पेश है ‘दी लल्लनटॉप’ की सीरीज ‘रेडियो जुबानी’ की 17वीं किस्त. इस सीरीज में हमआपको महेंद्र मोदी के लिखे रेडियो से जुड़े किस्से पढ़ा रहे हैं. बीकानेर में पैदाहुए महेंद्र मोदी मुंबई में रहते हैं. रेडियो में 40 साल से ज्यादा का एक्सपीरियेंसहै. विविध भारती मुंबई में लंबे वक्त तक सहायक केंद्र निदेशक रहे. अब तक आप इससीरीज की कई किस्तें पढ़ चुके हैं. अब पढ़िए महेंद्र मोदी की दादी का बताया वोकिस्सा, जो बेहद मार्मिक है.-------------------------------------------------------------------------------- भंवरी दूसरे ससुराल जा चुकी थी और अमरू की जेब फिर से भारी हो गयी थी. उसने गाडाचलाना फिर से छोड़ दिया था. फिर वही दिन भर जुआ खेलना शाम को दारू पीना और रात मेंमार पीट, हंगामा करना. क्योंकि दस हज़ार रुपये उसकी जेब में आ चुके थे और उस ज़मानेमें दस हज़ार रुपये का क्या अर्थ था, आज की पीढ़ी के लिए ये समझना थोड़ा मुश्किल कामहै. मेरी दादी जी जिन्हें पूरा मोहल्ला दादा के नाम से पुकारता था, अम्मल (अफीम)खाती थीं. हम लोग छोटे छोटे थे तो मुझे याद है, पिताजी दादी जी को चार तोला अम्मल(अफीम) दिलवाने के अलावा जो हाथ खर्च यानि पॉकेट मनी देते थे वो होती थी महज़ दोरुपया महीना. उन दो रुपयों में वो अपनी पसंद की खाने पीने की और दूसरी ज़रूरत कीचीज़ें भी खरीद लेती थीं और कुछ पैसा हम दोनों भाइयों पर भी खर्च कर देती थीं. ये वोवक्त था जब विज्ञान के मामले में भारत अभी अपने क़दम आगे नहीं बढ़ा पाया था क्योंकिअभी तो देश आज़ाद ही हुआ था और पंचवर्षीय योजनाओं का खाका बना कर प्रगति की सीढियोंका निर्माण हो रहा था. नेहरु ने पंचशील का सिद्धांत दुनिया के सामने रखा. शान्ति औरसह अस्तित्व के पांच मूलभूत सिद्धांत जिनपर चलकर पूरा विश्व बिना आपस में लड़े रहसकता है. पूरा एशिया दूसरे विश्वयुद्ध में तबाह हो चुका था और नेहरू की नेतागिरी कोप्रकट रूप से स्वीकार करने को तैयार हो गया था हालांकि 1962 में इस पूरे पंचशील कीहवा निकल गयी जब चीन ने 1954 की शान्ति संधि के बावजूद भारत पर आक्रमण कर दिया.नेहरू ने इससे भी आगे बढ़कर मिस्र के राष्ट्रपति नासिर और युगोस्लाविया के मार्शलटीटो के साथ मिलकर नॉनअलाइन्ड देशो का एक खेमा बनाया और पूरे विश्व की नेतागिरीकरने की ठान ली. भारत को विश्व में शान्ति का दूत सिद्ध करने में लगे नेहरू युद्धसामग्री बनाने वाले कारखानों में बहुत शान से मिक्सर ग्राइंडर बनवाने लगे और उनकेनिर्यात से भारत की खुशहाली का सपना देखने लगे. उनका मानना था कि भारत तो शांतिदूतका कार्य कर रहा है, पूरे विश्व को शान्ति का रास्ता दिखा रहा है, उस पर भला आक्रमणकौन करेगा? इधर चीन में माओत्से तुंग और चाऊ एन लाई की जोड़ी तेज़ी से हथियारों केज़खीरे इकट्ठे कर रही थी ताकि भारत पर आक्रमण कर सके. पाकिस्तान भी 1947 में