पेश है ‘दी लल्लनटॉप’ की नई सीरीज ‘रेडियो जुबानी’ की 12वीं किस्त. इस सीरीज में हमआपको महेंद्र मोदी के लिखे रेडियो से जुड़े किस्से पढ़ा रहे हैं. बीकानेर में पैदाहुए महेंद्र मोदी मुंबई में रहते हैं. रेडियो में 40 साल से ज्यादा का एक्सपीरियेंसहै. विविध भारती मुंबई में लंबे वक्त तक सहायक केंद्र निदेशक रहे. अब तक आप इससीरीज की कई किस्तें पढ़ चुके हैं. अब पढ़िए कि जब महेंद्र मोदी अपने भाई की बीमारीकी वजह से सालों तक लिख नहीं पाए.-------------------------------------------------------------------------------- मैंने पिछली कुछ कड़ियों में ज़िक्र किया था कि जब भी बचपन में मैं और मेरे बड़े भाईखेला करते थे, तो अक्सर मैं बड़े भाई की भूमिका में रहता और वो छोटे भाई की भूमिकामें. ना जाने ये खेल कब हम दोनों की ज़िंदगी में कुछ इस तरह शामिल हो गया कि पूरीतरह से आत्मनिर्भर होते हुए भी कुछ बातों में खेल ही की तरह भाई साहब मुझे बड़े भाईके आसन पर बिठा दिया करते थे. और मैं पहले तो मुंह बाए उनकी तरफ देखता रह जातालेकिन फिर अपनी जिम्मेदारी पूरी करने में जुट जाता. 2008 में मैं विविध भारती कीगोल्डन जुबली के कामों में पूरी तरह खोया हुआ था कि भाई साहब का फोन आया. “महेंदर”“जी” “ यार मैंने तुमसे कहा था ना एक बार कि मेरे प्रोस्टेट में कुछ प्रॉब्लम है,मुझे वो प्रोस्टेट कैंसर लग रहा था” “ हां डॉ. साहब लेकिन हम लोगों ने सारी जांचेंकरवाई थीं और वो कैंसर नहीं था” लंबी सांस भरते हुए उन्होंने कहा था, 'हां वो तोकैंसर नहीं था लेकिन मेरे पेट में आजकल बहुत जोर का दर्द उठता है. मुझे लगता है येइन्टेस्टाइन का कैंसर है.' मैं उनके मुंह से फिर कैंसर का नाम सुनकर कांप गया. एकतरफ मन कह रहा था कि उन्हें शायद फिर से वहम हो रहा है लेकिन दूसरी तरफ लग रहा थाकि डॉक्टर वो भी इतना अनुभवी सर्जन, उन्हें वहम क्या होगा ? कहीं ना कहीं कुछ तोगड़बड़ है. वो फिर बोले, 'महेंदर कुछ कर. इस बार ये कैंसर ही है.' मेरा दिल बैठ रहाथा लेकिन मैंने उन्हें ढाढस दिलाते हुए कहा, 'आप चिंता मत कीजिए मैं कल आ रहा हूंबीकानेर, फिर सोचते हैं कि क्या करना चाहिए.' विविध भारती के गोल्डन जुबलीकार्यक्रमों को अपने साथियों, कांचन जी, जोशी जी, कमलेश जी, कल्पना जी, यूनुस खानको सुपुर्द किया और उसी शाम जयपुर की फ्लाइट पकड़ी और दूसरे ही दिन बीकानेर जापहुंचा. भाभी जी, बाई, मिनी सबके सब परेशान थे. हालांकि मन ही मन मैं खुद भी बहुतडरा हुआ था लेकिन अपने डर को काबू करते हुए मैंने भाई साहब को कहा, 'हम दिल्ली चलतेहैं, मैंने नेट पर देखा है वहां के फोर्टिस अस्पताल में एक बहुत अच्छे डॉक्टर हैंपेट के रोगों के.' भाई साहब बोले, 'मुझे पता नहीं, जैसा तुझे ठीक लगे कर.' हम निकलपड़े दिल्ली के लिए. रास्ते में भी भाई साहब बहुत बुझे बुझे रहे. एकाध बार बात हुईतो मैंने उनसे पूछा, आपको ऐसा क्यों लग रहा है कि ये कैंसर है? वो बोले, 'तू