पेश है ‘दी लल्लनटॉप’ की नई सीरीज ‘रेडियो जुबानी’ की 11वीं किस्त. इस सीरीज में हमआपको महेंद्र मोदी के लिखे रेडियो से जुड़े किस्से पढ़ा रहे हैं. बीकानेर में पैदाहुए महेंद्र मोदी मुंबई में रहते हैं. रेडियो में 40 साल से ज्यादा का एक्सपीरियेंसहै. विविध भारती मुंबई में लंबे वक्त तक सहायक केंद्र निदेशक रहे. अब तक आप इससीरीज की कई किस्तें पढ़ चुके हैं. अब पढ़िए कि जब चार दोस्त मिलकर फिल्म देखनेपहुंचे और वहां मिले अड़ियल अंकल.-------------------------------------------------------------------------------- बचपन से पिताजी के मुंह से हमेशा एक अंग्रेज़ी कहावत सुना करता था कि अगर आपनेपैसा खो दिया तो कुछ भी नहीं खोया. अगर सेहत खो दी तो बहुत कुछ खो दिया और अगरचरित्र खो दिया तो सब कुछ खो दिया. यानी इस दुनिया में सबसे कम महत्त्व पैसे का है.हमेशा कोशिश की कि इस बात पर पूरा भरोसा किया जाए लेकिन ज़िंदगी जो पाठ पढ़ाने कीकोशिश पग पग पर करती है, वो इन कहावतों से बहुत अलग होते हैं. जैसे जैसे बड़ा होतागया, ये बार बार महसूस किया. फिर भी जो संस्कार माता-पिता से मिले वो इतनी गहराई तकउतरे हुए थे कि हर बार ज़िंदगी के हर ऐसे पाठ को नकारने की हिम्मत न जाने कहां से आगई. जिसने ये सिखाने की कोशिश की कि पैसा ही इस दुनिया की सबसे महत्त्वपूर्ण चीज़ हैऔर रिश्ते-नाते, प्यार-स्नेह, सब जिस धरातल पर टिके हुए हैं, उस धरातल का नाम हैअर्थ. बचपन वैसे तो आराम से गुजरा मगर सीमित साधनों के बीच. पिताजी की कोआपरेटिवडिपार्टमेंट की नौकरी हमें दो वक्त की रोटी और सरकारी स्कूल की पढ़ाई तो दे सकती थीमगर हम न प्राइवेट स्कूल में पढ़ने के सपने देख सकते थे और न ही महंगे कपड़ों से भरीआलमारियों की कल्पना कर सकते थे. सन 1962 में पिताजी का तबादला बीकानेर हो गया था.घर में उस वक्त तक न बिजली थी और न ही पानी का कनेक्शन. मुस्लिम भिश्ती चमड़े की मशकमें भरकर पानी लाया करते थे, जिसे उस ज़माने के छुआछूत मानने वाले बड़े से बड़े पण्डितभी पिया करते थे. नहाने धोने का पानी चमड़े की पखाल में भरकर ऊंट पर रखकर लाया जाताथा. खाना बनाने के लिए फोग की लकडियां टाल(लकड़ी की दुकान) से खरीदकर लाई जाती थी.सर्दी के मौसम में जब ज़्यादा लकड़ी की ज़रूरत रहती थी. हम लोग बाहर खड़े होकर गावों सेआने वाले लकड़ी के लादों(ऊंट पर लादे हुए लकड़ी के गट्ठर) का मोल-भाव करते थे औरवाजिब लगने पर पूरा लादा खरीद लिया करते थे. घर में गाय थी, उसके गोबर से थापी गयीथेपड़ियां(उपले) भी चूल्हे में लकडियों के साथ साथ जलाने के काम में ली जाती थीं.सर्दी के मौसम में उस चूल्हे और उल्हे (चूल्हे के पीछे की ओर बने मिनी चूल्हे) केपास बैठकर खाई मां के हाथ की बाजरे की रोटियों और उस पर लगे ताज़े मक्खन का स्वाद आजभी मुंह में मौजूद है. कई बार जब लकडियां या थेपड़ियां गीली होती थीं तो पूरा किचनधुंए से भर जाता था. तब किचन का एक टूल बहुत काम आता था जिसे भूंगळी कहा जाता था.