पूरेकश्मीर पर अधिकार ना कर पाने पर तिलमिलाया हुआ बैठा था और मौक़ा ढूंढ रहा था भारत परहमला करने का. नेहरू पूरे विश्व की नेतागिरी के सपने देख रहे थे और इधर कईकांग्रेसी नेता देश पर उसी तरह परीक्षण कर रहे थे जैसे कि प्रयोगशाला में गिनीपिगपर किये जाते है. दवाओं के नाम पर बहुत मूलभूत दवाएं भी उपलब्ध नहीं थीं. बाज़ार मेंया तो आर एम् पी डॉक्टर थे, या नीम हकीम या चूरन की पुड़िया वाले वैद्य, या फिरमेटिरिया मेडिका बगल में दबाये मीठी गोलियां देने वाले होमियोपैथिक डॉक्टर. नतीजाये कि हर चार में से एक इंसान अफीम खाता था. उस ज़माने में हर मर्ज़ की एक ही दवा थीअफीम. हालांकि जब तक मैं समझने लगा, अफीम पर सरकारी कंट्रोल हो गया था लेकिन तब भीहर मोहल्ले में अफीम और पोस्त की कम से कम एक दुकान होती थी. हर एक को अफीम की एकनिश्चित मात्रा ही मिलती थी. जब अफीम की वो मात्रा पूरी नहीं पड़ती थी तो लोग पोस्तके डोडे उबालकर उसे छानकर पीते थे. अफीम के हर अभ्यस्त के होठों पर एक ही शिकायतरहती थी कि क्या करें आजकल अफीम अच्छा नहीं आता इसलिए डोडा पोस्त उबालकर पीना पडरहा है. पता नहीं वास्तव में अफीम की क्वालिटी खराब हो गयी थी या फिर जैसा कि हरनशे के साथ होता है, उनके शरीर को एक निश्चित स्तर तक नशा आने के लिये अफीम कीमात्रा बढ़ती जा रही थी. मेरे खुद के परिवार में मेरी दादी जी, मेरे बड़े मामा, बड़ीमामी और छोटी मौसी बाकायदा नियम से अफीम लेते थे. इनमें से किसी को भी जम्हाइयांआने लगती तो हम बच्चों तक को पता चल जाता था कि इनका नशा उतर गया है, अब ये अफीमलेंगे. मुझे अफीम की वो कड़वी कड़वी गंध आज भी याद है. हालांकि मेरे पिताजी बच्चों कोअफीम देने के कड़े विरोधी थे मगर मेरी दादी जी कई बार कोई दर्द होने पर या और भी नजाने क्या क्या होने पर उनकी नज़र बचाकर हमें अफीम दे दिया करती थीं इसलिए मुझे अफीमका वो कड़वा कड़वा स्वाद भी आज तक याद है. मुझे ये भी बहुत अच्छी तरह याद है कि अफीमस्वाद और गंध दोनों में कड़वा होता है लेकिन फिर भी उसमे एक अजीब सा आकर्षण होता है.रेडियो जुबानी की पहली किस्त जो भी एक बार उसे चख लेता है उसका मन उसे बार बार खानेको करता है. ये कहा जाता था कि एक बार जिस शरीर मे अफीम पहुंच जाता है, वो शरीर कभीन कभी उसकी मांग ज़रूर करता है. इसीलिए एक बार अफीम खाना शुरू करने के बाद इंसान उसेकभी नहीं छोड़ सकता. उन दिनों एक तरफ जहां कुछ लोग किसी तकलीफ की वजह से अफीम खातेथे वहीं कुछ लोग मज़े के लिए और अपने आपको अभिजात्य वर्ग का सिद्ध करने के लिए इसकीआदत पाल लेते थे क्योंकि अफीम गरीबों का शौक नहीं था. गरीबों के लिये भांग, देसीशराब जैसे नशे मौजूद थे जबकि अफीम राजा महाराजाओं और बड़े बड़े ठाकुरों के घरों औरदरबारों मे चलती थी. इन दरबारों मे बाकायदा मेहमानों की कसुम्बे यानि अफीम के घोलसे मनुहार की जाती