'चौमासै में माछर खावै, अै दुःख जासी मूआं'
रेडियो जुबानी 11: जब चार दोस्त मिलकर फिल्म देखने पहुंचे और वहां मिले अड़ियल अंकल.
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फोटो - thelallantop
पेश है ‘दी लल्लनटॉप’ की नई सीरीज ‘रेडियो जुबानी’ की 11वीं किस्त. इस सीरीज में हम आपको महेंद्र मोदी के लिखे रेडियो से जुड़े किस्से पढ़ा रहे हैं. बीकानेर में पैदा हुए महेंद्र मोदी मुंबई में रहते हैं. रेडियो में 40 साल से ज्यादा का एक्सपीरियेंस है. विविध भारती मुंबई में लंबे वक्त तक सहायक केंद्र निदेशक रहे.
अब तक आप इस सीरीज की कई किस्तें पढ़ चुके हैं. अब पढ़िए कि जब चार दोस्त मिलकर फिल्म देखने पहुंचे और वहां मिले अड़ियल अंकल.
बचपन से पिताजी के मुंह से हमेशा एक अंग्रेज़ी कहावत सुना करता था कि अगर आपने पैसा खो दिया तो कुछ भी नहीं खोया. अगर सेहत खो दी तो बहुत कुछ खो दिया और अगर चरित्र खो दिया तो सब कुछ खो दिया. यानी इस दुनिया में सबसे कम महत्त्व पैसे का है. हमेशा कोशिश की कि इस बात पर पूरा भरोसा किया जाए लेकिन ज़िंदगी जो पाठ पढ़ाने की कोशिश पग पग पर करती है, वो इन कहावतों से बहुत अलग होते हैं. जैसे जैसे बड़ा होता गया, ये बार बार महसूस किया. फिर भी जो संस्कार माता-पिता से मिले वो इतनी गहराई तक उतरे हुए थे कि हर बार ज़िंदगी के हर ऐसे पाठ को नकारने की हिम्मत न जाने कहां से आ गई. जिसने ये सिखाने की कोशिश की कि पैसा ही इस दुनिया की सबसे महत्त्वपूर्ण चीज़ है और रिश्ते-नाते, प्यार-स्नेह, सब जिस धरातल पर टिके हुए हैं, उस धरातल का नाम है अर्थ. बचपन वैसे तो आराम से गुजरा मगर सीमित साधनों के बीच. पिताजी की कोआपरेटिव डिपार्टमेंट की नौकरी हमें दो वक्त की रोटी और सरकारी स्कूल की पढ़ाई तो दे सकती थी मगर हम न प्राइवेट स्कूल में पढ़ने के सपने देख सकते थे और न ही महंगे कपड़ों से भरी आलमारियों की कल्पना कर सकते थे. सन 1962 में पिताजी का तबादला बीकानेर हो गया था. घर में उस वक्त तक न बिजली थी और न ही पानी का कनेक्शन. मुस्लिम भिश्ती चमड़े की मशक में भरकर पानी लाया करते थे, जिसे उस ज़माने के छुआछूत मानने वाले बड़े से बड़े पण्डित भी पिया करते थे. नहाने धोने का पानी चमड़े की पखाल में भरकर ऊंट पर रखकर लाया जाता था. खाना बनाने के लिए फोग की लकडियां टाल(लकड़ी की दुकान) से खरीदकर लाई जाती थी. सर्दी के मौसम में जब ज़्यादा लकड़ी की ज़रूरत रहती थी. हम लोग बाहर खड़े होकर गावों से आने वाले लकड़ी के लादों(ऊंट पर लादे हुए लकड़ी के गट्ठर) का मोल-भाव करते थे और वाजिब लगने पर पूरा लादा खरीद लिया करते थे. उस ज़माने में बिना भूंगली के किसी रसोईघर की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. चाहे कितना भी धुंआ हो मैं, भाई साहब और पिताजी सर्दी के मौसम में शाम को तो रसोईघर में चूल्हे के पास ही बैठकर खाना खाया करते थे. खाना भी होता था और दुनिया जहान की बातें भी. जब-तब पिताजी अपने सरकारी सेवाकाल की कई बातें सुनाया करते थे. वो बताया करते थे कि वो पुलिस विभाग में सब-इन्स्पेक्टर थे मगर उन्होंने अपना तबादला कोआपरेटिव डिपार्टमेंट में करवा लिया क्योंकि पुलिस विभाग के भ्रष्ट माहौल में उनका दम घुटने लगा. वो अपने ईमान का सौदा किसी भी हालत में नहीं करना चाहते थे और ऊपर के अफसर चाहते थे कि वो स्वयं भी रिश्वत खाएं और उसका एक हिस्सा ऊपर भी पहुंचाएं. आखिरकार उन्होंने पुलिस विभाग ही छोड़ दिया. जब जब वो अपनी ईमानदारी के किस्से सुनाया करते थे, हम दोनों भाइयों के सीने गर्व से चौड़े हो जाते थे और हम घर में जहां तहां मुंह बाए अभावों को हंसते हंसते सहन करने को तैयार हो जाया करते थे. जीवन चल रहा था, हालांकि हर मौसम की अपनी अपनी तकलीफ थी. गर्मी में, बंद कमरे में,पसीने से लथ-पथ, लालटेन के सामने बैठकर होमवर्क किया करते थे तो कॉपियों पर लिखे गए अक्षर पसीने से फैल जाया करते थे. हाथ का पंखा झलें तो लिखने का काम कैसे करें? ऐसे में हवा का कोई झोंका गाहे ब गाहे आ जाता था तो पसीने से भीगे शरीर को तो एक ठंडा अहसास दे जाता था मगर लालटेन् झब-झब करने लग जाता था. आखिर उसे थोड़ी देर के लिए बुझाना पड़ता था. बारिश में तो हालत और भी खराब हो जाया करती थी क्योंकि सारे मच्छर और पतंगे लालटेन और उसके आस-पास बैठे हम लोगों पर टूट पड़ते थे. ऐसे में अक्सर पिताजी के मुंह से एक कहावत निकला करती थी, सियाले में सी लागै, उन्हाले चालै लूआं, चौमासै में माछर खावै, अै दुःख जासी मूआं यानि सर्दी के मौसम में सर्दी लगती है, गर्मी में लू चलती है, बारिश के मौसम में मच्छर काटते हैं. ये सारे दुःख तो तभी खत्म होंगे जब इस दुनिया से रुखसत होंगे. और हम बड़े संतुष्ट होकर फिर से पढ़ाई में मगन हो जाया करते थे. जब किसी समस्या का कोई हल है ही नहीं तो उसके बारे में सोचना