'हे भगवान, हीयो फूटग्यो कांई थारो?'
रेडियो जुबानी 15: जब एक बार 14 बरस की भंवरी का ब्याह 50 बरस के शफी से हुआ.
Advertisement

फोटो - thelallantop
पेश है ‘दी लल्लनटॉप’ की सीरीज ‘रेडियो जुबानी’ की 15वीं किस्त. इस सीरीज में हम आपको महेंद्र मोदी के लिखे रेडियो से जुड़े किस्से पढ़ा रहे हैं. बीकानेर में पैदा हुए महेंद्र मोदी मुंबई में रहते हैं. रेडियो में 40 साल से ज्यादा का एक्सपीरियेंस है. विविध भारती मुंबई में लंबे वक्त तक सहायक केंद्र निदेशक रहे.
अब तक आप इस सीरीज की कई किस्तें पढ़ चुके हैं. अब पढ़िए जब एक बार 14 बरस की भंवरी का ब्याह 50 बरस के शफी से हुआ.
इंसान का जीवन चलता तो क्रम से है, लेकिन अगर कोई भी अपने जीवन की घटनाओं को कागज़ पर उतारने की कोशिश करे तो वो उसी क्रम से याद नहीं आतीं जिस क्रम से घटित होती हैं. कोई घटना जो बाद में घटित होती है पहले याद आ जाती है फिर अचानक याद आता है कि इससे पहले तो कुछ और घटित हुआ था. ऐसे में या तो आप उस पहले वाली घटना को छोड़ दीजिए और या फिर जब जो याद आ जाए ईमानदारी से पाठकों को बताकर लिखते जाइए. मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है. जब मैंने 13वां एपिसोड लिखा तो एक पाठक मित्र ने ये शिकायत लिख भेजी कि आप तो 11 वें एपिसोड में कॉलेज में पहुंच गए थे 13वें एपिसोड में वापस बचपन में कैसे पहुंच गए? मैं माफी चाहता हूं, किसी घटना को छोड़ देने से अच्छा है आगे पीछे लिख देना. हां मैं वादा करता हूं कि जब मैं इन सारे संस्मरणों को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करुंगा तो मेरी कोशिश रहेगी कि जीवन जिस क्रम से आगे बढ़ा है. संस्मरण भी उसी क्रम में आगे बढ़े. रेडियो जुबानी की पहली किस्त मेरे घर के एक तरफ एक पतली सी गली थी. गली के दूसरी तरफ शेखों के घर थे. ज़्यादातर घर कच्ची ईंटों से बने हुए थे और लगभग सबके आगे घास के छप्पर थे. इस तरह के 30-40 घरों का एक झुण्ड सा था वहां. हमारे ये शेख भाई या तो जहां कहीं भी मकान बनते थे वहां मजदूरी करते थे या फिर हाथ गाडे(ठेले) में सामान ढोते थे. लड़के नंग धडंग उस कच्चे घरों के झुण्ड के बीच नाचते कूदते रहते थे. पैसा दो पैसा हाथ लगने पर कांच की गोलियां खेलते थे और उन पर दांव लगाकर जुआ खेलते थे, ये उनके लिए आने वाले जीवन की तैयारी की तरह था इसलिए उनके मां बाप भी उन्हें गोलियां खेलने से नहीं रोकते थे. घर की लड़कियां गोबर चुगने निकल जातीं और बीच बीच में गड्डे(पत्थर के गोल गोल टुकड़ों) से तन्मय होकर खेलती थीं. स्कूल क्या होता है न लड़कों को पता होता था न लड़कियों को और कपड़ा छोटे बच्चों को ईद पर तभी नसीब होता था, जब उनके मां बाप कहीं किसी घर से कोई फटा पुराना कपड़ा मांग लाते थे. चाहे वो किसी भी साइज़ का हो, जिसके भी हाथ लग जाता था वही उसे गले में डाल लेता था और वो कभी उतारा नहीं जाता था. रेडियो जुबानी 2 लाधू बाबा 1947 में पाकिस्तान से आया था. पता नहीं हमारे गरीब मोहल्ले में उसे क्या पसंद आया कि जो कुछ सोना चांदी छुपा वुपाकर ला पाया था, उसे बेचकर एक कमरा गजनेर रोड पर बनवा लिया था. यही गजनेर रोड हमारे मोहल्ले को दो हिस्सों में बांटती थी एक तरफ का हिस्सा शेखों का मोहल्ला कहलाता था और दूसरी तरफ का मोहल्ला कुचीलपुरा. उसी कमरे में पीछे की तरफ उसका परिवार रहता था और आगे उसने अपनी दुकान सजा रखी थी. घर की ज़रूरत का छोटा मोटा सारा सामान लाधू बाबा की दुकान में मिल जाता था. खूब चलती थी लाधू बाबा की दुकान क्योंकि आस पास और कोई दुकान नहीं थी. दिन भर तो आस पास के मोहल्ले के लोगों की ग्राहकी रहती थी क्योंकि मेरे मोहल्ले के लोगों के पास दिन में कुछ खरीदने के लिए पैसे कहां से आते? रेडियो जुबानी 3 दिन भर मेरे मोहल्ले की औरतें या तो अपने बच्चों की पिटाई में व्यस्त