थी. इसी अफीम के नशे के बल बूते पर बड़े बड़े शूरवीरों ने न जानेकितने युद्धों में अपने शरीर पर अनगिनत घाव झेलकर भी घुटने नहीं टेके. राजस्थान केइतिहास में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं जब अफीम के नशे में सैनिकों की गर्दन कट जाने केबावजूद बहुत देर तक उनके धड लड़ते रहते थे. मेरे मामा और मामी सिर्फ मज़े के लिए यायों कहें कि नशे का आनंद लेने के लिए अफीम खाते थे लेकिन मेरी दादी जी ने अफीम खानामजबूरी में शुरू किया था या ये कहें कि हमारे कुछ रिश्तेदारों ने अपने स्वार्थ केलिए उन्हें अफीम की आदत डाल दी थी. मैंने 5वें भाग में इस विषय में लिखा था किबीसवीं सदी की शुरुआत में जब मेरे पिताजी पौने दो साल के थे, प्लेग की महामारी फैलीथी. मेरे दादा जी क्षेत्र के एक प्रतिष्ठित व्यापारी थे. मेरे पिताजी के अलावा उनके10 और औलादें थीं. प्लेग की बीमारी ने जो मेरे घर में पांव पसारे तो मेरे दादा जीऔर उनकी दस औलादों को अपने दामन मे समेटकर ही उस घर से विदा हुई. मेरी दादी जीबताती थीं कि चार दिन में हमारे घर से 11 अर्थियां निकली और घर में महज़ दो लोग बचगए. अपना सुहाग और 10 औलादे खोने वाली मेरी दादी जी और पौने दो साल की उम्र केदुधमुंहे मेरे पिताजी. इतना सब खोने के बाद ऐसा कौन सा पत्थरदिल इंसान हो सकता हैजो अपने दिमाग का संतुलन न खो दे. दादी जी ने भी अपना संतुलन खो दिया और ऐसे मेंमेरे दादा जी के रिश्तेदारों ने उन्हें सुबह शाम दोपहर खूब अफीम खिलाया. इसी अफीमके नशे में उनके सारे गहनों और रुपयों पर आसानी से कब्ज़ा कर लिया और ज़मीन जायदाद केकागज़ात पर अंगूठे लगवा लिए. दादी जी के भाई जवाहर मल जी जो गंगानगर मे पोस्टेड थे,उनके पास आये तब तक सब कुछ लुट चुका था. दादा जी के रिश्तेदारों ने उस घर के कागज़ातपर भी दादी जी का अंगूठा लगवा लिया था जिस घर मे वो दुल्हन बनकर न जाने कितनेअरमानों के साथ आई थीं. दादी जी के भाई ने कहा, “छोड़ जमना छोड़ सबकुछ, अब तेरा यहांकुछ नहीं है.ये एक बच्चा बचा है तेरे पास, इसका जीवन बचाना है तो निकल चल मेरे साथगंगानगर इस घर मे तो प्लेग के कीटाणु फैले हुए हैं, यहां रहेगी तो इस बच्चे से भीहाथ धो बैठेगी.” और मेरी दादी जी अपनी गोद की मे पौने दो साल का एक बच्चा और अपनीअफीम की डिबिया उठा कर उस घर से चल पड़ीं. इस तरह मेरे पिताजी इतनी छोटी सी उम्र मेअपने मामा के घर आ गए जिनके एक बेटा और एक बेटी थी. मामी जी की मृत्यु कुछ ही समयपहले हो चुकी थी. अब दादी जी को तीन बच्चों को पालना था. एक अपनी औलाद थी और दो भाईकी औलादें. रेडियो जुबानी 2 मेरे पिताजी, ताऊ जी यानी “बा” और मोहिनी बुआ के साथसाथ पलने लगे. दादी जी भरसक तीनों बच्चों को अपने ही बच्चों की तरह पाल रही थीं.