The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • Lallankhas
  • radio zubani series by mahendra modi part 12 whe he not wrote radionama for four years

'भाई को कैंसर की वजह से 4 साल लिख नहीं पाया'

रेडियो जुबानी 12: माफ कीजिएगा, लेकिन इस किस्त का वास्ता रेडियो से नहीं है. सीधा दिल से है.

Advertisement
Img The Lallantop
फोटो - thelallantop
pic
लल्लनटॉप
21 मार्च 2016 (अपडेटेड: 12 मई 2016, 10:32 AM IST)
font-size
Small
Medium
Large
font-size
Small
Medium
Large
whatsapp share
पेश है ‘दी लल्लनटॉप’ की नई सीरीज ‘रेडियो जुबानी’ की 12वीं किस्त. इस सीरीज में हम आपको महेंद्र मोदी के लिखे रेडियो से जुड़े किस्से पढ़ा रहे हैं. बीकानेर में पैदा हुए महेंद्र मोदी मुंबई में रहते हैं. रेडियो में 40 साल से ज्यादा का एक्सपीरियेंस है. विविध भारती मुंबई में लंबे वक्त तक सहायक केंद्र निदेशक रहे.
mahendra modi-2
अब तक आप इस सीरीज की कई किस्तें पढ़ चुके हैं. अब पढ़िए कि जब महेंद्र मोदी अपने भाई की बीमारी की वजह से सालों तक लिख नहीं पाए.
  मैंने पिछली कुछ कड़ियों में ज़िक्र किया था कि जब भी बचपन में मैं और मेरे बड़े भाई खेला करते थे, तो अक्सर मैं बड़े भाई की भूमिका में रहता और वो छोटे भाई की भूमिका में. ना जाने ये खेल कब हम दोनों की ज़िंदगी में कुछ इस तरह शामिल हो गया कि पूरी तरह से आत्मनिर्भर होते हुए भी कुछ बातों में खेल ही की तरह भाई साहब मुझे बड़े भाई के आसन पर बिठा दिया करते थे. और मैं पहले तो मुंह बाए उनकी तरफ देखता रह जाता लेकिन फिर अपनी जिम्मेदारी पूरी करने में जुट जाता. 2008 में मैं विविध भारती की गोल्डन जुबली के कामों में पूरी तरह खोया हुआ था कि भाई साहब का फोन आया.
Embed
लंबी सांस भरते हुए उन्होंने कहा था, 'हां वो तो कैंसर नहीं था लेकिन मेरे पेट में आजकल बहुत जोर का दर्द उठता है. मुझे लगता है ये इन्टेस्टाइन का कैंसर है.' मैं उनके मुंह से फिर कैंसर का नाम सुनकर कांप गया. एक तरफ मन कह रहा था कि उन्हें शायद फिर से वहम हो रहा है लेकिन दूसरी तरफ लग रहा था कि डॉक्टर वो भी इतना अनुभवी सर्जन, उन्हें वहम क्या होगा ? कहीं ना कहीं कुछ तो गड़बड़ है. वो फिर बोले, 'महेंदर कुछ कर. इस बार ये कैंसर ही है.' मेरा दिल बैठ रहा था लेकिन मैंने उन्हें ढाढस दिलाते हुए कहा, 'आप चिंता मत कीजिए मैं कल आ रहा हूं बीकानेर, फिर सोचते हैं कि क्या करना चाहिए.' विविध भारती के गोल्डन जुबली कार्यक्रमों को अपने साथियों, कांचन जी, जोशी जी, कमलेश जी, कल्पना जी, यूनुस खान को सुपुर्द किया और उसी शाम जयपुर की फ्लाइट पकड़ी और दूसरे ही दिन बीकानेर जा पहुंचा. भाभी जी, बाई, मिनी सबके सब परेशान थे. हालांकि मन ही मन मैं खुद भी बहुत डरा हुआ था लेकिन अपने डर को काबू करते हुए मैंने भाई साहब को कहा, 'हम दिल्ली चलते हैं, मैंने नेट पर देखा है वहां के फोर्टिस अस्पताल में एक बहुत अच्छे डॉक्टर हैं पेट के रोगों के.' भाई साहब बोले, 'मुझे पता नहीं, जैसा तुझे ठीक लगे कर.' हम निकल पड़े दिल्ली के लिए. रास्ते में भी भाई साहब बहुत बुझे बुझे रहे. एकाध बार बात हुई तो मैंने उनसे पूछा, आपको ऐसा क्यों लग रहा है कि ये कैंसर है? वो बोले, 'तू आ गया है तो लगता है सब ठीक हो जाएगा लेकिन महेंदर पता नहीं क्यों, मुझे हमेशा लगता है कि कैंसर कहीं ना कहीं मेरे शरीर में पल रहा है.'