रहतीं या फिर एक दूसरे के सर से जूएं निकालती. शाम होते होते आदमी लोग लौटने लगते. तब लाधू बाबा की दुकान पर औरतों की, बच्चों की भीड़ लग जाती. हर औरत की शॉपिंग की लिस्ट लगभग एक जैसी ही होती थी. आठ आने का आटा, एक आने का तेल, एक आने के मसाले यानि नमक, मिर्च, धनिया, हल्दी वगैरह, एक पैसे का केरोसिन. ये सब लेने के बाद कोई औरत लाधू बाबा से “चुंगी” मांगना नहीं भूलती थी और अगर वो भूल भी गयी तो उसके साथ आया बच्चा चिल्ला पड़ता था “ऐ मां चुंगी” और लाधू बाबा उसके हाथ में गुड चढ़े मोटे सेव का एक टुकड़ा या चीनी चढ़े दो चार चने दे देता था. अब उस बच्चे के चेहरे पर ऐसी मुस्कान खिलती थी कि मानो किला फतह कर लिया हो. चुंगी का अर्थ था, पैसा देकर खरीदे गए सामान के अलावा मुफ्त में दी गयी कोई खाने पीने की चीज़.आज की भाषा में बोनस. रेडियो जुबानी 4 मैं बहुत छोटा था, एक बार लाधू बाबा की दुकान पर कुछ खरीदने गया. मुझसे पहले एक लड़के ने कुछ खरीदा और दूसरा हाथ आगे बढ़ाकर बोला, 'लाधू बाबा चुंगी.' लाधू बाबा ने चुपचाप कुछ उसके हाथ पर रख दिया. वो लड़का खुशी से कूदता हुआ भाग गया. मैंने सोचा “क्या बिना पैसे मिली चीज़ इतनी खुशी देती है ?” मैं भी चुंगी मांगने की हिम्मत बटोरने लगा. तभी मेरी बारी आ गयी. मैंने जो भी सामान खरीदना था खरीदा और दूसरा हाथ आगे बढ़ा दिया. बोलने की बहुत कोशिश की “लाधू बाबा चुंगी” लेकिन जुबान जैसे मन भर की हो गयी, मुंह से कुछ नहीं निकला. लाधू बाबा ने एक बार घूर कर देखा और फिर बोले “अच्छा तुझे भी चुंगी चाहिए? और बिना मेरे उत्तर का इंतज़ार किये एक गुड चढ़ा मोटे सेव का टुकड़ा मेरे हाथ में पकड़ा दिया. मैं सामान के साथ साथ उसे भी लेकर घर आ गया क्योंकि हमें सिखाया गया था कि रास्ते में कुछ भी खाना अच्छी आदत नहीं होती. जो कुछ भी खाना हो, घर बैठकर खाना चाहिए. टप टप करके दो आंसू मेरी आंख से गिर पड़े. मैंने सर हां में हिलाया. एक सेकण्ड रुककर पिताजी बोले “ ठीक है, जब मांगकर ले ही आये हो तो खा लो अब.” घर में ये भी सिखाया गया था कि जो भी खाने की चीज़ हो मिल बांटकर खानी चाहिए, अकेले कुछ भी खाना बुरी बात होती है. अब अगर ये भीख मांगकर लाई हुई चीज़ है तो कोई और नहीं खायेगा, ये बात मेरे बालमन को भी समझ आ गयी लेकिन अब इस सेव के टुकड़े का क्या करूं, ये मेरी समझ नहीं आया. थोड़ी देर मैं उसी तरह खडा रहा फिर न जाने क्या सोचकर वापस घर से निकला और लाधू बाबा की दुकान जा पहुंचा. रेडियो जुबानी 5 लाधू बाबा ने हुक्का गुडगुडाते हुए पूछा “ क्या हुआ?” मैंने वो सेव आगे बढाते हुए कहा “ये नहीं चाहिए” बाबा बोला “क्यों बेटा, क्या हुआ?” मैंने कहा “ कुछ नहीं, बस नहीं चाहिए.” बाबा मुस्कुरा कर बोला “ घर पर डांट पडी लगती है. सही है बेटा, अच्छे बच्चे चुंगी नहीं मांगते. खैर अब तुम इसे यहीं खा लो, मैं तुम्हारे पिताजी को नहीं बताऊंगा.” लाधू बाबा बोले जा रहा था और मैंने मानो अपने हाथ में बिच्छू पकड़ रखा था जिस से मैं जल्दी से जल्दी पीछा छुडाना चाहता था. मैं कसमसाकर बोला “नहीं ये आप वापस ले लो.” तभी मोहल्ले का एक लड़का आ गया. लाधू बाबा ने कहा “इसे दे दे”. मैंने जल्दी से वो सेव का टुकड़ा उस लड़के के हाथ में रख दिया. वो लड़का चकित हो गया कि आज तो बिना मांगे चुंगी मिल गयी और मेरी सांस में सांस आई कि एक बला से पीछा छूटा. मैं वहाँ से दौडता हुआ घर आया और पिताजी से कहा “ मैं वो..... वो चुंगी वापस कर आया. आइन्दा कभी नहीं मांगूंगा.” पिताजी ने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा “शाबाश”. रेडियो जुबानी 6 मोहल्ले की औरतें लाधू बाबा की दुकान से लाये सामान से खाना बनाने की तैयारी में जुट जातीं और आदमी लोग देसी दारू के ठेके से पव्वा लाकर थकान उतारने लगते. जिस दिन भी मजदूरी मिल जाती यही सब