हालांकि उन्हें कई बार लगता कि वो अपने भाई पर बोझ बनी हुई हैं मगर उन्हें कुछ सूझनहीं रहा था कि वो क्या करें? पढ़ी लिखी बिलकुल थीं नहीं, उस ज़माने मे औरतों मे पढाईका चलन था ही कहां? इसके अलावा तीन तीन छोटे बच्चों को संभालने के बाद इतना समय भीनहीं बचता था कि बड़ी पापड कुछ बना कर पैसा कमा सकें. खाना पीना तो खैर अपनी जगह थालेकिन सबसे ज़्यादा उन्हें चुभती थी अफीम की अपनी आदत. वो बताया करती थीं किउन्होंने बहुत कोशिश की कि किसी तरह अफीम की आदत छूट जाए लेकिन वो हर बार अफीमछोड़ने मे असफल रहीं. उनके भाई हर बार कहते थे “जमना तू चिंता मत कर, अरे जहां सेरोटी के लिये पैसा आयेगा, वहीं से तेरे अफीम के लिये भी आ जाएगा.” कुछ साल इसी तरहबीते कि एक दिन उन्होंने सुना कि पब्लिक पार्क में एक सिनेमा हाल बना है “गंगाथियेटर”. गंगा थियेटर में पांच क्लास हैं, फर्स्ट, सेकंड, थर्ड, बालकनी, बॉक्स औरलेडीज़. उन्हें लगा कि वो पढ़ी लिखी नहीं हैं तो क्या हुआ गिनती तो अच्छी तरह आती हैक्योंकि अपने अच्छे दिनों में पति के घर में रोज रात को घर लौटकर कलदारों(चांदी केएक एक रुपये के सिक्कों) और नोटों का थैला तो वो उन्हें ही सुपुर्द करते थे और वोउन्हें गिनकर अपने पति को बताती थीं कि आज इतने रुपये थे थैले में. वो टिकट भी गिनसकती हैं, लोगों को भी गिन सकती है तो क्यों न सिनेमा हॉल में जाकर नौकरी का कुछजुगाड किया जाए. उन्होंने सुना कि सिनेमा हॉल में लेडीज़ क्लास के लिये लेडी गेटकीपरकी ज़रूरत है. शाम को जब भाई घर आये तो उन्होंने भाई को मन की बात कही. हालांकिउन्हें समझाने में बहुत मुश्किल हुई दादी जी को लेकिन उन्होंने भाई को ये कहकर समझालिया कि बच्चे भी बड़े हो गए हैं, स्कूल चले जाते हैं अगर वो सिनेमा हॉल में कामकरें तो कोई नुक्सान नहीं होगा. रेडियो जुबानी 3 अगले दिन वो गंगा थियेटर जाकर वहांके मालिक से मिलीं और कहा कि वो लेडीज़ क्लास में गेटकीपर का काम करना चाहती हैं.हॉल के मालिक की एक बहुत बड़ी समस्या हल हुई क्योंकि उसने लेडीज़ क्लास तो बना ली थीलेकिन जब तक वहां कोई लेडी ही गेटकीपर न हो, औरतें वहां बैठने को तैयार नहीं थी औरउस युग में कोई औरत सिनेमा हॉल में नौकरी करने का सोच भी नहीं सकती थी. लेकिन उसयुग में मेरी दादी जी ने कमर कसी और सिनेमा हॉल में गेटकीपर की नौकरी की. तीन शोहोते थे. दिन में जाने में कोई दिक्कत नहीं थी मगर रात में लौटने में बहुत देर होजाती थी. इस समस्या का हल ढूंढ रही थीं कि ऐसे में काम आया वो कुत्ता जो कुछ सालपहले में अपने बचपन में न जाने कहां से डरा सहमा सा आकर घर की पिरोल में दुबक गयाथा. रेडियो जुबानी 4 दादी जी ने देखा तो बच्चों के दूध में से कुछ बूंदें दूध कीनिकालकर उसमे पानी मिलाया और उसमे रोटी भिगोकर उसके आगे डाल दी. बच्चों ने उसे नामदिया “लेटिया”. मुझे कभी समझ नहीं आया कि ये किस भाषा का शब्द था और इसका क्या अर्थथा? मैंने कई बार दादी जी से भी पूछा और पिताजी