ये पाइप का एक टुकड़ा होता था जिस से फूंक मारकर चूल्हे की आग को चेताया जाता था. उसज़माने में बिना भूंगली के किसी रसोईघर की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. चाहे कितनाभी धुंआ हो मैं, भाई साहब और पिताजी सर्दी के मौसम में शाम को तो रसोईघर में चूल्हेके पास ही बैठकर खाना खाया करते थे. खाना भी होता था और दुनिया जहान की बातें भी.जब-तब पिताजी अपने सरकारी सेवाकाल की कई बातें सुनाया करते थे. वो बताया करते थे किवो पुलिस विभाग में सब-इन्स्पेक्टर थे मगर उन्होंने अपना तबादला कोआपरेटिवडिपार्टमेंट में करवा लिया क्योंकि पुलिस विभाग के भ्रष्ट माहौल में उनका दम घुटनेलगा. वो अपने ईमान का सौदा किसी भी हालत में नहीं करना चाहते थे और ऊपर के अफसरचाहते थे कि वो स्वयं भी रिश्वत खाएं और उसका एक हिस्सा ऊपर भी पहुंचाएं. आखिरकारउन्होंने पुलिस विभाग ही छोड़ दिया. जब जब वो अपनी ईमानदारी के किस्से सुनाया करतेथे, हम दोनों भाइयों के सीने गर्व से चौड़े हो जाते थे और हम घर में जहां तहां मुंहबाए अभावों को हंसते हंसते सहन करने को तैयार हो जाया करते थे. जीवन चल रहा था,हालांकि हर मौसम की अपनी अपनी तकलीफ थी. गर्मी में, बंद कमरे में,पसीने से लथ-पथ,लालटेन के सामने बैठकर होमवर्क किया करते थे तो कॉपियों पर लिखे गए अक्षर पसीने सेफैल जाया करते थे. हाथ का पंखा झलें तो लिखने का काम कैसे करें? ऐसे में हवा का कोईझोंका गाहे ब गाहे आ जाता था तो पसीने से भीगे शरीर को तो एक ठंडा अहसास दे जाता थामगर लालटेन् झब-झब करने लग जाता था. आखिर उसे थोड़ी देर के लिए बुझाना पड़ता था.बारिश में तो हालत और भी खराब हो जाया करती थी क्योंकि सारे मच्छर और पतंगे लालटेनऔर उसके आस-पास बैठे हम लोगों पर टूट पड़ते थे. ऐसे में अक्सर पिताजी के मुंह से एककहावत निकला करती थी, सियाले में सी लागै, उन्हाले चालै लूआं, चौमासै में माछरखावै, अै दुःख जासी मूआं यानि सर्दी के मौसम में सर्दी लगती है, गर्मी में लू चलतीहै, बारिश के मौसम में मच्छर काटते हैं. ये सारे दुःख तो तभी खत्म होंगे जब इसदुनिया से रुखसत होंगे. और हम बड़े संतुष्ट होकर फिर से पढ़ाई में मगन हो जाया करतेथे. जब किसी समस्या का कोई हल है ही नहीं तो उसके बारे में सोचना क्या ? इन तकलीफोंने उन संस्कारों को कुछ और पुख्ता कर दिया जिनके बीज मां और पिताजी ने बचपन सेहमारे भीतर रोपे थे. सच्चाई, ईमानदारी, समय की पाबंदी, अनुशासन उन्होंने हमें भाषणदेकर सिखाने की कोशिश नहीं की बल्कि स्वयं इनका पालन कर हमारे सामने ऐसे उदाहरण रखेकि ये सारे मूल्य खुदबखुद हमारे जीवन का ज़रूरी हिस्सा बन गए. यदा कदा छोटे-मोटेअभावों के बीच जीते जीते पता नहीं कैसे एक मंहगा शौक़ हम लोगों ने पाल लिया. पिताजीएक दिन एक जर्मन शेफर्ड पिल्ला लेकर आये तो हम सब लोग बहुत खुश हो गए. हमें खेलनेको एक दोस्त भी मिल गया और शायद कहीं न कहीं हमारे अहम को भी एक तुष्टि मिली कि हमभी महंगे शौक़ पाल सकते हैं. पिल्ले का नाम रखा गया “जैकी”. हम जिधर जाते.... पीछेपीछे जैकी भी उधर ही जाता, हमारे साथ भागता दौडता, खूब खेलता.