क्या ? इन तकलीफों ने उन संस्कारों को कुछ और पुख्ता कर दिया जिनके बीज मां और पिताजी ने बचपन से हमारे भीतर रोपे थे. सच्चाई, ईमानदारी, समय की पाबंदी, अनुशासन उन्होंने हमें भाषण देकर सिखाने की कोशिश नहीं की बल्कि स्वयं इनका पालन कर हमारे सामने ऐसे उदाहरण रखे कि ये सारे मूल्य खुदबखुद हमारे जीवन का ज़रूरी हिस्सा बन गए. यदा कदा छोटे-मोटे अभावों के बीच जीते जीते पता नहीं कैसे एक मंहगा शौक़ हम लोगों ने पाल लिया. पिताजी एक दिन एक जर्मन शेफर्ड पिल्ला लेकर आये तो हम सब लोग बहुत खुश हो गए. एक वक्त आ गया जब हम घर के सब लोग मिलकर जितनी रोटियां खाते थी, उतनी रोटियां अकेला जैकी खा लेता था. ये वो वक्त था जब गेहूं एक रुपये का एक सेर (किलो से थोडा कम)-सवा सेर आया करता था. अचानक बाज़ार से गेहूं जैसे बिल्कुल लापता हो गया. किसी किसी दुकान में अगर थोड़ा बहुत गेहूं नज़र आता तो भाव होता ढाई रुपये सेर. कौन खरीदेगा ढाई रुपये सेर गेहूं? हर ओर त्राहि त्राहि मच गयी. बड़े बुज़ुर्ग छप्पने अकाल को याद कर कांप गए. तभी सुना कि भारत और अमेरिका में एक संधि हुई है पीएल 870. इस संधि के तहत अमेरिका भारत को वो गेहूं देगा जो बेकार हो चुका है. अमेरिका उस गेहूं को समंदर में फेंकने की बजाय भारत को देगा और भारत में उस गेहूं को राशन की दुकानों के ज़रिए जनता को बेचा जायेगा. राशन की दुकान से एक रुपये का डेढ़ सेर भाव का ये गेहूं सबसे पहले मैं लेकर आया तो घर के सब लोगों ने कहा ये तो लाल रंग का है, इसकी रोटी कैसी बनेगी? साफ़ करके पिसवाया गया. जब मेरी माँ ने रोटी बनाने के लिए आटा लगाया तो बोलीं “इसमें तो न जाने कैसी बदबू आ रही है”. पिताजी बोले “तुम्हें वहम हो गया है, मुझे तो नहीं आ रही बदबू”. हम लोग खाने बैठे तो कौर गले से नीचे उतारना मुश्किल हो गया. पिताजी, भाई साहब और मैं जैसे तैसे आधा अधूरा खाना खाकर उठ गए. मां ने कहा “अरे ! इस तरह कैसे चलेगा? आप लोगों ने तो पेट भर खाना भी नहीं खाया.” पिताजी बोले “इस गेहूं का स्वाद कुछ अलग है, चिंता मत करो, थोड़े दिनों में इसकी आदत पड़ जायेगी.” भाई साहब ने भी पिताजी की हाँ में हाँ मिलाई और मैंने भी मगर मन ही मन हम सब सोच रहे थे कि ये रोटियां हम लोग कैसे खा पायेंगे? कैसे आदत पड़ेगी इन लाल लाल रोटियों की? खाना बनाने के बाद मां खाने बैठीं, उस से पहले उन्होंने जैकी के बर्तन में थोड़े दूध में चूर कर वही लाल लाल रोटियां डालीं. जैकी को भी भूख लग गयी थी शायद. वो तेज़ी से आगे बढ़ा. बर्तन के पास पहुंचा उसे सूंघा और पीछे हट गया. माँ ने हम सबको पुकारा “अरे इधर आओ तो सब लोग” हम लोग वहां पहुंचे तो देखा जैकी के बर्तन में दूध रोटी रखी हुई है और वो कभी अपने बर्तन की ओर देख रहा है और कभी हमारे मुंह की तरफ. पिताजी बोले “भूख नहीं लगी होगी इसे, भूख लगेगी तो अपने आप खा लेगा.” मैं और भाई साहब पढ़ाई में लग गए मगर दोनों थोड़ी थोड़ी देर में उठ उठ कर किसी न किसी बहाने अंदर जाते और देखते कि जैकी ने रोटी खाई या नहीं? नहीं. अभी भी नहीं खाई. अभी भी नहीं खाई. रात को सोने से पहले मैं फिर से जैकी के पास गया, उसने गर्दन उठाई, एक बार अपने बर्तन में पड़ी उन लाल लाल रोटियों को देखा और फिर न जाने कैसी नज़रों से मेरी ओर देखा. फिर गर्दन नीचे ज़मीन पर टिकाकर बैठ गया. दूसरे दिन सुबह उठते ही हम सबने देखा कि जैकी अभी भी अपने खाने के कटोरे के पास बैठा है, मगर रोटियों के उसने मुंह तक नहीं लगाया है. घर में एक गाय थी, उस गाय का सबके हिस्से का दूध जैकी को पिलाया जा रहा था. फिर भी हमें महसूस होता था कि जैकी का पेट हम नहीं भर पा रहे हैं. ज्वार, बाजरा, चना, जौ सभी प्रकार के अनाज धीरे धीरे बाज़ार से गायब हो गए थे. हमें लगा, शायद जैकी को हम नहीं बचा पायेंगे. लोगों के सामने अपनी ये समस्या रखते तो कोई भी उसे उतनी गंभीरता से नहीं लेता जितनी गंभीर ये समस्या हमें लग रही थी. जिसके भी सामने बात होती, वो यही कहता “हुंह, अच्छे अच्छे पैसेवालों के नाज़ुक नाज़ुक बच्चे इसी लाल गेहूं के आटे की बनी रोटियां खा रहे हैं, आपका कुत्ता ऐसा क्या लाट साहब है कि इसे फार्मी गेहूं की रोटियां चाहिए?” उन दिनों हम दोनों भाइयों को महीने में दो फ़िल्में देखने की इजाज़त थी. हमने तय किया कि हम तीन महीने में एक फिल्म ही देखेंगे क्योंकि इसके अलावा हमारे ऐसे कोई खर्चे थे ही नहीं जिनमें कटौती की जा सके. शुरू से ही घर की व्यवस्था इस प्रकार की थी कि हमें ज़रूरत की हर चीज़ मुहैया करवाई जाती थी और ज़रूरत होने पर नकद पैसे भी दिए जाते थे मगर आम तौर पर दूसरे बच्चों की तरह जेबखर्च के नाम पर कोई निश्चित रकम हर महीने नहीं दी जाती थी. जैकी की सेहत फार्मी गेहूं की रोटियां खाकर लौटने लगी थी मगर तब तक के जीवन में शायद पहली बार मुझे लगा, सच्चाई, ईमानदारी, अनुशासन सब