से भी लेकिन उन्हें भी याद नहीं थाकि उसका नाम लेटिया कैसे पड़ा. दादी जी की नौकरी लगी तब तक लेटिया घर की बची खुचीरोटियां खाकर हृष्ट पुष्ट हो चुका था. दादी जी की नौकरी के पहले ही दिन से लेटियाने अपनी ड्यूटी संभाल ली. जब दादी जी कामपर जाने के लिये निकलीं तो उनके साथ रवानाहो गया और सिनेमा हॉल के बाहर तब तक बैठा रहा जब तक कि दादी जी अपना काम खत्म करकेहॉल से बाहर न आ गईं. रेडियो जुबानी 5 हालांकि नौकरी का पहला दिन था इसलिए पिताजीऔर ताऊजी दोनों मिलकर रात में दादी जी को लेने गंगा थियेटर पहुंच गए थे लेकिन वो येदेखकर हैरान रह गए कि लेटिया वहां पहले से मौजूद था. उस दिन तो चारों लोग मिलकर घरलौटे मगर उसके बाद लेटिया ने अपनी ड्यूटी इतनी जिम्मेदारी से संभाल ली कि किसी औरको दादी जी को लेने या छोड़ने नहीं जाना पड़ा. गंगा थियेटर की ये नौकरी दादी जी नेबहुत बरसों तक की, यहां तक कि जब मेरे पिताजी बड़े हो गए, पुलिस की नौकरी में आ गएऔर दादी जी से कहा कि अब उन्हें नौकरी करने की ज़रूरत नहीं है तब भी उन्होंने वोनौकरी नहीं छोड़ी. दादी जी बताया करती थीं कि बहुत बरसों बाद उन्होंने वो नौकरीछोड़ी. 1965 में उनका स्वर्गवास हुआ और अंतिम समय तक दिन में तीन टाइम अफीम का एकटुकड़ा वो खाया करती थीं. उनकी मृत्यु के साथ ही मुझे लगा अफीम से मेरा सम्बन्ध खत्महो गया लेकिन बड़ी अजीब है ये दुनिया भी. यहाँ ऐसे ऐसे इत्तेफाक होते हैं जिनकी हमकभी उम्मीद नहीं करते. रेडियो जुबानी 6 जिस साल दादी जी का स्वर्गवास हुआ उसी सालमेरे भाई साहब का मेडिकल कॉलेज में दाखिला हो गया और 1961 में उन्होंने MBBS कियाऔर सत्तर में इंटर्नशिप के बाद उनकी पहली पोस्टिंग हुई जोधपुर जिले के गांव पीलवाके हस्पताल में. बड़ी मुश्किल से नक़्शे में ढूंढकर भाई साहब पीलवा पहुंचे. वहांअस्पताल तो काफी समय से बनी हुई थी लेकिन शायद बरसों से कोई डॉक्टर वहां आकर नहींरहा था. छोटा सा गांव, जहां बिजली या तो ठाकुर साहब के रावले (किले) में थी या फिरअस्पताल में. रेडियो जुबानी 7 कोई भी नौजवान डॉक्टर जो किसी बड़े शहर के मेडिकलकॉलेज में पांच साल पढ़ाई करता था, तो सपने तो किसी बड़ी सी हस्पताल और बड़े से शहरके ही देखता था. पहली ही पोस्टिंग अगर ऐसी छोटी सी जगह हो जाय तो बेचारा वहां सेभागेगा नहीं तो क्या करेगा? ऐसे में जब कि कोई डॉक्टर वहां टिक नहीं रहा था मेरेसीधे सादे भाई साहब वहां पहुंचे तो उनका बहुत स्वागत हुआ. ठाकुर साहब ने अपने रावळेका एक हिस्सा उन्हें रहने के लिये दे दिया. एक लड़का सरूपिया खाना बनाने और दूसरेछोटे मोटे कामों के लिये रख लिया गया और भाई साहब बीमारों की सेवा में जुट गए.