होता था और जिस दिन मजदूरी नहीं मिलती तो न तो चूल्हा जलता था और न ही दारू का पव्वा आता था. रेडियो जुबानी 7 कभी कभार जब मजदूरी कम होती थी तो अमरू घर में पैसे नहीं देता था और जितने पैसे मिलते उसकी दारू खरीद लाता था. ऐसे में जैना और अमरू के बीच बहुत झगडा होता, अमरू उसे मारता और अगर कोइ लड़की बीच बचाव की कोशिश करती तो उसे भी खूब मार पड़ती. पूरे घर में हो हल्ला मच जाता . फिर जैना मेरी मां के पास आकर रोती और मां उसे आटा और मिर्च मसाले देती ताकि वो रोटियां बनाकर बच्चों को खिला सके. इसी तरह उनकी ज़िंदगी चल रही थी और हमारी भी आदत पड गयी थी जैना को मार खाते देखने की और अमरू को दारू पीकर उसकी पिटाई करते हुए सुनने की. जैना बोली “ भंवरकी ने देखन ने आया है, काकी जी, खातरदारी तो करनी पड़सी.” मेरी मां ने 20 रुपये निकालकर दे दिए और जैना की चौकी की तरफ झांक कर पूछा, “ जैना...... छोरो कठे ? म्हने तो कोई छोरो निजर नईं आ रियो है.” रेडियो जुबानी 8 “है काकी जी है” कहकर वो रुपये लेकर भाग गयी थी. मैं अपने घर की चौकी पर आकर बैठ गया था. मैंने देखा आज अमरू ने अड़ोस पड़ोस के सब लोगों को काम पर लगा दिया था. कोई भाग कर गोस(गोश्त) लाया तो कोई प्याज लहसुन. इस सबसे पहले एक पड़ोसी भागकर दारू की बोतलें लेकर आया. जश्न का सा माहौल बन गया था. हर तरफ लहसुन के भुनने की गंध फैली हुई थी. पड़ोस की मटोलकी और बोलकी एक बड़े से देग में गोस पका रही थी और जैना सेठानी की तरह उन्हें हुकुम दी रही थी. मैंने हमेशा जैना को अपने घर में बर्तन मांजते देखा था या फिर अमरू के हाथों पिटते देखा था. मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि में मां से 20 रुपये उधार लेकर जाने के बाद जैना इस तरह सेठानी कैसे बन गयी थी. सारे मरद पी कर जोर जोर से बोल रहे थे, हंस रहे थे और गालियां निकाल रहे थे. अमरू और आये हुए लोगों में से एक के बीच कुछ रुपयों की बात चल रही थी. मुझे लगा शायद दहेज की बात चल रही है...... थोड़ी बातचीत के बाद दोनों पक्षों के लोगों ने हाथ मिलाए और एक दूसरे से गले मिले. शायद बात तय हो गयी थी. रेडियो जुबानी किस्त -9 अगले दिन सुना, जैना मां को बता रही थी. भंवरी की शादी तय हो गयी. मां ने पूछा, 'अरे बावली लडको किसो हो ? कित्ती उमर रो है?” जैना ने जवाब दिया “ काकी जी 50 बरसां रो है.” “50 बरसां रो ? पण भंवरी तो 14 बरसा री है, दूज वर है कांई ?” “हां काकी जी तीन बच्चा है” “हे भगवान, हीयो फूटग्यो कांई थारो? इती सुन्दर 14 बरसां री छोरी ने 50 बरसां रे बूढ़े रे लारे करे?” “कांई फरक पड़े काकी जी, हाथ पीला हू जावे ओ कांई कम है ?” और इस तरह 14 बरस की भंवरी की शादी 50 बरस के शफी के साथ तय हो गयी. मैं दूसरे दिन स्कूल से लौटा तो सोचा भंवरी से पूछूंगा कि उसका बींद कैसा है लेकिन घर लौटा तो देखा कि अमरू छप्पर के नीचे पड़ा हुआ नशे में गालियाँ बक रहा है, जैना चूल्हे के पास बैठी गीली लकडियों को सुलगाने की कोशिश कर रही है और भंवरी लाल रंग का घाघरा ओढनी पहने सजी धजी खड़ी है. सोने चांदी की समझ तो मुझे उस वक्त नहीं थी लेकिन हां मुझे इतना याद है कि उसने कुछ गहने भी पहन रखे थे जो खन खन बज रहे थे. बाकी बच्चे भी बाप की गालियों की परवाह किये बगैर कुछ चबा रहे थे. रेडियो जुबानी किस्त-10 मैंने सोचा, लगता है रात को लाए हुए सामान में से कुछ सामान बच गया है और सब लोग उसी पर ऐश कर रहे हैं. हमेशा जो बच्चे चिल्लाते रहते थे. “ऐ मां भूख लागी है........ भूख लागी है” वो बच्चे आज अलग ही नज़र आ रहे थे और जैना जो तंग आई सी चिल्लाती थी “ म्हने तोड़’र खा लो सारा मिल’र.........” वो जैना कुछ इस तरह चूल्हे चौके में मगन हो रही थी मानो इस चूल्हे पर तो दोनों वक्त खाना पकता हो और अंदर हर चीज़ के भण्डार भरे हों. अगले दिन फिर देखा अमरू मजदूरी पर नहीं गया है, उसका गाडा यूं का यूं खड़ा है और वो खर्राटे ले रहा है. मैंने सोचा अब तो थोड़े दिनों में ही भंवरी की शादी करनी होगी. फिर ये लोग इतने आराम से पड़े कैसे हैं? मैंने तो सुना था कि लड़की की शादी में दहेज देना होता है, इसके अलावा भी बहुत सारे खर्चे होते हैं. मां पिताजी को अक्सर बातें करते सुना था कि फलां राम जी का घर बेटियों की शादी में बिक गया और फलां चंद जी के सर बेटी की शादी के बाद इतना कर्जा हो गया है. लेकिन जिन्हें अपने मेहमानों की खातिरदारी के लिए 20 रुपये उधार लेने पड़ें वो बिलकुल मस्त होकर जीवन बिता रहे हैं, यहां तक कि मजदूरी पर भी नहीं जा रहे हैं. भंवरी गोरी चिट्टी तो थी ही, अब सजी धजी रहने लगी थी और मैंने देखा जो अमरू आये दिन बच्चों की पिटाई किया करता था अब भंवरी पर हाथ नहीं उठाता था. हां गालियां तो उसके लिए दाल रोटी थीं, दिन भर पड़ा पड़ा गालियां बकता रहता था. वो पूरे मोहल्ले में बस मेरे पिताजी से डरता था. मेरे पिताजी पहले पुलिस में थे इसलिए वो उन्हें थानेदार जी के नाम से बुलाता था और जब कभी ज़्यादा चिल्लाने लगता तो जैना कहती “थानेदार जी ने बुलाऊं कांई ?” और बस अमरू की सिट्टी पिट्टी गुम हो जाती थी. हालांकि उस माइक का कोई खास उपयोग नहीं होता था बस दो चार रेकॉर्ड्स के बाद माइक खोलकर कोई भी हेलो हेलो कर लेता था. अपनी खुद की आवाज़ को लाउडस्पीकर पर सुनना भी उस वक्त कम थ्रिलिंग नहीं होता था. अब होड मचती थी कि चूडीबाजा कौन बजायेगा? कुछ नौजवान इसके माहिर होते थे जिन्हें बाजे का भी ज्ञान होता था और गानों का भी. उन्हें असिस्ट करते थे कुछ बच्चे. एक सवाल हमेशा खडा होता था कि रात में ये ड्यूटी कौन करेगा क्योंकि जब रेडियो लगाया गया है तो अगर चौबीसों घंटे नहीं बजाया जायेगा तो एक तरह से फिजूलखर्ची हो जायेगी. रेडियो जुबानी की 12वीं किस्त उत्साह से भरे कई नौजवान ये चुनौती स्वीकार कर लेते थे लेकिन इतनी आसान भी नहीं होती थी ये रेडियो बजाने की ड्यूटी क्योंकि हर 3.25 मिनट में रिकॉर्ड बदलना या उलटना पड़ता था, हर दो रिकॉर्ड के बाद सुई बदलनी पड़ती थी और हर पांच छह मिनट बाद चाबी भरनी पड़ती थी जिसे, कुछ लोग चूड़ी भरना कहते थे और कुछ लोग हवा भरना. अगर समय समय पर चाबी ना भरी जाती तो रिकॉर्ड स्पीड लूज़ करने लगता और दूर दूर छतों पर सोये लोग भी ठहाके लगा कर हंस पड़ते “ अरे झपकी आ गयी रे रेडियो वाले को झपकी आ गयी .............” और अगले दिन उस इंसान की सभी लोग खूब खिल्ली उड़ाते. रेडियो जुबानी 14 तो रेडियो लग चुका था, आस पास के बच्चों ने ग्रामोफोन को घेर रखा था. मैं हालांकि जैना के घर में कभी नहीं जाता था लेकिन ये रेडियो मेरे भी रूचि की चीज़ थी इसलिए मैं भी दूर खड़े होकर देखने लगा. अमरू ने मुझे देखा तो फ़ौरन मोहल्ले के बच्चों को डांट कर भगा दिया और मुझे कहा “आओ आओ कंवर साब........” उनके और मोहल्ले के सभी शेख परिवारों के लिए हमारा यही नाम था. मैंने देखा जो लड़का ग्रामोफोन बजा रहा था उसने माइक खोल कर हेलो हेलो बोला और दूसरे को दे दिया दूसरे ने भी उसमे हेलो हेलो बोलकर अपनी आवाज़ सुनी तभी मेरे दिमाग में आया कि क्यों ना हेलो हेलो की बजाय रिकॉर्ड पर लिखा हुआ फिल्म का नाम और गायक का नाम बोला जाय. वहां मेरे अलावा कोई पढ़ा लिखा नहीं था जो ये काम कर सके. मैंने कहा “ अरे क्या हेलो हेलो कर रहे हो?” पास में खड़ी भंवरी ने माइक उस लड़के के हाथ से छीनकर मेरे हाथ में देते हुए कहा, “ लो कंवर साब आपई कुछ आछो आछो बोलो......” मैंने माइक हाथ में लिया और रिकॉर्ड पर लिखी हुई जानकारी पढ़ दी. मैंने सोचा जैना के घर का भंवरी नाम का एक अध्याय तो खत्म हुआ. लेकिन मुझे क्या पता था कि ये अध्याय अभी तो शुरू हुआ है और आगे जाकर यही अध्याय मेरे एक नाटक का आधार बनेगा.
