मेरा दोस्त महेश मेरा इंतज़ार कर रहा होगा, मैं जानता था इसलिए मैंने आंटी से माफीमाँगी और मैं बाहर निकल आया. बड़ी मुश्किल से मुझे एक रिक्शा मिला जिसे लेकर मैंमहेश के घर पहुंचा. दो दिन बाद ही मैं उदयपुर लौट आया. 15 दिन बाद एक खबर सीने मेंतीर की तरह आकर लगी, “राजस्थान के मशहूर स्टेज आर्टिस्ट और डायरेक्टर एच सी सक्सेनाने टिक-20 पीकर खुदकुशी की.” नफ्सियाती तौर पर बहुत परेशान हो गया मैं. जिस इंसानसे इतनी मुहब्बत, इतना ख़ुलूस मिला था, वो इंसान इस तरह इस दुनिया को छोड़कर चला गया.अक्सर मैं रात में नींद से जाग जाता था और इस सवाल का जवाब ढूँढने लगता था कि वोमुझसे क्या कहना चाहते थे और वो इस तरह इस दुनिया से क्यों चले गए, मगर मुझे वोजवाब कभी नहीं मिला. कहानी को यहाँ खत्म हो जाना चाहिए, लेकिन ये ज़िंदगी है. यहाँकहानियां जब लगती है, खत्म हो जानी चाहिए, तब अक्सर खत्म नहीं होतीं.बरस गुजर गए. 1998 की एक सुबह. मैं आकाशवाणी, उदयपुर में प्रोग्राम एग्जीक्यूटिवथा. एक खत आकाशवाणी जयपुर से आया था कि मुझे हमारे ही साथी गोकुल गोस्वामी के लिखेएक ड्रामा “अश्वपुरुष” में लीड रोल करने के लिए आकाशवाणी जयपुर जाना था, जिसे मुकुलगोस्वामी डायरेक्ट करने वाले थे. मैं उसी दिन जयपुर के लिए रवाना हो गया. सुबहजयपुर पहुंचा तो नहा धोकर सीधे आकाशवाणी भागा, लेकिन वहाँ पहुँचते ही पता लगा किस्टूडियो में रिहर्सल चालू हो चुकी है. मैं दबे कदमों से स्टूडियो में घुसा. मेरेगुरु नंदलाल जी बैठे थे, उनके पैर छुए, उन्होंने सर पर हाथ रखा और मैं चुपचापकलाकारों के उस गोल घेरे में जाकर बैठ गया, जो रीडिंग कर रहे थे.मैंने इधर उधर नज़रें दौड़ाईं, देखा एक जगह जो शक्ल बैठी हुई थी, वो बहुत जानी पहचानीलग रही थी. जी हाँ, वो रेखा थी. उसने मेरी तरफ देखा या नहीं देखा, मुझे नहीं पता.थोड़ी ही देर में वो हिस्सा आया जहां मेरा रोल था. जैसे ही मैंने अपना डायलॉग बोला.अचानक मेरी आवाज़ सुनकर एक दर्दभरी 'ओह' की आवाज़ माहौल में गूँज उठी. रेखा का चेहरामेरी तरफ उठा, एक अजीब सा दर्द उभरा और बिना आवाज़ के उसके होठों ने प्रश्न किया,“म................हे................न्द्र?”मैंने अपने डायलॉग के साथ ही हाँ में गर्दन हिला दी. डायलॉग खत्म होते ही मैंनेदेखा, उसकी आँखें डबडबा आई थीं. क्यों? मुझे आज भी पता नहीं.--------------------------------------------------------------------------------रेडियो ज़ुबानी की पिछली किस्तें:दारू चाहे कहीं भी पी लो, सबसे ज़्यादा मज़ा तो पिता के साथ पीकर ही आता हैपति को मारनेवाले डाकू के आगे खड़ी हो गई भंवरी, कहा, "मुझे भी साथ ले चलो."कहानी पीवणा सांप की, जो इंसान की छाती पर बैठकर मुंह में ज़हर टपकाता है!कहानी जानू की, जिसने अपने इंसानी दोस्त को बरसों तक याद रखाजब अचानक से रेडियो पर लड़कियों के नाम लिए जाने लगेबस ड्राइवर की पुकार अनसुनी की और घातक एक्सीडेंट हो गयाजब पान खाकर खुद की पैंट पर पीक थूक दी और वकील को झापड़ मार दियाजब एक पाकिस्तानी जासूस के लिए हिंदुस्तानी जनता ने ज़िंदाबाद के नारे लगाएजब 1971 के भारत-पाक युद्ध की आंच राजस्थान तक जा पहुंचीबीकानेर का डूंगर कॉलेज और करणी सिंह बॉस का आतंककहानी अमरू की, जो बेटियों की शादी से हासिल रकम से ज़िंदगी चलाता था'जब पूरा पेज पढ़कर हटा, तो मेरा चेहरा आंसुओं में डूबा हुआ था'वीडियो: शहीद उधम सिंह ने जनरल डायर को नहीं मारा था