कुछ एक अच्छे चरित्र का ज़रूरी हिस्सा हैं मगर पैसा भी इस दुनिया में बिल्कुल महत्वहीन नहीं है. रेडियो जुबानी की पहली किस्त ज़िंदगी ने छोटी सी अवस्था में एक नया पाठ पढ़ाने की कोशिश की थी मगर मेरा भाग्य बहुत अच्छा था कि इसी बीच एक ऐसी घटना मेरे जीवन में घटी, जिसने सिद्ध कर दिया कि नहीं, ज़िंदगी जो पाठ सिखाने की कोशिश कर रही है वो सही नहीं है. पिताजी की बार बार सुनाई हुई उस अंग्रेज़ी कहावत पर विश्वास और पक्का हो गया कि अगर आपने पैसा खो दिया तो कुछ भी नहीं खोया, अगर सेहत खो दी तो बहुत कुछ खो दिया और अगर चरित्र खो दिया तो सब कुछ खो दिया. स्कूल में अक्सर हम लोग देखते थे कि लड़के स्कूल से भागकर फिल्म देखने जाया करते थे लेकिन फिल्म देखने के लिए हम दोनों भाइयों को कभी घरवालों से छुपकर नहीं जाना पड़ता था क्योंकि पिताजी के सिद्धांत बहुत साफ़ और पारदर्शी थे. शुरू शुरू में जब हम लोग बहुत छोटे थे तो वो किसी अच्छी फिल्म के लगने पर खुद हमें फिल्म दिखाने ले जाया करते थे, फिर थोड़े बड़े हुए तो पहले पिताजी फिल्म देखकर आया करते थे और फिल्म अच्छी होने पर हम दोनों भाइयों को कहा करते थे कि जाओ फलां फिल्म देख आओ, अच्छी है, जब कुछ और बड़े हुए तो अपने अपने दोस्तों के साथ फिल्म देखने की भी छूट थी हमें. बस उनका कहना था, स्कूल के समय में सिनेमा मत देखो, जब भी सिनेमा देखना हो, इजाज़त की ज़रूरत नहीं है, बस उसकी सूचना घर में होनी चाहिए और कोशिश करो कि जिन दोस्तों के साथ जा रहे हो, वो भी अपने घर में इसकी सूचना दे दें ताकि उनकी वजह से तुम्हें कोई शर्मिंदगी न उठानी पड़े. उन दिनों जैकी के लिए फार्मी गेहूं की रोटियां जुटाने के लिए हम लोग फिल्म के उपवास पर चल रहे थे. यानि तीन महीनों में सिर्फ एक फिल्म. बड़ी कड़की का दौर था. रेडियो जुबानी की दूसरी किस्त इसी बीच मेरे तीन बेस्ट फ्रेंड्स ने मेरे सामने फिल्म देखने का प्रस्ताव रखा. ये तीनों ही मित्र बहुत धनाढ्य पिताओं के सुपुत्र थे. निर्मल धारीवाल के पिताजी का के ईएम् रोड पर बहुत बड़ा शो रूम था, हरि प्रसाद मोहता के पिताजी का कानपुर में लंबा चौड़ा व्यापार था और मैं पाठकों से माफी चाहूंगा कि अपने तीसरे मित्र का नाम नहीं लिख पाऊंगा क्योंकि उनके पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं. और मेरे वो मित्र आज भी मेरे संपर्क में है और बचपन की उस मित्रता को वही नहीं उनका पूरा परिवार पूरी ईमानदारी से निभा रहा है. आज अगर मैं उनका नाम लिखता हूं तो शायद कहीं उनकी भावनाओं को चोट पहुंचे, जो मैं कतई नहीं चाहूंगा. बस इतना ही कहूंगा कि मेरे तीसरे मित्र के पिता बीकानेर के माने हुए एडवोकेट थे. इन तीनों मित्रों के सामने धन कोई समस्या नहीं था. सौभाग्य से मुझे भी पिछली फिल्म देखे तीन महीने हो रहे थे. इसलिए फिल्म देखने पर मेरे व्रत के टूटने का भी कोई डर नहीं था. हरि ने अपने भाई के साथ घर सूचना भेज दी कि वो फिल्म देखने जा रहा है, थोड़ा देर से घर लौटेगा, निर्मल महाराज को इसकी भी ज़रूरत महसूस नहीं हुई, उसने कहा “घर जाकर बता दूंगा”. मेरा घर स्कूल से ज़्यादा दूर नहीं था मगर सूचना तो देनी ही थी. निर्मल और हरि ने मुझे कहा “तुम फटाफट सूचना करके प्रकाश चित्र थियेटर पहुंचो हम तब तक टिकट खरीदकर रखते हैं. अब समस्या थी एडवोकेट साहब के सुपुत्र की. उन्होंने कहा “मैं अगर पिताजी के पास जाकर पूछता हूं तो मुझे इजाज़त तो नहीं ही मिलेगी, उलटे डॉट पड़ जाएगी. हां तुम सब लोग मेरे साथ मेरे घर चलो तो शायद मेरे पिताजी कुछ न कहें और इजाज़त दे दें.” मैंने कहा “ठीक है, मैं घर सूचना देकर आप लोगों से प्रकाश चित्र में मिलता हूं फिर हम सब इनके घर चलेंगे”. रेडियो जुबानी की तीसरी किस्त मैंने अपनी साइकिल उठाई और घर जा पहुंचा. पिताजी घर पर नहीं थे मगर मुझे इस बात की कोई फ़िक्र नहीं थी, क्योंकि मुझे इजाज़त तो लेनी नहीं थी सिर्फ सूचना भर देनी थी. मैंने मां को बताया कि मैं फिल्म देखने जा रहा हूं और मुझे लौटने में थोड़ी देर होगी. बस मैंने अपनी साइकिल उठाई और चल पड़ा फिल्म देखने की की ओर. उन दिनों बीकानेर में न तो वन वे का चक्कर था, न इतने मोटर साइकिल, स्कूटर तो शायद पैदा भी नहीं हुआ था और कारें सिर्फ महाराजा करनी सिंह जी के पास और दो चार शहर के वणिक-पुत्रों के पास थीं. लगभग 20 मिनट में मैं घर सूचना देकर आराम से प्रकाशचित्र पहुंच गया. देखा, निर्मल के हाथ में सिनेमा के चार टिकट मौजूद थे. आज की पीढ़ी के बच्चे, जिनके सामने टी वी पर देश-विदेश के 25-50 चैनल चौबीसों घंटे एक के बाद एक हर भाषा की फ़िल्में परोसते रहते है, इसके अलावा सी डी, डी वी डी, ब्ल्यू रे, पैन ड्राइव, पोर्टेबल हार्ड ड्राइव न जाने कितने साधन मौजूद हैं,जिनमें सहेजकर अपनी पसंद की फ़िल्में वो जब चाहें देख सकते हैं, वो नहीं समझ सकते कि हमारे