इंसान का जीवन चलता तो क्रम से है, लेकिन अगर कोई भी अपने जीवन की घटनाओं को कागज़ पर उतारने की कोशिश करे तो वो उसी क्रम से याद नहीं आतीं जिस क्रम से घटित होती हैं. कोई घटना जो बाद में घटित होती है पहले याद आ जाती है फिर अचानक याद आता है कि इससे पहले तो कुछ और घटित हुआ था. ऐसे में या तो आप उस पहले वाली घटना को छोड़ दीजिए और या फिर जब जो याद आ जाए ईमानदारी से पाठकों को बताकर लिखते जाइए. मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है. जब मैंने 13वां एपिसोड लिखा तो एक पाठक मित्र ने ये शिकायत लिख भेजी कि आप तो 11 वें एपिसोड में कॉलेज में पहुंच गए थे 13वें एपिसोड में वापस बचपन में कैसे पहुंच गए? मैं माफी चाहता हूं, किसी घटना को छोड़ देने से अच्छा है आगे पीछे लिख देना. हां मैं वादा करता हूं कि जब मैं इन सारे संस्मरणों को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करुंगा तो मेरी कोशिश रहेगी कि जीवन जिस क्रम से आगे बढ़ा है. संस्मरण भी उसी क्रम में आगे बढ़े. रेडियो जुबानी की पहली किस्त मेरे घर के एक तरफ एक पतली सी गली थी. गली के दूसरी तरफ शेखों के घर थे. ज़्यादातर घर कच्ची ईंटों से बने हुए थे और लगभग सबके आगे घास के छप्पर थे. इस तरह के 30-40 घरों का एक झुण्ड सा था वहां. हमारे ये शेख भाई या तो जहां कहीं भी मकान बनते थे वहां मजदूरी करते थे या फिर हाथ गाडे(ठेले) में सामान ढोते थे. लड़के नंग धडंग उस कच्चे घरों के झुण्ड के बीच नाचते कूदते रहते थे. पैसा दो पैसा हाथ लगने पर कांच की गोलियां खेलते थे और उन पर दांव लगाकर जुआ खेलते थे, ये उनके लिए आने वाले जीवन की तैयारी की तरह था इसलिए उनके मां बाप भी उन्हें गोलियां खेलने से नहीं रोकते थे. घर की लड़कियां गोबर चुगने निकल जातीं और बीच बीच में गड्डे(पत्थर के गोल गोल टुकड़ों) से तन्मय होकर खेलती थीं. स्कूल क्या होता है न लड़कों को पता होता था न लड़कियों को और कपड़ा छोटे बच्चों को ईद पर तभी नसीब होता था, जब उनके मां बाप कहीं किसी घर से कोई फटा पुराना कपड़ा मांग लाते थे. चाहे वो किसी भी साइज़ का हो, जिसके भी हाथ लग जाता था वही उसे गले में डाल लेता था और वो कभी उतारा नहीं जाता था. रेडियो जुबानी 2 लाधू बाबा 1947 में पाकिस्तान से आया था. पता नहीं हमारे गरीब मोहल्ले में उसे क्या पसंद आया कि जो कुछ सोना चांदी छुपा वुपाकर ला पाया था, उसे बेचकर एक कमरा गजनेर रोड पर बनवा लिया था. यही गजनेर रोड हमारे मोहल्ले को दो हिस्सों में बांटती थी एक तरफ का हिस्सा शेखों का मोहल्ला कहलाता था और दूसरी तरफ का मोहल्ला कुचीलपुरा. उसी कमरे में पीछे की तरफ उसका परिवार रहता था और आगे उसने अपनी दुकान सजा रखी थी. घर की ज़रूरत का छोटा मोटा सारा सामान लाधू बाबा की दुकान में मिल जाता था. खूब चलती थी लाधू बाबा की दुकान क्योंकि आस पास और कोई दुकान नहीं थी. दिन भर तो आस पास के मोहल्ले के लोगों की ग्राहकी रहती थी क्योंकि मेरे मोहल्ले के लोगों के पास दिन में कुछ खरीदने के लिए पैसे कहां से आते? रेडियो जुबानी 3 दिन भर मेरे मोहल्ले की औरतें या तो अपने बच्चों की पिटाई में व्यस्त रहतीं या फिर एक दूसरे के सर से जूएं निकालती. शाम होते होते आदमी लोग लौटने लगते. तब लाधू बाबा की दुकान पर औरतों की, बच्चों की भीड़ लग जाती. हर औरत की शॉपिंग की लिस्ट लगभग एक जैसी ही होती थी. आठ आने का आटा, एक आने का तेल, एक आने के मसाले यानि नमक, मिर्च, धनिया, हल्दी वगैरह, एक पैसे का केरोसिन. ये सब लेने के बाद कोई औरत लाधू बाबा से “चुंगी” मांगना नहीं भूलती थी और अगर वो भूल भी गयी तो उसके साथ आया बच्चा चिल्ला पड़ता था “ऐ मां चुंगी” और लाधू बाबा उसके हाथ में गुड चढ़े मोटे सेव का एक टुकड़ा या चीनी चढ़े दो चार चने दे देता था. अब उस बच्चे के चेहरे पर ऐसी मुस्कान खिलती थी कि मानो किला फतह कर लिया हो. चुंगी का अर्थ था, पैसा देकर खरीदे गए सामान के अलावा मुफ्त में दी गयी कोई खाने पीने की चीज़.