आ गयाहै तो लगता है सब ठीक हो जाएगा लेकिन महेंदर पता नहीं क्यों, मुझे हमेशा लगता है किकैंसर कहीं ना कहीं मेरे शरीर में पल रहा है.' मैंने उन्हें फिर दिलासा दिया कि कईबार हमारे दिल में ऐसा वहम बैठ जाता है जिसका दरअसल कोई वजूद नहीं होता और नींद कीगोली देकर सुला दिया. दूसरे दिन दिल्ली पहुंचकर हम लोग फोर्टिस पहुंचे. रजिस्ट्रेशनके बाद से लेकर डॉक्टर के कॉल करने तक का दो घंटे का वक्त हम दोनों के लिए बहुततकलीफदेह था. मैं कोशिश कर रहा था कि भाई साहब को बातों में लगाकर उनके तनाव को कुछकम करुं लेकिन वो सिवाय हां हूं के कुछ नहीं बोल रहे थे. और इससे मेरा तनाव बढ़ता जारहा था. मेरे दिमाग में भाई साहब का एक ही वाक्य बार बार घूम रहा था. 'महेंदर पतानहीं क्यों मुझे हमेशा लगता है कि कैंसर कहीं ना कहीं मेरे शरीर में पल रहा है.'मुझे याद आया, भाई साहब ने एक बार कहा था, आजकल डॉक्टर मानने लगे हैं कि कैंसर भीएक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को मिलने वाली बीमारी है और हमारे पिताजी की मृत्यु से चारदिन पहले पता चला कि उन्हें कैंसर था जबकि कैंसर की सेकेंड्रीज मुंह में नज़र आनेलगी थी. डॉक्टर्स ने कह दिया था कि प्राइमरी कैंसर कहां है अब पता लगाने से कोईमतलब नहीं निकलेगा बस तरह तरह के टेस्ट करके हम इन्हें तकलीफ ही देंगे. रेडियोजुबानी की पहली किस्त इसलिए टेस्ट नहीं करवाए गए और उन्हें कहां का कैंसर था पतानहीं चल पाया. मुझे लगा भाई साहब को इसीलिये लग रहा है शायद कि उन्हें कैंसर है.मैं इन्हीं ख्यालों में गुम था कि डॉक्टर के चपरासी ने नाम पुकारा, “ डॉक्टरराजेन्द्र मोदी.......” हम दोनों डॉक्टर केक चैम्बर की ओर चल पड़े. डॉक्टर ने अच्छीतरह उनकी जांच की. बहुत देर तक बातचीत की, कुछ टेस्ट करवाए. हम सांस रोके डॉक्टर केचेहरे को इस तरह देख रहे थे मानो सेशन्स कोर्ट में खड़े हों और हम दोनों का फैसलासुनाया जाना हो, सज़ा-ए-मौत या फिर बरी. तभी डॉक्टर ने मुंह खोला “ देखिये डॉक्टरसाहब, वैसे तो टेस्ट्स की रिपोर्ट आ जाएं तभी पक्का होगा लेकिन अपने 20 साल केअनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूं कि आपकी आंतों में वेर्बेटीकुलम बन गए हैं जिनमेंखाना फंस जाता है तो आपके पेट में दर्द होता है. रेडियो जुबानी 2 आपको आंतों काकैंसर बिलकुल नहीं है. हम दोनों भाइयों ने एक दूसरे की तरफ देखा और एक साथ एक लंबीसांस भरी. हम लोग डॉक्टर को धन्यवाद देकर चैंबर से बाहर आ गए और शाम को टेस्ट्स कीरिपोर्ट भी यही कह रही थी कि भाई साहब को कैंसर नहीं है. उसी वक्त फोन कर बीकानेरऔर मुम्बई में सबको बताया कि कोइ चिंता की बात नहीं है और हमने बीकानेर के लिएट्रेन पकड़ ली. मैंने देखा भाई साहब के चेहरे पर के चिंता के बादल थोड़े हलके तो हुएथे लेकिन बिलकुल साफ़ नहीं हुए थे. ट्रेन में बैठे बैठे मैंने उनसे पूछा “ क्या बातहै डाक साहब ( उनके मेडिकल कॉलेज में दाखिले के बाद