लिए उस ज़माने में फिल्म देखना किसी बहुत बड़े अभियान से कम नहीं होता था. निर्मल ने टिकट जेब में रखे और बोला, 'चलो इसके घर चलते हैं.' हम चारों ने अपनी अपनी साइकिल उठाई और चल पड़े लक्ष्मी नाथ जी की घाटी की ओर. 10 मिनट में हम घर पहुँच गए. पूछा, पिताजी घर पर हैं क्या? माताजी ने कहा “हां हैं, बैठो तुम लोग, अभी आते हैं.” हम बेचैनी से कमरे में इधर से उधर चक्कर लगाने लगे, लगा देर हो रही है, फिल्म्स डिविज़न की न्यूज़ रील तो निकल ही गयी होगी कहीं फिल्म का शुरू का हिस्सा भी न निकल जाए. उस समय रेडियो पर न्यूज़ सुनने को तो आसानी से मिल जाती थी मगर न्यूज़ देखने को तभी मिलती थी जब फिल्म देखने जाया करते थे. रेडियो जुबानी की चौथी किस्त थोड़ी ही देर में मेरे मित्र के पिताजी कमरे में आये हम चारों के चेहरों पर एक नज़र डाली और बोले “क्या बात है? आज तुम लोग इकट्ठे होकर कैसे आये हो?” उनके सुपुत्र ने पहले ही कह दिया था कि वो कुछ भी नहीं बोलेंगे, जो कुछ कहना है, हम लोगों को कहना है. मुझे बड़ा अजीब लग रहा था.... जिस खुले वातावरण में मैं पला था, उसमें इस तरह किसी को भी कठघरे में खड़ा नहीं किया जाता. मैं चुपचाप खड़ा रहा क्योंकि अपने मित्र के पिताजी के सामने अपराधी की तरह खड़े रहना मुझे बहुत अपमानजनक लग रहा था. निर्मल ने हिम्मत की और बोला “ जी अंकल हम चारों फिल्म देखने जाना चाहते हैं.” वो बोले “अच्छा? तुम तो धारीवाल जी के बेटे हो न?” “जी अंकल” “अपने घर पूछकर आये हो? फोन करूं धारीवाल जी को?” “अंकल मैं बाद में बता दूंगा पिताजी को”. “अच्छा... मतलब पूछकर नहीं आये हो!” इसके बाद वो मेरी तरफ मुड़े “हूं.... तुम भी बिना पूछे ही आये होगे क्योंकि तुम्हारे पिताजी तो अभी दफ्तर से आए नहीं होंगे” मैं अब तक के वार्तालाप से बहुत उद्विग्न हो गया था. किसी तरह अपनी उद्विग्नता पर नियंत्रण करते हुए मैंने कहा “जी अंकल मेरे घर में फिल्म देखने के लिए इजाज़त नहीं लेनी पड़ती, सिर्फ इसकी सूचना देनी पड़ती है, जो मैं घर जाकर अपनी मां को दे आया हूं.” वो बोले “अच्छा?तुम्हारे पिताजी से तो मैं बाद में बात करूँगा क्योंकि तुम्हारे घर तो फोन भी नहीं है. खैर, अभी ये बताओ कि टिकट ले आये हो?” रेडियो जुबानी की 5वीं किस्त हमें लगा अभी वो कहेंगे अब जब टिकट ले ही आये हो तो जाओ, देख आओ. निर्मल ने झट से कहा- जी अंकल. वो बोले- कहां है टिकट? निर्मल ने जेब से टिकट निकालकर डरते डरते उनके सामने कर दिए. उन्होंने बहुत शान्ति से निर्मल की हथेली पर से टिकट उठाए, दोनों हाथों से उन चारों टिकटों के टुकड़े टुकड़े किए, उन टुकड़ों को खिड़की से बाहर फेंका और बोले, जाओ. काम करो अपना अपना, कोई फिल्म नहीं देखनी है. “पढ़ते लिखते तो कुछ हैं नहीं और इन्हें फ़िल्में देखने को चाहिए. सुनाई नहीं दिया तुम लोगों को? जाओ अपना अपना काम करो और भूल जाओ फिल्म देखना. और हां....तुम अंदर चलो” उनके आज्ञाकारी पुत्र चुपचाप नज़रें नीची किये हुए अंदर चले गए. हम तीनों मरे हुई कदमों से उनके घर से बाहर आए. मुझे इतनी शर्मिंदगी हो रही थी कि लग रहा था ये ज़मीन फट जाए तो मैं इसमें समा जाऊं. क्योंकि इस तरह की कंडीशन से अपने तब तक के जीवन में पहली बार मेरा आमना सामना हुआ था. मगर न ज़मीन को फटना था और न वो फटी. रेडियो जुबानी की छठी किस्त मैं निर्मल और हरि किसी तरह अपनी अपनी साइकिल तक पहुंचे और चुपचाप वहाँ से चल पड़े. इतना बड़ा झटका हम तीनों के दिमाग को लगा था कि समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या कहकर एक दूसरे को दिलासा दें? कोटगेट से हम तीनों के रास्ते अलग हो गए. हम तीनों ने खामोशी से एक दूसरे की तरफ देखा और अपने अपने रास्ते पर चल पड़े. रास्ते में मैं सोचने लगा, “अंकल के लिए सिनेमा के वो चार टिकट महज़ कागज़ के टुकड़े थे जिन्हें कुछ रुपये फेंककर खरीदा जा सकता है, जिनकी उनके पास कोई कमी नहीं है. उन्हें क्या पता कि मेरे लिए वो टिकट रुपयों के पर्याय नहीं थे. मेरे लिए वो टिकट मेरे तीन महीने इंतज़ार का मीठा सा फल थे...........”. रेडियो जुबानी की 7वीं किस्त साइकिल पर चलते चलते मैंने अपने आप से कहा, “मैं ऐसा क्यों सोच रहा हूं? अगर मैं अपने प्यारे जैकी के लिए महीने में दो बार की बजाय तीन महीने में एक फिल्म देखने का निर्णय कर सकता हूं तो मैं छः महीने फिल्म नहीं देखूंगा तो क्या बिगड़ जाएगा? कुछ भी नहीं. पिताजी कहते हैं, उपवास करने से चरित्र में दृढता आती है. मेरे इस उपवास से भी निश्चित रूप से मेरा चरित्र दृढ होगा. और अंकल ने कुछ पैसों का टिकट ही तो फाड़ा है न? कुछ पैसों के जाने का क्या अफ़सोस करना?” और मैंने मन ही मन एक बार फिर दोहरा दिया “अगर आपने पैसा खो दिया तो कुछ भी नहीं खोया, अगर सेहत खो दी तो बहुत कुछ खो दिया और अगर चरित्र खो दिया तो सब कुछ खो दिया.”