हमें खूब मज़ा आता. बसदिक्क़त एक ही थी. उसे ये सिखाना बड़ा मुश्किल काम था कि जब उसे सू-सू, पॉटी करना हैतो घर के पिछवाड़े जाकर करना है जहां गाय बांधी जाती थी. कुछ दिन हमें थोड़ी तकलीफहुई मगर धीरे धीरे वो पिताजी के कठोर अनुशासन में ढल गया. कुछ ही महीनों में उसकाकद कुछ इस तरह निकल कर आया कि लोग अब हमारे घर आने से डरने लगे. जितनी तेज़ी से उसकाशरीर बढ़ रहा था उतनी ही तेज़ी से उसकी खुराक भी बढ़ती जा रही थी. एक वक्त आ गया जब हमघर के सब लोग मिलकर जितनी रोटियां खाते थी, उतनी रोटियां अकेला जैकी खा लेता था. येवो वक्त था जब गेहूं एक रुपये का एक सेर (किलो से थोडा कम)-सवा सेर आया करता था.अचानक बाज़ार से गेहूं जैसे बिल्कुल लापता हो गया. किसी किसी दुकान में अगर थोड़ाबहुत गेहूं नज़र आता तो भाव होता ढाई रुपये सेर. कौन खरीदेगा ढाई रुपये सेर गेहूं?हर ओर त्राहि त्राहि मच गयी. बड़े बुज़ुर्ग छप्पने अकाल को याद कर कांप गए. तभी सुनाकि भारत और अमेरिका में एक संधि हुई है पीएल 870. इस संधि के तहत अमेरिका भारत कोवो गेहूं देगा जो बेकार हो चुका है. अमेरिका उस गेहूं को समंदर में फेंकने की बजायभारत को देगा और भारत में उस गेहूं को राशन की दुकानों के ज़रिए जनता को बेचाजायेगा. राशन की दुकान से एक रुपये का डेढ़ सेर भाव का ये गेहूं सबसे पहले मैं लेकरआया तो घर के सब लोगों ने कहा ये तो लाल रंग का है, इसकी रोटी कैसी बनेगी? साफ़ करकेपिसवाया गया. जब मेरी माँ ने रोटी बनाने के लिए आटा लगाया तो बोलीं “इसमें तो नजाने कैसी बदबू आ रही है”. पिताजी बोले “तुम्हें वहम हो गया है, मुझे तो नहीं आ रहीबदबू”. हम लोग खाने बैठे तो कौर गले से नीचे उतारना मुश्किल हो गया. पिताजी, भाईसाहब और मैं जैसे तैसे आधा अधूरा खाना खाकर उठ गए. मां ने कहा “अरे ! इस तरह कैसेचलेगा? आप लोगों ने तो पेट भर खाना भी नहीं खाया.” पिताजी बोले “इस गेहूं का स्वादकुछ अलग है, चिंता मत करो, थोड़े दिनों में इसकी आदत पड़ जायेगी.” भाई साहब ने भीपिताजी की हाँ में हाँ मिलाई और मैंने भी मगर मन ही मन हम सब सोच रहे थे कि येरोटियां हम लोग कैसे खा पायेंगे? कैसे आदत पड़ेगी इन लाल लाल रोटियों की? खाना बनानेके बाद मां खाने बैठीं, उस से पहले उन्होंने जैकी के बर्तन में थोड़े दूध में चूर करवही लाल लाल रोटियां डालीं. जैकी को भी भूख लग गयी थी शायद. वो तेज़ी से आगे बढ़ा.