आज की भाषा में बोनस. रेडियो जुबानी 4 मैं बहुत छोटा था, एक बार लाधू बाबा की दुकान पर कुछ खरीदने गया. मुझसे पहले एक लड़के ने कुछ खरीदा और दूसरा हाथ आगे बढ़ाकर बोला, 'लाधू बाबा चुंगी.' लाधू बाबा ने चुपचाप कुछ उसके हाथ पर रख दिया. वो लड़का खुशी से कूदता हुआ भाग गया. मैंने सोचा “क्या बिना पैसे मिली चीज़ इतनी खुशी देती है ?” मैं भी चुंगी मांगने की हिम्मत बटोरने लगा. तभी मेरी बारी आ गयी. मैंने जो भी सामान खरीदना था खरीदा और दूसरा हाथ आगे बढ़ा दिया. बोलने की बहुत कोशिश की “लाधू बाबा चुंगी” लेकिन जुबान जैसे मन भर की हो गयी, मुंह से कुछ नहीं निकला. लाधू बाबा ने एक बार घूर कर देखा और फिर बोले “अच्छा तुझे भी चुंगी चाहिए? और बिना मेरे उत्तर का इंतज़ार किये एक गुड चढ़ा मोटे सेव का टुकड़ा मेरे हाथ में पकड़ा दिया. मैं सामान के साथ साथ उसे भी लेकर घर आ गया क्योंकि हमें सिखाया गया था कि रास्ते में कुछ भी खाना अच्छी आदत नहीं होती. जो कुछ भी खाना हो, घर बैठकर खाना चाहिए. टप टप करके दो आंसू मेरी आंख से गिर पड़े. मैंने सर हां में हिलाया. एक सेकण्ड रुककर पिताजी बोले “ ठीक है, जब मांगकर ले ही आये हो तो खा लो अब.” घर में ये भी सिखाया गया था कि जो भी खाने की चीज़ हो मिल बांटकर खानी चाहिए, अकेले कुछ भी खाना बुरी बात होती है. अब अगर ये भीख मांगकर लाई हुई चीज़ है तो कोई और नहीं खायेगा, ये बात मेरे बालमन को भी समझ आ गयी लेकिन अब इस सेव के टुकड़े का क्या करूं, ये मेरी समझ नहीं आया. थोड़ी देर मैं उसी तरह खडा रहा फिर न जाने क्या सोचकर वापस घर से निकला और लाधू बाबा की दुकान जा पहुंचा. रेडियो जुबानी 5 लाधू बाबा ने हुक्का गुडगुडाते हुए पूछा “ क्या हुआ?” मैंने वो सेव आगे बढाते हुए कहा “ये नहीं चाहिए” बाबा बोला “क्यों बेटा, क्या हुआ?” मैंने कहा “ कुछ नहीं, बस नहीं चाहिए.” बाबा मुस्कुरा कर बोला “ घर पर डांट पडी लगती है. सही है बेटा, अच्छे बच्चे चुंगी नहीं मांगते. खैर अब तुम इसे यहीं खा लो, मैं तुम्हारे पिताजी को नहीं बताऊंगा.” लाधू बाबा बोले जा रहा था और मैंने मानो अपने हाथ में बिच्छू पकड़ रखा था जिस से मैं जल्दी से जल्दी पीछा छुडाना चाहता था. मैं कसमसाकर बोला “नहीं ये आप वापस ले लो.” तभी मोहल्ले का एक लड़का आ गया. लाधू बाबा ने कहा “इसे दे दे”. मैंने जल्दी से वो सेव का टुकड़ा उस लड़के के हाथ में रख दिया. वो लड़का चकित हो गया कि आज तो बिना मांगे चुंगी मिल गयी और मेरी सांस में सांस आई कि एक बला से पीछा छूटा. मैं वहाँ से दौडता हुआ घर आया और पिताजी से कहा “ मैं वो..... वो चुंगी वापस कर आया. आइन्दा कभी नहीं मांगूंगा.” पिताजी ने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा “शाबाश”. रेडियो जुबानी 6 मोहल्ले की औरतें लाधू बाबा की दुकान से लाये सामान से खाना बनाने की तैयारी में जुट जातीं और आदमी लोग देसी दारू के ठेके से पव्वा लाकर थकान उतारने लगते. जिस दिन भी मजदूरी मिल जाती यही सब होता था और जिस दिन मजदूरी नहीं मिलती तो न तो चूल्हा जलता था और न ही दारू का पव्वा आता था. रेडियो जुबानी 7 कभी कभार जब मजदूरी कम होती थी तो अमरू घर में पैसे नहीं देता था और जितने पैसे मिलते उसकी दारू खरीद लाता था. ऐसे में जैना और अमरू के बीच बहुत झगडा होता, अमरू उसे मारता और अगर कोइ लड़की