से ही मैं उन्हें इसी संबोधन सेबुलाने लग गया था ), आप डॉक्टर की बातों से आश्वस्त नहीं हो पा रहे हैं तो हममुम्बई चलकर किसी और डॉक्टर से सेकेंड ओपीनियन ले लेते हैं.” रेडियो जुबानी 3 वोलंबी सांस खींच कर बोले “ नहीं महेंदर ऐसी बात नहीं है, डॉक्टर ने जो कुछ कहा मुझेउस पर पूरा विश्वास है लेकिन फिर वही बात दोहराऊंगा....... मुझे लग रहा है कहीं नाकहीं मेरे शरीर में कैंसर पल रहा है.” मैंने कहा “ चलिए किसी ओंकोलोजिस्ट से सलाहकर लेते हैं........” बीकानेर लौटकर उनके साथी डॉक्टर्स से सलाह मशविरा किया गया,उनमे ओंकोलौजिस्ट भी शामिल थे. जो भी जांचें संभव थीं करने के बाद सबने एकमत से कहाकि उनके दिमाग में वहम बैठ गया है. कैंसर उनके जिस्म में कहीं भी नहीं है. रेडियोजुबानी 4 मैं मुम्बई लौट आया, अपने काम में व्यस्त हो गया, भाई साहब भी बीमारों केइलाज में लग गए. वक्त गुज़रता गया इस बीच भाभी जी ज़्यादा बीमार हो गईं तो हम सबकाध्यान उनकी बीमारी पर केंद्रित हो गया. भाभी जी की दो बार स्पाइनल सर्जरी हुई, मेरीपोस्टिंग कुछ महीनों के लिए दिल्ली हुई, फिर मैं वापस मुम्बई आया और 2011 में किनहालात में रिटायर हुआ ये आगे जाकर लिखूंगा, अभी बस यही समझ लीजिए कि वक्त अपनीरफ़्तार से चलता हुआ अगस्त 2012 तक आ पहुंचा. भाई साहब पूरे शरीर में और खास तौर परसीने में और पीठ में दर्द की शिकायत करने लगे. उनके दोस्त डॉक्टर शिव गोपाल सोनी,डॉक्टर अनूप बोथरा, डॉक्टर मुकेश आर्य वगैरह सबने जांच की, सबकी राय थी कि मांसपेशियों का दर्द है कोई खास बात नहीं है. अब भाई साहब से मैं रोजाना शाम में फोन परएक बार बात करने लगा था. मेरा बेटा वैभव इस वक्त तक कई जॉब्स बदलते बदलते स्टारप्लस के वाइस प्रेसिडेंट के पद पर आ गया था. उसने बताया कि थोड़ा रिलेक्स होने केलिए वो अपनी पत्नी तबस्सुम और बेटे टाइगर के साथ 15-20 दिन के लिए इंग्लेंड जा रहाहै. हमने उसे विदा किया और 6-7 दिन बाद ही भाई साहब ने मुझे फोन पर बताया कि उनकादर्द बढ़ रहा है. उन्होंने कहा “ महेंदर कई दवाओं के बावजूद ये दर्द कंट्रोल नहीं होरहा है और मेरा वज़न भी कम हो रहा है, मैंने यहां के डॉक्टर्स को कहा लेकिन कोइ मेरीबात मान नहीं रहा है, सब कह रहे हैं तुझे वहम की बीमारी है और मैं चुपचाप उनकी बातसुन रहा हूं. लेकिन मैं तुझे सच कह रहा हूं, मुझे लग रहा है मुझे मल्टिपल मायलोमा(एक तरह का कैंसर जिसमे हड्डियां, खून और मज्जा तीनो प्रभावित होते हैं ) है...” मैंउनकी बात सुनकर सन्न रह गया. इतने अनुभवी सर्जन की बात कोइ डॉक्टर इसलिए नहीं सुनरहा था कि इससे पहले दो बार उनकी बात गलत निकली थी और वो सभी डॉक्टर जो हालांकिपेशे से डॉक्टर थे मगर थे तो आखिर इंसान ही. वो भाई साहब के सहपाठी और दोस्त थेइसलिए मन से नहीं चाहते थे कि उन्हें ये रोग हो. इसीलिए शायद इसे झुठला रहे थे.