बर्तन के पास पहुंचा उसे सूंघा और पीछे हट गया. माँ ने हम सबको पुकारा “अरे इधर आओतो सब लोग” हम लोग वहां पहुंचे तो देखा जैकी के बर्तन में दूध रोटी रखी हुई है औरवो कभी अपने बर्तन की ओर देख रहा है और कभी हमारे मुंह की तरफ. पिताजी बोले “भूखनहीं लगी होगी इसे, भूख लगेगी तो अपने आप खा लेगा.” मैं और भाई साहब पढ़ाई में लग गएमगर दोनों थोड़ी थोड़ी देर में उठ उठ कर किसी न किसी बहाने अंदर जाते और देखते किजैकी ने रोटी खाई या नहीं? नहीं. अभी भी नहीं खाई. अभी भी नहीं खाई. रात को सोने सेपहले मैं फिर से जैकी के पास गया, उसने गर्दन उठाई, एक बार अपने बर्तन में पड़ी उनलाल लाल रोटियों को देखा और फिर न जाने कैसी नज़रों से मेरी ओर देखा. फिर गर्दन नीचेज़मीन पर टिकाकर बैठ गया. दूसरे दिन सुबह उठते ही हम सबने देखा कि जैकी अभी भी अपनेखाने के कटोरे के पास बैठा है, मगर रोटियों के उसने मुंह तक नहीं लगाया है. अब हमसबको चिंता होने लगी कि जैकी को क्या खिलाया जाए? पिताजी ने कहा “इसका बर्तन साफ़करके कुछ ज़्यादा दूध डालकर ताज़ा रोटियां डालो उसमें”. मां ने थोड़ा चने का बेसनमिलाकर उस लाल आटे की रोटियां बनाईं. हम सबने जैसे तैसे वो खा लीं, करते भी क्या?हर घर की यही कहानी थी. सभी लोग उसी पी एल 870 गेहूं की रोटियां खा रहे थे. हर रोज़हर तरफ इन्हीं रोटियों की चर्चा थी. कोई कहता उसे ये लाल गेहूं की रोटियां खाकरउल्टियां होती हैं, कोई कहता इन रोटियों की वजह से उसके शरीर पर चकत्ते होने लगेहैं और कोई कहता लाल गेहूं के कारण उसकी भूख आधी रह गयी है. यानि सब इनसे परेशान थेमगर हमारी परेशानी बाकी लोगों से कहीं ज्यादा थी. हम लोग तो जैसे तैसे अक्सर छाछ केसाथ इन लाल रोटियों को निगल लेते थे मगर जैकी ने तो जैसे क़सम खा ली थी इन रोटियोंके मुंह न लगाने की. घर में एक गाय थी, उस गाय का सबके हिस्से का दूध जैकी कोपिलाया जा रहा था. फिर भी हमें महसूस होता था कि जैकी का पेट हम नहीं भर पा रहेहैं. ज्वार, बाजरा, चना, जौ सभी प्रकार के अनाज धीरे धीरे बाज़ार से गायब हो गए थे.हमें लगा, शायद जैकी को हम नहीं बचा पायेंगे. लोगों के सामने अपनी ये समस्या रखतेतो कोई भी उसे उतनी गंभीरता से नहीं लेता जितनी गंभीर ये समस्या हमें लग रही थी.जिसके भी सामने बात होती, वो यही कहता “हुंह, अच्छे अच्छे पैसेवालों के नाज़ुक नाज़ुकबच्चे इसी लाल गेहूं के आटे की बनी रोटियां खा रहे हैं, आपका कुत्ता ऐसा क्या लाटसाहब है कि इसे फार्मी गेहूं की रोटियां चाहिए?” हमारे पास इस बात का कोई जवाब नहींथा मगर हम लोग महसूस कर रहे थे कि जैकी बहुत तेज़ी से कमज़ोर होता जा रहा है. आखिर हमसबने बैठकर तय किया कि हम सब अपने खर्चों में थोड़ी थोड़ी कटौती करेंगे और उस बचतकिये हुए पैसे से ढाई रुपये सेर का महंगा गेहूं खरीदा जाएगा, उसे घर में ही पीसाजाएगा(क्योंकि चक्की पर पिसवाने देने पर उसमें मिलावट हो जाने का डर था) और उस आटेकी रोटियां जैकी को खिलाई जाएंगी. उन दिनों हम दोनों भाइयों को महीने में दोफ़िल्में देखने की इजाज़त थी. हमने तय किया कि हम तीन महीने में एक फिल्म ही देखेंगेक्योंकि इसके