बचपन से पिताजी के मुंह से हमेशा एक अंग्रेज़ी कहावत सुना करता था कि अगर आपने पैसा खो दिया तो कुछ भी नहीं खोया. अगर सेहत खो दी तो बहुत कुछ खो दिया और अगर चरित्र खो दिया तो सब कुछ खो दिया. यानी इस दुनिया में सबसे कम महत्त्व पैसे का है. हमेशा कोशिश की कि इस बात पर पूरा भरोसा किया जाए लेकिन ज़िंदगी जो पाठ पढ़ाने की कोशिश पग पग पर करती है, वो इन कहावतों से बहुत अलग होते हैं. जैसे जैसे बड़ा होता गया, ये बार बार महसूस किया. फिर भी जो संस्कार माता-पिता से मिले वो इतनी गहराई तक उतरे हुए थे कि हर बार ज़िंदगी के हर ऐसे पाठ को नकारने की हिम्मत न जाने कहां से आ गई. जिसने ये सिखाने की कोशिश की कि पैसा ही इस दुनिया की सबसे महत्त्वपूर्ण चीज़ है और रिश्ते-नाते, प्यार-स्नेह, सब जिस धरातल पर टिके हुए हैं, उस धरातल का नाम है अर्थ. बचपन वैसे तो आराम से गुजरा मगर सीमित साधनों के बीच. पिताजी की कोआपरेटिव डिपार्टमेंट की नौकरी हमें दो वक्त की रोटी और सरकारी स्कूल की पढ़ाई तो दे सकती थी मगर हम न प्राइवेट स्कूल में पढ़ने के सपने देख सकते थे और न ही महंगे कपड़ों से भरी आलमारियों की कल्पना कर सकते थे. सन 1962 में पिताजी का तबादला बीकानेर हो गया था. घर में उस वक्त तक न बिजली थी और न ही पानी का कनेक्शन. मुस्लिम भिश्ती चमड़े की मशक में भरकर पानी लाया करते थे, जिसे उस ज़माने के छुआछूत मानने वाले बड़े से बड़े पण्डित भी पिया करते थे. नहाने धोने का पानी चमड़े की पखाल में भरकर ऊंट पर रखकर लाया जाता था. खाना बनाने के लिए फोग की लकडियां टाल(लकड़ी की दुकान) से खरीदकर लाई जाती थी. सर्दी के मौसम में जब ज़्यादा लकड़ी की ज़रूरत रहती थी. हम लोग बाहर खड़े होकर गावों से आने वाले लकड़ी के लादों(ऊंट पर लादे हुए लकड़ी के गट्ठर) का मोल-भाव करते थे और वाजिब लगने पर पूरा लादा खरीद लिया करते थे. उस ज़माने में बिना भूंगली के किसी रसोईघर की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. चाहे कितना भी धुंआ हो मैं, भाई साहब और पिताजी सर्दी के मौसम में शाम को तो रसोईघर में चूल्हे के पास ही बैठकर खाना खाया करते थे. खाना भी होता था और दुनिया जहान की बातें भी. जब-तब पिताजी अपने सरकारी सेवाकाल की कई बातें सुनाया करते थे. वो बताया करते थे कि वो पुलिस विभाग में सब-इन्स्पेक्टर थे मगर उन्होंने अपना तबादला कोआपरेटिव डिपार्टमेंट में करवा लिया क्योंकि पुलिस विभाग के भ्रष्ट माहौल में उनका दम घुटने लगा. वो अपने ईमान का सौदा किसी भी हालत में नहीं करना चाहते थे और ऊपर के अफसर चाहते थे कि वो स्वयं भी रिश्वत खाएं और उसका एक हिस्सा ऊपर भी पहुंचाएं. आखिरकार उन्होंने पुलिस विभाग ही छोड़ दिया. जब जब वो अपनी ईमानदारी के किस्से सुनाया करते थे, हम दोनों भाइयों के सीने गर्व से चौड़े हो जाते थे और हम घर में जहां तहां मुंह बाए अभावों को हंसते हंसते सहन करने को तैयार हो जाया करते थे. जीवन चल रहा था, हालांकि हर मौसम की अपनी अपनी तकलीफ थी. गर्मी में, बंद कमरे में,पसीने से लथ-पथ, लालटेन के सामने बैठकर होमवर्क किया करते थे तो कॉपियों पर लिखे गए अक्षर पसीने से फैल जाया करते थे. हाथ का पंखा झलें तो लिखने का काम कैसे करें? ऐसे में हवा का कोई झोंका गाहे ब गाहे आ जाता था तो पसीने से भीगे शरीर को तो एक ठंडा अहसास दे जाता था मगर लालटेन् झब-झब करने लग जाता था. आखिर उसे थोड़ी देर के लिए बुझाना पड़ता था. बारिश में तो हालत और भी खराब हो जाया करती थी क्योंकि सारे मच्छर और पतंगे लालटेन और उसके आस-पास बैठे हम लोगों पर टूट पड़ते थे. ऐसे में अक्सर पिताजी के मुंह से एक कहावत निकला करती थी, सियाले में सी लागै, उन्हाले चालै लूआं, चौमासै में माछर खावै, अै दुःख जासी मूआं यानि सर्दी के मौसम में सर्दी लगती है, गर्मी में लू चलती है, बारिश के मौसम में मच्छर काटते हैं. ये सारे दुःख तो तभी खत्म होंगे जब इस दुनिया से रुखसत होंगे. और हम बड़े संतुष्ट होकर फिर से पढ़ाई में मगन हो जाया करते थे. जब किसी समस्या का कोई हल है ही नहीं तो उसके बारे में सोचना क्या ? इन तकलीफों ने उन संस्कारों को कुछ और पुख्ता कर दिया जिनके बीज मां और पिताजी ने बचपन से हमारे भीतर रोपे थे. सच्चाई, ईमानदारी, समय की पाबंदी, अनुशासन उन्होंने हमें भाषण देकर सिखाने की कोशिश नहीं की बल्कि स्वयं इनका पालन कर हमारे सामने ऐसे उदाहरण रखे कि ये सारे मूल्य खुदबखुद हमारे जीवन का ज़रूरी हिस्सा बन गए. यदा कदा छोटे-मोटे अभावों के बीच जीते जीते पता नहीं कैसे एक मंहगा शौक़ हम लोगों ने पाल लिया. पिताजी एक दिन एक जर्मन शेफर्ड पिल्ला लेकर आये तो हम सब लोग बहुत खुश हो