Embed
मेरे दिमाग में भाई साहब का एक ही वाक्य बार बार घूम रहा था. 'महेंदर पता नहीं क्यों मुझे हमेशा लगता है कि कैंसर कहीं ना कहीं मेरे शरीर में पल रहा है.' मुझे याद आया, भाई साहब ने एक बार कहा था, आजकल डॉक्टर मानने लगे हैं कि कैंसर भी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को मिलने वाली बीमारी है और हमारे पिताजी की मृत्यु से चार दिन पहले पता चला कि उन्हें कैंसर था जबकि कैंसर की सेकेंड्रीज मुंह में नज़र आने लगी थी. डॉक्टर्स ने कह दिया था कि प्राइमरी कैंसर कहां है अब पता लगाने से कोई मतलब नहीं निकलेगा बस तरह तरह के टेस्ट करके हम इन्हें तकलीफ ही देंगे. रेडियो जुबानी की पहली किस्त इसलिए टेस्ट नहीं करवाए गए और उन्हें कहां का कैंसर था पता नहीं चल पाया. मुझे लगा भाई साहब को इसीलिये लग रहा है शायद कि उन्हें कैंसर है. मैं इन्हीं ख्यालों में गुम था कि डॉक्टर के चपरासी ने नाम पुकारा, “ डॉक्टर राजेन्द्र मोदी.......” हम दोनों डॉक्टर केक चैम्बर की ओर चल पड़े. डॉक्टर ने अच्छी तरह उनकी जांच की. बहुत देर तक बातचीत की, कुछ टेस्ट करवाए. हम सांस रोके डॉक्टर के चेहरे को इस तरह देख रहे थे मानो सेशन्स कोर्ट में खड़े हों और हम दोनों का फैसला सुनाया जाना हो, सज़ा-ए-मौत या फिर बरी. तभी डॉक्टर ने मुंह खोला “ देखिये डॉक्टर साहब, वैसे तो टेस्ट्स की रिपोर्ट आ जाएं तभी पक्का होगा लेकिन अपने 20 साल के अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूं कि आपकी आंतों में वेर्बेटीकुलम बन गए हैं जिनमें खाना फंस जाता है तो आपके पेट में दर्द होता है. रेडियो जुबानी 2 आपको आंतों का कैंसर बिलकुल नहीं है. हम दोनों भाइयों ने एक दूसरे की तरफ देखा और एक साथ एक लंबी सांस भरी. हम लोग डॉक्टर को धन्यवाद देकर चैंबर से बाहर आ गए और शाम को टेस्ट्स की रिपोर्ट भी यही कह रही थी कि भाई साहब को कैंसर नहीं है. उसी वक्त फोन कर बीकानेर और मुम्बई में सबको बताया कि कोइ चिंता की बात नहीं है और हमने बीकानेर के लिए ट्रेन पकड़ ली. मैंने देखा भाई साहब के चेहरे पर के चिंता के बादल थोड़े हलके तो हुए थे लेकिन बिलकुल साफ़ नहीं हुए थे. ट्रेन में बैठे बैठे मैंने उनसे पूछा “ क्या बात है डाक साहब ( उनके मेडिकल कॉलेज में दाखिले के बाद से ही मैं उन्हें इसी संबोधन से बुलाने लग गया था ), आप डॉक्टर की बातों से आश्वस्त नहीं हो पा रहे हैं तो हम मुम्बई चलकर किसी और डॉक्टर से सेकेंड ओपीनियन ले लेते हैं.” रेडियो जुबानी 