मेरा मन बहुत घबराने लगा और मुझे लगा मैं अभी जोर से रो पडूंगा. रेडियो जुबानी 5मैंने तुरंत फोन काट दिया और तेज तेज सांस लेकर अपने आंसुओं को काबू में किया. फिरसे फोन मिलाया और कहा “ आप चिंता मत कीजिये मैं कल शाम तक बीकानेर पहुंच रहा हूं.आजकल कैंसर का भी इलाज है. भगवान ना करे अगर आपकी आशंका सही भी है तो हम लोग पूराइलाज करवाएंगे. ज़रूरत पडी तो देश के बाहर के डॉक्टर्स से मदद लेंगे. आप घबराएंनहीं, मैं आ रहा हूं.” मैंने उन्हें तो नहीं घबराने को कह दिया था लेकिन मेरा खुदका दिल बहुत जोर से घबरा रहा था. मैं फूट फूट कर रो पड़ा. एक पूरी तरह से नास्तिकइंसान हारकर भगवान से प्रार्थना कर रहा था कि मेरे भाई को बचा लो. मैंने तुरंत वैभवको फोन कर उसे बताया कि मैं बीकानेर जा रहा हूं. 15 अगस्त की शाम भाई साहब, भाभी जीको लेकर मुम्बई पहुंचूंगा और 16 अगस्त को सुबह उन्हें टाटा हॉस्पीटल में लेकरजाऊंगा. उसने कहा, 'डैडी मैं भी पहुंच जाता हूं.' मैंने उसे बहुत कहा कि अपनी 15दिन की छुट्टियां काटकर आ जाओ लेकिन वो नहीं माना और उसने कहा कि वो 16 की सुबहमुम्बई पहुंच जाएगा. मैं बीकानेर गया. 15 अगस्त को जब पूरा देश आज़ादी की सालगिरहमना रहा था मैं और मेरी बेटी मिनी जो उन दिनों जयपुर में ही रह रही थी, दो व्हीलचेयर्स पर भाई साहब और भाभी जी को लेकर जयपुर एयरपोर्ट पर हवाई जहाज़ की तरफ बढ़ रहेथे. शाम में जब मुम्बई पहुंचे तब तक वैभव ने इंग्लैंड से अपनी एक दोस्त निमिषा कोमुम्बई में सारी तैयारियों के लिए बोल दिया था. हम लोग अपने अंधेरी वाले घर उन्हेंलेकर आ गए. इस बीच मेरी पत्नी ने डॉक्टर अमित सेनगुप्ता सलाह ली कि किस डॉक्टर कोदिखाया जाना चाहिए. दूसरे दिन यानी 16 अगस्त की सुबह मैं, मेरी पत्नी, मिनी औरनिमिषा भाई साहब को लेकर टाटा पहुंचे. निमिषा ने रजिस्ट्रेशन वगैरह का काम पूराकिया ही था कि वैभव हॉस्पीटल के मेन गेट से अंदर घुसा. उसे सामने देखते ही मुझे लगाकि मेरे अंदर से कुछ उबल कर बाहर निकलने वाला है. मैंने बहुत मुश्किल से उबल आएआंसुओं को रोका और वैभव की ओर देखा. आंसू तो मैंने रोक लिए थे मगर ना जाने क्या थाउस वक्त मेरी आंखों में कि वैभव ने मेरे कंधे पर एक हाथ रखा और हलके से उसे थपथपादिया. रेडियो जुबानी 6 मेरा मन किया. मैं उससे लिपटकर जोर जोर से रो पडूं. लेकिननहीं. मैंने देखा, भाई साहब की नज़रें मुझपर ही टिकी थीं. अगर मैं कमज़ोर पड़ गया तोउनका क्या हाल होगा? रेडियो जुबानी 7 इसी बीच डॉक्टर मंजू सेंगर कमरे में घुसीं.बाकी सब लोग कमरे से बाहर कर दिए गए, वहां अब बस भाई साहब, मैं, वैभव और डॉक्टरसेंगर थे. डॉक्टर ने भाई साहब से बात करनी शुरू की. अपने हर सवाल के उत्तर पर उनकाचेहरा गंभीर होता चला गया. उन्होंने भाई साहब की रीढ़ की हड्डी की जांच की और कुछ पलके लिए खामोश खड़ी हो गईं. लगा हम एक बार फिर सैशन कोर्ट के कटघरे में खड़े हैं औरहमारी ज़िंदगी का फैसला होने वाला है. रेडियो जुबानी 8 मुझे लगा, अभी वो कहेंगी, 'आपलोग ख्वामख्वाह इतने परेशान हो रहे