गए. एक वक्त आ गया जब हम घर के सब लोग मिलकर जितनी रोटियां खाते थी, उतनी रोटियां अकेला जैकी खा लेता था. ये वो वक्त था जब गेहूं एक रुपये का एक सेर (किलो से थोडा कम)-सवा सेर आया करता था. अचानक बाज़ार से गेहूं जैसे बिल्कुल लापता हो गया. किसी किसी दुकान में अगर थोड़ा बहुत गेहूं नज़र आता तो भाव होता ढाई रुपये सेर. कौन खरीदेगा ढाई रुपये सेर गेहूं? हर ओर त्राहि त्राहि मच गयी. बड़े बुज़ुर्ग छप्पने अकाल को याद कर कांप गए. तभी सुना कि भारत और अमेरिका में एक संधि हुई है पीएल 870. इस संधि के तहत अमेरिका भारत को वो गेहूं देगा जो बेकार हो चुका है. अमेरिका उस गेहूं को समंदर में फेंकने की बजाय भारत को देगा और भारत में उस गेहूं को राशन की दुकानों के ज़रिए जनता को बेचा जायेगा. राशन की दुकान से एक रुपये का डेढ़ सेर भाव का ये गेहूं सबसे पहले मैं लेकर आया तो घर के सब लोगों ने कहा ये तो लाल रंग का है, इसकी रोटी कैसी बनेगी? साफ़ करके पिसवाया गया. जब मेरी माँ ने रोटी बनाने के लिए आटा लगाया तो बोलीं “इसमें तो न जाने कैसी बदबू आ रही है”. पिताजी बोले “तुम्हें वहम हो गया है, मुझे तो नहीं आ रही बदबू”. हम लोग खाने बैठे तो कौर गले से नीचे उतारना मुश्किल हो गया. पिताजी, भाई साहब और मैं जैसे तैसे आधा अधूरा खाना खाकर उठ गए. मां ने कहा “अरे ! इस तरह कैसे चलेगा? आप लोगों ने तो पेट भर खाना भी नहीं खाया.” पिताजी बोले “इस गेहूं का स्वाद कुछ अलग है, चिंता मत करो, थोड़े दिनों में इसकी आदत पड़ जायेगी.” भाई साहब ने भी पिताजी की हाँ में हाँ मिलाई और मैंने भी मगर मन ही मन हम सब सोच रहे थे कि ये रोटियां हम लोग कैसे खा पायेंगे? कैसे आदत पड़ेगी इन लाल लाल रोटियों की? खाना बनाने के बाद मां खाने बैठीं, उस से पहले उन्होंने जैकी के बर्तन में थोड़े दूध में चूर कर वही लाल लाल रोटियां डालीं. जैकी को भी भूख लग गयी थी शायद. वो तेज़ी से आगे बढ़ा. बर्तन के पास पहुंचा उसे सूंघा और पीछे हट गया. माँ ने हम सबको पुकारा “अरे इधर आओ तो सब लोग” हम लोग वहां पहुंचे तो देखा जैकी के बर्तन में दूध रोटी रखी हुई है और वो कभी अपने बर्तन की ओर देख रहा है और कभी हमारे मुंह की तरफ. पिताजी बोले “भूख नहीं लगी होगी इसे, भूख लगेगी तो अपने आप खा लेगा.” मैं और भाई साहब पढ़ाई में लग गए मगर दोनों थोड़ी थोड़ी देर में उठ उठ कर किसी न किसी बहाने अंदर जाते और देखते कि जैकी ने रोटी खाई या नहीं? नहीं. अभी भी नहीं खाई. अभी भी नहीं खाई. रात को सोने से पहले मैं फिर से जैकी के पास गया, उसने गर्दन उठाई, एक बार अपने बर्तन में पड़ी उन लाल लाल रोटियों को देखा और फिर न जाने कैसी नज़रों से मेरी ओर देखा. फिर गर्दन नीचे ज़मीन पर टिकाकर बैठ गया. दूसरे दिन सुबह उठते ही हम सबने देखा कि जैकी अभी भी अपने खाने के कटोरे के पास बैठा है, मगर रोटियों के उसने मुंह तक नहीं लगाया है. घर में एक गाय थी, उस गाय का सबके हिस्से का दूध जैकी को पिलाया जा रहा था. फिर भी हमें महसूस होता था कि जैकी का पेट हम नहीं भर पा रहे हैं. ज्वार, बाजरा, चना, जौ सभी प्रकार के अनाज धीरे धीरे बाज़ार से गायब हो गए थे. हमें लगा, शायद जैकी को हम नहीं बचा पायेंगे. लोगों के सामने अपनी ये समस्या रखते तो कोई भी उसे उतनी गंभीरता से नहीं लेता जितनी गंभीर ये समस्या हमें लग रही थी. जिसके भी सामने बात होती, वो यही कहता “हुंह, अच्छे अच्छे पैसेवालों के नाज़ुक नाज़ुक बच्चे इसी लाल गेहूं के आटे की बनी रोटियां खा रहे हैं, आपका कुत्ता ऐसा क्या लाट साहब है कि इसे फार्मी गेहूं की रोटियां चाहिए?” उन दिनों हम दोनों भाइयों को महीने में दो फ़िल्में देखने की इजाज़त थी. हमने तय किया कि हम तीन महीने में एक फिल्म ही देखेंगे क्योंकि इसके अलावा हमारे ऐसे कोई खर्चे थे ही नहीं जिनमें कटौती की जा सके. शुरू से ही घर की व्यवस्था इस प्रकार की थी कि हमें ज़रूरत की हर चीज़ मुहैया करवाई जाती थी और ज़रूरत होने पर नकद पैसे भी दिए जाते थे मगर आम तौर पर दूसरे बच्चों की तरह जेबखर्च के नाम पर कोई निश्चित रकम हर महीने नहीं दी जाती थी. जैकी की सेहत फार्मी गेहूं की रोटियां खाकर लौटने लगी थी मगर तब तक के जीवन में शायद पहली बार मुझे लगा, सच्चाई, ईमानदारी, अनुशासन सब कुछ एक अच्छे चरित्र का ज़रूरी हिस्सा हैं मगर पैसा भी इस दुनिया में बिल्कुल महत्वहीन नहीं है. रेडियो जुबानी की पहली किस्त ज़िंदगी ने छोटी सी अवस्था में एक नया पाठ पढ़ाने की कोशिश की थी मगर मेरा भाग्य बहुत अच्छा था कि इसी बीच एक ऐसी घटना मेरे जीवन में घटी, जिसने सिद्ध कर दिया कि नहीं, ज़िंदगी जो पाठ सिखाने की कोशिश कर रही है वो सही नहीं