3 वो लंबी सांस खींच कर बोले “ नहीं महेंदर ऐसी बात नहीं है, डॉक्टर ने जो कुछ कहा मुझे उस पर पूरा विश्वास है लेकिन फिर वही बात दोहराऊंगा....... मुझे लग रहा है कहीं ना कहीं मेरे शरीर में कैंसर पल रहा है.” मैंने कहा “ चलिए किसी ओंकोलोजिस्ट से सलाह कर लेते हैं........” बीकानेर लौटकर उनके साथी डॉक्टर्स से सलाह मशविरा किया गया, उनमे ओंकोलौजिस्ट भी शामिल थे. जो भी जांचें संभव थीं करने के बाद सबने एकमत से कहा कि उनके दिमाग में वहम बैठ गया है. कैंसर उनके जिस्म में कहीं भी नहीं है. रेडियो जुबानी 4 मैं मुम्बई लौट आया, अपने काम में व्यस्त हो गया, भाई साहब भी बीमारों के इलाज में लग गए. वक्त गुज़रता गया इस बीच भाभी जी ज़्यादा बीमार हो गईं तो हम सबका ध्यान उनकी बीमारी पर केंद्रित हो गया. भाभी जी की दो बार स्पाइनल सर्जरी हुई, मेरी पोस्टिंग कुछ महीनों के लिए दिल्ली हुई, फिर मैं वापस मुम्बई आया और 2011 में किन हालात में रिटायर हुआ ये आगे जाकर लिखूंगा, अभी बस यही समझ लीजिए कि वक्त अपनी रफ़्तार से चलता हुआ अगस्त 2012 तक आ पहुंचा. भाई साहब पूरे शरीर में और खास तौर पर सीने में और पीठ में दर्द की शिकायत करने लगे. उनके दोस्त डॉक्टर शिव गोपाल सोनी, डॉक्टर अनूप बोथरा, डॉक्टर मुकेश आर्य वगैरह सबने जांच की, सबकी राय थी कि मांस पेशियों का दर्द है कोई खास बात नहीं है.
Embed
मैं उनकी बात सुनकर सन्न रह गया. इतने अनुभवी सर्जन की बात कोइ डॉक्टर इसलिए नहीं सुन रहा था कि इससे पहले दो बार उनकी बात गलत निकली थी और वो सभी डॉक्टर जो हालांकि पेशे से डॉक्टर थे मगर थे तो आखिर इंसान ही. वो भाई साहब के सहपाठी और दोस्त थे इसलिए मन से नहीं चाहते थे कि उन्हें ये रोग हो. इसीलिए शायद इसे झुठला रहे थे. मेरा मन बहुत घबराने लगा और मुझे लगा मैं अभी जोर से रो पडूंगा. रेडियो जुबानी 5 मैंने तुरंत फोन काट दिया और तेज तेज सांस लेकर अपने आंसुओं को काबू में किया. फिर से फोन मिलाया और कहा “ आप चिंता मत कीजिये मैं कल शाम तक बीकानेर पहुंच रहा हूं. आजकल कैंसर का भी इलाज है. भगवान ना करे अगर आपकी आशंका सही भी है तो हम लोग पूरा इलाज करवाएंगे. ज़रूरत पडी तो देश के बाहर के डॉक्टर्स से मदद लेंगे. आप घबराएं नहीं, मैं आ रहा हूं.” मैंने उन्हें तो नहीं घबराने को कह दिया था लेकिन मेरा खुद का दिल बहुत जोर से घबरा रहा था. मैं फूट फूट कर रो पड़ा. एक पूरी तरह से नास्तिक इंसान हारकर भगवान से प्रार्थना कर रहा था कि मेरे भाई को बचा लो.
