The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • Lallankhas
  • radio zubani series by mahendra modi part 2 seven rupees radio and first play performance in childhood

'सालों तक साथ रहा 7 रुपये वाला मेरा रेडियो'

रेडियो जुबानी 2: बड़े होकर नाटक करने वाले उस बच्चे की पहली परफॉर्मेंस 4 बरस की उम्र में हुई थी. पढ़िए पूरा किस्सा.

Advertisement
Img The Lallantop
फोटो - thelallantop
pic
लल्लनटॉप
9 मार्च 2016 (अपडेटेड: 12 मई 2016, 10:41 AM IST)
font-size
Small
Medium
Large
font-size
Small
Medium
Large
whatsapp share
पेश है ‘दी लल्लनटॉप’ की नई सीरीज ‘रेडियो जुबानी’ की दूसरी किस्त. इस सीरीज में हम आपको महेंद्र मोदी के लिखे रेडियो से जुड़े किस्से पढ़ाएंगे. बीकानेर में पैदा हुए महेंद्र मोदी मुंबई में रहते हैं. रेडियो में 40 साल से ज्यादा का एक्सपीरियेंस है. विविध भारती मुंबई में लंबे वक्त तक सहायक केंद्र निदेशक रहे.
mahendra modi-2
पहली किस्त में आपने पढ़ा- छोटे से बच्चे ने रेडियो के लिए अपनी गुल्लक तोड़ी. अब पढ़िए बच्चे के साथ उस रेडियो के आगे के सालों की कहानी.
  उस ज़माने में राजस्थान में कहने को पांच रेडियो स्टेशन हुआ करते थे. जिनमें से एक अजमेर में सिर्फ ट्रांसमीटर लगा हुआ था. जो पूरे वक्त जयपुर से जुड़ा रहता था. मुख्य स्टेशन जयपुर था और बाकी स्टेशन यानी जोधपुर, बीकानेर और उदयपुर केन्द्रीय समाचार दिल्ली से रिले करते थे. प्रादेशिक समाचार जयपुर से और कुछ प्रोग्राम के टेप्स जयपुर से आते थे, उन्हें ही प्रसारित कर दिया जाता था. कुछ प्रोग्राम जिनमें ज़्यादातर फ़िल्मी गाने बजाए जाते थे. अपने अपने स्टूडियो से प्रसारित करते थे. मुझे इस से कोई मतलब नहीं था कि कौन सा प्रोग्राम कहीं और से रिले किया जाता है और कौन सा बीकानेर के स्टूडियो से प्रसारित होता है. मैं तो अपने मालिये (छत पर बने कमरे) में बैठा अपने उस छोटे से रेडियो को कानों से लगाए हर वक्त रेडियो सुनने में मगन रहता था. जब भी संगीत का कोई प्रोग्राम आता तो मैं बैंजो निकालकर उसके साथ संगत करने लगता. उस वक्त मुझे इस बात का ज़रा भी आभास नहीं था कि खेल खेल में की गई, ये संगत आगे जाकर हर उस स्टेशन पर मेरे साथियों के बीच मुझे एक अलग पोजिशन दिलवाएगी. हर बुधवार और शुक्रवार को रात में नाटक आया करता था जिसे मैं किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ सकता था. रविवार को दिन में पन्द्रह मिनट की झलकी आती थी और महीने में एक बार रात में नाटकों का अखिल भारतीय कार्यक्रम. ये सभी कार्यक्रम मेरे सात रुपये के उस नन्हें से रेडियो ने बरसों तक मुझे सुनवाए. उन दिनों जयपुर केंद्र से नाटकों में जो आवाजें सुनाई देती थीं. उनमें नन्द लाल शर्मा, घनश्याम शर्मा, गणपत लाल डांगी, देवेन्द्र मल्होत्रा, गोरधन असरानी (आगे चलकर फिल्मों के प्रसिद्ध कलाकार बने असरानी), माया इसरानी, सुलतान सिंह, लता गुप्ता नाम शामिल थे.
Embed
मैं उनके कदमों में झुक गया था, श्रद्धा से सराबोर. खैर ये बात आगे चलकर पूरी करुंगा. तो इन सभी कलाकारों के नाटक सुनते सुनते पता नहीं कब नाटक का एक बीज मेरे भीतर भी फूट पड़ा. कहते हैं आप चाहकर भी किसी को कलाकार बना नहीं सकते. कला का बीज तो हर कलाकार में जन्म से ही होता है. जब भी उसे सही माहौल मिलता है वो बीज अंकुरित होने लगता है. नाटक करने की कितनी क्षमता मुझमें रही है इसका आकलन तो मैं खुद नहीं कर सकता मगर नाटक करने का शौक़ मुझे बचपन में उस वक्त से रहा है, जब मुझे पता भी नहीं था कि जो मैं कर रहा हूं, उसे नाटक कहते हैं. मुझे याद आ रहा है एक ऐसा ही किस्सा. बात उस वक्त की है जब मेरी उम्र थी चार साल. मेरी मौसी उज्जैन से आए हुई थीं. सब साथ में बैठे थे. मैं जो कि अपनी मौसी के बहुत मुंह लगा हुआ था. वहां खूब शैतानियां कर रहा था. सभी लोगों ने मुझे शैतानियां न करने के लिए कहा लेकिन मुझ पर कोई असर नहीं हुआ. मैंने अपनी मस्ती चालू रखी. जब सब लोग तंग हो गए तो मेरी मौसी जी ने आख़िरी हथियार का इस्तेमाल किया. वो बोलीं 'देख महेन्द्र, अब भी तू नहीं मानेगा तो मुझे तेरी शिकायत जीजा (मेरे पिताजी) से करनी होगी.'
Embed
मुझे अंदाजा हो गया कि वो मुझे बेवकूफ बना रही हैं, उन्होंने मेरी शिकायत हरगिज़ नहीं की है. मैं उठा. अंदर आंगन के चार चक्कर लगाए और रोता हुआ वापस उस कमरे में आ गया जहां मौसी जी वगैरह बैठे थे. मैं सिर्फ नकली रोना चाह रहा था मगर न जाने कैसे नकली रोते रोते सचमुच मेरी आंखों में आंसू आ गए. मौसी जी घबराईं. बोलीं- अरे क्या हुआ? क्यों रो रहे हो? मैं रोते रोते बोला- पहले तो मेरी शिकायत पिताजी से करके डांट पड़वा दी और अब पूछ रही हैं क्यों रो रहे हो.? उन्होंने मुझे गोद में लिया और बोलीं- लेकिन बेटा न तो मैं उनके पास गई और न ही तुम्हारी शिकायत की. मैं तो वैसे ही आंगन में चक्कर लगा कर आ गई थी. मेरी आंखें तो अब भी आंसुओं से भरी हुई थीं. मगर मुझे जोर सी हंसी आ गई और मैंने कहा, 'तो मैं कौन सा उनके पास गया था? मैं भी आंगन में चक्कर लगाकर लौट आया था.' इस पर वो बोलीं, 'अरे राम, फिर ये इतने बड़े बड़े आंसू? ये कैसे आ गए तुम्हारी आंखों में.' इसका मेरे पास भी कोई जवाब नहीं था. क्योंकि मुझे खुद पता नहीं लगा कि रोने का अभिनय करते करते कब मेरी आंखों में सचमुच के आंसू आ गए.
Embed

Advertisement

Advertisement

()