अलावा हमारे ऐसे कोई खर्चे थे ही नहीं जिनमें कटौती की जा सके. शुरूसे ही घर की व्यवस्था इस प्रकार की थी कि हमें ज़रूरत की हर चीज़ मुहैया करवाई जातीथी और ज़रूरत होने पर नकद पैसे भी दिए जाते थे मगर आम तौर पर दूसरे बच्चों की तरहजेबखर्च के नाम पर कोई निश्चित रकम हर महीने नहीं दी जाती थी. जैकी की सेहत फार्मीगेहूं की रोटियां खाकर लौटने लगी थी मगर तब तक के जीवन में शायद पहली बार मुझे लगा,सच्चाई, ईमानदारी, अनुशासन सब कुछ एक अच्छे चरित्र का ज़रूरी हिस्सा हैं मगर पैसा भीइस दुनिया में बिल्कुल महत्वहीन नहीं है. रेडियो जुबानी की पहली किस्त ज़िंदगी नेछोटी सी अवस्था में एक नया पाठ पढ़ाने की कोशिश की थी मगर मेरा भाग्य बहुत अच्छा थाकि इसी बीच एक ऐसी घटना मेरे जीवन में घटी, जिसने सिद्ध कर दिया कि नहीं, ज़िंदगी जोपाठ सिखाने की कोशिश कर रही है वो सही नहीं है. पिताजी की बार बार सुनाई हुई उसअंग्रेज़ी कहावत पर विश्वास और पक्का हो गया कि अगर आपने पैसा खो दिया तो कुछ भीनहीं खोया, अगर सेहत खो दी तो बहुत कुछ खो दिया और अगर चरित्र खो दिया तो सब कुछ खोदिया. स्कूल में अक्सर हम लोग देखते थे कि लड़के स्कूल से भागकर फिल्म देखने जायाकरते थे लेकिन फिल्म देखने के लिए हम दोनों भाइयों को कभी घरवालों से छुपकर नहींजाना पड़ता था क्योंकि पिताजी के सिद्धांत बहुत साफ़ और पारदर्शी थे. शुरू शुरू मेंजब हम लोग बहुत छोटे थे तो वो किसी अच्छी फिल्म के लगने पर खुद हमें फिल्म दिखानेले जाया करते थे, फिर थोड़े बड़े हुए तो पहले पिताजी फिल्म देखकर आया करते थे औरफिल्म अच्छी होने पर हम दोनों भाइयों को कहा करते थे कि जाओ फलां फिल्म देख आओ,अच्छी है, जब कुछ और बड़े हुए तो अपने अपने दोस्तों के साथ फिल्म देखने की भी छूट थीहमें. बस उनका कहना था, स्कूल के समय में सिनेमा मत देखो, जब भी सिनेमा देखना हो,इजाज़त की ज़रूरत नहीं है, बस उसकी सूचना घर में होनी चाहिए और कोशिश करो कि जिनदोस्तों के साथ जा रहे हो, वो भी अपने घर में इसकी सूचना दे दें ताकि उनकी वजह सेतुम्हें कोई शर्मिंदगी न उठानी पड़े. उन दिनों जैकी के लिए फार्मी गेहूं की रोटियांजुटाने के लिए हम लोग फिल्म के उपवास पर चल रहे थे. यानि तीन महीनों में सिर्फ एकफिल्म. बड़ी कड़की का दौर था. रेडियो जुबानी की दूसरी किस्त इसी बीच मेरे तीन बेस्टफ्रेंड्स ने मेरे सामने फिल्म देखने का प्रस्ताव रखा. ये तीनों ही मित्र बहुतधनाढ्य पिताओं के सुपुत्र थे. निर्मल धारीवाल के पिताजी का के ईएम् रोड पर बहुत बड़ाशो रूम था, हरि प्रसाद मोहता के पिताजी का कानपुर में लंबा चौड़ा व्यापार था और मैंपाठकों से माफी चाहूंगा कि अपने तीसरे मित्र का नाम नहीं लिख पाऊंगा क्योंकि उनकेपिता अब इस दुनिया में नहीं हैं. और मेरे वो मित्र आज भी मेरे संपर्क में है औरबचपन की उस मित्रता को वही नहीं उनका पूरा परिवार पूरी ईमानदारी से निभा रहा