दीवाली की छुट्टियां हुईं तो मैं एक हफ्ते उनके पास रहने के लिये चल पड़ा. बीकानेरसे बस से फलौदी, फलौदी से ट्रेन से लोहावट और फिर लोहावट से बस से पीलवा. इस तरहतीन टुकड़ों में मेरा पीलवा तक का सफर पूरा हुआ. वहाँ पहुंचकर देखा तो पीलवा गांव कीजो कल्पना की थी वैसा कुछ भी नहीं था वहां. बचपन का कुछ समय गांव चूनावढ़ में गुज़ाराथा लेकिन चूनावढ़ था गंगानगर जिले का हरा भरा गांव और पीलवा जोधपुर जिले का बिलकुलसूखा और वीरान गांव. मुझे लगा भाई साहब यहां कैसे वक्त बिताते होंगे? मैंने उनसेपूछा तो वो मुस्कुरा कर् बोले, “पिताजी इसी साल रिटायर हो रहे हैं, मुझे नौकरी तोकरनी ही पड़ेगी ना ? रेडियो जुबानी 8 हालांकि मैं भी एम् एस करना चाहता था और एम् एसकरने पर निश्चित तौर पर किसी बड़ी जगह ही पोस्टिंग मिलती लेकिन अभी तो इस बारे मेंसोचना भी संभव नहीं है. मेरी पढाई के लायक तो स्कॉलरशिप शायद मुझे मिल जाती लेकिनपिताजी की पेंशन से घर का खर्च और तेरी पढ़ाई का खर्च तो नहीं चल सकता ना? इसलिएमैंने मन बना लिया है यहां रहने का और अब मुझे अच्छा भी लगने लगा है यहां, फिरठाकुर साहब बहुत अच्छे और इस क्षेत्र के जाने माने आदमी हैं.” मुझे लगा उन्हें इसउजाड गांव में आकर रहना पड़ रहा है इसके लिये कहीं न कहीं मैं भी ज़िम्मेदार हूं.उन्होंने देखा कि मैं थोड़ा गंभीर हो गया हूं तो मुस्कुरा कर बोले “तू चिंता मतकर,अभी एम् एस नहीं करुंगा तो क्या फर्क पड़ता है? तू पढाई पूरी करके नौकरी में लगजाएगा उसके बाद मैं एम् एस कर लूंगा.” मैंने पूछा, 'ऐसा हो सकता है?' वो बोले, 'हांहां क्यों नहीं?' और यही हुआ भी मेरे आकाशवाणी में आने के तीन साल बाद उन्होंनेअजमेर से एमएस किया. शाम को हम दोनों को रावले में खाने का न्यौता था. मैं भाई साहबके साथ अंदर पहुंचा. एक सजे धजे कमरे में ठाकुर साहब सोफे पर बैठे थे. हमें देखतेखड़े हो गए. सफ़ेद लिबास में दरमियाने कद के ठाकुर साहब बहुत सौम्य लग रहे थे.उन्होंने भाई साहब से हाथ मिलाया. मैंने पैर छूकर उन्हें प्रणाम किया तो बहुत खुशहुए और कई आशीर्वाद दे डाले. रेडियो जुबानी किस्त -9 उस दिन तो खाना खाकर हम लोगलौट आये. दो दिन बाद ही दीवाली थी. भाई साहब ने बताया कि दीवाली के दिन ठाकुर साहबके रावले में दरबार लगता है, जिसमें आस पास के बहुत से छोटे बड़े ठाकुर और रिश्तेदारसंबंधी आते हैं. उस दिन हमें भी दरबार में हाजिरी देनी होगी. दो दिन गुजर गए.दीवाली वाले दिन हम दोनों तैयार होकर ठाकुर साहब के दरबार में पहुंचे. सामने सबसेऊंचे सजे धजे सिंहासन पर ठाकुर साहब बिराजमान थे और दोनों तरफ ओहदों के हिसाब से आसपास के ठिकानेदार बैठे हुए थे. हमने जाते ही झुककर मुजरा किया और तभी मेरे नाक मेंवही जानी पहचानी कड़वी सी गंध आई. रेडियो जुबानी किस्त-10 मैंने मन ही मन कहा,“अरे..... ये तो अफीम की गंध है.” देखा दो लोग खड़े हुए हैं एक के हाथ में सोने काकरवा है, जिसमें कसूम्बा(अफीम का घोल) है दूसरे आदमी के हाथ में पानी का करवा औरतौलिया है. किसी भी मेहमान के आकर अभिवादन करते ही ठाकुर साहब हाथ उठाकर कसूम्बेवाले को इशारा करते और वो बहुत नम्रता से आगे बढ़कर अपनी हथेली में एक गड्ढा सा बनाकर् उसमे कसुम्बा भरता और मेहमान को पिलाता और फिर अपना हाथ धोकर तौलिए से पोंछता.