हैं, कुछ नहीं हुआ है इन्हें. इन्हें सिर्फ वहमकी बीमारी है.' लेकिन नहीं, उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा. वो तो कह रही थीं. डॉक्टरसाहब....... देखने से तो लग रहा है आपको मल्टिपल मायलोमा हुआ है.” उनका एक एक शब्दएक बड़े से पहाड़ की तरह हम तीनों पर जैसे टूट पड़ा. आज कोर्ट में जज की कुर्सी परबैठी डॉक्टर ने हम पर ज़रा भी रहम नहीं किया था और सज़ा सुना दी थी, “ सज़ा-ए-मौत”.कुछ पल के लिए कमरे में एक खौफ़नाक सन्नाटा पसर गया. जैसे हम सब के पास शब्द ही चुकगए. थोड़ी देर में भाई साहब ने अपने आपको सम्भाला एक फीकी सी मुस्कराहट चेहरे परलाते हुए पूछा, “ क्या लगता है डॉक्टर साहब, कितने दिन हैं मेरे पास ?” डॉक्टरसेंगर ने उनकी पीठ पर हाथ रखते हुए कहा, 'अभी आपको कुछ नहीं होने वाला है आप ठीक सेइलाज करवाइए बस और वैसे किसकी ज़िंदगी कब तक है कौन जानता है? मैं कितने दिन ज़िंदारहूंगी कोइ बता सकता है क्या?” कई जांचें हुई. हर जांच के साथ उम्मीद जागती थी किशायद कुछ निगेटिव आ जाय और डॉक्टर सेंगर बोले “ ये जांच निगेटिव है, इसका मतलबइन्हें कैंसर नहीं है.” रेडियो जुबानी किस्त -9 मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ. हर जांच केसाथ ये बात और पुख्ता होती चली गयी कि भाई साहब को कैंसर है. फिर शुरू हुआकीमोथेरेपी का तकलीफदेह दौर. हर हफ्ते कीमोथेरेपी दी जाती थी. साथ ही अम्बानीहॉस्पीटल में रेडियो थेरेपी भी शुरू की गयी ताकि रीढ़ की हड्डी का क्षरण आगे ना हो.पूरा परिवार भाई साहब के कैंसर के इर्द गिर्द सिमट आया था. मानो इस घर में किसी कोकोई और काम ही नहीं था. कैंसर की भयावहता भाई साहब के ही नहीं घर के हर सदस्य केचेहरे पर उतर आई थी. डॉक्टर सेंगर कहतीं “ आप लोग इतने परेशान क्यों हो रहे हैं ?अभी इनकी जान को कोई ख़तरा नहीं है.” लेकिन कैंसर ने हम सबको अपने जबड़ों में जकड़लिया था. मैं आप सबसे माफी चाहता हूं. भाई साहब की इस बीमारी के दौरान उनपर और हमसबपर क्या क्या गुज़री, ये कागज़ पर उतारने की हिम्मत अभी मुझमे नहीं है. अमेरिका मेंबस गए डॉक्टर आलोक पांडे, लास वेगास विश्व विद्यालय की कैंसर विशेषज्ञ डॉक्टरजुमाना, यू के के कैंसर विशेषज्ञ डॉक्टर अनिल भाटिया, हमारे दूर के रिश्तेदार प्रेमशंकर जी और तीन साल तक भाई साहब का इलाज करने वाली डॉक्टर मंजू जैसे लोगों ने किसप्रकार हमें सहारा दिया, वो सब भी मैं आपको बताऊंगा लेकिन फिर कभी. अभी तो यही बतापाऊंगा कि बस उसी अगस्त 2012 में मेरी इस सीरीज को विराम लग गया. भाई साहब कई बारकहते थे, “ महेंदर, तू अपना रेडियोनामा आगे बढ़ा ना. मेरा भी मन करता है उसे पढ़नेका.......” मैंने बहुत बार कोशिश भी की लेकिन नहीं शुरू कर पाया आगे लिखना. और फिरसे लिखना कब शुरू किया है? अब जब मेरे भाई साहब इस दुनिया में नहीं रहे. यहां तक किउनके अंतिम अवशेष भी कुछ दिन पहले हरिद्वार जाकर मां गंगा को समर्पित कर आया हूं.