है. आजअगर मैं उनका नाम लिखता हूं तो शायद कहीं उनकी भावनाओं को चोट पहुंचे, जो मैं कतईनहीं चाहूंगा. बस इतना ही कहूंगा कि मेरे तीसरे मित्र के पिता बीकानेर के माने हुएएडवोकेट थे. इन तीनों मित्रों के सामने धन कोई समस्या नहीं था. सौभाग्य से मुझे भीपिछली फिल्म देखे तीन महीने हो रहे थे. इसलिए फिल्म देखने पर मेरे व्रत के टूटने काभी कोई डर नहीं था. हरि ने अपने भाई के साथ घर सूचना भेज दी कि वो फिल्म देखने जारहा है, थोड़ा देर से घर लौटेगा, निर्मल महाराज को इसकी भी ज़रूरत महसूस नहीं हुई,उसने कहा “घर जाकर बता दूंगा”. मेरा घर स्कूल से ज़्यादा दूर नहीं था मगर सूचना तोदेनी ही थी. निर्मल और हरि ने मुझे कहा “तुम फटाफट सूचना करके प्रकाश चित्र थियेटरपहुंचो हम तब तक टिकट खरीदकर रखते हैं. अब समस्या थी एडवोकेट साहब के सुपुत्र की.उन्होंने कहा “मैं अगर पिताजी के पास जाकर पूछता हूं तो मुझे इजाज़त तो नहीं हीमिलेगी, उलटे डॉट पड़ जाएगी. हां तुम सब लोग मेरे साथ मेरे घर चलो तो शायद मेरेपिताजी कुछ न कहें और इजाज़त दे दें.” मैंने कहा “ठीक है, मैं घर सूचना देकर आपलोगों से प्रकाश चित्र में मिलता हूं फिर हम सब इनके घर चलेंगे”. रेडियो जुबानी कीतीसरी किस्त मैंने अपनी साइकिल उठाई और घर जा पहुंचा. पिताजी घर पर नहीं थे मगरमुझे इस बात की कोई फ़िक्र नहीं थी, क्योंकि मुझे इजाज़त तो लेनी नहीं थी सिर्फ सूचनाभर देनी थी. मैंने मां को बताया कि मैं फिल्म देखने जा रहा हूं और मुझे लौटने मेंथोड़ी देर होगी. बस मैंने अपनी साइकिल उठाई और चल पड़ा फिल्म देखने की की ओर. उनदिनों बीकानेर में न तो वन वे का चक्कर था, न इतने मोटर साइकिल, स्कूटर तो शायदपैदा भी नहीं हुआ था और कारें सिर्फ महाराजा करनी सिंह जी के पास और दो चार शहर केवणिक-पुत्रों के पास थीं. लगभग 20 मिनट में मैं घर सूचना देकर आराम से प्रकाशचित्रपहुंच गया. देखा, निर्मल के हाथ में सिनेमा के चार टिकट मौजूद थे. आज की पीढ़ी केबच्चे, जिनके सामने टी वी पर देश-विदेश के 25-50 चैनल चौबीसों घंटे एक के बाद एक हरभाषा की फ़िल्में परोसते रहते है, इसके अलावा सी डी, डी वी डी, ब्ल्यू रे, पैनड्राइव, पोर्टेबल हार्ड ड्राइव न जाने कितने साधन मौजूद हैं,जिनमें सहेजकर अपनीपसंद की फ़िल्में वो जब चाहें देख सकते हैं, वो नहीं समझ सकते कि हमारे लिए उस ज़मानेमें फिल्म देखना किसी बहुत बड़े अभियान से कम नहीं होता था. विविध भारती पर जब किसीफिल्म के संवादों को काट-छांट कर सप्ताह में एक दिन चित्रध्वनि नामक प्रोग्राम मेंप्रसारित किया जाता था तो हर शहर, हर गांव में पान की दुकानों पर वो संवाद सुनने केलिए मेला लग जाया करता था. निर्मल के हाथ में फिल्म के टिकट देखकर विश्वास हो गयाथा कि अब तो फिल्म देखनी ही है, अब हमें फिल्म देखने से कौन रोक सकता है? मैंनेसाइकिल खड़ी की और निर्मल के पास पहुंचा कि मेरे तीसरे मित्र बोले “भायला (दोस्त)भूल गए क्या? अभी तो मेरे पिताजी से परमिशन लेनी है.”