Embed
शाम में जब मुम्बई पहुंचे तब तक वैभव ने इंग्लैंड से अपनी एक दोस्त निमिषा को मुम्बई में सारी तैयारियों के लिए बोल दिया था. हम लोग अपने अंधेरी वाले घर उन्हें लेकर आ गए. इस बीच मेरी पत्नी ने डॉक्टर अमित सेनगुप्ता सलाह ली कि किस डॉक्टर को दिखाया जाना चाहिए. दूसरे दिन यानी 16 अगस्त की सुबह मैं, मेरी पत्नी, मिनी और निमिषा भाई साहब को लेकर टाटा पहुंचे. निमिषा ने रजिस्ट्रेशन वगैरह का काम पूरा किया ही था कि वैभव हॉस्पीटल के मेन गेट से अंदर घुसा. उसे सामने देखते ही मुझे लगा कि मेरे अंदर से कुछ उबल कर बाहर निकलने वाला है. मैंने बहुत मुश्किल से उबल आए आंसुओं को रोका और वैभव की ओर देखा. आंसू तो मैंने रोक लिए थे मगर ना जाने क्या था उस वक्त मेरी आंखों में कि वैभव ने मेरे कंधे पर एक हाथ रखा और हलके से उसे थपथपा दिया. रेडियो जुबानी 6 मेरा मन किया. मैं उससे लिपटकर जोर जोर से रो पडूं. लेकिन नहीं. मैंने देखा, भाई साहब की नज़रें मुझपर ही टिकी थीं. अगर मैं कमज़ोर पड़ गया तो उनका क्या हाल होगा? रेडियो जुबानी 7 इसी बीच डॉक्टर मंजू सेंगर कमरे में घुसीं. बाकी सब लोग कमरे से बाहर कर दिए गए, वहां अब बस भाई साहब, मैं, वैभव और डॉक्टर सेंगर थे. डॉक्टर ने भाई साहब से बात करनी शुरू की. अपने हर सवाल के उत्तर पर उनका चेहरा गंभीर होता चला गया. उन्होंने भाई साहब की रीढ़ की हड्डी की जांच की और कुछ पल के लिए खामोश खड़ी हो गईं. लगा हम एक बार फिर सैशन कोर्ट के कटघरे में खड़े हैं और हमारी ज़िंदगी का फैसला होने वाला है. रेडियो जुबानी 8
Embed
उनका एक एक शब्द एक बड़े से पहाड़ की तरह हम तीनों पर जैसे टूट पड़ा. आज कोर्ट में जज की कुर्सी पर बैठी डॉक्टर ने हम पर ज़रा भी रहम नहीं किया था और सज़ा सुना दी थी, “ सज़ा-ए-मौत”. कुछ पल के लिए कमरे में एक खौफ़नाक सन्नाटा पसर गया. जैसे हम सब के पास शब्द ही चुक गए. थोड़ी देर में भाई साहब ने अपने आपको सम्भाला एक फीकी सी मुस्कराहट चेहरे पर लाते हुए पूछा, “ क्या लगता है डॉक्टर साहब, कितने दिन हैं मेरे पास ?” डॉक्टर सेंगर ने उनकी पीठ पर हाथ रखते हुए कहा, 'अभी आपको कुछ नहीं होने वाला है आप ठीक से इलाज करवाइए बस और वैसे किसकी ज़िंदगी कब तक है कौन जानता है? मैं कितने दिन ज़िंदा रहूंगी कोइ बता सकता है क्या?” कई जांचें हुई. हर जांच के साथ उम्मीद जागती थी कि शायद कुछ निगेटिव आ जाय और डॉक्टर सेंगर बोले “ ये जांच निगेटिव है, इसका मतलब इन्हें कैंसर नहीं है.” रेडियो जुबानी किस्त -9 मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ. हर जांच के साथ ये बात और पुख्ता होती चली गयी कि भाई साहब को कैंसर है. फिर शुरू हुआ कीमोथेरेपी का तकलीफदेह दौर. हर हफ्ते कीमोथेरेपी दी जाती थी. साथ ही अम्बानी हॉस्पीटल में रेडियो थेरेपी भी शुरू की गयी ताकि रीढ़ की हड्डी का क्षरण आगे ना हो. पूरा परिवार भाई साहब के कैंसर के इर्द गिर्द सिमट आया था. मानो इस घर में किसी को कोई और काम ही नहीं था. कैंसर की भयावहता भाई साहब के ही नहीं घर के हर सदस्य के चेहरे पर उतर आई थी. डॉक्टर सेंगर कहतीं “ आप लोग इतने परेशान क्यों हो रहे हैं ? अभी इनकी जान को कोई ख़तरा नहीं है.” लेकिन कैंसर ने हम सबको अपने जबड़ों में जकड़ लिया था. मैं आप सबसे माफी चाहता हूं. भाई साहब की इस बीमारी के दौरान उनपर और हम सबपर क्या क्या गुज़री, ये कागज़ पर उतारने की हिम्मत अभी मुझमे नहीं है. अमेरिका में बस गए डॉक्टर आलोक पांडे, लास वेगास विश्व विद्यालय की कैंसर विशेषज्ञ डॉक्टर जुमाना, यू के के कैंसर विशेषज्ञ डॉक्टर अनिल भाटिया, हमारे दूर के रिश्तेदार प्रेम शंकर जी और तीन साल तक भाई साहब का इलाज करने वाली डॉक्टर मंजू जैसे लोगों ने किस प्रकार हमें सहारा दिया, वो सब भी मैं आपको बताऊंगा लेकिन फिर कभी.
Embed

Advertisement

Advertisement

()