है. पिताजी की बार बार सुनाई हुई उस अंग्रेज़ी कहावत पर विश्वास और पक्का हो गया कि अगर आपने पैसा खो दिया तो कुछ भी नहीं खोया, अगर सेहत खो दी तो बहुत कुछ खो दिया और अगर चरित्र खो दिया तो सब कुछ खो दिया. स्कूल में अक्सर हम लोग देखते थे कि लड़के स्कूल से भागकर फिल्म देखने जाया करते थे लेकिन फिल्म देखने के लिए हम दोनों भाइयों को कभी घरवालों से छुपकर नहीं जाना पड़ता था क्योंकि पिताजी के सिद्धांत बहुत साफ़ और पारदर्शी थे. शुरू शुरू में जब हम लोग बहुत छोटे थे तो वो किसी अच्छी फिल्म के लगने पर खुद हमें फिल्म दिखाने ले जाया करते थे, फिर थोड़े बड़े हुए तो पहले पिताजी फिल्म देखकर आया करते थे और फिल्म अच्छी होने पर हम दोनों भाइयों को कहा करते थे कि जाओ फलां फिल्म देख आओ, अच्छी है, जब कुछ और बड़े हुए तो अपने अपने दोस्तों के साथ फिल्म देखने की भी छूट थी हमें. बस उनका कहना था, स्कूल के समय में सिनेमा मत देखो, जब भी सिनेमा देखना हो, इजाज़त की ज़रूरत नहीं है, बस उसकी सूचना घर में होनी चाहिए और कोशिश करो कि जिन दोस्तों के साथ जा रहे हो, वो भी अपने घर में इसकी सूचना दे दें ताकि उनकी वजह से तुम्हें कोई शर्मिंदगी न उठानी पड़े. उन दिनों जैकी के लिए फार्मी गेहूं की रोटियां जुटाने के लिए हम लोग फिल्म के उपवास पर चल रहे थे. यानि तीन महीनों में सिर्फ एक फिल्म. बड़ी कड़की का दौर था. रेडियो जुबानी की दूसरी किस्त इसी बीच मेरे तीन बेस्ट फ्रेंड्स ने मेरे सामने फिल्म देखने का प्रस्ताव रखा. ये तीनों ही मित्र बहुत धनाढ्य पिताओं के सुपुत्र थे. निर्मल धारीवाल के पिताजी का के ईएम् रोड पर बहुत बड़ा शो रूम था, हरि प्रसाद मोहता के पिताजी का कानपुर में लंबा चौड़ा व्यापार था और मैं पाठकों से माफी चाहूंगा कि अपने तीसरे मित्र का नाम नहीं लिख पाऊंगा क्योंकि उनके पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं. और मेरे वो मित्र आज भी मेरे संपर्क में है और बचपन की उस मित्रता को वही नहीं उनका पूरा परिवार पूरी ईमानदारी से निभा रहा है. आज अगर मैं उनका नाम लिखता हूं तो शायद कहीं उनकी भावनाओं को चोट पहुंचे, जो मैं कतई नहीं चाहूंगा. बस इतना ही कहूंगा कि मेरे तीसरे मित्र के पिता बीकानेर के माने हुए एडवोकेट थे. इन तीनों मित्रों के सामने धन कोई समस्या नहीं था. सौभाग्य से मुझे भी पिछली फिल्म देखे तीन महीने हो रहे थे. इसलिए फिल्म देखने पर मेरे व्रत के टूटने का भी कोई डर नहीं था. हरि ने अपने भाई के साथ घर सूचना भेज दी कि वो फिल्म देखने जा रहा है, थोड़ा देर से घर लौटेगा, निर्मल महाराज को इसकी भी ज़रूरत महसूस नहीं हुई, उसने कहा “घर जाकर बता दूंगा”. मेरा घर स्कूल से ज़्यादा दूर नहीं था मगर सूचना तो देनी ही थी. निर्मल और हरि ने मुझे कहा “तुम फटाफट सूचना करके प्रकाश चित्र थियेटर पहुंचो हम तब तक टिकट खरीदकर रखते हैं. अब समस्या थी एडवोकेट साहब के सुपुत्र की. उन्होंने कहा “मैं अगर पिताजी के पास जाकर पूछता हूं तो मुझे इजाज़त तो नहीं ही मिलेगी, उलटे डॉट पड़ जाएगी. हां तुम सब लोग मेरे साथ मेरे घर चलो तो शायद मेरे पिताजी कुछ न कहें और इजाज़त दे दें.” मैंने कहा “ठीक है, मैं घर सूचना देकर आप लोगों से प्रकाश चित्र में मिलता हूं फिर हम सब इनके घर चलेंगे”. रेडियो जुबानी की तीसरी किस्त मैंने अपनी साइकिल उठाई और घर जा पहुंचा. पिताजी घर पर नहीं थे मगर मुझे इस बात की कोई फ़िक्र नहीं थी, क्योंकि मुझे इजाज़त तो लेनी नहीं थी सिर्फ सूचना भर देनी थी. मैंने मां को बताया कि मैं फिल्म देखने जा रहा हूं और मुझे लौटने में थोड़ी देर होगी. बस मैंने अपनी साइकिल उठाई और चल पड़ा फिल्म देखने की की ओर. उन दिनों बीकानेर में न तो वन वे का चक्कर था, न इतने मोटर साइकिल, स्कूटर तो शायद पैदा भी नहीं हुआ था और कारें सिर्फ महाराजा करनी सिंह जी के पास और दो चार शहर के वणिक-पुत्रों के पास थीं. लगभग 20 मिनट में मैं घर सूचना देकर आराम से प्रकाशचित्र पहुंच गया. देखा, निर्मल के हाथ में सिनेमा के चार टिकट मौजूद थे. आज की पीढ़ी के बच्चे, जिनके सामने टी वी पर देश-विदेश के 25-50 चैनल चौबीसों घंटे एक के बाद एक हर भाषा की फ़िल्में परोसते रहते है, इसके अलावा सी डी, डी वी डी, ब्ल्यू रे, पैन ड्राइव, पोर्टेबल हार्ड ड्राइव न जाने कितने साधन मौजूद हैं,जिनमें सहेजकर अपनी पसंद की फ़िल्में वो जब चाहें देख सकते हैं, वो नहीं समझ सकते कि हमारे लिए उस ज़माने में फिल्म देखना किसी बहुत बड़े अभियान से कम नहीं होता था. निर्मल ने टिकट जेब में रखे और बोला, 'चलो इसके घर चलते हैं.' हम चारों ने अपनी अपनी साइकिल उठाई और चल पड़े लक्ष्मी नाथ जी की