. निर्मल ने टिकट जेब में रखेऔर बोला, 'चलो इसके घर चलते हैं.' हम चारों ने अपनी अपनी साइकिल उठाई और चल पड़ेलक्ष्मी नाथ जी की घाटी की ओर. 10 मिनट में हम घर पहुँच गए. पूछा, पिताजी घर पर हैंक्या? माताजी ने कहा “हां हैं, बैठो तुम लोग, अभी आते हैं.” हम बेचैनी से कमरे मेंइधर से उधर चक्कर लगाने लगे, लगा देर हो रही है, फिल्म्स डिविज़न की न्यूज़ रील तोनिकल ही गयी होगी कहीं फिल्म का शुरू का हिस्सा भी न निकल जाए. उस समय रेडियो परन्यूज़ सुनने को तो आसानी से मिल जाती थी मगर न्यूज़ देखने को तभी मिलती थी जब फिल्मदेखने जाया करते थे. रेडियो जुबानी की चौथी किस्त थोड़ी ही देर में मेरे मित्र केपिताजी कमरे में आये हम चारों के चेहरों पर एक नज़र डाली और बोले “क्या बात है? आजतुम लोग इकट्ठे होकर कैसे आये हो?” उनके सुपुत्र ने पहले ही कह दिया था कि वो कुछभी नहीं बोलेंगे, जो कुछ कहना है, हम लोगों को कहना है. मुझे बड़ा अजीब लग रहाथा.... जिस खुले वातावरण में मैं पला था, उसमें इस तरह किसी को भी कठघरे में खड़ानहीं किया जाता. मैं चुपचाप खड़ा रहा क्योंकि अपने मित्र के पिताजी के सामने अपराधीकी तरह खड़े रहना मुझे बहुत अपमानजनक लग रहा था. निर्मल ने हिम्मत की और बोला “ जीअंकल हम चारों फिल्म देखने जाना चाहते हैं.” वो बोले “अच्छा? तुम तो धारीवाल जी केबेटे हो न?” “जी अंकल” “अपने घर पूछकर आये हो? फोन करूं धारीवाल जी को?” “अंकल मैंबाद में बता दूंगा पिताजी को”. “अच्छा... मतलब पूछकर नहीं आये हो!” इसके बाद वोमेरी तरफ मुड़े “हूं.... तुम भी बिना पूछे ही आये होगे क्योंकि तुम्हारे पिताजी तोअभी दफ्तर से आए नहीं होंगे” मैं अब तक के वार्तालाप से बहुत उद्विग्न हो गया था.किसी तरह अपनी उद्विग्नता पर नियंत्रण करते हुए मैंने कहा “जी अंकल मेरे घर मेंफिल्म देखने के लिए इजाज़त नहीं लेनी पड़ती, सिर्फ इसकी सूचना देनी पड़ती है, जो मैंघर जाकर अपनी मां को दे आया हूं.” वो बोले “अच्छा?तुम्हारे पिताजी से तो मैं बादमें बात करूँगा क्योंकि तुम्हारे घर तो फोन भी नहीं है. खैर, अभी ये बताओ कि टिकटले आये हो?” रेडियो जुबानी की 5वीं किस्त हमें लगा अभी वो कहेंगे अब जब टिकट ले हीआये हो तो जाओ, देख आओ. निर्मल ने झट से कहा- जी अंकल. वो बोले- कहां है टिकट?निर्मल ने जेब से टिकट निकालकर डरते डरते उनके सामने कर दिए. उन्होंने बहुत शान्तिसे निर्मल की हथेली पर से टिकट उठाए, दोनों हाथों से उन चारों टिकटों के टुकड़ेटुकड़े किए, उन टुकड़ों को खिड़की से बाहर फेंका और बोले, जाओ. काम करो अपना अपना, कोईफिल्म नहीं देखनी है. हम चारों के चारों सन्न रह गए. मुझे यकीन नहीं हो रहा था किसच में उन्होंने टिकट फाड़ दिए हैं, मुझे लगा उन्होंने कागज़ का कोई और टुकड़ा फाड़ाहै. अभी वो टिकट हमें लौटायेंगे और हंसकर कहेंगे......” अरे मैं तो मज़ाक कर रहा था,ये लो टिकट और जाओ.... आराम से फिल्म देखकर आओ.....” मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ.....