हम लोग की तरफ मुस्कुराते हुए ठाकुर साहब ने देखा और कहा “डॉक्टर साहब कसुम्बोअरोगो(पियो).” भाई साहब ने हाथ जोड़ते हुए कहा “ माफी हुकुम... हम लोगों को माफीबख्शो.” ठाकुर साहब ठहाका लगाकर हंस पड़े. हम लोगों को बख्श दिया गया. हम थोड़ी देरतक वहां बैठे रहे और अफीम की उस कड़वी गंध का आनंद लेते रहे जो हमारी रग रग में बसीहुई थी. दादी जी, मामा जी, मामी जी, मौसी जी हर एक में से हमें वही गंध तो आती थी,फिर भला वो हमारी रग रग में बसी हुई क्यों न होती? रेडियो जुबानी की 11वीं किस्तवक्त गुज़रता गया. वक्त क्या पूरी ज़िंदगी ही गुजर गई. 16 अगस्त 2012 को भाई साहब कोमुंबई लाया गया और टाटा कैंसर हस्पताल में डॉक्टर मंजू सेंगर को दिखाया गया. जैसाकि मैं 12 वें एपिसोड में लिख चुका हूं कि देखते ही डॉक्टर सेंगर ने कह दिया“मल्टिपल मायलोमा” यानी कैंसर. भाई साहब ने कहा कि उनके पूरे शरीर में असहनीय दर्दहोता है. रेडियो जुबानी की 12वीं किस्त डॉक्टर सेंगर ने दवा की पर्ची लिखकर दी. हमलोग दवा लेकर घर आये. घर पहुंचते ही भाई साहब मुझसे बोले, 'ज़रा दिखाना कौन कौन सीदवाएं लिखी हैं?' मैंने लाई हुई दवाएं उनके हाथ में पकड़ा दी. एक दवा पर उन्होंनेनाम पढ़ा, “ट्रेमेडौल” और उनके चेहरे पर एक दर्दभरी मुस्कराहट आ गयी. मैं कुछ समझानहीं. मैंने कहा “क्या हुआ डाक साहब ?” वो बोले, 'जानते हो महेंदर ये क्या दवा है?'मैंने कहा, 'नहीं, कोई खास बात ?' रेडियो जुबानी 13 वो बोले, 'ये वही दवा है जोहमारी दादी जी लेती थीं, मामा जी, मामी जी, मौसी जी सब लेते थे- अफीम, जब हमारेइतने पूर्वज लेते थे तो भला मैं इस से कैसे बचता? तुझे याद है ना. बचपन में सुनाकरते थे कि जिस शरीर में एक बार अफीम पहुंच जाता है वो शरीर कभी न कभी अफीम की मांगज़रूर करता है. बचपन में इस शरीर में अफीम पहुँच चुका है तो ये शरीर अफीम की मांग तोकरेगा ही. मुझे पता है, अब ये अफीम ही थोड़ा बहुत सहारा देगी इस दर्द में.' रेडियोजुबानी 14 और उनकी बात बिलकुल सच साबित हुई. जिस दिन बीमारी का डायग्नोसिस हुआ उसदिन से लेकर आखिर तक उन्हें दर्द से अगर किसी चीज़ ने थोड़ी बहुत राहत दी तो बस उसीअफीम ने. अफीम की जिस गंध को मैं 1970 में ठाकुर साहब के रावले में पीछे छोड़ आया थाभाई साहब के इलाज के दौरान वो गंध फिर मेरे जीवन का हिस्सा बन गई थी. भाई साहब केचले जाने के बाद अब भी रात में कई बार मेरी नींद टूट जाती है और न जाने कहां सेअफीम की वो कड़वी मगर आकर्षक गंध आकर मेरे नथुनों में भर जाती है और मैं मानो फिर सेएक बार दादी जी, मामा जी, मामी जी, मौसी जी के बीच पहुंच जाता हूं.