घाटी की ओर. 10 मिनट में हम घर पहुँच गए. पूछा, पिताजी घर पर हैं क्या? माताजी ने कहा “हां हैं, बैठो तुम लोग, अभी आते हैं.” हम बेचैनी से कमरे में इधर से उधर चक्कर लगाने लगे, लगा देर हो रही है, फिल्म्स डिविज़न की न्यूज़ रील तो निकल ही गयी होगी कहीं फिल्म का शुरू का हिस्सा भी न निकल जाए. उस समय रेडियो पर न्यूज़ सुनने को तो आसानी से मिल जाती थी मगर न्यूज़ देखने को तभी मिलती थी जब फिल्म देखने जाया करते थे. रेडियो जुबानी की चौथी किस्त थोड़ी ही देर में मेरे मित्र के पिताजी कमरे में आये हम चारों के चेहरों पर एक नज़र डाली और बोले “क्या बात है? आज तुम लोग इकट्ठे होकर कैसे आये हो?” उनके सुपुत्र ने पहले ही कह दिया था कि वो कुछ भी नहीं बोलेंगे, जो कुछ कहना है, हम लोगों को कहना है. मुझे बड़ा अजीब लग रहा था.... जिस खुले वातावरण में मैं पला था, उसमें इस तरह किसी को भी कठघरे में खड़ा नहीं किया जाता. मैं चुपचाप खड़ा रहा क्योंकि अपने मित्र के पिताजी के सामने अपराधी की तरह खड़े रहना मुझे बहुत अपमानजनक लग रहा था. निर्मल ने हिम्मत की और बोला “ जी अंकल हम चारों फिल्म देखने जाना चाहते हैं.” वो बोले “अच्छा? तुम तो धारीवाल जी के बेटे हो न?” “जी अंकल” “अपने घर पूछकर आये हो? फोन करूं धारीवाल जी को?” “अंकल मैं बाद में बता दूंगा पिताजी को”. “अच्छा... मतलब पूछकर नहीं आये हो!” इसके बाद वो मेरी तरफ मुड़े “हूं.... तुम भी बिना पूछे ही आये होगे क्योंकि तुम्हारे पिताजी तो अभी दफ्तर से आए नहीं होंगे” मैं अब तक के वार्तालाप से बहुत उद्विग्न हो गया था. किसी तरह अपनी उद्विग्नता पर नियंत्रण करते हुए मैंने कहा “जी अंकल मेरे घर में फिल्म देखने के लिए इजाज़त नहीं लेनी पड़ती, सिर्फ इसकी सूचना देनी पड़ती है, जो मैं घर जाकर अपनी मां को दे आया हूं.” वो बोले “अच्छा?तुम्हारे पिताजी से तो मैं बाद में बात करूँगा क्योंकि तुम्हारे घर तो फोन भी नहीं है. खैर, अभी ये बताओ कि टिकट ले आये हो?” रेडियो जुबानी की 5वीं किस्त हमें लगा अभी वो कहेंगे अब जब टिकट ले ही आये हो तो जाओ, देख आओ. निर्मल ने झट से कहा- जी अंकल. वो बोले- कहां है टिकट? निर्मल ने जेब से टिकट निकालकर डरते डरते उनके सामने कर दिए. उन्होंने बहुत शान्ति से निर्मल की हथेली पर से टिकट उठाए, दोनों हाथों से उन चारों टिकटों के टुकड़े टुकड़े किए, उन टुकड़ों को खिड़की से बाहर फेंका और बोले, जाओ. काम करो अपना अपना, कोई फिल्म नहीं देखनी है. “पढ़ते लिखते तो कुछ हैं नहीं और इन्हें फ़िल्में देखने को चाहिए. सुनाई नहीं दिया तुम लोगों को? जाओ अपना अपना काम करो और भूल जाओ फिल्म देखना. और हां....तुम अंदर चलो” उनके आज्ञाकारी पुत्र चुपचाप नज़रें नीची किये हुए अंदर चले गए. हम तीनों मरे हुई कदमों से उनके घर से बाहर आए. मुझे इतनी शर्मिंदगी हो रही थी कि लग रहा था ये ज़मीन फट जाए तो मैं इसमें समा जाऊं. क्योंकि इस तरह की कंडीशन से अपने तब तक के जीवन में पहली बार मेरा आमना सामना हुआ था. मगर न ज़मीन को फटना था और न वो फटी. रेडियो जुबानी की छठी किस्त मैं निर्मल और हरि किसी तरह अपनी अपनी साइकिल तक पहुंचे और चुपचाप वहाँ से चल पड़े. इतना बड़ा झटका हम तीनों के दिमाग को लगा था कि समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या कहकर एक दूसरे को दिलासा दें? कोटगेट से हम तीनों के रास्ते अलग हो गए. हम तीनों ने खामोशी से एक दूसरे की तरफ देखा और अपने अपने रास्ते पर चल पड़े. रास्ते में मैं सोचने लगा, “अंकल के लिए सिनेमा के वो चार टिकट महज़ कागज़ के टुकड़े थे जिन्हें कुछ रुपये फेंककर खरीदा जा सकता है, जिनकी उनके पास कोई कमी नहीं है. उन्हें क्या पता कि मेरे लिए वो टिकट रुपयों के पर्याय नहीं थे. मेरे लिए वो टिकट मेरे तीन महीने इंतज़ार का मीठा सा फल थे...........”. रेडियो जुबानी की 7वीं किस्त साइकिल पर चलते चलते मैंने अपने आप से कहा, “मैं ऐसा क्यों सोच रहा हूं? अगर मैं अपने प्यारे जैकी के लिए महीने में दो बार की बजाय तीन महीने में एक फिल्म देखने का निर्णय कर सकता हूं तो मैं छः महीने फिल्म नहीं देखूंगा तो क्या बिगड़ जाएगा? कुछ भी नहीं. पिताजी कहते हैं, उपवास करने से चरित्र में दृढता आती है. मेरे इस उपवास से भी निश्चित रूप से मेरा चरित्र दृढ होगा. और अंकल ने कुछ पैसों का टिकट ही तो फाड़ा है न? कुछ पैसों के जाने का क्या अफ़सोस करना?” और मैंने मन ही मन एक बार फिर दोहरा दिया “अगर आपने पैसा खो दिया तो कुछ भी नहीं खोया, अगर सेहत खो दी तो बहुत कुछ खो दिया और अगर चरित्र खो दिया तो सब कुछ खो दिया.”

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