बीच बचाव की कोशिश करती तो उसे भी खूब मार पड़ती. पूरे घर में हो हल्ला मच जाता . फिर जैना मेरी मां के पास आकर रोती और मां उसे आटा और मिर्च मसाले देती ताकि वो रोटियां बनाकर बच्चों को खिला सके. इसी तरह उनकी ज़िंदगी चल रही थी और हमारी भी आदत पड गयी थी जैना को मार खाते देखने की और अमरू को दारू पीकर उसकी पिटाई करते हुए सुनने की. जैना बोली “ भंवरकी ने देखन ने आया है, काकी जी, खातरदारी तो करनी पड़सी.” मेरी मां ने 20 रुपये निकालकर दे दिए और जैना की चौकी की तरफ झांक कर पूछा, “ जैना...... छोरो कठे ? म्हने तो कोई छोरो निजर नईं आ रियो है.” रेडियो जुबानी 8 “है काकी जी है” कहकर वो रुपये लेकर भाग गयी थी. मैं अपने घर की चौकी पर आकर बैठ गया था. मैंने देखा आज अमरू ने अड़ोस पड़ोस के सब लोगों को काम पर लगा दिया था. कोई भाग कर गोस(गोश्त) लाया तो कोई प्याज लहसुन. इस सबसे पहले एक पड़ोसी भागकर दारू की बोतलें लेकर आया. जश्न का सा माहौल बन गया था. हर तरफ लहसुन के भुनने की गंध फैली हुई थी. पड़ोस की मटोलकी और बोलकी एक बड़े से देग में गोस पका रही थी और जैना सेठानी की तरह उन्हें हुकुम दी रही थी. मैंने हमेशा जैना को अपने घर में बर्तन मांजते देखा था या फिर अमरू के हाथों पिटते देखा था. मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि में मां से 20 रुपये उधार लेकर जाने के बाद जैना इस तरह सेठानी कैसे बन गयी थी. सारे मरद पी कर जोर जोर से बोल रहे थे, हंस रहे थे और गालियां निकाल रहे थे. अमरू और आये हुए लोगों में से एक के बीच कुछ रुपयों की बात चल रही थी. मुझे लगा शायद दहेज की बात चल रही है...... थोड़ी बातचीत के बाद दोनों पक्षों के लोगों ने हाथ मिलाए और एक दूसरे से गले मिले. शायद बात तय हो गयी थी. रेडियो जुबानी किस्त -9 अगले दिन सुना, जैना मां को बता रही थी. भंवरी की शादी तय हो गयी. मां ने पूछा, 'अरे बावली लडको किसो हो ? कित्ती उमर रो है?” जैना ने जवाब दिया “ काकी जी 50 बरसां रो है.” “50 बरसां रो ? पण भंवरी तो 14 बरसा री है, दूज वर है कांई ?” “हां काकी जी तीन बच्चा है” “हे भगवान, हीयो फूटग्यो कांई थारो? इती सुन्दर 14 बरसां री छोरी ने 50 बरसां रे बूढ़े रे लारे करे?” “कांई फरक पड़े काकी जी, हाथ पीला हू जावे ओ कांई कम है ?” और इस तरह 14 बरस की भंवरी की शादी 50 बरस के शफी के साथ तय हो गयी. मैं दूसरे दिन स्कूल से लौटा तो सोचा भंवरी से पूछूंगा कि उसका बींद कैसा है लेकिन घर लौटा तो देखा कि अमरू छप्पर के नीचे पड़ा हुआ नशे में गालियाँ बक रहा है, जैना चूल्हे के पास बैठी गीली लकडियों को सुलगाने की कोशिश कर रही है और भंवरी लाल रंग का घाघरा ओढनी पहने सजी धजी खड़ी है. सोने चांदी की समझ तो मुझे उस वक्त नहीं थी लेकिन हां मुझे इतना याद है कि उसने कुछ गहने भी पहन रखे थे जो खन खन बज रहे थे. बाकी बच्चे भी बाप की गालियों की परवाह किये बगैर कुछ चबा रहे थे. रेडियो जुबानी किस्त-10 मैंने सोचा, लगता है रात को लाए हुए सामान में से कुछ सामान बच गया है और सब लोग उसी पर ऐश कर रहे हैं. हमेशा जो बच्चे चिल्लाते रहते थे. “ऐ मां भूख लागी है........ भूख लागी है” वो बच्चे आज अलग ही नज़र आ रहे थे और जैना जो तंग आई सी चिल्लाती थी “ म्हने तोड़’र खा लो सारा मिल’र.........” वो जैना कुछ इस तरह चूल्हे चौके में मगन हो रही थी मानो इस चूल्हे पर तो दोनों वक्त खाना पकता हो और अंदर हर चीज़ के भण्डार भरे हों. अगले दिन फिर देखा अमरू मजदूरी पर नहीं गया है, उसका गाडा यूं का यूं खड़ा है और वो खर्राटे ले रहा है. मैंने सोचा अब तो थोड़े दिनों में ही भंवरी की शादी करनी होगी. फिर ये लोग इतने आराम से पड़े कैसे हैं? मैंने तो सुना था कि लड़की की शादी में दहेज देना होता है, इसके अलावा भी बहुत सारे खर्चे होते हैं. मां पिताजी को अक्सर बातें करते सुना था कि फलां राम जी का घर बेटियों की शादी में बिक गया और फलां चंद जी के सर बेटी की शादी के बाद इतना कर्जा हो गया है. लेकिन जिन्हें अपने मेहमानों की खातिरदारी के लिए 20 रुपये उधार लेने पड़ें वो बिलकुल मस्त होकर जीवन बिता रहे हैं, यहां तक कि मजदूरी पर भी नहीं जा रहे हैं. भंवरी गोरी चिट्टी तो थी ही, अब सजी धजी रहने लगी थी और मैंने देखा जो अमरू आये दिन बच्चों की पिटाई किया करता था अब भंवरी पर हाथ नहीं उठाता था. हां गालियां तो उसके लिए दाल रोटी थीं, दिन भर पड़ा पड़ा गालियां बकता रहता था. वो पूरे मोहल्ले में बस मेरे पिताजी से डरता था. मेरे पिताजी पहले पुलिस में थे इसलिए वो उन्हें थानेदार जी के नाम से बुलाता था और जब कभी ज़्यादा चिल्लाने लगता तो जैना कहती “थानेदार जी ने बुलाऊं कांई ?” और बस अमरू की सिट्टी पिट्टी गुम हो जाती थी. हालांकि उस माइक का कोई खास उपयोग नहीं होता था बस दो चार रेकॉर्ड्स के बाद माइक खोलकर कोई भी हेलो हेलो कर लेता था. अपनी खुद की आवाज़ को लाउडस्पीकर पर सुनना भी उस वक्त कम थ्रिलिंग नहीं होता था. अब होड मचती थी कि चूडीबाजा कौन बजायेगा? कुछ नौजवान इसके माहिर होते थे जिन्हें बाजे का भी ज्ञान होता था और गानों का भी. उन्हें असिस्ट करते थे कुछ बच्चे. एक सवाल हमेशा खडा होता था कि रात में ये ड्यूटी कौन करेगा क्योंकि जब रेडियो लगाया गया है तो अगर चौबीसों घंटे नहीं बजाया जायेगा तो एक तरह से फिजूलखर्ची हो जायेगी. रेडियो जुबानी की 12वीं किस्त उत्साह से भरे कई नौजवान ये चुनौती स्वीकार कर लेते थे लेकिन इतनी आसान भी नहीं होती थी ये रेडियो बजाने की ड्यूटी क्योंकि हर 3.25 मिनट में रिकॉर्ड बदलना या उलटना पड़ता था, हर दो रिकॉर्ड के बाद सुई बदलनी पड़ती थी और हर पांच छह मिनट बाद चाबी भरनी पड़ती थी जिसे, कुछ लोग चूड़ी भरना कहते थे और कुछ लोग हवा भरना. अगर समय समय पर चाबी ना भरी जाती तो रिकॉर्ड स्पीड लूज़ करने लगता और दूर दूर छतों पर सोये लोग भी ठहाके लगा कर हंस पड़ते “ अरे झपकी आ गयी रे रेडियो वाले को झपकी आ गयी .............” और अगले दिन उस इंसान की सभी लोग खूब खिल्ली उड़ाते. रेडियो जुबानी 14 तो रेडियो लग चुका था, आस पास के बच्चों ने ग्रामोफोन को घेर रखा था. मैं हालांकि जैना के घर में कभी नहीं जाता था लेकिन ये रेडियो मेरे भी रूचि की चीज़ थी इसलिए मैं भी दूर खड़े होकर देखने लगा. अमरू ने मुझे देखा तो फ़ौरन मोहल्ले के बच्चों को डांट कर भगा दिया और मुझे कहा “आओ आओ कंवर साब........” उनके और मोहल्ले के सभी शेख परिवारों के लिए हमारा यही नाम था. मैंने देखा जो लड़का ग्रामोफोन बजा रहा था उसने माइक खोल कर हेलो हेलो बोला और दूसरे को दे दिया दूसरे ने भी उसमे हेलो हेलो बोलकर अपनी आवाज़ सुनी तभी मेरे दिमाग में आया कि क्यों ना हेलो हेलो की बजाय रिकॉर्ड पर लिखा हुआ फिल्म का नाम और गायक का नाम बोला जाय. वहां मेरे अलावा कोई पढ़ा लिखा नहीं था जो ये काम कर सके. मैंने कहा “ अरे क्या हेलो हेलो कर रहे हो?” पास में खड़ी भंवरी ने माइक उस लड़के के हाथ से छीनकर मेरे हाथ में देते हुए कहा, “ लो कंवर साब आपई कुछ आछो आछो बोलो......” मैंने माइक हाथ में लिया और रिकॉर्ड पर लिखी हुई जानकारी पढ़ दी. मैंने सोचा जैना के घर का भंवरी नाम का एक अध्याय तो खत्म हुआ. लेकिन मुझे क्या पता था कि ये अध्याय अभी तो शुरू हुआ है और आगे जाकर यही अध्याय मेरे एक नाटक का आधार बनेगा.

.webp?width=60)