तभीउनकी कड़कती हुई आवाज़ फिर से फिजा में गूंज गई. “पढ़ते लिखते तो कुछ हैं नहीं औरइन्हें फ़िल्में देखने को चाहिए. सुनाई नहीं दिया तुम लोगों को? जाओ अपना अपना कामकरो और भूल जाओ फिल्म देखना. और हां....तुम अंदर चलो” उनके आज्ञाकारी पुत्र चुपचापनज़रें नीची किये हुए अंदर चले गए. हम तीनों मरे हुई कदमों से उनके घर से बाहर आए.मुझे इतनी शर्मिंदगी हो रही थी कि लग रहा था ये ज़मीन फट जाए तो मैं इसमें समा जाऊं.क्योंकि इस तरह की कंडीशन से अपने तब तक के जीवन में पहली बार मेरा आमना सामना हुआथा. मगर न ज़मीन को फटना था और न वो फटी. रेडियो जुबानी की छठी किस्त मैं निर्मल औरहरि किसी तरह अपनी अपनी साइकिल तक पहुंचे और चुपचाप वहाँ से चल पड़े. इतना बड़ा झटकाहम तीनों के दिमाग को लगा था कि समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या कहकर एक दूसरे कोदिलासा दें? कोटगेट से हम तीनों के रास्ते अलग हो गए. हम तीनों ने खामोशी से एकदूसरे की तरफ देखा और अपने अपने रास्ते पर चल पड़े. रास्ते में मैं सोचने लगा, “अंकलके लिए सिनेमा के वो चार टिकट महज़ कागज़ के टुकड़े थे जिन्हें कुछ रुपये फेंककर खरीदाजा सकता है, जिनकी उनके पास कोई कमी नहीं है. उन्हें क्या पता कि मेरे लिए वो टिकटरुपयों के पर्याय नहीं थे. मेरे लिए वो टिकट मेरे तीन महीने इंतज़ार का मीठा सा फलथे...........”. रेडियो जुबानी की 7वीं किस्त साइकिल पर चलते चलते मैंने अपने आप सेकहा, “मैं ऐसा क्यों सोच रहा हूं? अगर मैं अपने प्यारे जैकी के लिए महीने में दोबार की बजाय तीन महीने में एक फिल्म देखने का निर्णय कर सकता हूं तो मैं छः महीनेफिल्म नहीं देखूंगा तो क्या बिगड़ जाएगा? कुछ भी नहीं. पिताजी कहते हैं, उपवास करनेसे चरित्र में दृढता आती है. मेरे इस उपवास से भी निश्चित रूप से मेरा चरित्र दृढहोगा. और अंकल ने कुछ पैसों का टिकट ही तो फाड़ा है न? कुछ पैसों के जाने का क्याअफ़सोस करना?” और मैंने मन ही मन एक बार फिर दोहरा दिया “अगर आपने पैसा खो दिया तोकुछ भी नहीं खोया, अगर सेहत खो दी तो बहुत कुछ खो दिया और अगर चरित्र खो दिया तो सबकुछ खो दिया.” मेरे मन को शान्ति मिल गई थी. मैं बहुत खुश खुश घर में घुसा तो मांने पूछा “अरे तुम इतनी जल्दी कैसे लौट आये? तुम तो फिल्म देखने जाने वाले थे न?”मैंने हंसते हुए जवाब दिया “आज की फिल्म बहुत छोटी थी मगर बहुत अच्छी और शिक्षाप्रदथी.” मेरी सीधी सादी भोली भाली मां को कुछ समझ नहीं आया मगर उन्हें शायद इस बात सेकोई मतलब भी नहीं था कि मैंने कौन सी फिल्म देखी है और कौन सी नहीं. उन्हें तो मुझेखुश देखने से मतलब था. मैं खुश खुश सीढियां चढ़कर अपने मालिये की तरफ जा रहा था औरउनके संतुष्ट होने के लिए इतना काफी था.